
Kuntī’s Consolation to Draupadī and Lament for the Dispossessed Pandavas (सभा पर्व, अध्याय 70)
Upa-parva: Vanapravēśa (Departure for the Forest) — Kuntī–Draupadī Lament Sequence
Vaiśaṃpāyana narrates that as the departure for exile proceeds, Draupadī (Kṛṣṇā) approaches Kuntī (Pṛthā) and other women to take leave with appropriate salutations and embraces. A loud lament rises within the Pandavas’ inner quarters. Seeing Draupadī leaving in distress, Kuntī—overwhelmed—addresses her with effortful speech: she discourages despair, affirms Draupadī’s knowledge of women’s duties and conduct, and urges her to travel safely with steadfast remembrance and protection through adherence to elder-duty (guru-dharma). Kuntī then turns to her sons, seeing them deprived of ornaments and garments, covered with animal skins, downcast with shame and surrounded by hostile onlookers and grieving friends; she embraces them and laments the reversal of order and fortune, attributing blame to destiny and to her own misfortune in having borne sons now forced into hardship. She worries about their life in difficult forests and regrets having remained in the city had she known exile was certain. The Pandavas console and bow to Kuntī and proceed to the forest. Vidura and others comfort Kuntī and lead her home, while Dhṛtarāṣṭra, mentally shaken by grief, sends for Vidura; Vidura goes to the king, who anxiously questions him.
Chapter Arc: सभामण्डप में द्रौपदी के अपमान और करुण क्रन्दन को देखकर भी वातावरण काँप उठता है—वह कुररी-सी आर्त होकर रोती है, और राजसभा मौन-सा हो जाता है। → धृतराष्ट्र-पुत्र दुर्योधन, अन्य राजाओं और कुरुवृद्धों की उपस्थिति में, द्रौपदी को छल-कपटयुक्त वचनों से घेरता है और उसे प्रश्नों में बाँधकर अपमान को ‘न्याय’ का रूप देने का प्रयास करता है। सबकी दृष्टि धर्मज्ञ युधिष्ठिर पर टिकती है कि वे क्या उत्तर देंगे। → कोलाहल थमते ही भीमसेन चन्दनचर्चित भुजा उठाकर गर्जना करता है—यदि धर्मराज की मर्यादा बाधक न होती तो वह धार्तराष्ट्रों को सिंह की भाँति कुचल देता; वह अपनी परिघ-सी भुजाओं के बीच से इन्द्र तक के न बच पाने की प्रतिज्ञा-सी घोषणा करता है और द्यूत-धर्म के नाम पर हुए अन्याय को असह्य बताता है। → भीष्म, द्रोण और विदुर भीम को संयम का उपदेश देते हैं—सभा में अभी क्षमा और धैर्य ही उचित है; भीम का रोष रोका तो जाता है, पर शान्त नहीं होता। → भीम का प्रतिशोध-वचन सभा के ऊपर काले बादल की तरह टिक जाता है—धर्म और क्रोध के इस संघर्ष का परिणाम आगे किस रूप में फूटेगा, यह अनिश्चित रह जाता है।
Verse 1
