
माधवी-प्रदानम् (Mādhavī Offered to Gālava) — Udyoga Parva 113
Upa-parva: Gālavopākhyāna (Mādhavī-episode) — Udyoga Parva
Nārada continues the embedded account of Gālava’s quest. After Garuḍa (Tārkṣya/Vainateya) delivers truthful counsel, King Yayāti reflects carefully and speaks. He welcomes Garuḍa and Gālava, declaring their arrival auspicious and crediting Garuḍa with rescuing his land and lineage. Yayāti admits his former wealth has diminished and that he cannot allow the visitors’ journey to be fruitless, nor can he bear to render a brāhmaṇa’s expectation false. He articulates a social-ethical principle: nothing is more blameworthy than telling a petitioner “give” and then “there is none,” because a disappointed, honored seeker may return in distress, harming familial continuity. To resolve the obligation, Yayāti offers his daughter Mādhavī—praised as virtuous and desired—as a means by which kings will provide bride-price, even kingdoms, and certainly the rare horses sought. Gālava accepts Mādhavī and departs; Garuḍa notes that a “door” to obtaining horses has been found and returns home. Gālava then proceeds to Ayodhyā to approach King Haryaśva (Ikṣvāku line), presenting Mādhavī and inviting consideration of the stated śulka.
Chapter Arc: नारद गालव के दैन्य और गुरु-ऋण की कथा छेड़ते हैं—विश्वामित्र के शिष्य गालव को गुरु-दक्षिणा चुकाने के लिए असंभव-सी याचना करनी पड़ती है। → गालव की बार-बार विनती से विश्वामित्र के भीतर क्षणिक क्रोध उठता है और वे ‘गुर्वर्थ’ हेतु श्यामकर्ण घोड़ों की मांग रख देते हैं; गालव के पास साधन नहीं, पर संकल्प अडिग है। नारद धन के ‘धारण’ करने वाले शाश्वत स्वरूप और दान-प्रतिग्रह की पात्रता का प्रतिपादन करते हुए कथा को राजाओं के द्वार तक ले जाते हैं। → नारद नहुषनन्दन (ययाति/नहुष-वंश) के समक्ष गालव का परिचय देते हैं—‘तपोनिधि’ शिष्य, विश्वामित्र का प्रिय, पर गुरु-आज्ञा से बंधा हुआ। राजा के सामने निर्णायक क्षण आता है: क्या वह इस असाध्य याचना को स्वीकार कर दान-धर्म निभाएगा? → नारद दान और प्रतिग्रह की परस्पर ‘पात्रता’ को शंख में क्षीर-न्याय से स्थापित करते हैं—गालव योग्य पात्र हैं, राजा योग्य दाता। घोड़े-दान के फल का महात्म्य (घोड़े के रोमों जितने लोक) कहकर राजा को उदारता की ओर प्रवृत्त करते हैं और गालव की यात्रा को आगे बढ़ाते हैं। → गालव की गुरु-दक्षिणा की शर्त अभी पूरी नहीं—अगले चरण में कौन-सा राजा/उपाय श्यामकर्ण घोड़ों की पूर्ति करेगा, यह प्रश्न खुला रहता है।
Verse 1
अत-#--#कत चतुर्दशाधिकशततमो< ध्याय: गरुड़ और गालवका राजा ययातिके यहाँ जाकर गुरुको देनेके लिये श्यामकर्ण घोड़ोंकी याचना करना नारद उवाच अथाह गालवं दीन सुपर्ण: पततां वर: । निर्मितं वह्निना भूमौ वायुना शोधितं तथा । यस्माद्धिरण्मयं सर्व हिरण्यं तेन चोच्यते,नारदजी कहते हैं--तदनन्तर पक्षियोंमें श्रेष्ठ गरुड़ने दीन-दुःखी गालव मुनिसे इस प्रकार कहा--'पृथ्वीके भीतर जो उसका सारतत्त्व है, उसे तपाकर अग्निने जिसका निर्माण किया है और उस अग्निको उद्दीप्त करनेवाली वायुने जिसका शोधन किया है, उस सुवर्णको हिरण्य कहते हैं। यह सम्पूर्ण जगत् हिरण्यप्रधान है; इसलिये भी उसे हिरण्य कहते हैं!
