
Udyoga Parva, Adhyaya 104: Nārada on Suhṛt and Nirbandha; the Viśvāmitra–Gālava Exemplum Begins
Upa-parva: Nārada-nīti (Counsel on Suhṛt, Listening, and the Perils of Nirbandha) — embedded exemplum of Viśvāmitra and Gālava
Janamejaya describes a destructive psychological profile—attachment to the purposeless, greed for others’ goods, delight in ignoble company, and resolve toward death—then asks why relatives, affectionate friends, or even a revered elder do not restrain such a person. Vaiśaṃpāyana replies that multiple authoritative counsels have been spoken and introduces Nārada’s instruction: a true listener among friends is rare, and a truly beneficial friend is also rare; where such a friend stands, mere kinship may not suffice. Nārada warns against harsh insistence (nirbandha), calling it severe in consequence, and begins an ancient narrative to illustrate this. Dharma, testing Viśvāmitra’s austerity, approaches disguised as Vasiṣṭha (and as a hungry ascetic). Viśvāmitra attempts hospitality; after prolonged testing, Dharma is satisfied, and Viśvāmitra attains brahmin-status affirmation. Viśvāmitra then releases his devoted student Gālava, who repeatedly insists on giving guru-dakṣiṇā. Pressed by Gālava’s persistent demand, Viśvāmitra finally names an extremely difficult gift: eight hundred moon-white horses with dark ears, initiating Gālava’s ensuing ordeal.
Chapter Arc: As the embassy-laden air of Udyoga Parva thickens, the narrative briefly turns from kings to the heavens: Mātali, Indra’s charioteer, is charged with an urgent, delicate mission—find a worthy bridegroom—setting a celestial quest beside the looming human war. → Mātali’s search becomes a survey of lineages and merit: candidates appear, but each is weighed against dharma, reputation, and suitability. The very act of choosing stirs rivalry and pride among noble houses, hinting that even divine errands can ignite worldly contention. → A decisive evaluation is reached—Mātali’s scrutiny crystallizes into a choice (or a near-choice), and the competing claims of birth, valor, and conduct collide at the moment when one path must be preferred over all others. → The mission’s direction is settled: Mātali’s findings and judgment establish who is fit, and the matter is steered toward formal acceptance, tempering immediate discord with the authority of Indra’s envoy and the standard of dharmic worth. → The chapter closes with the search concluded in principle, but the consequences—how the chosen alliance will be received and what rival pride may yet flare—hang poised for the next adhyāya.
Verse 1
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३१ “लोक हैं।] अपने-आप बछ। अंक पञ्चाधिकशततमोब< ध्याय: भगवान् विष्णुके द्वारा गरुड़का गर्वभंजन तथा दुर्योधनद्वारा कण्व मुनिके उपदेशकी अवहेलना कण्व उवाच गरुडस्तत्र शुभ्राव यथावृत्तं महाबल: । आयु:प्रदानं शक्रेण कृतं नागस्य भारत,कण्व मुनि कहते हैं--भारत! महाबली गरुड़ने यह सारा वृत्तान्त यथार्थरूपसे सुना कि इन्द्रने सुमुख नागको दीर्घायु प्रदान की है
କଣ୍ୱ ମୁନି କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ସେଠାରେ ମହାବଳୀ ଗରୁଡ ଯଥାବୃତ୍ତ ସମସ୍ତ ବୃତ୍ତାନ୍ତ ଶୁଣିଲା—ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ସୁମୁଖ ନାଗକୁ ଦୀର୍ଘାୟୁ ପ୍ରଦାନ କରିଛନ୍ତି।
Verse 2
पक्षवातेन महता रुद्ध्वा त्रिभुवनं खग: । सुपर्ण: परमक्कुद्धो वासवं समुपाद्रवत्,यह सुनते ही आकाशचारी गरुड़ अत्यन्त क़ुद्ध हो अपने पंखोंकी प्रचण्ड वायुसे तीनों लोकोंको कम्पित करते हुए इन्द्रके समीप दौड़े आये
ଏହା ଶୁଣିମାତ୍ରେ ଆକାଶଚାରୀ ସୁପର୍ଣ୍ଣ ଗରୁଡ଼ ପରମ କ୍ରୋଧରେ ଜ୍ୱଳି ଉଠିଲା। ପକ୍ଷବାତର ମହାବେଗରେ ତ୍ରିଭୁବନକୁ କମ୍ପାଇ ବାସବ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ନିକଟକୁ ସିଧା ଧାଇଗଲା।
Verse 3
गरुड उवाच भगवन् किमवज्ञानाद् वृत्ति: प्रतिहता मम । कामकारवरं दत्त्वा पुनश्नलितवानसि,गरुड बोले--भगवन्! आपने अवहेलना करके मेरी जीविकामें क्यों बाधा पहुँचायी है? एक बार मुझे इच्छानुसार कार्य करनेका वरदान देकर अब फिर उससे विचलित क्यों हुए हैं?
ଗରୁଡ଼ କହିଲା—“ଭଗବନ୍! ଅବଜ୍ଞାବଶତଃ ମୋର ଜୀବିକାକୁ କାହିଁକି ଅଟକାଇଲେ? ଏକଥର ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ କରିବାର ବର ଦେଇ, ଏବେ ପୁଣି କାହିଁକି ସେଥିରୁ ଫେରିଗଲେ?”