अफ्--णक+ सप्ततितमो< ध्याय: दुर्योधनके छल-कपटयुक्त वचन और भीमसेनका रोषपूर्ण उद्गार वैशम्पायन उवाच तथा तु दृष्टवा बहु तत्र देवीं रोरूयमाणां कुररीमिवार्ताम् । नोचुर्वच: साध्वथ वाप्यसाधु महीक्षितो धार्तराष्ट्रस्य भीता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! महारानी द्रौपदीको वहाँ आर्त होकर कुररीकी भाँति बहुत विलाप करती देखकर भी सभामें बैठे हुए राजालोग दुर्योधनके भयसे भला या बुरा कुछ भी नहीं कह सके
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ସେଠାରେ ମହାରାଣୀ ଦ୍ରୌପଦୀ କୁରରୀ ପକ୍ଷୀ ପରି ଆର୍ତ୍ତ ହୋଇ ଉଚ୍ଚସ୍ୱରେ ବିଲାପ କରୁଥିବାକୁ ଦେଖି ମଧ୍ୟ, ସଭାରେ ବସିଥିବା ରାଜାମାନେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ୟୋଧନଙ୍କ ଭୟରେ କିଛି କହିଲେ ନାହିଁ—ନ ଧର୍ମପକ୍ଷରେ, ନ ଅଧର୍ମର ନିନ୍ଦାରେ।
Verse 2
दृष्टवा तथा पार्थिवपुत्रपौत्रां- स्तृष्णी भूतान् धृतराष्ट्रस्य पुत्र: । स्मयन्निवेदं वचनं बभाषे पाञ्चालराजस्य सुतां तदानीम्,राजाओंके बेटों और पोतोंको मौन देखकर धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधनने उस समय मुसकराते हुए पांचालराजकुमारी द्रौपदीसे यह बात कही
ରାଜାମାନଙ୍କ ପୁଅ-ନାତିମାନେ ନିରବ ଥିବାକୁ ଦେଖି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ସେତେବେଳେ ହସିମୁହେଁ ପାଞ୍ଚାଳରାଜକନ୍ୟା ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କୁ ଏହି କଥା କହିଲା।
Verse 3
दुर्योधन उवाच तिष्ठत्वयं प्रश्न उदारसत्त्वे भीमे<र्जुने सहदेवे तथैव । पत्यौ च ते नकुले याज्ञसेनि वदन्त्वेते वचन त्वत्प्रसूतम्
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—“ଉଦାରହୃଦୟେ! ଏହି ପ୍ରଶ୍ନ ଭୀମ, ଅର୍ଜୁନ, ସହଦେବ ଏବଂ ତୁମ ପତି ନକୁଳ—ହେ ଯାଜ୍ଞସେନୀ—ଏମାନଙ୍କ ଉପରେ ରହୁ। ତୁମଠାରୁ ଉଦ୍ଭୂତ ଏହି କଥାର ଉତ୍ତର ଏମାନେ ଦିଅନ୍ତୁ।”
Verse 4
दुर्योधन बोला--द्रौपदी! तुम्हारा यह प्रश्न तुम्हारे ही पति महाबली भीम, अर्जुन, सहदेव और नकुलपर छोड़ दिया जाता है। ये ही तुम्हारी पूछी हुई बातका उत्तर दें ।। अनीशथ्ररं विब्रुवन्त्वार्यम ध्ये युधिष्ठिरं तव पाज्चालि हेतो: । कुर्वन्तु सर्वे चानृतं धर्मराजं पाज्चालि त्वं मोक्ष्यसे दासभावात्,पांचालि! इन श्रेष्ठ राजाओंके बीच ये लोग यह स्पष्ट कह दें कि युधिष्ठिरको तुम्हें दाँवपर रखनेका कोई अधिकार नहीं था। सभी पाण्डव मिलकर धर्मराज युधिष्ठिरको झूठा ठहरा दें। फिर पांचालि! तुम दास्यभावसे मुक्त कर दी जाओगी
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—“ଦ୍ରୌପଦୀ! ତୁମ ପ୍ରଶ୍ନ ତୁମ ନିଜ ପତିମାନେ—ମହାବଳୀ ଭୀମ, ଅର୍ଜୁନ, ସହଦେବ ଓ ନକୁଳ—ଏମାନଙ୍କ ଉପରେ ଛାଡ଼ାଯାଉ। ତୁମେ ପଚାରିଥିବା କଥାର ଉତ୍ତର ଏମାନେ ଦିଅନ୍ତୁ। ହେ ପାଞ୍ଚାଳୀ! ଏହି ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାଜାମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ସ୍ପଷ୍ଟ କହନ୍ତୁ—ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ତୁମକୁ ଦାଉରେ ରଖିବାର କୌଣସି ଅଧିକାର ନଥିଲା। ସମସ୍ତ ପାଣ୍ଡବ ମିଶି ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଅସତ୍ୟବାଦୀ ଠାରେଇଦିଅନ୍ତୁ; ତେବେ, ହେ ପାଞ୍ଚାଳୀ, ତୁମେ ଦାସ୍ୟଭାବରୁ ମୁକ୍ତ ହେବ।”
Verse 5