ନାରଦ କହିଲେ—ତାପରେ ପକ୍ଷୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସୁପର୍ଣ୍ଣ (ଗରୁଡ଼) ଦୁଃଖିତ ଗାଲବଙ୍କୁ କହିଲେ—“ପୃଥିବୀର ଭିତରେ ଥିବା ଯେ ସାରତତ୍ତ୍ୱ, ଅଗ୍ନି ତାହାକୁ ତାପି ଗଢ଼େ ଏବଂ ସେଇ ଅଗ୍ନିକୁ ଉଦ୍ଦୀପିତ କରୁଥିବା ବାୟୁ ତାହାକୁ ଶୋଧନ କରେ—ସେଇ ସୁବର୍ଣ୍ଣକୁ ‘ହିରଣ୍ୟ’ କୁହାଯାଏ। ଯେହେତୁ ସମଗ୍ର ଜଗତ ହିରଣ୍ୟ-ତତ୍ତ୍ୱରେ ବ୍ୟାପ୍ତ, ତେଣୁ ଏହାକୁ ମଧ୍ୟ ‘ହିରଣ୍ୟ’ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।”
Verse 2
धत्ते धारयते चेदमेतस्मात् कारणाद् धनम् । तदेतत् त्रिषु लोकेषु धनं तिष्ठति शाश्वतम्,“वह इस जगत्को स्वयं तो धारण करता ही है, दूसरोंसे भी धारण कराता है। इस कारण उस सुवर्णका नाम धन, है। यह धन तीनों लोकोंमें सदा स्थित रहता है
ଏହା ନିଜେ ଧାରଣ କରେ ଏବଂ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଧାରଣ କରାଏ; ଏହି କାରଣରୁ ଏହାକୁ ‘ଧନ’ କୁହାଯାଏ। ଏହି ଧନ—ସୁବର୍ଣ୍ଣ—ତିନି ଲୋକରେ ସଦା ସ୍ଥିତ ରହେ।
Verse 3
नित्य॑ प्रोष्ठपदा भ्यां च शुक्रे धनपतौ तथा । मनुष्येभ्य: समादत्ते शुक्रश्ित्तार्जितं धनम्,द्विजश्रेष्ठ! पूर्वभाद्रपद और उत्तरभाद्रपद इन दो नक्षत्रोंमेंसे किसी एकके साथ शुक्रवारका योग हो तो अग्निदेव कुबेरके लिये अपने संकल्पसे धनका निर्माण करके उसे मनुष्योंको दे देते हैं। पूर्वभाद्रपदके देवता अजैकपाद, उत्तरभाद्रपदके देवता अहिर्बुध्न्य और कुबेर--ये तीनों उस धनकी रक्षा करते हैं। इस प्रकार किसीको भी ऐसा धन नहीं मिल सकता, जो प्रारब्धवश उसे मिलनेवाला न हो और धनके बिना तुम्हें श्यामकर्ण घोड़ोंकी प्राप्ति नहीं हो सकती
ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ପୂର୍ବଭାଦ୍ରପଦ କିମ୍ବା ଉତ୍ତରଭାଦ୍ରପଦ—ଏହି ଦୁଇ ପ୍ରୋଷ୍ଠପଦା ନକ୍ଷତ୍ରରୁ ଯେକୌଣସି ଗୋଟିଏ ସହ ଯଦି ଶୁକ୍ରବାରର ଯୋଗ ହୁଏ, ତେବେ ଧନପତି କୁବେର ନିଜ ସଙ୍କଳ୍ପରେ ଧନ ସୃଷ୍ଟି କରି ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କୁ ପ୍ରାପ୍ତ କରାନ୍ତି। କିନ୍ତୁ ଯାହା ଭାଗ୍ୟରେ ନିୟତ ନୁହେଁ, ତାହା କେହି ପାଉନାହିଁ; ଏବଂ ଧନ ବିନା ତୁମେ ଶ୍ୟାମକର୍ଣ୍ଣ ଅଶ୍ୱମାନେ ମଧ୍ୟ ପାଇବ ନାହିଁ।
Verse 4
