Adhyaya 103
Udyoga ParvaAdhyaya 10333 Verses

Adhyaya 103

Udyoga Parva Adhyāya 103: Garuḍa’s Protest, Viṣṇu’s Demonstration, and Counsel Toward Śama

Upa-parva: Garuḍa–Indra–Viṣṇu Bala-Parīkṣā Episode (Embedded Exemplum within Udyoga Parva)

Kaṇva narrates that Garuḍa learns Indra has granted longevity to a nāga, obstructs the worlds with his wing-wind, and confronts Indra, alleging disrespect and interference with his ordained sustenance. Garuḍa asserts lineage, prior feats against daityas, and claims of unmatched burden-bearing, interpreting his service at the banner-station as a cause of being slighted. Kaṇva then describes a corrective intervention: Viṣṇu (rathacakrabhṛt) challenges Garuḍa’s self-praise and proposes a test—Garuḍa should bear a single arm. When the arm is placed upon Garuḍa’s shoulder, he collapses under the weight, shedding feathers, losing composure, and acknowledging he misjudged Viṣṇu’s supreme strength. Viṣṇu grants reassurance and redirects the lesson into policy counsel addressed to a royal figure: desist from hostility, seek śama, and recognize the formidable coalition associated with the Pāṇḍavas. Vaiśaṃpāyana closes with Duryodhana hearing Kaṇva’s words, reacting with derision and fatalistic self-justification rather than adopting restraint.

Chapter Arc: देवराज इन्द्र के सारथि और मन्त्री-तुल्य मित्र मातलि का परिचय—जिसका रथ सहस्र हरियों से युक्त होकर देवासुर-संग्रामों में मनोबल से ही नियंत्रित होता है—और उसी मातलि का पृथ्वी पर ‘वर’ खोजने का असाधारण प्रयोजन। → मातलि योग्य वर की खोज में मानवीय कुलों और ऋषि-आश्रमों के मानदण्डों को टटोलता है; कण्व-मुनि के आश्रम में आर्यक के पुत्र सुमुख के गुण (शील, शौच, दम आदि) सामने आते हैं, पर ‘जामातृ’ के रूप में स्वीकार्यता, कुल-प्रतिष्ठा और देव-मानव मर्यादा का प्रश्न तनाव बढ़ाता है। → दैवयोग से चतुर्भुज भगवान विष्णु की उपस्थिति में नारद द्वारा समस्त वृत्तान्त का उद्घाटन; इन्द्र गरुड़ (वैनतेय) के पराक्रम का स्मरण कर विष्णु से निवेदन करता है—‘आप ही इसे प्रदान करें’—और वर-निर्णय देव-आज्ञा के स्तर पर प्रतिष्ठित हो जाता है। → सुमुख की योग्यता और मर्यादा मान्य होती है; मातलि स्वयं कन्यादान हेतु उद्यत होकर आर्यक/कण्व-पक्ष से सम्मान और स्वीकृति की अपेक्षा करता है—सम्बन्ध की विधिवत स्थापना की दिशा स्पष्ट हो जाती है। → देव-समर्थन से वर निश्चित तो होता है, पर विवाह-सम्पादन और दोनों कुलों/लोकों के बीच इस सम्बन्ध के दूरगामी परिणाम अगले प्रसंग की ओर संकेत करते हैं।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें मातलिके द्वारा वरका खोजविषयक एक सौ तीनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १०३ ॥। ऑपन-माज बछ। अकाल चतुर्राधिकशततमो< ध्याय: नारदजीका नागराज आर्यकके सम्मुख सुमुखके साथ मातलिकी कन्याके विवाहका प्रस्ताव एवं मातलिका नारदजी, सुमुख एवं आर्यकके साथ इन्द्रके पास आकर उनके द्वारा सुमुखको दीर्घायु प्रदान कराना तथा सुमुख- गुणकेशी-विवाह (कण्व उवाच माललेव॑चन श्रुत्वा नारदो मुनिसत्तम: । अब्रवीन्नागराजानमार्यक॑ कुरुनन्दन ।।) कण्व मुनि कहते हैं--कुरुनन्दन! मातलिकी बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारदने नागराज आर्यकसे कहा। नारद उवाच सूतो5यं मातलिननम शक्रस्य दयित: सुहृत्‌ । शुचि: शीलगुणोपेतस्तेजस्वी वीर्यवान्‌ बली,नारदजी बोले--नागराज! ये इन्द्रके प्रिय सखा और सारथि मातलि हैं। इनमें पवित्रता, सुशीलता और समस्त सदगुण भरे हुए हैं। ये तेजस्वी होनेके साथ ही बल- पराक्रमसे सम्पन्न हैं