धर्मे स्थितो धर्मसुतो महात्मा स्वयं चेद॑ कथयव्विन्द्रकल्प: । ईशो वा ते ह्नीशो5थ वैष वाक्यादस्य क्षिप्रमेके भजस्व,ये धर्मपुत्र महात्मा युधिष्ठिर इन्द्रके समान तेजस्वी तथा सदा धर्ममें स्थित रहनेवाले हैं। तुमको दाँवपर रखनेका इन्हें अधिकार था या नहीं? ये स्वयं ही कह दें; फिर इन्हींके कथनानुसार तुम शीघ्र दासीपन या अदासीपन किसी एकका आश्रय लो
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—“ଧର୍ମରେ ଅବସ୍ଥିତ ମହାତ୍ମା ଧର୍ମପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଇନ୍ଦ୍ରସମ ତେଜସ୍ବୀ, ସେ ନିଜେ ଏହା କହୁନ୍ତୁ—ତୁମକୁ ଦାଉରେ ରଖିବାର ଅଧିକାର ତାଙ୍କର ଥିଲା କି ନଥିଲା। ତାଙ୍କ କଥା ଅନୁସାରେ ତୁମେ ଶୀଘ୍ର ଦୁଇ ଅବସ୍ଥାର ଗୋଟିଏକୁ ଗ୍ରହଣ କର—ଦାସ୍ୟ କିମ୍ବା ଦାସ୍ୟମୁକ୍ତି।”
Verse 6
सर्वे हीमे कौरवेया: सभायां दुःखान्तरे वर्तमानास्तवैव । न वि्लुवन्त्यार्यसत्त्वा यथावत् पतींश्व ते समवेक्ष्याल्पभाग्यान्,द्रौपदी! ये सभी उत्तम स्वभाववाले कुरुवंशी इस सभामें तुम्हारे लिये ही दुःखी हैं और तुम्हारे मन्दभाग्य पतियोंको देखकर तुम्हारे प्रश्चका ठीक-ठीक उत्तर नहीं दे पाते हैं
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—“ଦ୍ରୌପଦୀ! ଏହି ସଭାରେ ଥିବା ସମସ୍ତ କୌରବ ତୁମ ପାଇଁ ହିଁ ଦୁଃଖରେ ଅଛନ୍ତି। ଏହି କ୍ଷଣରେ ଅଲ୍ପଭାଗ୍ୟ ତୁମ ପତିମାନଙ୍କୁ ଦେଖି, ଏହି ଆର୍ଯ୍ୟସ୍ୱଭାବୀମାନେ ତୁମ ପ୍ରଶ୍ନର ଯଥାଯଥ ଉତ୍ତର ଦେଇପାରୁନାହାନ୍ତି।”
Verse 7
वैशम्पायन उवाच ततः सभ्या: कुरुराजस्य तस्य वाक्यं सर्वे प्रशशंसुस्तथोच्चै: । चेलावेधांश्वापि चक्रुर्नदन्तो हाहेत्यासीदपि चैवार्तनाद:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर एक ओर सभी सभासदोंने कुरुराज दुर्योधनके उस कथनकी उच्च स्वरसे भूरि-भूरि प्रशंसा की और गर्जना करते हुए वे वस्त्र हिलाने लगे तथा वहीं दूसरी ओर हाहाकार और आर्तनाद होने लगा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ତାପରେ ସଭାସଦମାନେ ସେ କୁରୁରାଜ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ବାକ୍ୟକୁ ଉଚ୍ଚ ସ୍ୱରରେ ଭୁରି-ଭୁରି ପ୍ରଶଂସା କଲେ। ଉତ୍ସାହରେ ଗର୍ଜନ କରି ବସ୍ତ୍ର ହଲାଇଲେ; କିନ୍ତୁ ସେହି ସମୟରେ ‘ହା ହା’ ଧ୍ୱନି ଓ ଆର୍ତ୍ତନାଦ ମଧ୍ୟ ଉଠିଲା।
Verse 8
श्रुत्वा तु वाक््यं सुमनोहरं त- दर्षश्वासीत् कौरवाणां सभायाम् | सर्वे चासन् पार्थिवा: प्रीतिमन्तः कुरुश्रेष्ठ धार्मिकं पूजयन्त:,दुर्योधनका वह मनोहर वचन सुनकर उस समय सभामें कौरवोंको बड़ा हर्ष हुआ। अन्य सब राजा भी बड़े प्रसन्न हुए तथा दुर्योधनको कौरवोंमें श्रेष्ठ और धार्मिक कहते हुए उसका आदर करने लगे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମନୋହର ବାକ୍ୟ ଶୁଣି ସେ ସମୟରେ ରାଜସଭାରେ କୌରବମାନଙ୍କର ବଡ଼ ହର୍ଷ ହେଲା। ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ରାଜାମାନେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ ଏବଂ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ କୁରୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଓ ଧାର୍ମିକ ବୋଲି ପ୍ରଶଂସା କରି ସମ୍ମାନ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 9
युधिष्ठिरं च ते सर्वे समुदैक्षन्त पार्थिवा: । कि नु वक्ष्यति धर्मज्ञ इति साचीकृतानना:,फिर वे सब नरेश मुँह घुमाकर राजा युधिष्ठिरकी ओर इस आशासे देखने लगे कि देखें, ये धर्मज्ञ पाण्डुकुमार क्या कहते हैं?