अजैकपादहिर्बुध्न्यै रक्ष्यते धनदेन च । एवं न शक््यते लब्धुमलब्धव्यं द्विजर्षभ । ऋते च धनमश्चानां नावाप्तिविद्यते तव,द्विजश्रेष्ठ! पूर्वभाद्रपद और उत्तरभाद्रपद इन दो नक्षत्रोंमेंसे किसी एकके साथ शुक्रवारका योग हो तो अग्निदेव कुबेरके लिये अपने संकल्पसे धनका निर्माण करके उसे मनुष्योंको दे देते हैं। पूर्वभाद्रपदके देवता अजैकपाद, उत्तरभाद्रपदके देवता अहिर्बुध्न्य और कुबेर--ये तीनों उस धनकी रक्षा करते हैं। इस प्रकार किसीको भी ऐसा धन नहीं मिल सकता, जो प्रारब्धवश उसे मिलनेवाला न हो और धनके बिना तुम्हें श्यामकर्ण घोड़ोंकी प्राप्ति नहीं हो सकती
ସେ ଧନ ଅଜୈକପାଦ, ଅହିର୍ବୁଧ୍ନ୍ୟ ଏବଂ ଧନଦ (କୁବେର) ଦ୍ୱାରା ରକ୍ଷିତ। ତେଣୁ, ହେ ଦ୍ୱିଜର୍ଷଭ! ଯାହା ଅଲବ୍ଧବ୍ୟ, ତାହା ପ୍ରାପ୍ତ କରିବା ସମ୍ଭବ ନୁହେଁ। ଏବଂ ଧନ ବିନା, ହେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ, ତୁମ ପାଇଁ ଅଶ୍ୱପ୍ରାପ୍ତି ମଧ୍ୟ ନାହିଁ।
Verse 5
स त्वं याचात्र राजानं कंचिद् राजर्षिवंशजम् | अपीड्य राजा पौरान् हि यो नौ कुर्यात् कृतार्थिनौ,“इसलिये मेरी राय यह है कि तुम राजर्षियोंके कुलमें उत्पन्न हुए किसी ऐसे राजाके पास चलकर धनके लिये याचना करो, जो पुरवासियोंको पीड़ा दिये बिना ही हम दोनोंको धन देकर कृतार्थ कर सके
ଏହିହେତୁ ରାଜର୍ଷିବଂଶଜ ଏମିତି କୌଣସି ରାଜାଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ଧନ ଯାଚନା କର; ଯେ ନଗରବାସୀମାନଙ୍କୁ ପୀଡ଼ା ନଦେଇ ଆମ ଦୁହେଁକୁ ଧନ ଦେଇ କୃତାର୍ଥ କରିପାରିବେ।
Verse 6
अस्ति सोमान्ववाये मे जात: कश्रिन्नप: सखा । अभिगच्छावहे त॑ वै तस्यास्ति विभवो भुवि,“चन्द्रवंशमें उत्पन्न एक राजा हैं, जो मेरे मित्र हैं। हम दोनों उन्हींके पास चलें। इस भूतलपर उनके पास अवश्य ही धन है
ମୋ ସୋମବଂଶୀୟ ପରମ୍ପରାରେ ଜନ୍ମିଥିବା ଜଣେ ରାଜା ଅଛନ୍ତି; ସେ ମୋର ସଖା। ଆସ, ଆମେ ଦୁହେଁ ନିଶ୍ଚୟ ତାଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଉ; ଏହି ଭୂମିରେ ତାଙ୍କର ନିଶ୍ଚୟ ଭାବେ ବିଭବ ଅଛି।
Verse 7
ययातिननम राजर्षिनाहुष: सत्यविक्रम: । स दास्यति मया चोक्तो भवता चार्थित: स्वयम्
ନାରଦ କହିଲେ—ସତ୍ୟବିକ୍ରମୀ ରାଜର୍ଷି ନହୁଷ ତୁମକୁ ରାଜର୍ଷି ଯୟାତିଙ୍କୁ ଦେବେ। ମୁଁ ଏହି କଥା ତାଙ୍କୁ କହିଛି, ଏବଂ ତୁମେ ମଧ୍ୟ ସ୍ୱୟଂ ଅନୁରୋଧ କରିଛ।
Verse 8
“मेरे उन मित्रका नाम है राजर्षि ययाति, जो महाराज नहुषके पुत्र हैं। वे सत्यपराक्रमी वीर हैं। तुम्हारे माँगने और मेरे कहनेपर वे स्वयं ही तुम्हें धन देंगे ।। विभवश्चास्य सुमहानासीद् धनपतेरिव । एवं गुरुधनं विद्वन् दानेनेव विशोधय,“उनके पास धनाध्यक्ष कुबेरकी भाँति महान् वैभव रहा है। विद्वन्! इस प्रकार दान लेकर ही तुम गुरुदक्षिणाका ऋण चुका दो”