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ନାଗରାଜ! ଏହେ ‘ମାତଲି’ ନାମକ—ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ପ୍ରିୟ, ଭରସାଯୋଗ୍ୟ ସଖା ଓ ସାରଥି। ଏହେ ଶୁଚି, ଶୀଳ ଓ ସଦ୍‌ଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ; ତେଜସ୍ବୀ, ବୀର୍ୟବାନ୍ ଏବଂ ବଳବାନ୍।

Verse 2

शक्रस्थायं सखा चैव मन्त्री सारथिरेव च । अल्पान्तरप्रभावश्नल वासवेन रणे रणे,इन्द्रके मित्र, मन्‍त्री और सारथि सब कुछ यही हैं। प्रत्येक युद्धमें ये इन्द्रके साथ रहते हैं। इनका प्रभाव इन्द्रसे कुछ ही कम है

ଏହେ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ସଖା ମାତ୍ର ନୁହେଁ, ମନ୍ତ୍ରୀ ଓ ସାରଥି ମଧ୍ୟ। ପ୍ରତ୍ୟେକ ଯୁଦ୍ଧରେ ଏହେ ବାସବଙ୍କ ପାଖେ ଥାନ୍ତି; ଏହାଙ୍କ ପ୍ରଭାବ ଇନ୍ଦ୍ରଠାରୁ କେବଳ ଅଳ୍ପ ହିଁ କମ୍।

Verse 3

अयं हरिसहस्रेण युक्त जैत्र॑ रथोत्तमम्‌ । देवासुरेषु युद्धेषु मनसैव नियच्छति,ये देवासुर-संग्राममें सहस्न घोड़ोंसे जुते हुए देवराजके विजयशील श्रेष्ठ रथका अपने मानसिक संकल्पसे ही (संचालन और) नियन्त्रण करते हैं

ଦେବାସୁର ଯୁଦ୍ଧରେ ସହସ୍ର ଅଶ୍ୱଯୁକ୍ତ ସେହି ବିଜୟଶୀଳ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରଥକୁ ଏହେ କେବଳ ମନୋବଳରେ ହିଁ ସଂଯମ କରି ନିୟନ୍ତ୍ରଣ କରନ୍ତି।

Verse 4

अनेन विजितानबश्नैर्दोर्भ्यां जयति वासव: । अनेन बलभित्‌ पूर्व प्रह्ते प्रहरत्युत,ये अपने अभश्वोंद्वारा जिन शत्रुओंको जीत लेते हैं, उन्हींको देवराज इन्द्र अपने बाहुबलसे पराजित करते हैं। पहले इनके द्वारा प्रहार हो जानेपर ही बलनाशक इन्द्र शत्रुओंपर प्रहार करते हैं

ଏହାଙ୍କ ଅଶ୍ୱବଳରେ ଯେଉଁ ଶତ୍ରୁମାନେ ପୂର୍ବରୁ ଜିତାଯାନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କୁ ହିଁ ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର) ନିଜ ବାହୁବଳରେ ପରାଜିତ କରନ୍ତି। ଏହେ ପ୍ରଥମେ ପ୍ରହାର କଲେ ପରେ ହିଁ ବଲଭିଦ୍ (ଇନ୍ଦ୍ର) ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଉପରେ ଆଘାତ କରନ୍ତି।

Verse 5

अस्य कन्या वरारोहा रूपेणासदृशी भुवि । सत्यशीलगुणोपेता गुणकेशीति विश्रुता

ତାଙ୍କର ଗୋଟିଏ ବରାରୋହା କନ୍ୟା ଅଛି; ତାହାର ରୂପ ପୃଥିବୀରେ ଅଦ୍ୱିତୀୟ। ସତ୍ୟ, ଶୀଳ ଓ ସଦ୍ଗୁଣରେ ସମ୍ପନ୍ନ ସେ ‘ଗୁଣକେଶୀ’ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ।

Verse 6

इनके एक सुन्दरी कन्या है, जिसके रूपकी समानता भूमण्डलमें कहीं नहीं है। उसका नाम है गुणकेशी। वह सत्य, शील और सदगुणोंसे सम्पन्न है ।। तस्यास्य यत्नाच्चरतस्त्रैलोक्यममरथ़ुते । सुमुखो भवतः: पौत्रो रोचते दुहितुः पति:,देवोपम कान्तिवाले नागराज! ये मातलि बड़े प्रयत्नसे कनन्‍्याके लिये वर ढूँढ़नेके निमित्त तीनों लोकोंमें विचरते हुए यहाँ आये हैं। आपका पौत्र सुमुख इन्हें अपनी कन्याका पति होनेयोग्य प्रतीत हुआ है; उसीको इन्होंने पसंद किया है

