माधवी-प्रदानम् (Mādhavī Offered to Gālava) — Udyoga Parva 113
तथा तौ कथयन्तौ च चिन्तयन्तौ च यत् क्षमम् । प्रतिष्ठाने नरपतिं ययातिं प्रत्युपस्थिताौ,इस प्रकार परस्पर बातें करते और उचित कर्तव्यको मन-ही-मन सोचते हुए वे दोनों प्रतिष्ठानपुरमें राजा ययातिके दरबारमें उपस्थित हुए
tathā tau kathayantau ca cintayantau ca yat kṣamam | pratiṣṭhāne narapatiṁ yayātiṁ pratyupasthitau ||
ଏଭଳି ପରସ୍ପର କଥାହୁଏ ଏବଂ ମନେମନେ କ’ଣ ଯଥୋଚିତ ତାହା ଚିନ୍ତା କରୁଥିବାବେଳେ, ସେମାନେ ଦୁଇଜଣ ପ୍ରତିଷ୍ଠାନକୁ ପହଞ୍ଚି ରାଜା ଯୟାତିଙ୍କ ଦରବାରରେ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ।
नारद उवाच