Verse 4
निसर्गात् सर्वभूतानां सर्वभूतेश्वरेण मे । आहारो विदितो धात्रा किमर्थ वार्यते त्वया,समस्त प्राणियोंके स्वामी विधाताने सम्पूर्ण प्राणियोंकी सृष्टि करते समय मेरा आहार निश्चित कर दिया था। फिर आप किसलिये उसमें बाधा उपस्थित करते हैं?
ସର୍ବଭୂତଙ୍କ ଅଧିପତି ଧାତା ସୃଷ୍ଟିକାଳରେ ମୋର ଆହାର ନିର୍ଦ୍ଧାରଣ କରିଦେଇଛନ୍ତି। ତେବେ ଆପଣ କେଉଁ କାରଣରୁ ତାହାକୁ ରୋକୁଛନ୍ତି?
Verse 5
वृतश्नैष महानाग: स्थापित: समयश्न मे । अनेन च मया देव भर्तव्य: प्रसवो महान्,देव! मैंने उस महानागको अपने भोजनके लिये चुन लिया था। इसके लिये समय भी निश्चित कर दिया था और उसीके द्वारा मुझे अपने विशाल परिवारका भरण-पोषण करना था
ଦେବ! ମୁଁ ଏହି ମହାନାଗକୁ ମୋର ଆହାରରୂପେ ବାଛିଥିଲି, ଏବଂ ତାହା ପାଇଁ ସମୟ ମଧ୍ୟ ନିର୍ଦ୍ଧାରଣ କରିଥିଲି। ଏହା ଦ୍ୱାରା ମୋତେ ମୋର ବିଶାଳ ପରିବାରକୁ ପୋଷଣ କରିବାକୁ ଥିଲା।
Verse 6
एतसस्मिंस्तु तथाभूते नान्यं हिंसितुमुत्सहे । क्रीडसे कामकारेण देवराज यथेच्छकम्,वह नाग जब दीर्घायु हो गया, तब अब मैं उसके बदलेमें दूसरेकी हिंसा नहीं कर सकता। देवराज! आप स्वेच्छाचारको अपनाकर मनमाने खेल कर रहे हैं
ଏପରି ପରିସ୍ଥିତି ହୋଇଗଲାପରେ, ତାହାର ପରିବର୍ତ୍ତେ ଅନ୍ୟ କାହାକୁ ହିଂସା କରିବାକୁ ମୋର ସାହସ ହୁଏନାହିଁ। ଦେବରାଜ! ଆପଣ କେବଳ ସ୍ୱେଚ୍ଛାଚାରରେ ଯେମିତି ଇଚ୍ଛା ସେମିତି କ୍ରୀଡ଼ା କରୁଛନ୍ତି।
Verse 7
सो5हं प्राणान् विमोक्ष्यामि तथा परिजनो मम | ये च भृत्या मम गृहे प्रीतिमान् भव वासव,वासव! अब मैं प्राण त्याग दूँगा। मेरे परिवारमें तथा मेरे घरमें जो भरण-पोषण करनेयोग्य प्राणी हैं, वे भी भोजनके अभावमें प्राण दे देंगें। अब आप अकेले संतुष्ट होइये
ଗରୁଡ କହିଲେ— ତେବେ ମୁଁ ପ୍ରାଣ ତ୍ୟାଗ କରିବି; ମୋ ପରିବାର ମଧ୍ୟ ତେଣୁହିଁ। ମୋ ପୋଷଣରେ ଜୀବିତ ଥିବା ମୋ ଘରର ଆଶ୍ରିତମାନେ ମଧ୍ୟ ଅନ୍ନାଭାବରେ ପ୍ରାଣ ହରାଇବେ। ଏବେ, ହେ ବାସବ, ତୁମେ ଏକା ତୃପ୍ତ ହୁଅ।
Verse 8
एतच्चैवाहमहामि भूयश्न बलवृत्रहन् | त्रैलोकस्येश्वरो यो5हं परभृत्यत्वमागत:,बल और वृत्रासुरका वध करनेवाले देवराज! मैं इसी व्यवहारके योग्य हूँ; क्योंकि तीनों लोकोंका शासन करनेमें समर्थ होकर भी मैंने दूसरेकी सेवा स्वीकार की है
ହେ ବଳ ଓ ବୃତ୍ରହନ୍ତା! ମୁଁ ଏହି କଥା ପୁନର୍ବାର କହୁଛି— ତ୍ରିଲୋକ ଶାସନ କରିବାର ସାମର୍ଥ୍ୟ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ପରସେବା ଗ୍ରହଣ କରିଛି; ତେଣୁ ଏପରି ବ୍ୟବହାରର ଯୋଗ୍ୟ ମୁଁ ନିଜେ।
Verse 9
त्वयि तिष्ठति देवेश न विष्णु: कारणं मम । त्रैलोक्यराज राज्यं हि त्वयि वासव शाश्वतम्
ଗରୁଡ କହିଲେ— ହେ ଦେବେଶ! ତୁମେ ଦୃଢ଼ ଥିବା ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମୋ ଏହି କାର୍ଯ୍ୟର କାରଣ ବିଷ୍ଣୁ ନୁହେଁ। ହେ ବାସବ! ତ୍ରିଲୋକର ଶାଶ୍ୱତ ରାଜ୍ୟାଧିକାର ତୁମ ଉପରେ ହିଁ ଅଛି।
Verse 10