ନାରଦ କହିଲେ—ଯୋଗ୍ୟ ବର ଖୋଜିବା ପାଇଁ ତିନି ଲୋକରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରୟାସରେ ବିଚରଣ କରୁଥିବା ମାତଲି ଏହି ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ଏଠାକୁ ଆସିଛନ୍ତି। ହେ ନାଗରାଜ! ଆପଣଙ୍କ ପୌତ୍ର ସୁମୁଖ ତାଙ୍କୁ ନିଜ କନ୍ୟାର ଯୋଗ୍ୟ ପତି ଭାବେ ପ୍ରତୀତ ହୋଇଛନ୍ତି; ଦେବତୁଲ୍ୟ କାନ୍ତିଧାରୀ ସେହି ସୁମୁଖଙ୍କୁ ମାତଲି ବାଛିଛନ୍ତି।

Verse 7

यदि ते रोचते सम्यग्‌ भुजगोत्तम मा चिरम्‌ | क्रियतामार्यक क्षिप्रं बुद्धि: कन्यापरिग्रहे,नागप्रवर आर्यक! यदि आपको भी यह सम्बन्ध भलीभाँति रुचिकर जान पड़े तो शीघ्र ही इनकी पुत्रीको ब्याह लानेका निश्चय कीजिये

ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ଭୁଜଗୋତ୍ତମ! ଯଦି ଏହି ପ୍ରସ୍ତାବ ଆପଣଙ୍କୁ ସତ୍ୟସତ୍ ରୁଚେ, ତେବେ ବିଳମ୍ବ କରନ୍ତୁ ନାହିଁ। ହେ ଆର୍ୟକ! କନ୍ୟା-ପରିଗ୍ରହ (ବିବାହ ସ୍ୱୀକାର) ବିଷୟରେ ଶୀଘ୍ର ନିଷ୍ପତ୍ତି କରନ୍ତୁ।

Verse 8

यथा विष्णुकुले लक्ष्मीर्यथा स्वाहा विभावसो: । कुले तव तथैवास्तु गुणकेशी सुमध्यमा,जैसे भगवान्‌ विष्णुके घरमें लक्ष्मी और अग्निके घरमें स्वाहा शोभा पाती हैं, उसी प्रकार सुन्दरी गुणकेशी तुम्हारे कुलमें प्रतिष्ठित हो

ନାରଦ କହିଲେ—ଯେପରି ବିଷ୍ଣୁଙ୍କ ଗୃହରେ ଲକ୍ଷ୍ମୀ ଶୋଭା ପାଆନ୍ତି ଏବଂ ଅଗ୍ନିଙ୍କ ଲୋକରେ ସ୍ୱାହା ଆଦର ପାଆନ୍ତି, ସେପରି ସୁମଧ୍ୟମା ସୁନ୍ଦରୀ ଗୁଣକେଶୀ ଆପଣଙ୍କ କୁଳରେ ସୁପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ଓ ସମ୍ମାନିତ ହେଉ।

Verse 9

पौत्रस्यार्थे भवांस्तस्माद्‌ गुणकेशीं प्रतीच्छतु । सदृशीं प्रतिरूपस्य वासवस्य शचीमिव,अतः आप अपने पौत्रके लिये गुणकेशीको स्वीकार करें। जैसे इन्द्रके अनुरूप शची हैं, उसी प्रकार आपके सुयोग्य पौत्रके योग्य गुणकेशी है

ନାରଦ କହିଲେ—ଏହେତୁ ଆପଣଙ୍କ ପୌତ୍ରର ହିତାର୍ଥେ ଗୁଣକେଶୀଙ୍କୁ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତୁ। ଯେପରି ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ପାଇଁ ଶଚୀ ସଦୃଶା, ସେପରି ଆପଣଙ୍କ ଯୋଗ୍ୟ ପ୍ରତିରୂପବାନ ପୌତ୍ର ପାଇଁ ଗୁଣକେଶୀ ଯୋଗ୍ୟ ବଧୂ।

Verse 10

पितृहीनमपि होनं गुणतो वरयामहे । बहुमानाच्च भवतस्तथैवैरावतस्य च

ନାରଦ କହିଲେ—ପିତୃବଂଶହୀନ ଓ ଲୋକଦୃଷ୍ଟିରେ ‘ହୀନ’ ଲାଗିଲେ ମଧ୍ୟ, ଗୁଣବଳରେ ଆମେ ତାକୁ ବରଣ କରୁ; ଏହା ତୁମ ପ୍ରତି ଓ ଏଇରାବତ ପ୍ରତି ସମ୍ମାନରୁ ମଧ୍ୟ ଅଟେ।