ତାପରେ ସେ ସମସ୍ତ ରାଜା ମୁହଁ ଘୁଞ୍ଚାଇ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଦିଗକୁ ଚାହିଁଲେ—“ଏହି ଧର୍ମଜ୍ଞ ଏବେ କ’ଣ କହିବେ?” ବୋଲି।
Verse 10
कि नु वक्ष्यति बीभत्सुरजितो युधि पाण्डव: । भीमसेनो यमौ चोभौ भृशं कौतूहलान्विता:,युद्धमें कभी पराजित न होनेवाले पाण्डुनन्दन अर्जुन किस प्रकार अपना मत व्यक्त करते हैं? भीमसेन, नकुल तथा सहदेव भी क्या कहते हैं? इसके लिये उन राजाओंके मनमें बड़ी उत्कण्ठा थी
ସେମାନଙ୍କ ମନରେ ଭାରି ଉତ୍କଣ୍ଠା ହେଲା—“ଯୁଦ୍ଧରେ ଅଜିତ ପାଣ୍ଡୁନନ୍ଦନ ବୀଭତ୍ସୁ ଅର୍ଜୁନ କ’ଣ ମତ ଦେବେ? ଏବଂ ଭୀମସେନ ଓ ଯମଜ ନକୁଳ-ସହଦେବ କ’ଣ କହିବେ?”
Verse 11
तस्मिन्नुपरते शब्दे भीमसेनो<ब्रवीदिदम् । प्रगृह्म रुचिरं दिव्यं भुजं चन्दनचर्चितम्,वह कोलाहल शान्त होनेपर भीमसेन अपनी चन्दनचर्चित सुन्दर दिव्य भुजा उठाकर इस प्रकार बोले
ସେ କୋଳାହଳ ଶାନ୍ତ ହେବା ପରେ, ଭୀମସେନ ଚନ୍ଦନଚର୍ଚ୍ଚିତ ନିଜ ସୁନ୍ଦର, ଦିବ୍ୟ ଭୁଜାକୁ ଉଠାଇ ଏହିପରି କହିଲେ।
Verse 12
भीमसेन उवाच यद्येष गुरुरस्माकं धर्मराजो महामना: । न प्रभु: स्थात् कुलस्यास्य न वयं मर्षयेमहि
ଭୀମସେନ କହିଲେ—ଯଦି ଏହି ମହାମନା ଧର୍ମରାଜ, ଯିଏ ଆମ ପୂଜ୍ୟ ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ଓ ଏହି ପାଣ୍ଡବକୁଳର ଅଧିପତି-ରକ୍ଷକ, ଏମିତି ନ ଥାନ୍ତେ, ତେବେ ଆମେ ଏହି ଅବସ୍ଥା କେବେ ମଧ୍ୟ ସହିନଥାନ୍ତୁ; ଆମେ ଏହା ସହିବୁ ନାହିଁ।
Verse 13
भीमसेनने कहा--यदि ये महामना धर्मराज युधिष्छिर हमारे पितृतुल्य तथा इस पाण्डुकुलके स्वामी न होते तो हम कौरवोंका यह अत्याचार कदापि सहन नहीं करते ।। ईशो नः पुण्यतपसां प्राणानामपि चेश्वर: । मन्यतेडजितमात्मानं यद्येष विजिता वयम्,ये हमारे पुण्य, तप और प्राणोंके भी प्रभु हैं। यदि ये द्रौपदीको दाँवपर लगानेसे पूर्व अपनेको हारा हुआ नहीं मानते हैं तो हम सब लोग इनके द्वारा दाँवपर रखे जानेके कारण हारे जा चुके हैं। यदि मैं हारा गया न होता तो अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श करनेवाला कोई भी मरणथधर्मा मनुष्य द्रौपदीके इन केशोंको छू लेनेपर मेरे हाथसे जीवित नहीं बच सकता था। राजाओ! परिघके समान मोटी और गोलाकार मेरी इन विशाल भुजाओंकी ओर तो देखो। इनके बीचमें आकर इन्द्र भी जीवित नहीं बच सकता
ଭୀମ କହିଲେ—ଯଦି ଏହି ମହାମନା ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଯିଏ ଆମ ପିତୃତୁଲ୍ୟ ଓ ପାଣ୍ଡବକୁଳର ଅଧିପତି, ଏମିତି ନ ଥାନ୍ତେ, ତେବେ କୌରବମାନଙ୍କ ଏହି ଅତ୍ୟାଚାରକୁ ଆମେ କେବେ ମଧ୍ୟ ସହିନଥାନ୍ତୁ। ସେ ଆମ ପୁଣ୍ୟ, ତପ ଓ ପ୍ରାଣର ମଧ୍ୟ ପ୍ରଭୁ। ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କୁ ପଣରେ ରଖିବା ପୂର୍ବରୁ ସେ ନିଜକୁ ହାରିଥିବା ବୋଲି ନ ମାନିଲେ ମଧ୍ୟ, ତାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପଣରେ ରଖାଯାଇଥିବା ଆମେ ପୂର୍ବରୁ ହାରିଥିବା ବୋଲି ଗଣାଯାଇଛୁ। ମୁଁ ହାରିନଥାନ୍ତି, ତେବେ ପୃଥିବୀରେ ଚାଲୁଥିବା କୌଣସି ମର୍ତ୍ୟ ପାଞ୍ଚାଳୀଙ୍କ ଏହି କେଶକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରି ମୋ ହାତରୁ ଜୀବନ୍ତ ଛୁଟିପାରିନଥାନ୍ତା। ହେ ରାଜାମାନେ, ମୋର ଏହି ବିଶାଳ ଭୁଜଦ୍ୱୟକୁ ଦେଖ—ଲୋହା ପରିଘ ପରି ମୋଟ ଓ ଗୋଲ; ଏମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପଡ଼ିଲେ ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ର ମଧ୍ୟ ଜୀବନ୍ତ ଛୁଟିବେ ନାହିଁ।
Verse 14
न हि मुच्येत मे जीवन् पदा भूमिमुपस्पृशन् | मर्त्यधर्मा परामृश्य पाज्चाल्या मूर्थजानिमान्,ये हमारे पुण्य, तप और प्राणोंके भी प्रभु हैं। यदि ये द्रौपदीको दाँवपर लगानेसे पूर्व अपनेको हारा हुआ नहीं मानते हैं तो हम सब लोग इनके द्वारा दाँवपर रखे जानेके कारण हारे जा चुके हैं। यदि मैं हारा गया न होता तो अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श करनेवाला कोई भी मरणथधर्मा मनुष्य द्रौपदीके इन केशोंको छू लेनेपर मेरे हाथसे जीवित नहीं बच सकता था। राजाओ! परिघके समान मोटी और गोलाकार मेरी इन विशाल भुजाओंकी ओर तो देखो। इनके बीचमें आकर इन्द्र भी जीवित नहीं बच सकता
ଭୀମସେନ କହିଲେ—ପୃଥିବୀରେ ପଦଚାରଣା କରୁଥିବା କୌଣସି ମର୍ତ୍ୟ ପାଞ୍ଚାଳୀଙ୍କ ଏହି କେଶକୁ ସ୍ପର୍ଶ କଲେ, ସେ ମୋ ହାତରୁ ଜୀବନ୍ତ ଛୁଟିପାରିବ ନାହିଁ। ଯଦି ମୁଁ ପରାଜୟର ଅପମାନରେ ବନ୍ଧା ନ ଥାନ୍ତି, ଏହି ଅପରାଧ ଦଣ୍ଡବିହୀନ ରହିନଥାନ୍ତା।
Verse 15
पश्यध्वं ह्वायतौ वृत्तौ भुजी मे परिघाविव । नैतयोरन्तरं प्राप्प मुच्येतापि शतक्रतु:,ये हमारे पुण्य, तप और प्राणोंके भी प्रभु हैं। यदि ये द्रौपदीको दाँवपर लगानेसे पूर्व अपनेको हारा हुआ नहीं मानते हैं तो हम सब लोग इनके द्वारा दाँवपर रखे जानेके कारण हारे जा चुके हैं। यदि मैं हारा गया न होता तो अपने पैरोंसे पृथ्वीका स्पर्श करनेवाला कोई भी मरणथधर्मा मनुष्य द्रौपदीके इन केशोंको छू लेनेपर मेरे हाथसे जीवित नहीं बच सकता था। राजाओ! परिघके समान मोटी और गोलाकार मेरी इन विशाल भुजाओंकी ओर तो देखो। इनके बीचमें आकर इन्द्र भी जीवित नहीं बच सकता
ଭୀମସେନ କହିଲେ—ଦେଖ, ମୋର ଏହି ଦୁଇ ଭୁଜ ପରିଘ ପରି ଲମ୍ବା, ମୋଟ ଓ ଗୋଲ। ଏମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପଡ଼ିଲେ ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ର ମଧ୍ୟ ଜୀବନ୍ତ ଛୁଟିବେ ନାହିଁ।
Verse 16
धर्मपाशसितत्त्वेवं नाधिगच्छामि संकटम् । गौरवेण विरुद्धश्न निग्रहादर्जुनस्य च,मैं धर्मके बन्धनमें बँधा हूँ, बड़े भाईके गौरवने मुझे रोक रखा है और अर्जुन भी मना कर रहा है, इसीलिये मैं इस संकटसे पार नहीं हो पाता