देवेश्वर! त्रिलोकीनाथ! आपके रहते भगवान् विष्णु भी मेरी जीविका रोकनेमें कारण नहीं हो सकते; क्योंकि वासव! तीनों लोकोंके राज्यका भार सदा आपके ही ऊपर ह%)॥ ममापि दक्षस्य सुता जननी कश्यप: पिता । अहमप्युत्सहे लोकान् समन्ताद् वोढुमज्जसा,मेरी माता भी प्रजापति दक्षकी पुत्री हैं। मेरे पिता भी महर्षि कश्यप ही हैं। मैं भी अनायास ही सम्पूर्ण लोकोंका भार वहन कर सकता हूँ
ଗରୁଡ କହିଲେ— ହେ ଦେବେଶ୍ୱର, ହେ ତ୍ରିଲୋକନାଥ! ତୁମେ ସତ୍ତାରେ ଦୃଢ଼ ଥିବାବେଳେ ଭଗବାନ ବିଷ୍ଣୁ ମଧ୍ୟ ମୋ ଜୀବିକା ରୋକିବାର କାରଣ ହୋଇପାରିବେ ନାହିଁ; କାରଣ, ହେ ବାସବ, ତ୍ରିଲୋକର ରାଜ୍ୟଭାର ସଦା ତୁମ ଉପରେ ହିଁ ଅଛି। ମୋ ମାତା ମଧ୍ୟ ପ୍ରଜାପତି ଦକ୍ଷଙ୍କ କନ୍ୟା, ଏବଂ ମୋ ପିତା ମହର୍ଷି କଶ୍ୟପ। ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଅନାୟାସେ ସମସ୍ତ ଦିଗର ସମଗ୍ର ଲୋକମାନଙ୍କର ଭାର ବହନ କରିବାକୁ ସମର୍ଥ।
Verse 11
असहां सर्वभूतानां ममापि विपुलं बलम् | मयापि सुमहत् कर्म कृतं दैतेयविग्रहे,मुझमें भी वह विशाल बल है, जिसे समस्त प्राणी एक साथ मिलकर भी सह नहीं सकते। मैंने भी दैत्योंके साथ युद्ध छिड़नेपर महान् पराक्रम प्रकट किया है
ଗରୁଡ କହିଲେ— ମୋ ଭିତରେ ମଧ୍ୟ ଏମିତି ବିପୁଳ ବଳ ଅଛି, ଯାହାକୁ ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ଏକାଠି ହେଲେ ମଧ୍ୟ ସହିପାରିବେ ନାହିଁ। ଏବଂ ଦୈତ୍ୟମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧ ଆରମ୍ଭ ହେବାବେଳେ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଏକ ମହାନ କାର୍ଯ୍ୟ କରିଛି, ମହାପରାକ୍ରମ ପ୍ରକାଶ କରିଛି।
Verse 12
श्रुतश्री: श्रुतसेनश्व॒ विवस्वान् रोचनामुख:। प्रसृत: कालकाक्षश्न मयापि दितिजा हता:,मैंने भी श्रुतश्री, श्रुतसेन, विवस्वानू, रोचनामुख, प्रसृत और कालकाक्ष नामक दैत्योंको मारा है
ଗରୁଡ କହିଲେ—ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଦୈତ୍ୟଶତ୍ରୁମାନଙ୍କୁ ବଧ କରିଛି—ଶ୍ରୁତଶ୍ରୀ, ଶ୍ରୁତସେନ, ବିବସ୍ୱାନ, ରୋଚନାମୁଖ, ପ୍ରସୃତ ଏବଂ କାଳକାକ୍ଷ।
Verse 13
यत् तु ध्वजस्थानगतो यत्नात् परिचराम्यहम् । वहामि चैवानुजं ते तेन मामवमन्यसे
କିନ୍ତୁ ମୁଁ ତୁମ ଧ୍ୱଜସ୍ଥାନରେ ରହି ଯତ୍ନପୂର୍ବକ ତୁମ ସେବା କରୁଛି, ଏବଂ ତୁମ ଅନୁଜକୁ ମଧ୍ୟ ବହନ କରୁଛି—ସେହି କାରଣରୁ ତୁମେ ମୋତେ ଅବମାନ କରୁଛ।
Verse 14
तथापि मैं जो रथकी ध्वजामें रहकर यत्नपूर्वक आपके छोटे भाई (विष्णु)-की सेवा करता और उनको वहन करता हूँ, इसीसे आप मेरी अवहेलना करते हैं ।। को<न्यो भार सहो हास्ति को<न्यो5स्ति बलवत्तर: । मया यो<हं विशिष्ट: सन् वहामीमं सबान्धवम्,मेरे सिवा दूसरा कौन है, जो भगवान् विष्णुका महान् भार सह सके? कौन मुझसे अधिक बलवान है? मैं सबसे विशिष्ट शक्तिशाली होकर भी बन्धु-बान्धवोंसहित इन विष्णुभगवानका भार वहन करता हूँ