Verse 11

अभिगम्य स्वयं कन्यामयं दातुं समुद्यत:

ସେ ନିଜେ ଯାଇ କନ୍ୟାଦାନ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ହୋଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହେଲା—ପ୍ରତିଜ୍ଞାକୃତ ଦାନର ଭାର ନିଜେ ନେଇ, ଅନ୍ୟଙ୍କୁ ନ ସୋପାଇ।

Verse 12

कण्व उवाच स तु दीन: प्रद्ृष्ट श्न प्राह नारदमार्यक:,कण्व मुनि कहते हैं--कुरुनन्दन! तब नागराज आर्यक प्रसन्न होकर दीनभावसे बोले --

କଣ୍ୱ ମୁନି କହିଲେ—ତେବେ ନାଗରାଜ ଆର୍ୟକ ମନେ ଦୀନତା ଧାରି, ନାରଦଙ୍କୁ ଦେଖି ସଂୟତ ଭାବେ କହିଲେ।

Verse 13

आर्यक उवाच व्रियमाणे तथा पौत्रे पुत्रे च निधनं गते । कथमिच्छामि देवर्षे गुणकेशीं स्नुषां प्रति,आर्यक पुनः बोले--'देवर्षे! मेरा पुत्र मारा गया और पौत्रका भी उसी प्रकार मृत्युने वरण किया है; अतः मैं गुणकेशीको बहू बनानेकी इच्छा कैसे करूँ?

ଆର୍ୟକ କହିଲେ—ହେ ଦେବର୍ଷି! ମୋ ପୌତ୍ର ମୃତ୍ୟୁସନ୍ନ ଓ ପୁତ୍ର ମଧ୍ୟ ନିଧନ ପ୍ରାପ୍ତ; ଏପରି ଶୋକକାଳେ ମୁଁ ଗୁଣକେଶୀକୁ ସ୍ନୁଷା କରିବାକୁ କିପରି ଇଚ୍ଛା କରିବି?

Verse 14

न मे नैतद्‌ बहुमतं महर्षे वचनं तव । सखा शक्रस्य संयुक्त: कस्यायं नेप्सितो भवेत्‌

ହେ ମହର୍ଷି! ଆପଣଙ୍କ ଏହି ବଚନ ମୋତେ ଗ୍ରାହ୍ୟ ନୁହେଁ। ଯେ ଶକ୍ରଙ୍କ ସଖା ଓ ତାଙ୍କ ସହ ସଂଯୁକ୍ତ, ସେ କାହା ପାଖରେ ଅନିପ୍ସିତ ହେବ?

Verse 15

महर्षे! मेरी दृष्टिमें आपके इस वचनका कम आदर नहीं है और ये मातलि तो इन्द्रके साथ रहनेवाले उनके सखा हैं; अत: ये किसको प्रिय नहीं लगेंगे? ।। कारणस्य तु दौर्बल्याच्चिन्तयामि महामुने । अस्य देहकरस्तात मम पुत्रो महाद्युते,परंतु माननीय महामुने! कारणकी दुर्बलतासे मैं चिन्तामें पड़ा रहता हूँ। महाद्युते! इस बालकका पिता, जो मेरा पुत्र था, गरुड़का भोजन बन गया। इस दुःखसे हमलोग पीड़ित हैं। प्रभो! जब गरुड़ यहाँसे जाने लगे, तब पुनः यह कहते गये कि दूसरे महीनेमें मैं सुमुखको भी खा जाऊँगा। अवश्य ही ऐसा ही होगा; क्योंकि हम गरुड़के निश्चयको जानते हैं। गरुड़के उस कथनसे मेरी हँसी-खुशी नष्ट हो गयी है

