Adhyaya 69
Sabha ParvaAdhyaya 6923 Verses

Adhyaya 69

सभा-पर्यवसान-प्रस्थानवचनम् | Counsel at the Point of Departure

Upa-parva: Prasthāna–Āśvāsana (Departure and Counsel) Episode

Yudhiṣṭhira addresses and takes leave of leading Kuru authorities and sabhā members—Bhīṣma, Somadatta, Bāhlika, Droṇa, Kṛpa, Aśvatthāman, Vidura, Dhṛtarāṣṭra, the Dhārtarāṣṭras, Sañjaya, Yuyutsu, and others—stating his intention to depart and return to see them again. Vaiśaṃpāyana notes the assembly’s silence, attributed to modesty and moral discomfort, while their inward thought wishes him well. Vidura then offers practical and ethical counsel: Pṛthā (Kuntī), described as noble, delicate, and accustomed to comfort, should not go to the forest; she will be honored and protected in Vidura’s home. Vidura further reframes defeat without adharma as non-ruinous, enumerates the Pāṇḍavas’ complementary competencies (Yudhiṣṭhira’s dharma-knowledge, Arjuna’s martial expertise, Bhīma’s force, Nakula’s resource stewardship, Sahadeva’s restraint and management), and praises Draupadī and Dhaumya as ethically skilled supports. He strengthens Yudhiṣṭhira’s resolve by recalling prior instruction by revered sages and by articulating a schematic of virtues aligned with cosmic domains (self-giving, gentleness, restraint, forbearance, and strength). The chapter closes with auspicious benedictions and Yudhiṣṭhira’s respectful departure after saluting Bhīṣma and Droṇa.

Chapter Arc: द्यूतसभा के अपमान-तूफ़ान के बीच द्रौपदी का विलाप और प्रश्न सभा के हृदय में कील की तरह धँसता है—“मैं दासी हूँ या स्वामिनी?” → द्रौपदी अपने पूर्व-जीवन की मर्यादा (जिसे सूर्य-वायु भी न देख पाते) और आज की सार्वजनिक घसीट-अपमान की विडम्बना रखती है; वह कुरुसभा के महात्माओं को प्रणाम कर के भी उन्हें उनके कर्तव्य की याद दिलाती है। सभा में मौन, भय, लोभ और राजधर्म का संघर्ष बढ़ता है—कौन बोले, किसके विरुद्ध बोले? → भीष्म का ‘धर्म-संकट’ वचन: वह द्रौपदी के प्रश्न का निर्णायक उत्तर देने में असमर्थता प्रकट करता है—स्त्री की स्थिति, युधिष्ठिर के पहले स्वयं हारने/फिर द्रौपदी को दाँव पर लगाने की वैधता, और जुए की अधर्म-प्रकृति—इन सबके बीच धर्म का निर्णय ‘सूक्ष्म’ होकर फिसल जाता है। → भीष्म का कथन सभा को एक कठोर दर्पण दिखाता है: जब बल/सत्ता धर्म को दबा देती है, तब ‘धर्म-वेला’ में भी धर्म आहत हो जाता है। यह उत्तर समाधान कम, चेतावनी अधिक बनता है—सभा की नैतिक पराजय स्पष्ट होती है। → भीष्म के असमर्थ-परंतु-भयावह संकेत के बाद प्रश्न हवा में लटकता है: क्या कोई वरिष्ठ (द्रोण, कृप, विदुर) निर्णायक रूप से अधर्म रोकेंगे, या अपमान की धारा और उग्र होगी?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ ३ श्लोक मिलाकर कुल ९४३ “लोक हैं) न२्च्स्स्त््साि्स्सि ह्य ४: एकोनसप्ततितमो<ध्याय: द्रौोपदीका चेतावनीयुक्त विलाप एवं भीष्मका वचन द्रौपहुवाच पुरस्तात्‌ करणीयं मे न कृतं कार्यमुत्तरम्‌ । विह्वलास्मि कृतानेन कर्षता बलिना बलातू,द्रौपदी बोली--हाय! मेरा जो कार्य सबसे पहले करनेका था, वह अभीतक नहीं हुआ। मुझे अब वह कार्य कर लेना चाहिये। इस बलवान दुरात्मा दुःशासनने मुझे बलपूर्वक घसीटकर व्याकुल कर दिया है