ତଥାପି ମୁଁ ରଥଧ୍ୱଜରେ ଅବସ୍ଥିତ ରହି ଯତ୍ନପୂର୍ବକ ତୁମ ଅନୁଜ ବିଷ୍ଣୁଙ୍କ ସେବା କରୁଛି ଏବଂ ତାଙ୍କୁ ବହନ କରୁଛି—ଏହି କାରଣରୁ ତୁମେ ମୋତେ ଅବମାନ କରୁଛ। ମୋ ବ୍ୟତୀତ ଆଉ କିଏ ଭଗବାନ ବିଷ୍ଣୁଙ୍କ ଏତେ ମହାଭାର ସହିପାରିବ? ମୋଠାରୁ ଅଧିକ ବଳବାନ କିଏ? ମୁଁ ସର୍ବଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶକ୍ତିଶାଳୀ ହୋଇ ମଧ୍ୟ, ବନ୍ଧୁ-ବାନ୍ଧବ ସହିତ ଏହି ବିଷ୍ଣୁ-ପ୍ରଭୁଙ୍କ ଭାର ବହନ କରୁଛି।
Verse 15
अवज्ञाय तु यत् ते5हं भोजनाद् व्यपरोपित: । तेन मे गौरवं नष्टं त्वत्तक्षास्माच्च वासव
ଗରୁଡ କହିଲେ—ହେ ବାସବ! ତୁମେ ମୋତେ ଅବଜ୍ଞା କରି ମୋ ଭୋଜନରୁ ମୋତେ ଦୂରେ ହଟାଇଦେଲ; ତାହାରେ ମୋର ଗୌରବ ନଷ୍ଟ ହେଲା। ଏବଂ ହେ ବାସବ, ତୁମ କାରଣରୁ ତକ୍ଷକ ମୋତେ ଦଂଶନ କରିଛି।
Verse 16
वासव! आपने मेरी अवज्ञा करके जो मेरा भोजन छीन लिया है, उसके कारण मेरा सारा गौरव नष्ट हो गया तथा इसमें कारण हुए हैं आप और ये श्रीहरि ।। अदित्यां य इमे जाता बलविक्रमशालिन: । त्वमेषां किल सर्वेषां बलेन बलवत्तर:,विष्णो! अदितिके गर्भसे जो ये बल और पराक्रमसे सुशोभित देवता उत्पन्न हुए हैं, इन सबमें बलकी दृष्टिसे अधिक शक्तिशाली आप ही हैं
ଗରୁଡ କହିଲେ—ହେ ବାସବ! ତୁମେ ମୋତେ ଅବଜ୍ଞା କରି ମୋର ଭୋଜନ ଛିନିନେଲ; ତାହାରେ ମୋର ସମସ୍ତ ଗୌରବ ନଷ୍ଟ ହେଲା, ଏବଂ ଏଥିରେ କାରଣ ତୁମେ ଓ ଶ୍ରୀହରି। ହେ ବିଷ୍ଣୋ! ଅଦିତିଙ୍କ ଗର୍ଭରୁ ଯେ ବଳ-ପରାକ୍ରମଶାଳୀ ଦେବତାମାନେ ଜନ୍ମିଛନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବଳରେ ତୁମେ ହିଁ ସର୍ବାଧିକ ଶକ୍ତିଶାଳୀ।
Verse 17
सोडहं पक्षैकदेशेन वहामि त्वां गतक्लम: । विमृश त्वं शनैस्तात को न्वत्र बलवानिति,तात! आपको मैं अपनी पाँखके एक देशमें बिठाकर बिना किसी थकावटके ढोता रहता हूँ। धीरेसे आप ही विचार करें कि यहाँ कौन सबसे अधिक बलवान् है?
ଗରୁଡ କହିଲେ—ତାତ! ମୋ ପଖର ଅଳ୍ପ ଅଂଶରେ ତୁମକୁ ବସାଇ, କ୍ଲାନ୍ତି ବିନା ମୁଁ ତୁମକୁ ବହନ କରୁଛି। ଶାନ୍ତ ଭାବେ ବିଚାର କର—ଏଠାରେ ସତ୍ୟରେ ବଳବାନ କିଏ?
Verse 18
कण्व उवाच स तस्य वचन श्रुत्वा खगस्योदर्कदारुणम् । अक्षोभ्यं क्षोभयंस्ताक्ष्यमुवाच रथचक्रभूत्,कण्व मुनि कहते हैं--राजन्! गरुड़की ये बातें भयंकर परिणाम उपस्थित करनेवाली थीं। उन्हें सुनकर रथांगपाणि श्रीविष्णुने किसीसे क्षुब्ध न होनेवाले पश्षिराजको क्षुब्ध करते हुए कहा--“गरुत्मन्! तुम हो तो अत्यन्त दुर्बल, परंतु अपने-आपको बड़ा भारी बलवान् मानते हो। अण्डज! मेरे सामने फिर कभी अपनी प्रशंसा न करना
କଣ୍ୱ କହିଲେ—ରାଜନ୍! ସେହି ପକ୍ଷୀର ବଚନ ଭୟଙ୍କର ପରିଣାମଦାୟକ ଥିଲା। ତାହା ଶୁଣି ରଥଚକ୍ରଧାରୀ ଶ୍ରୀବିଷ୍ଣୁ, ଅକ୍ଷୋଭ୍ୟ ତାକ୍ଷ୍ୟ (ଗରୁଡ)କୁ ଉତ୍ତେଜିତ କରି କହିଲେ—
Verse 19
गरुत्मन् मन्यसे55त्मानं बलवन्तं सुदुर्बलम् । अलमस्मत्समक्षं ते स्तोतुमात्मानमण्डज,कण्व मुनि कहते हैं--राजन्! गरुड़की ये बातें भयंकर परिणाम उपस्थित करनेवाली थीं। उन्हें सुनकर रथांगपाणि श्रीविष्णुने किसीसे क्षुब्ध न होनेवाले पश्षिराजको क्षुब्ध करते हुए कहा--“गरुत्मन्! तुम हो तो अत्यन्त दुर्बल, परंतु अपने-आपको बड़ा भारी बलवान् मानते हो। अण्डज! मेरे सामने फिर कभी अपनी प्रशंसा न करना