ଆର୍ୟକ କହିଲେ—“ହେ ମହାମୁନି! ଆପଣଙ୍କ ବଚନକୁ ମୁଁ କିଛିମାତ୍ରେ ଅବମାନ କରୁନାହିଁ। ଏହି ମାତଲି ତ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ସହଚର, ତାଙ୍କ ସହ ବସୁଥିବା ସଖା; ତେଣୁ କାହାକୁ ସେ ପ୍ରିୟ ନ ଲାଗିବ? କିନ୍ତୁ ପୂଜ୍ୟ ମହାମୁନି, କାରଣଟି ଦୁର୍ବଳ ଓ ଅନିଶ୍ଚିତ ଥିବାରୁ ମୁଁ ଚିନ୍ତାରେ ପଡ଼ିଛି। ହେ ମହାଦ୍ୟୁତି! ଏହି ବାଳକର ପିତା—ମୋର ନିଜ ପୁତ୍ର—ଗରୁଡଙ୍କ ଆହାର ହୋଇଗଲା। ସେଇ ଶୋକରେ ଆମେ ପୀଡ଼ିତ। ପ୍ରଭୋ! ଗରୁଡ ଏଠାରୁ ଯିବାବେଳେ ପୁନର୍ବାର କହିଗଲେ—‘ଦ୍ୱିତୀୟ ମାସରେ ସୁମୁଖକୁ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଭକ୍ଷିବି।’ ନିଶ୍ଚୟ ତେଣୁ ହେବ; କାରଣ ଗରୁଡଙ୍କ ଦୃଢ଼ ସଙ୍କଳ୍ପକୁ ଆମେ ଜାଣୁ। ଗରୁଡଙ୍କ ସେଇ ବଚନରେ ମୋର ହସ-ଆନନ୍ଦ ନଷ୍ଟ ହୋଇଗଲା।”

Verse 16

भक्षितो वैनतेयेन दुःखातास्तेन वै वयम्‌ । पुनरेव च तेनोक्तं वैनतेयेन गच्छता । मासेनान्येन सुमुखं भक्षयिष्य इति प्रभो,परंतु माननीय महामुने! कारणकी दुर्बलतासे मैं चिन्तामें पड़ा रहता हूँ। महाद्युते! इस बालकका पिता, जो मेरा पुत्र था, गरुड़का भोजन बन गया। इस दुःखसे हमलोग पीड़ित हैं। प्रभो! जब गरुड़ यहाँसे जाने लगे, तब पुनः यह कहते गये कि दूसरे महीनेमें मैं सुमुखको भी खा जाऊँगा। अवश्य ही ऐसा ही होगा; क्योंकि हम गरुड़के निश्चयको जानते हैं। गरुड़के उस कथनसे मेरी हँसी-खुशी नष्ट हो गयी है

ଆର୍ୟକ କହିଲେ—“ବୈନତେୟ (ଗରୁଡ) ମୋର ପୁତ୍ରକୁ—ଏହି ବାଳକର ପିତାକୁ—ଭକ୍ଷିଲେ; ସେଇ ଦୁଃଖରେ ଆମେ ଶୋକାକୁଳ। ଏବଂ ବୈନତେୟ ଏଠାରୁ ଯିବାବେଳେ ପୁନର୍ବାର କହିଗଲେ—‘ହେ ପ୍ରଭୋ! ଆଉ ଗୋଟିଏ ମାସ ପରେ ସୁମୁଖକୁ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଭକ୍ଷିବି।’ ନିଶ୍ଚୟ ତାହା ହେବ; କାରଣ ଗରୁଡଙ୍କ ଦୃଢ଼ ସଙ୍କଳ୍ପକୁ ଆମେ ଜାଣୁ। ଗରୁଡଙ୍କ ସେଇ ଘୋଷଣାରେ ମୋର ସୁଖ-ହର୍ଷ ନଷ୍ଟ ହୋଇଛି, ଏବଂ କାରଣର ଦୁର୍ବଳତାରୁ ମୁଁ ସଦା ଭୟାକୁଳ।”

Verse 17

ध्रुवं तथा तद्‌ भविता जानीमस्तस्यथ निश्चयम्‌ । तेन हर्ष: प्रणष्टो मे सुपर्णवचनेन वै,परंतु माननीय महामुने! कारणकी दुर्बलतासे मैं चिन्तामें पड़ा रहता हूँ। महाद्युते! इस बालकका पिता, जो मेरा पुत्र था, गरुड़का भोजन बन गया। इस दुःखसे हमलोग पीड़ित हैं। प्रभो! जब गरुड़ यहाँसे जाने लगे, तब पुनः यह कहते गये कि दूसरे महीनेमें मैं सुमुखको भी खा जाऊँगा। अवश्य ही ऐसा ही होगा; क्योंकि हम गरुड़के निश्चयको जानते हैं। गरुड़के उस कथनसे मेरी हँसी-खुशी नष्ट हो गयी है

“ନିଶ୍ଚୟ ତେଣୁ ହେବ; ତାହାର ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟକୁ ଆମେ ଭଲଭାବେ ଜାଣୁ। ତେଣୁ ସୁପର୍ଣ୍ଣ (ଗରୁଡ)ଙ୍କ ବଚନରେ ମୋର ହର୍ଷ ନଷ୍ଟ ହୋଇଗଲା।”