ନାରଦ କହିଲେ—ମୋ ସେହି ସଖାଙ୍କ ନାମ ରାଜର୍ଷି ଯୟାତି; ସେ ମହାରାଜ ନହୁଷଙ୍କ ପୁତ୍ର। ସେ ସତ୍ୟାଧାରିତ ପରାକ୍ରମର ବୀର। ତୁମେ ଯାଚିଲେ, ଏବଂ ମୋ କଥାରେ, ସେ ସ୍ୱୟଂ ତୁମକୁ ଧନ ଦେବେ। ତାଙ୍କର ବିଭବ ଧନାଧିପତି କୁବେରଙ୍କ ପରି ଅପାର ଥିଲା। ତେଣୁ, ହେ ବିଦ୍ୱାନ, ଏହି ଦାନ ଗ୍ରହଣ କରି (ଏବଂ ପୁନଃ ଦାନମାର୍ଗେ ଅର୍ପଣ କରି) ଗୁରୁଦକ୍ଷିଣାର ଋଣକୁ ଶୁଦ୍ଧ ଭାବେ ଶୋଧ କର।
Verse 9
तथा तौ कथयन्तौ च चिन्तयन्तौ च यत् क्षमम् । प्रतिष्ठाने नरपतिं ययातिं प्रत्युपस्थिताौ,इस प्रकार परस्पर बातें करते और उचित कर्तव्यको मन-ही-मन सोचते हुए वे दोनों प्रतिष्ठानपुरमें राजा ययातिके दरबारमें उपस्थित हुए
ଏଭଳି ପରସ୍ପର କଥାହୁଏ ଏବଂ ମନେମନେ କ’ଣ ଯଥୋଚିତ ତାହା ଚିନ୍ତା କରୁଥିବାବେଳେ, ସେମାନେ ଦୁଇଜଣ ପ୍ରତିଷ୍ଠାନକୁ ପହଞ୍ଚି ରାଜା ଯୟାତିଙ୍କ ଦରବାରରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ।
Verse 10
प्रतिगृह्य॒ च सत्कारैरघ्र्यपाद्यादिकं वरम् पृष्टेश्षागमने हेतुमुवाच विनतासुत:,राजाके द्वारा सत्कारपूर्वक दिये हुए श्रेष्ठ अर्घ्य-पाद्य आदि ग्रहण करके विनतानन्दन गरुड़ने उनके पूछनेपर अपने आगमनका प्रयोजन इस प्रकार बताया--
ରାଜାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସତ୍କାରସହ ଦିଆଯାଇଥିବା ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଅର୍ଘ୍ୟ-ପାଦ୍ୟ ଆଦି ଗ୍ରହଣ କରି, ପଚାରାଯିବା ପରେ ବିନତାସୁତ ଗରୁଡ ନିଜ ଆଗମନର କାରଣ କହିଲେ।
Verse 11
अयं मे नाहुष सखा गालवस्तपसो निधि: । विश्वामित्रस्य शिष्यो5भूद् वर्षाण्ययुतशो नूप,“नहुषनन्दन! ये तपोनिधि गालव मेरे मित्र हैं। राजन! ये दस हजार वर्षोतक महर्षि विश्वामित्रके शिष्य रहे हैं
ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ନହୁଷବଂଶଜ, ଏହି ଗାଲବ ମୋର ସଖା; ତପସ୍ୟାର ନିଧି ସ୍ୱରୂପ। ହେ ରାଜନ, ସେ ଅୟୁତ ବର୍ଷ (ଦଶହଜାର ବର୍ଷ) ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମହର୍ଷି ବିଶ୍ୱାମିତ୍ରଙ୍କ ଶିଷ୍ୟ ଥିଲେ।
Verse 12
सो<यं तेनाभ्यनुज्ञात उपकारेप्सया द्विज: । तमाह भगवन् किं ते ददानि गुरुदक्षिणाम्,'विश्वामित्रजीने (इनकी सेवाके बदले) इनका भी उपकार करनेकी इच्छासे इन्हें घर जानेकी आज्ञा दे दी। तब इन्होंने उनसे पूछा--“भगवन्! मैं आपको क्या गुरुदक्षिणा दूँ?
ତାଙ୍କର ଅନୁମତି ପାଇ ସେ ଦ୍ୱିଜ, କୃତ ଉପକାରର ପ୍ରତିଉପକାର କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରି, ତାଙ୍କୁ କହିଲା—“ଭଗବନ୍! ମୁଁ ଆପଣଙ୍କୁ କେଉଁ ଗୁରୁଦକ୍ଷିଣା ଦେବି?”