କଣ୍ୱ କହିଲେ—“ଗରୁତ୍ମନ୍! ତୁମେ ସତ୍ୟରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ବଳ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ନିଜକୁ ଅତି ବଳବାନ ଭାବୁଛ। ଅଣ୍ଡଜ! ଯଥେଷ୍ଟ—ମୋ ସମ୍ମୁଖରେ ଆଉ ନିଜ ପ୍ରଶଂସା କରନି।”
Verse 20
त्रैलोक्यमपि मे कृत्स्नमशक्त देहधारणे । अहमेवात्मना5>5त्मानं वहामि त्वां च धारये,“सारी त्रिलोकी मिलकर भी मेरे शरीरका भार वहन करनेमें असमर्थ है। मैं ही अपने द्वारा अपने-आपको ढोता हूँ और तुमको भी धारण करता हूँ
କଣ୍ୱ କହିଲେ—“ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ତ୍ରିଲୋକ ମଧ୍ୟ ମୋ ଦେହଭାର ଧାରଣ କରିବାକୁ ଅଶକ୍ତ। ମୁଁ ନିଜେ ନିଜ ଶକ୍ତିରେ ନିଜକୁ ବହନ କରେ, ଏବଂ ତୁମକୁ ମଧ୍ୟ ଧାରଣ କରେ।”
Verse 21
इमं तावन्ममैकं त्वं बाहुं सवब्येतरं वह । यद्येनं धारयस्येक॑ सफलं ते विकत्थितम्,“अच्छा, पहले तुम मेरी केवल दाहिनी भुजाका भार वहन करो। यदि इस एकको ही धारण कर लोगे तो तुम्हारी यह सारी आत्मप्रशंसा सफल समझी जायगी'
କଣ୍ୱ କହିଲେ—“ତେବେ ପ୍ରଥମେ ମୋର ଏହି ଏକମାତ୍ର ଦକ୍ଷିଣ ବାହୁର ଭାର ବହନ କର। ଯଦି ଏହି ଏକକୁ ମାତ୍ର ଧାରଣ କରିପାର, ତେବେ ତୁମର ସେଇ ଡିଙ୍ଗ ସଫଳ ମନାଯିବ।”
Verse 22
ततः स भगवांस्तस्य स्कन््धे बाहुं समासजत् । निपपात स भारार्तों विह्नलो नष्टचेतन:,इतना कहकर भगवान् विष्णुने गरुड़के कंधेपर अपनी दाहिनी बाँह रख दी। उसके बोझसे पीड़ित एवं विह्नल होकर गरुड़ गिर पड़े। उनकी चेतना भी नष्ट-सी हो गयी
ଏତେ କହି ଭଗବାନ ବିଷ୍ଣୁ ଗରୁଡ଼ଙ୍କ କାନ୍ଧ ଉପରେ ନିଜ ଡାହାଣ ବାହୁ ରଖିଲେ। ସେଇ ଭାରରେ ପୀଡ଼ିତ ଓ ବିହ୍ବଳ ହୋଇ ଗରୁଡ଼ ପଡ଼ିଗଲେ; ତାଙ୍କ ଚେତନା ମଧ୍ୟ ଯେନ ଲୁପ୍ତ ହେଲା।
Verse 23
यावान् हि भार: कृत्स्नाया: पृथिव्या: पर्वत: सह । एकस्या देहशाखायास्तावद् भारममन्यत,पर्वतोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीका जितना भार हो सकता है, उतना ही उस एक बाँहका भार है, यह गरुड़को अनुभव हुआ
ପର୍ବତସହିତ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀର ଯେତେ ଭାର ହୋଇପାରେ, ସେତେଇ ଭାର ତାହାର ଦେହର ଶାଖାସଦୃଶ ଏକମାତ୍ର ବାହୁର—ଏହିପରି ଗରୁଡ଼ ଅନୁଭବ କଲେ।
Verse 24
न त्वेनं पीडयामास बलेन बलवत्तर: । ततो हि जीवितं तस्य न व्यनीनशदच्युत:,अत्यन्त बलशाली भगवान् अच्युतने गरुड़को बलपूर्वक दबाया नहीं था; इसीलिये उनके जीवनका नाश नहीं हुआ
କିନ୍ତୁ ବଳବାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସର୍ବବଳବାନ ଅଚ୍ୟୁତ ତାଙ୍କୁ ବଳପୂର୍ବକ ଚାପି ଦେଲେ ନାହିଁ; ତେଣୁ ଗରୁଡ଼ଙ୍କ ଜୀବନ ନଷ୍ଟ ହେଲା ନାହିଁ।
Verse 25
व्यात्तास्य: स्रस्तकायश्न विचेता विह्लल: खग: । मुमोच पत्राणि तदा गुरुभारप्रपीडित:,उस महान् भारसे अत्यन्त पीड़ित हो गरुड़ने मुँह बा दिया। उनका सारा शरीर शिथिल हो गया। उन्होंने अचेत और विह्लल होकर अपने पंख छोड़ दिये