Verse 18

कण्व उवाच मातलिस्त्वब्रवीदेनं बुद्धिरत्र कृता मया । जामातृभावेन वृतः सुमुखस्तव पुत्रज:,कण्व मुनि कहते हैं--राजन! तब मातलिने आर्यकसे कहा--“मैंने इस विषयमें एक विचार किया है। यह तो निश्चय ही है कि मैंने आपके पौत्रको जामाताके पदपर वरण कर लिया

କଣ୍ୱ କହିଲେ—“ରାଜନ୍! ତାପରେ ମାତଲି ଆର୍ୟକଙ୍କୁ କହିଲେ—‘ଏ ବିଷୟରେ ମୁଁ ଏକ ବିଚାର କରିଛି। ତୁମ ପୌତ୍ର ସୁମୁଖକୁ ମୁଁ ଜାମାତା ରୂପେ ବରଣ କରିଛି।’”

Verse 19

सो<5यं मया च सहितो नारदेन च पन्नग: । त्रिलोकेशं सुरपतिं गत्वा पश्यतु वासवम्‌,“अतः यह नागकुमार मेरे और नारदजीके साथ त्रिलोकीनाथ देवराज इन्द्रके पास चलकर उनका दर्शन करे

କଣ୍ୱ କହିଲେ—“ଏହି ନାଗକୁମାର ମୋ ଓ ନାରଦଙ୍କ ସହିତ ତ୍ରିଲୋକନାଥ, ସୁରପତି ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ତାଙ୍କ ଦର୍ଶନ କରୁ।”

Verse 20

शेषेणैवास्य कार्येण प्रज्ञास्याम्पहमायुष: । सुपर्णस्य विघाते च प्रयतिष्यामि सत्तम,'साधुशिरोमणे! तदनन्तर मैं अवशिष्ट कार्यद्वारा इसकी आयुके विषयमें जानकारी प्राप्त करूँगा और इस बातकी भी चेष्टा करूँगा कि गरुड़ इसे न मार सकें

ହେ ସତ୍ତମ! ଏହି କାର୍ଯ୍ୟରେ ଯାହା ଶେଷ ଅଛି ତାହା ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କରି ମୁଁ ତାହାର ଆୟୁଷ୍ୟର ପରିମାଣ ଜାଣିବି; ଏବଂ ସୁପର୍ଣ୍ଣ (ଗରୁଡ଼) ତାକୁ ଘାତ କରିନ ପାରୁ—ଏହିଥିରେ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ପ୍ରୟାସ କରିବି।

Verse 21

सुमुखश्न॒ मया सार्ध देवेशमभिगच्छतु । कार्यसंसाधनार्थाय स्वस्ति ते5स्तु भुजंगम,“नागराज! आपका कल्याण हो। सुमुख अपने अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये मेरे साथ देवराज इन्द्रके पास चले”

ହେ ନାଗରାଜ! ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ଆବଶ୍ୟକ କାର୍ଯ୍ୟ ସାଧନାର୍ଥେ ସୁମୁଖ ମୋ ସହ ଦେବେଶ୍ୱର ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଉ।

Verse 22

ततस्ते सुमुखं गृह सर्व एव महौजस: । ददृशु: शक्रमासीनं देवराज॑ महाद्युतिम्‌,तदनन्तर उन सभी महातेजस्वी सज्जनोंने सुमुखको साथ लेकर परम कान्तिमान्‌ देवराज इन्द्रका दर्शन किया, जो स्वर्गके सिंहासनपर विराजमान थे

ତାପରେ ସେ ସମସ୍ତ ମହାଓଜସ୍ବୀ ସଜ୍ଜନ ସୁମୁଖକୁ ସହ ନେଇ, ସ୍ୱର୍ଗସିଂହାସନରେ ଆସୀନ ପରମ ଦ୍ୟୁତିମାନ ଦେବରାଜ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କୁ ଦର୍ଶନ କଲେ।

Verse 23

संगत्या तत्र भगवान्‌ विष्णुरासीच्चतुर्भुज: । ततस्तत्‌ सर्वमाचख्यौ नारदो मातलिं प्रति,दैवयोगसे वहाँ चतुर्भुज भगवान्‌ विष्णु भी उपस्थित थे। तदनन्तर देवर्षि नारदने मातलिसे सम्बन्ध रखनेवाला सारा वृत्तान्त कह सुनाया

ଦୈବଯୋଗରେ ସେଠାରେ ଚତୁର୍ଭୁଜ ଭଗବାନ ବିଷ୍ଣୁ ମଧ୍ୟ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ। ତାପରେ ଦେବର୍ଷି ନାରଦ ମାତଲି ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ସମସ୍ତ ବୃତ୍ତାନ୍ତ କହିଶୁଣାଇଲେ।