ଭୀମସେନ କହିଲେ—ମୁଁ ଧର୍ମର ପାଶରେ ବନ୍ଧା; ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ଭ୍ରାତାଙ୍କ ପ୍ରତି ଗୌରବ-ଶ୍ରଦ୍ଧା ମୋତେ ରୋକୁଛି, ଅର୍ଜୁନ ମଧ୍ୟ ମୋତେ ନିଗ୍ରହ କରୁଛନ୍ତି। ତେଣୁ ମୁଁ ଏହି ସଙ୍କଟକୁ ଅତିକ୍ରମ କରିପାରୁନାହିଁ।
Verse 17
धर्मराजनिसृष्टस्तु सिंह: क्षुद्रमृगानिव । धार्तराष्ट्रानिमान् पापान् निष्पिषेयं तलासिभि:,यदि धर्मराज मुझे आज्ञा दे दें तो जैसे सिंह छोटे मृगोंको दबोच लेता है, उसी प्रकार मैं धृतराष्ट्रके इन पापी पुत्रोंको तलवारकी जगह हाथोंके तलवोंसे ही मसल डालूँ
ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଯଦି ମୋତେ ଆଜ୍ଞା ଦିଅନ୍ତି, ତେବେ ସିଂହ ଯେପରି ଛୋଟ ମୃଗମାନଙ୍କୁ ଧରି ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରେ, ସେପରି ମୁଁ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଏହି ପାପୀ ପୁଅମାନଙ୍କୁ ତଳୱାରରେ ନୁହେଁ—ମୋ ହାତର ତଳୁଦ୍ୱାରା ହିଁ ପିଷିଦେବି।
Verse 18
वैशम्पायन उवाच तमुवाच तदा भीष्मो द्रोणो विदुर एव च । क्षम्यतामिदमित्येवं सर्व सम्भाव्यते त्वयि,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! तब भीष्म, द्रोण और विदुरने भीमसेनको शान्त करते हुए कहा--“भीम! क्षमा करो, तुम सब कुछ कर सकते हो”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତେବେ ଭୀଷ୍ମ, ଦ୍ରୋଣ ଓ ବିଦୁର ଭୀମସେନଙ୍କୁ ଶାନ୍ତ କରି କହିଲେ—“ଏହାକୁ କ୍ଷମା କର; ତୁମ ଦ୍ୱାରା ସବୁ କିଛି ସମ୍ଭବ।”
Verse 70
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि भीमवाक्ये सप्ततितमो5ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବର ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ‘ଭୀମବାକ୍ୟ’ ନାମକ ସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The dilemma is how to preserve dharma and composure when authority and procedure have produced unjust outcomes—especially how Draupadī and Kuntī negotiate duty, dignity, and emotional truth during forced exile.
The chapter models disciplined resilience: grief is acknowledged but should not disable duty; adherence to ethical conduct and protective norms (guru-dharma/strī-dharma) is presented as a stabilizing strategy amid political collapse.
No explicit phalaśruti appears here; the meta-significance is narrative and ethical—this farewell sequence functions as a moral bridge from courtly injustice to exile, sharpening the epic’s inquiry into dharma’s endurance under coercion.