Verse 13
असकृत् तेन चोक्तेन किंचिदागतमन्युना । अयमुक्त: प्रयच्छेति जानता विभवं लघु,“इनके बार-बार आग्रह करनेपर विश्वामित्रजीको कुछ क्रोध आ गया; अत: इनके पास धनका अभाव है, यह जानते हुए भी उन्होंने इनसे कहा--“लाओ, गुरुदक्षिणा दो। गालव! मुझे अच्छी जातिमें उत्पन्न हुए ऐसे आठ सौ घोड़े दो, जिनकी अंगकान्ति चन्द्रमाके समान उज्ज्वल और कान एक ओरसे श्याम रंगके हों। गालव! यदि तुम मेरी बात मानो तो यही गुरुदक्षिणा ला दो।” तपोधन विश्वामित्रने यह बात कुपित होकर ही कही थी
ବାରମ୍ବାର ଅନୁରୋଧ କରିବାରୁ ତାଙ୍କର ମନେ କିଛି କ୍ରୋଧ ଉଦ୍ଭବିଲା; ଏବଂ ତାହାର ଅଳ୍ପ ସମ୍ପତ୍ତି ଜାଣିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ କହିଲେ—“ଦେ—ଗୁରୁଦକ୍ଷିଣା ଆଣ।”
Verse 14
एकत: श्यामकर्णानां शुभ्राणां शुद्धजन्मनाम् । अष्टौ शतानि मे देहि हयानां चन्द्रवर्चसाम्,“इनके बार-बार आग्रह करनेपर विश्वामित्रजीको कुछ क्रोध आ गया; अत: इनके पास धनका अभाव है, यह जानते हुए भी उन्होंने इनसे कहा--“लाओ, गुरुदक्षिणा दो। गालव! मुझे अच्छी जातिमें उत्पन्न हुए ऐसे आठ सौ घोड़े दो, जिनकी अंगकान्ति चन्द्रमाके समान उज्ज्वल और कान एक ओरसे श्याम रंगके हों। गालव! यदि तुम मेरी बात मानो तो यही गुरुदक्षिणा ला दो।” तपोधन विश्वामित्रने यह बात कुपित होकर ही कही थी
“ଏକ ପାର୍ଶ୍ୱରେ ଶ୍ୟାମ କାନ ଥିବା, ଶୁଭ୍ର, ଶୁଦ୍ଧ କୁଳଜ, ଚନ୍ଦ୍ରସମ କାନ୍ତିଯୁକ୍ତ—ଏମିତି ଆଠଶେ ଘୋଡ଼ା ମୋତେ ଦେ।”
Verse 15
गुर्वर्थो दीयतामेष यदि गालव मन्यसे । इत्येवमाह सक्रोधो विश्वामित्रस्तपोधन:,“इनके बार-बार आग्रह करनेपर विश्वामित्रजीको कुछ क्रोध आ गया; अत: इनके पास धनका अभाव है, यह जानते हुए भी उन्होंने इनसे कहा--“लाओ, गुरुदक्षिणा दो। गालव! मुझे अच्छी जातिमें उत्पन्न हुए ऐसे आठ सौ घोड़े दो, जिनकी अंगकान्ति चन्द्रमाके समान उज्ज्वल और कान एक ओरसे श्याम रंगके हों। गालव! यदि तुम मेरी बात मानो तो यही गुरुदक्षिणा ला दो।” तपोधन विश्वामित्रने यह बात कुपित होकर ही कही थी
“ହେ ଗାଲବ, ତୁମେ ଯଦି ଯୁକ୍ତିସଂଗତ ଭାବ, ତେବେ ଏହିଟି ଗୁରୁଙ୍କ ଦେୟ ଭାବେ ଦିଆଯାଉ।” ଏମିତି କହି କ୍ରୋଧିତ ତପୋଧନ ବିଶ୍ୱାମିତ୍ର କହିଲେ।
Verse 16
सो<5यं शोकेन महता तप्यमानो द्विजर्षभ: । अशक्तः प्रतिकर्तु तद् भवन्तं शरणं गत:,“अत: ये द्विजश्रेष्ठ गालव महान् शोकसे संतप्त हो गुरुदक्षिणा चुकानेमें असमर्थ हो गये हैं और इसीलिये आपकी शरणमें आये हैं
ସେ ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ ମହାଶୋକରେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇ, ସେହି କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ପୂରଣ କରିବାରେ ଅସମର୍ଥ ହୋଇ, ଆପଣଙ୍କ ଶରଣକୁ ଆସିଛି।
Verse 17
प्रतिगृह नरव्याघ्र त्वत्तो भिक्षां गतव्यथ: । कृत्वापवर्ग गुरवे चरिष्यति महत् तप:,'पुरुषसिंह! आपसे भिक्षा ग्रहण करके गुरुको पूर्वोक्त धन देकर ये क्लेशरहित हो महान् तपमें संलग्न हो जायँगे
ନରବ୍ୟାଘ୍ର! ଆପଣଙ୍କଠାରୁ ଭିକ୍ଷା ଗ୍ରହଣ କରି ସେମାନେ କ୍ଲେଶରହିତ ହେବେ। ପୂର୍ବୋକ୍ତ ଧନ ଗୁରୁଙ୍କୁ ଅର୍ପଣ କରି ପରେ ସେମାନେ ମହାତପରେ ଲଗ୍ନ ହେବେ।