Verse 24

वैशम्पायन उवाच ततः पुरंदरं विष्णुरुवाच भुवनेश्वरम्‌ । अमृतं दीयतामस्मै क्रियताममरै: सम:

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ଭୁବନେଶ୍ୱର ପୁରନ୍ଦର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କୁ ଭଗବାନ ବିଷ୍ଣୁ କହିଲେ—“ଏହାକୁ ଅମୃତ ଦିଆଯାଉ; ଏହାକୁ ଅମରମାନଙ୍କ ସମାନ କରାଯାଉ।”

Verse 25

वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तत्पश्चात्‌ भगवान्‌ विष्णुने लोकेश्वर इन्द्रसे कहा --'देवराज! तुम सुमुखको अमृत दे दो और इसे देवताओंके समान बना दो ।। मातलिननरिदश्वैव सुमुखश्वैव वासव । लभन्तां भवत: कामात्‌ काममेत॑ यथेप्सितम्‌,“वासव! इस प्रकार मातलि, नारद और सुमुख--ये सभी तुमसे इच्छानुसार अमृतका दान पाकर अपना यह अभीष्ट मनोरथ पूर्ण कर लें!

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ତତ୍ପରେ ଭଗବାନ ବିଷ୍ଣୁ ଲୋକେଶ୍ୱର ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଦେବରାଜ! ସୁମୁଖକୁ ଅମୃତ ଦିଅ ଏବଂ ତାକୁ ଦେବତାମାନଙ୍କ ସମାନ କର। ହେ ବାସବ! ମାତଲି, ନାରଦ ଓ ସୁମୁଖ—ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ତୁମ ପ୍ରସାଦରେ, ଅମୃତଦାନ ଦ୍ୱାରା, ନିଜ ନିଜ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ଇଚ୍ଛିତ ବର ପାଇ ନିଜ ଅଭୀଷ୍ଟ ସିଦ୍ଧି ଲଭନ୍ତୁ।”

Verse 26

पुरंदरो5थ संचिन्त्य वैनतेयपराक्रमम्‌ । विष्णुमेवाब्रवीदेनं भवानेव ददात्विति,तब देवराज इन्द्रने गरुड़के पराक्रमका विचार करके भगवान्‌ विष्णुसे कहा--“आप ही इसे उत्तम आयु प्रदान कीजिये”

ତେବେ ପୁରନ୍ଦର (ଇନ୍ଦ୍ର) ବୈନତେୟ (ଗରୁଡ) ଙ୍କ ପରାକ୍ରମ ବିଚାର କରି କେବଳ ଭଗବାନ ବିଷ୍ଣୁଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଏହି ବର ଆପଣ ନିଜେ ଦିଅନ୍ତୁ।”

Verse 27

विष्णुरुवाच ईशस्त्वं सर्वलोकानां चराणामचराश्ष ये । त्वया दत्तमदत्तं कः कर्तुमुत्सहते विभो,भगवान्‌ विष्णु बोले--प्रभो! तुम सम्पूर्ण जगत्‌में जितने भी चराचर प्राणी हैं, उन सबके ईश्वर हो। तुम्हारी दी हुई आयुको बिना दी हुई करने (मिटाने)-का साहस कौन कर सकता है?

ଭଗବାନ ବିଷ୍ଣୁ କହିଲେ—“ପ୍ରଭୋ! ସମସ୍ତ ଲୋକରେ ଥିବା ଚର ଓ ଅଚର ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କର ତୁମେ ଈଶ୍ୱର। ହେ ବିଭୋ! ତୁମେ ଯାହା ଦେଇଛ, ତାହାକୁ ‘ନ ଦିଆ’ (ନଷ୍ଟ) କରିବାକୁ କିଏ ସାହସ କରିପାରିବ?”

Verse 28

प्रादाच्छक्रस्ततस्तस्मै पन्नगायायुरुत्तमम्‌ । न त्वेनममृतप्राशं चकार बलवृत्रहा,तब इन्द्रने उस नागको अच्छी आयु प्रदान की, परंतु बलासुर और वृत्रासुरका विनाश करनेवाले इन्द्रने उसे अमृतभोजी नहीं बनाया

ତାପରେ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ସେହି ପନ୍ନଗକୁ ଉତ୍ତମ ଆୟୁ ଦେଲେ; କିନ୍ତୁ ବଲ ଓ ବୃତ୍ର-ସଂହାରୀ ଇନ୍ଦ୍ର ତାକୁ ଅମୃତପ୍ରାଶୀ (ଅମୃତଭୋଜୀ) କଲେ ନାହିଁ।