ଦ୍ରୌପଦୀ କହିଲେ—ହାୟ! ଯାହା ମୋତେ ପ୍ରଥମେ କରିବା ଉଚିତ୍ ଥିଲା, ସେହି କାମ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ହୋଇନାହିଁ; ଏବେ ଯାହା ଶେଷ ରହିଛି, ସେହି କରିବାକୁ ପଡିବ। ମୁଁ ବିହ୍ୱଳ, କାରଣ ଏହି ବଳବାନ ଦୁଷ୍ଟାତ୍ମା ଦୁଃଶାସନ ମୋତେ ବଳପୂର୍ବକ ଟାଣି ଆଣିଛି।

Verse 2

अभिवादं करोम्येषां कुरूणां कुरुसंसदि । न मे स्थादपराधो<यं यदिदं न कृतं मया,कौरवोंकी सभामें मैं समस्त कुरुवंशी महात्माओंको प्रणाम करती हूँ। मैंने घबराहटके कारण पहले प्रणाम नहीं किया; अतः यह मेरा अपराध न माना जाय

କୁରୁମଣ୍ଡଳୀର ସଭାରେ ମୁଁ ଏହି ସମସ୍ତ କୁରୁବଂଶୀଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କରୁଛି। ଭୟ-ବିହ୍ୱଳତାରେ ପୂର୍ବେ ପ୍ରଣାମ କରିପାରିନଥିଲି; ଏହାକୁ ମୋର ଅପରାଧ ଭାବେ ଗଣନା କରାଯାଉ ନାହିଁ।

Verse 3

वैशम्पायन उवाच सा तेन च समाधूता दुःखेन च तपस्विनी । पतिता विललापेदं सभायामतथोचिता,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! दुशासनके बार-बार खींचनेसे तपस्विनी द्रौपदी पृथ्वीपर गिर पड़ी और उस सभामें अत्यन्त दु:खित हो विलाप करने लगी। वह जिस दुरवस्थामें पड़ी थी, उसके योग्य कदापि न थी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ସେ ତାହାର ଦ୍ୱାରା ପୁନଃପୁନଃ ଟାଣି ନିଆଯାଇ, ଦୁଃଖରେ ଆବୃତ ତପସ୍ୱିନୀ ଦ୍ରୌପଦୀ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଗଲା। ରାଜସଭାରେ—ଯେ ଦଶା ତାହା ପାଇଁ ସର୍ବଥା ଅଯୋଗ୍ୟ—ସେହି ଦଶାରେ ସେ କରୁଣ ଭାବେ ବିଲାପ କରିବାକୁ ଲାଗିଲା।

Verse 4

द्रौपहयुवाच स्वयंवरे यास्मि नृपैर्दृष्टा रड़े समागतै: । न दृष्टपूर्वा चान्यत्र साहमद्य सभां गता,द्रौपदीने कहा--हा! मैं स्वयंवरके समय सभामें आयी थी और उस समय रंगभूमिमें पधारे हुए राजाओंने मुझे देखा था। उसके सिवा, अन्य अवसरोंपर कहीं भी आजसे पहले किसीने मुझे नहीं देखा। वही मैं आज सभामें बलपूर्वक लायी गयी हूँ

ଦ୍ରୌପଦୀ କହିଲେ—ସ୍ୱୟଂବର ସମୟରେ ରଙ୍ଗଭୂମିରେ ସମାଗତ ରାଜାମାନେ ମୋତେ ଦେଖିଥିଲେ। ସେଇ ଏକ ଅବସର ଛଡ଼ା, ଆଜି ପୂର୍ବରୁ ଅନ୍ୟ କେଉଁଠି ମୋତେ କେହି ଦେଖିନଥିଲେ; ତଥାପି ଆଜି ମୋତେ ସଭାକୁ ଆଣାଯାଇଛି।