ସେଇ ଭାରୀ ଭାରରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପୀଡ଼ିତ ହୋଇ ଗରୁଡ଼ ମୁହଁ ଫାଟିଲେ; ତାଙ୍କ ସମଗ୍ର ଶରୀର ଶିଥିଳ ହୋଇଗଲା। ଅଚେତ ଓ ବିହ୍ବଳ ହୋଇ ସେତେବେଳେ ସେ ନିଜ ପକ୍ଷପତ୍ର ଝଡ଼ାଇଦେଲେ।
Verse 26
स विष्णुं शिरसा पक्षी प्रणम्य विनतासुत: । विचेता विह्नललो दीन: किंचिद् वचनमब्रवीत्,तदनन्तर अचेत एवं विह्नल हुए विनतापुत्र पक्षिराज गरुड़ने भगवान् विष्णुके चरणोंमें प्रणाम किया और दीनभावसे कुछ कहा--
ତାପରେ ବିନତାପୁତ୍ର ପକ୍ଷିରାଜ ଗରୁଡ଼ ଅଚେତ ଓ ବିହ୍ବଳ ହୋଇ ଶିର ନମାଇ ବିଷ୍ଣୁଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କଲେ ଏବଂ ଦୀନଭାବରେ କିଛି କଥା କହିଲେ।
Verse 27
भगवल्लॉकसारस्य सदृशेन वपुष्मता । भुजेन स्वैरमुक्तेन निष्पिष्टोडस्मि महीतले,“भगवन्! संसारके मूर्तिमान् सारतत्त्व-सदूश आपकी इस भुजाके द्वारा, जिसे आपने स्वाभाविक ही मेरे ऊपर रख दिया था, मैं पिसकर पृथ्वीपर गिर गया हूँ
କଣ୍ୱ କହିଲେ— ଭଗବନ୍! ଲୋକସାର ସଦୃଶ ରୂପବାନ୍ ଆପଣଙ୍କ ସେଇ ଭୁଜା, ଯାହାକୁ ଆପଣ ସ୍ୱାଭାବିକଭାବେ ମୋ ଉପରେ ରଖିଥିଲେ, ତାହାରେ ମୁଁ ପିଷ୍ଟ ହୋଇ ପୃଥିବୀରେ ପଡ଼ିଗଲି।
Verse 28
क्षन्तुमरहसि मे देव विह्वलस्याल्पचेतस: । बलदाहविदग्धस्य पक्षिणो ध्वजवासिन:,“देव! मैं आपकी ध्वजामें रहनेवाला एक साधारण पक्षी हूँ। इस समय आपके बल और तेजसे दग्ध होकर व्याकुल और अचेत-सा हो गया हूँ। आप मेरे अपराधको क्षमा करें
କଣ୍ୱ କହିଲେ— ଦେବ! ବିହ୍ୱଳ ଓ ଅଳ୍ପବୁଦ୍ଧି ମୋତେ କ୍ଷମା କରନ୍ତୁ। ମୁଁ ଆପଣଙ୍କ ଧ୍ୱଜରେ ବସୁଥିବା ଏକ ସାଧାରଣ ପକ୍ଷୀ। ଆପଣଙ୍କ ବଳ-ତେଜର ଦାହରେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇ ମୁଁ ବ୍ୟାକୁଳ ଓ ଅଚେତନ ପ୍ରାୟ ହୋଇପଡ଼ିଛି; ମୋ ଅପରାଧ କ୍ଷମା କରନ୍ତୁ।
Verse 29
न हि ज्ञातं बल देव मया ते परमं विभो । तेन मन्ये हाहं वीर्यमात्मनो न सम॑ परै:
କଣ୍ୱ କହିଲେ— ଦେବ, ବିଭୋ! ଆପଣଙ୍କ ପରମ ବଳକୁ ମୁଁ ଜାଣିନଥିଲି। ତେଣୁ ଏବେ ବୁଝୁଛି—ହାୟ! ମୋର ପରାକ୍ରମ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ (ପ୍ରକୃତ ବଳବାନଙ୍କ) ସମାନ ନୁହେଁ।
Verse 30
“विभो! मुझे आपके महान् बलका पता नहीं था। देव! इसीसे मैं अपने बल और पराक्रमको दूसरोंके समान ही नहीं, उनसे बहुत बढ़-चढ़कर मानता था” ।। ततक्षक्रे स भगवान् प्रसाद वै गरुत्मतः । मैवं भूय इति स्नेहात् तदा चैनमुवाच ह,गरुड़के ऐसा कहनेपर भगवानने उनपर कृपादृष्टि की और उस समय स्नेहपूर्वक उनसे कहा--'फिर कभी इस प्रकार घमंड न करना'
କଣ୍ୱ କହିଲେ— ବିଭୋ! ଆପଣଙ୍କ ମହାନ ବଳର ପରିମାଣ ମୋତେ ଜଣା ନଥିଲା। ଦେବ! ସେହିକାରଣରୁ ମୁଁ ମୋର ବଳ ଓ ପରାକ୍ରମକୁ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ସମାନ ମାତ୍ର ନୁହେଁ, ତାଙ୍କଠାରୁ ଅଧିକ ବୋଲି ଭାବୁଥିଲି। ଗରୁଡ ଏପରି କହିବା ପରେ ଭଗବାନ୍ ତାଙ୍କୁ କୃପାଦୃଷ୍ଟି କରି ସ୍ନେହପୂର୍ବକ କହିଲେ— “ପୁଣି କେବେ ଏଭଳି ଅଭିମାନ କରିବୁ ନାହିଁ।”