Verse 29

लब्ध्वा वरं तु सुमुख: सुमुख: सम्बभूव ह । कृतदारो यथाकामं॑ जगाम च गृहान्‌ प्रति,इन्द्रका वर पाकर सुमुखका मुख प्रसन्नतासे खिल उठा। वह विवाह करके इच्छानुसार अपने घरको चला गया

ବର ପାଇ ସୁମୁଖ ସତ୍ୟସତ୍ୟ ପ୍ରସନ୍ନ ଓ ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଲା। ବିବାହ କରି, ନିଜ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ, ସେ ନିଜ ଘରକୁ ଫେରିଗଲା।

Verse 30

नारदस्त्वार्यकश्चैव कृतकार्यो मुदा युतौ । अभिमजम्मतुरभ्यर्च्य देवराजं महाद्युतिम्‌ू,नारद और आर्यक दोनों ही कृतकृत्य हो महातेजस्वी देवराजकी अर्चना करके प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थानको चले गये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ନାରଦ ଓ ଆର୍ୟକ ଉଭୟେ କାର୍ଯ୍ୟ ସିଦ୍ଧ କରି ଆନନ୍ଦରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇ, ମହାଦ୍ୟୁତିମାନ ଦେବରାଜ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ବିଧିପୂର୍ବକ ଅର୍ଚ୍ଚନା କଲେ। ତାଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ ଦେଇ ସନ୍ତୁଷ୍ଟଚିତ୍ତରେ ଉଭୟେ ନିଜ-ନିଜ ଧାମକୁ ପ୍ରତ୍ୟାବର୍ତ୍ତନ କଲେ।

Verse 104

इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि मातलिवरान्वेषणे चतुरधिकशततमो<ध्याय:

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବର ଭଗବଦ୍ୟାନପର୍ବରେ ମାତଲି-ବରାନ୍ୱେଷଣ ପ୍ରସଙ୍ଗର (ଚାରି ଅଧିକ ସହିତ) ଏକଶତ ଚତୁର୍ଥ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 106

सुमुखस्य गुणैश्नैव शीलशौचदमादिभि: | आपके और ऐरावतके प्रति हमारे हृदयमें विशेष सम्मान है और यह सुमुख भी शील, शौच और इन्द्रियसंयम आदि गुणोंसे सम्पन्न है, इसलिये इसके पितृहीन होनेपर भी हम गुणोंके कारण इसका वरण करते हैं

ନାରଦ କହିଲେ—କେବଳ ବଂଶମାତ୍ର ଦେଖି ବର ଗ୍ରହଣ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ; ଶୀଳ, ଶୌଚ, ଦମ (ଇନ୍ଦ୍ରିୟସଂଯମ) ଆଦି ଗୁଣ ହିଁ ପ୍ରମାଣ। ତେଣୁ ପିତୃଆଶ୍ରୟ ନଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସୁମୁଖ ଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ; ଗୁଣର କାରଣରୁ ହିଁ ଆମେ ତାହାକୁ ବରଣ କରୁ। ଏବଂ ଆପଣ ଓ ଐରାବତ ପ୍ରତି ମଧ୍ୟ ଆମ ହୃଦୟରେ ବିଶେଷ ସମ୍ମାନ ଅଛି।

Verse 116

मातलिस्तस्य सम्मान कर्तुमहों भवानपि । ये मातलि स्वयं चलकर कन्यादान करनेको उद्यत हैं। आपको भी इनका सम्मान करना चाहिये

ନାରଦ କହିଲେ—ମାତଲି ସମ୍ମାନର ଯୋଗ୍ୟ; ଆପଣଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ କରିବା ଉଚିତ୍। କାରଣ ମାତଲି ସ୍ୱୟଂ ଚାଲି କନ୍ୟାଦାନ କରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ହୋଇଛନ୍ତି; ତେଣୁ ଆପଣ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ଆଦର ଦିଅନ୍ତୁ।

Frequently Asked Questions

The dilemma is the conflict between perceived entitlement to one’s ordained role (Garuḍa’s sustenance and status) and the ethical requirement to recognize higher order, accept correction, and prevent pride from driving destructive escalation.

The episode teaches that self-estimation is unreliable without calibrated comparison; genuine strength includes discernment and restraint, and recognition of superior order should redirect action from confrontation to prudent policy.

Yes. The narrative explicitly pivots into counsel urging cessation of hostility and acceptance of śama, and it is immediately contrasted with Duryodhana’s dismissive reaction, underscoring how ignored counsel accelerates systemic breakdown.