Udyoga Parva Adhyāya 103: Garuḍa’s Protest, Viṣṇu’s Demonstration, and Counsel Toward Śama
महर्षे! मेरी दृष्टिमें आपके इस वचनका कम आदर नहीं है और ये मातलि तो इन्द्रके साथ रहनेवाले उनके सखा हैं; अत: ये किसको प्रिय नहीं लगेंगे? ।। कारणस्य तु दौर्बल्याच्चिन्तयामि महामुने । अस्य देहकरस्तात मम पुत्रो महाद्युते,परंतु माननीय महामुने! कारणकी दुर्बलतासे मैं चिन्तामें पड़ा रहता हूँ। महाद्युते! इस बालकका पिता, जो मेरा पुत्र था, गरुड़का भोजन बन गया। इस दुःखसे हमलोग पीड़ित हैं। प्रभो! जब गरुड़ यहाँसे जाने लगे, तब पुनः यह कहते गये कि दूसरे महीनेमें मैं सुमुखको भी खा जाऊँगा। अवश्य ही ऐसा ही होगा; क्योंकि हम गरुड़के निश्चयको जानते हैं। गरुड़के उस कथनसे मेरी हँसी-खुशी नष्ट हो गयी है
Mahārṣe! merī dṛṣṭi meṃ āpake isa vacana kā kama ādara nahīṃ hai, aura ye Mātali to Indra ke sātha rahane-vāle unake sakhā haiṃ; ataḥ ye kisako priya nahīṃ lageṃge? || kāraṇasya tu daurbalyāc cintayāmi mahāmune | asya deha-karaḥ tāta mama putro mahādyute |
ଆର୍ୟକ କହିଲେ—“ହେ ମହାମୁନି! ଆପଣଙ୍କ ବଚନକୁ ମୁଁ କିଛିମାତ୍ରେ ଅବମାନ କରୁନାହିଁ। ଏହି ମାତଲି ତ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ସହଚର, ତାଙ୍କ ସହ ବସୁଥିବା ସଖା; ତେଣୁ କାହାକୁ ସେ ପ୍ରିୟ ନ ଲାଗିବ? କିନ୍ତୁ ପୂଜ୍ୟ ମହାମୁନି, କାରଣଟି ଦୁର୍ବଳ ଓ ଅନିଶ୍ଚିତ ଥିବାରୁ ମୁଁ ଚିନ୍ତାରେ ପଡ଼ିଛି। ହେ ମହାଦ୍ୟୁତି! ଏହି ବାଳକର ପିତା—ମୋର ନିଜ ପୁତ୍ର—ଗରୁଡଙ୍କ ଆହାର ହୋଇଗଲା। ସେଇ ଶୋକରେ ଆମେ ପୀଡ଼ିତ। ପ୍ରଭୋ! ଗରୁଡ ଏଠାରୁ ଯିବାବେଳେ ପୁନର୍ବାର କହିଗଲେ—‘ଦ୍ୱିତୀୟ ମାସରେ ସୁମୁଖକୁ ମଧ୍ୟ ମୁଁ ଭକ୍ଷିବି।’ ନିଶ୍ଚୟ ତେଣୁ ହେବ; କାରଣ ଗରୁଡଙ୍କ ଦୃଢ଼ ସଙ୍କଳ୍ପକୁ ଆମେ ଜାଣୁ। ଗରୁଡଙ୍କ ସେଇ ବଚନରେ ମୋର ହସ-ଆନନ୍ଦ ନଷ୍ଟ ହୋଇଗଲା।”
आर्यक उवाच