Verse 31
पादाडगुछ्ठेन चिक्षेप सुमुखं गरुडोरसि । ततःप्रभृति राजेन्द्र सह सर्पेण वर्तते
କଣ୍ୱ କହିଲେ— ସେ ନିଜ ପାଦାଙ୍ଗୁଠାରେ ସୁମୁଖକୁ ଠେଲି ଗରୁଡର ବକ୍ଷ ଉପରେ ଛାଡ଼ିଦେଲେ। ସେହି ମୁହୂର୍ତ୍ତରୁ, ରାଜେନ୍ଦ୍ର, ଗରୁଡ ସେଇ ସର୍ପ ସହିତ ରହୁଛି।
Verse 32
राजेन्द्र! तत्पश्चात् भगवानने अपने पैरके अँगूठेसे सुमुख नागको उठाकर गरुड़के वक्ष:स्थलपर रख दिया। तभीसे गरुड़ उस सर्पको सदा साथ लिये रहते हैं ।। एवं विष्णुबलाक्रान्तो गर्वनाशमुपागत: । गरुडो बलवान राजन् वैनतेयो महायशा:,राजन्! इस प्रकार महायशस्वी बलवान विनतानन्दन गरुड़ भगवान् विष्णुके बलसे आक्रान्त हो अपना अहंकार छोड़ बैठे
ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ତତ୍ପରେ ଭଗବାନ୍ ନିଜ ପାଦର ଅଙ୍ଗୁଠିରେ ସୁମୁଖ ନାଗକୁ ଉଠାଇ ଗରୁଡଙ୍କ ବକ୍ଷସ୍ଥଳରେ ରଖିଦେଲେ। ସେହି ମୁହୂର୍ତ୍ତରୁ ଗରୁଡ ସେହି ସର୍ପକୁ ସଦା ସହିତ ବହନ କରିଲେ। ଏଭଳି ବିଷ୍ଣୁବଳରେ ଆକ୍ରାନ୍ତ ହୋଇ, ମହାଯଶସ୍ବୀ ବଳବାନ୍ ବିନତାନନ୍ଦନ ଗରୁଡଙ୍କ ଗର୍ବ ଭଙ୍ଗ ହେଲା ଏବଂ ସେ ଅହଂକାର ତ୍ୟାଗ କଲେ।
Verse 33
कण्व उवाच तथा त्वमपि गान्धारे यावत् पाण्डुसुतान् रणे । नासादयसि तान् वीरांस्तावज्जीवसि पुत्रक,कण्व मुनि कहते हैं--गान्धारीनन्दन वत्स दुर्योधन! इसी तरह तुम भी जबतक रणभूमिमें उन वीर पाण्डवोंको अपने सामने नहीं पाते, तभीतक जीवन धारण करते हो
କଣ୍ୱ କହିଲେ—ଗାନ୍ଧାରୀନନ୍ଦନ ବତ୍ସ! ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ତୁମେ ରଣଭୂମିରେ ପାଣ୍ଡୁଙ୍କ ସେହି ବୀର ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ସାମ୍ନାସାମ୍ନି ନ ପାଉଛ, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମାତ୍ର ତୁମେ ଜୀବିତ ଅଛ।
Verse 34
भीम: प्रहरतां श्रेष्ठो वायुपुत्रो महाबल: । धनंजयश्रेन्द्रसुतो न हन्यातां तु क॑ रणे,योद्धाओंमें श्रेष्ठ महाबली भीम वायुके पुत्र हैं। अर्जुन भी इन्द्रके पुत्र हैं। ये दोनों मिलकर युद्धमें किसे नहीं मार डालेंगे?
ପ୍ରହାରକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ମହାବଳୀ ଭୀମ ବାୟୁପୁତ୍ର; ଧନଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନ ଇନ୍ଦ୍ରପୁତ୍ର। ଏହି ଦୁଇଜଣ ଏକାଠି ହେଲେ ରଣରେ କାହାକୁ ସେମାନେ ନ ମାରିପାରିବେ?
Verse 35
विष्णुर्वायुश्च शक्रश्न धर्मस्तौ चाश्विनावुभौ । एते देवास्त्वया केन हेतुना वीक्षितुं क्षमा:,धर्मस्वरूप विष्णु, वायु, इन्द्र और वे दोनों अश्विनीकुमार--इतने देवता तुम्हारे विरुद्ध हैं। तुम किस कारणसे इन देवताओंकी ओर देखनेका भी साहस कर सकते हो?
ବିଷ୍ଣୁ, ବାୟୁ, ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର), ଧର୍ମ ଏବଂ ସେହି ଦୁଇ ଅଶ୍ୱିନୀକୁମାର—ଏହି ଦେବତାମାନେ ତୁମ ବିରୋଧରେ ଅଛନ୍ତି। କେଉଁ ହେତୁରୁ ତୁମେ ସେମାନଙ୍କ ଦିଗକୁ ଦେଖିବାକୁ ମଧ୍ୟ ସାହସ କରୁଛ?