Verse 18
तपस: संविभागेन भवन्तमपि योक्ष्यते । स्वेन राजर्षितपसा पूर्ण त्वां पूरयिष्यति,अपनी तपस्याके एक अंशसे ये आपको भी संयुक्त करेंगे। यद्यपि आप अपनी राजर्षिजनोचित तपस्यासे पूर्ण हैं, तथापि ये अपने ब्राह्म तपसे आपको और भी परिपूर्ण करेंगे
ତପସ୍ୟାର ଏକ ଅଂଶ ସଂବିଭାଗ କରି ସେ ଆପଣଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ତାହାର ପୁଣ୍ୟରେ ଯୋଗ କରିବ। ଆପଣ ରାଜର୍ଷି-ଯୋଗ୍ୟ ତପରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ସେ ନିଜ ବ୍ରାହ୍ମ ତପରେ ଆପଣଙ୍କୁ ଆହୁରି ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ କରିବ।
Verse 19
यावन्ति रोमाणि हये भवन्तीह नरेश्वर । तावन्तो वाजिनो लोकान प्राप्तुवन्ति महीपते,“नरेश्वर! भूपाल! यहाँ (दान किये हुए) घोड़ेके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, दान करनेवाले लोगोंको (परलोकमें) उतने ही घोड़े प्राप्त होते हैं
ନରେଶ୍ୱର, ମହୀପତେ! ଏଠାରେ ଦାନ ଦିଆଯାଇଥିବା ଘୋଡ଼ାର ଶରୀରରେ ଯେତେ ରୋମ ଅଛି, ପରଲୋକରେ ଦାତାକୁ ସେତେ ଘୋଡ଼ା ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ।
Verse 20
पात्र प्रतिग्रहस्यायं दातुं पात्र तथा भवान् | शड्खे क्षीरमिवासिक्त भवत्वेतत् तथोपमम्,'ये गालव दान लेनेके सुयोग्य पात्र हैं और आप दान करनेके श्रेष्ठ अधिकारी हैं। जैसे शंखमें दूध रखा गया हो, उसी प्रकार इनके हाथमें दिए हुए आपके इस दानकी शोभा होगी”
ଏହି ଗାଲବ ଦାନ ଗ୍ରହଣ କରିବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ ପାତ୍ର, ଏବଂ ଆପଣ ମଧ୍ୟ ଦାନ ଦେବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦାତା। ଶଙ୍ଖରେ କ୍ଷୀର ଢାଳିଲେ ଯେପରି ଶୋଭା ବଢ଼େ, ସେପରି ତାଙ୍କ ହାତରେ ଦିଆଯାଇଥିବା ଆପଣଙ୍କ ଏହି ଦାନ ଶୋଭିତ ହେଉ।
Verse 114
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि गालवचरिते चतुर्दशशाधिकशततमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବରେ, ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଗାଲବଚରିତ ବିଷୟକ ଏକଶେ ଚୌଦହତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ।
Yayāti must reconcile limited resources with the dharmic obligation not to frustrate a respected supplicant; he seeks a solution that preserves truthfulness, hospitality, and dynastic reputation without making an empty promise.
The chapter teaches that ethical governance includes managing expectations responsibly: honoring guests and petitioners, avoiding deceptive assurances, and choosing lawful means to fulfill obligations even when direct material capacity is constrained.
No explicit phalaśruti is presented in these verses; the chapter’s meta-lesson is implicit, using narrative causality to show how truthful speech, non-frustration of petitioners, and principled generosity function as safeguards for lineage and social order.