Verse 36
तदलं ते विरोधेन शमं गच्छ नृपात्मज । वासुदेवेन तीर्थेन कुलं रक्षितुमहसि,अतः राजकुमार! इस विरोधसे तुम्हें कुछ मिलनेवाला नहीं है। पाण्डवोंके साथ संधि कर लो। भगवान् श्रीकृष्णको सहायक बनाकर इनके द्वारा तुम्हें अपने कुलकी रक्षा करनी चाहिये
ଅତଏବ ନୃପପୁତ୍ର! ଏହି ବିରୋଧରୁ ତୁମକୁ କୌଣସି ସତ୍ୟ ଲାଭ ମିଳିବ ନାହିଁ; ଶାନ୍ତିକୁ ଯାଅ। ପବିତ୍ର ଆଶ୍ରୟସ୍ୱରୂପ ବାସୁଦେବଙ୍କୁ ସହାୟ କରି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ସନ୍ଧି କରି ନିଜ କୁଳକୁ ରକ୍ଷା କର।
Verse 37
प्रत्यक्षदर्शी सर्वस्य नारदो5यं महातपा: । माहात्म्यस्य तदा विष्णो: सो5यं चक्रगदाधर:
କଣ୍ୱ କହିଲେ—ଏହି ମହାତପସ୍ବୀ ନାରଦ ସମସ୍ତଙ୍କର ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ସାକ୍ଷୀ। ଏବଂ ଯାହାଙ୍କ ବିଷ୍ଣୁ-ମାହାତ୍ମ୍ୟ ସେତେବେଳେ କଥିତ ହେଉଥିଲା, ଚକ୍ର ଓ ଗଦାଧାରୀ ଏହିଜଣେ ସେଇ ଭଗବାନ ବିଷ୍ଣୁ।
Verse 38
इन महातपस्वी नारदजीने उस समय भगवान् विष्णुके माहात्म्यको प्रत्यक्ष देखा था। वे चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णु ही ये “श्रीकृष्ण' हैं ।। वैशम्पायन उवाच दुर्योधनस्तु तच्छुत्वा नि:श्वसन् भूकुटीमुख: । राधेयमभिसम्प्रेक्ष्य जहास स्वनवत् तदा,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! कण्वका वह कथन सुनकर दुर्योधनकी भौंहें तन गयीं। वह लम्बी साँस खींचता हुआ राधानन्दन कर्णकी ओर देखकर जोर-जोरसे हँसने लगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ କଥା ଶୁଣି ଦୁର୍ୟୋଧନ ଭାରି ନିଶ୍ୱାସ ଛାଡ଼ି, ଭୃକୁଟି କୁଞ୍ଚିତ ମୁହଁରେ, ରାଧେୟ କର୍ଣ୍ଣଙ୍କୁ ଦେଖି ସେତେବେଳେ ଉଚ୍ଚସ୍ୱରେ ହସି ପଡ଼ିଲା।
Verse 39
कदर्थीकृत्य तद् वाक्यमृषे: कण्वस्य दुर्मति: । ऊरुं गजकराकारं ताडयन्निदमब्रवीत्,उस दुर्बुद्धिने कण्व मुनिके वचनोंकी अवहेलना करके हाथीकी सूँड़के समान चढ़ाव- उतारवाली अपनी मोटी जाँघपर हाथ पीटकर इस प्रकार कहा--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ଦୁର୍ମତି ଋଷି କଣ୍ୱଙ୍କ ବାକ୍ୟକୁ ଅବମାନ କରି, ହାତୀର ଶୁଣ୍ଡ ପରି ଆକାର ଥିବା ନିଜ ମୋଟ ଜଂଘାକୁ ତାଡ଼ି ଏପରି କହିଲା।
Verse 40
यथैवेश्वरसृष्टो5स्मि यद् भावि या च मे गति: । तथा महर्षे वर्तामि कि प्रलाप: करिष्यति,“महर्षे! मुझे ईश्वरने जैसा बनाया है, जो होनहार और जैसी मेरी अवस्था है, उसीके अनुसार मैं बर्ताव करता हूँ। आपलोगोंका यह प्रलाप क्या करेगा?”
ସେ କହିଲା—“ମହର୍ଷେ! ଈଶ୍ୱର ମୋତେ ଯେପରି ସୃଷ୍ଟି କରିଛନ୍ତି, ଯାହା ହେବାକୁ ଥିବ, ଏବଂ ମୋର ଯେ ଗତି ନିର୍ଦ୍ଧାରିତ—ସେହି ଅନୁସାରେ ମୁଁ ଚାଲେ। ଆପଣମାନଙ୍କର ଏହି ପ୍ରଲାପ କ’ଣ କରିପାରିବ?”
Verse 104
इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें मातलिके द्वारा वरका खोजविषयक एक सौ चारवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ମାତଲିଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ବର-ଅନ୍ୱେଷଣ ବିଷୟକ ଏକଶ ଚାରିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 105
इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि मातलिवरान्वेषणे पजञ्चाधिकशततमो<ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବରେ ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସାରଥି ମାତଲିଙ୍କ ଅନ୍ୱେଷଣ-ବିଷୟକ ଏକଶ ପାଞ୍ଚମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The dilemma is how (and whether) one can restrain a person committed to self-harm and social harm when that person is driven by greed, ignoble associations, and rigid insistence—highlighting the limits of kinship and authority without receptivity.
Ethical speech is effective only when paired with a genuine listener; persistent pressure (nirbandha) can become counterproductive, and even well-intentioned insistence may precipitate severe outcomes, as foreshadowed by Gālava’s predicament.
No explicit phalaśruti appears in this excerpt; the meta-commentary operates through exemplum-based instruction, positioning the narrative as a diagnostic tool for understanding counsel, fixation, and the ethics of obligation.