Verse 5

यां न वायुर्न चादित्यो दृष्टवन्तौ पुरा गृहे । साहमद्य सभामध्ये दृश्यास्मि जनसंसदि

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଯାହାକୁ ପୂର୍ବେ ଗୃହାନ୍ତରେ ବାୟୁ ଓ ସୂର୍ଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଦେଖିନଥିଲେ, ସେଇ ମୁଁ ଆଜି ପୁରୁଷଜନସମାଗମରେ, ରାଜସଭାମଧ୍ୟରେ, ସମସ୍ତଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଦୃଶ୍ୟ ହେଉଛି।

Verse 6

पहले राजभवनमें रहते हुए जिसे वायु तथा सूर्य भी नहीं देख पाते थे, वही मैं आज इस सभाके भीतर महान्‌ जनसमुदायमें आकर सबके नेत्रोंकी लक्ष्य बन गयी हूँ ।। यां न मृष्यन्ति वातेन स्पृश्यमानां गृहे पुरा । स्पृश्यमानां सहन्तेड्द्य पाण्डवास्तां दुरात्मना,पहले अपने महलमें रहते समय जिसका वायुद्वारा स्पर्श भी पाण्डवोंको सहन नहीं होता था, उसी मुझ द्रौपदीका यह दुरात्मा दुःशासन भरी सभामें स्पर्श कर रहा है, तो भी आज ये पाण्डुकुमार सह रहे हैं

ଯେ ନାରୀକୁ ପୂର୍ବେ ରାଜଭବନରେ ଥିବାବେଳେ ପାଣ୍ଡବମାନେ ବାୟୁର ସ୍ପର୍ଶ ମଧ୍ୟ ସହି ପାରୁନଥିଲେ, ଆଜି ସେଇ ନାରୀକୁ ଏହି ସଭାମଧ୍ୟରେ ଏକ ଦୁରାତ୍ମା ଲୋକ ସ୍ପର୍ଶ କରୁଛି—ତଥାପି ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନେ ସହୁଛନ୍ତି। ଏହି ଦୃଶ୍ୟ ରାଜଧର୍ମ ଓ ସୁରକ୍ଷାକର୍ତ୍ତବ୍ୟର ପତନକୁ ପ୍ରକାଶ କରେ: ବୃଦ୍ଧ ଓ ରାଜାମାନଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ସାର୍ବଜନୀନ ଅପମାନ ଘଟୁଛି, ଏବଂ ଯେମାନେ ରକ୍ଷା କରିବାକୁ ବାଧ୍ୟ ସେମାନେ ବନ୍ଧନରେ ନୀରବ।

Verse 7

मृष्यन्ति कुरवश्लेमे मनन्‍्ये कालस्य पर्ययम्‌ । स्‍्नुषां दुहितरं चैव क्लिश्यमानामनर्हतीम्‌,मैं कुरुकुलकी पुत्रवधू एवं पुत्रीतुल्य हूँ। सताये जानेके योग्य नहीं हूँ, फिर भी मुझे यह दारुण क्लेश दिया जा रहा है और ये समस्त कुरुवंशी इसे सहन करते हैं। मैं समझती हूँ, बड़ा विपरीत समय आ गया है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—କୁରୁମାନେ ନୀରବରେ ସହୁଛନ୍ତି; ମୋ ମତରେ ଏହା କାଳର କ୍ରୂର ପରିବର୍ତ୍ତନ। କାରଣ ଯେ ପୁତ୍ରବଧୂ—ପୁତ୍ରୀ ସମାନ—ଏପରି କ୍ଲେଶର ଯୋଗ୍ୟ ନୁହେଁ, ସେଇ ନାରୀକୁ ଯନ୍ତ୍ରଣା ଦିଆଯାଉଛି, ତଥାପି ସମଗ୍ର କୁରୁବଂଶ ସହୁଛି।

Verse 8

कि नवतः कृपणं भूयो यदहं स्त्री सती शुभा । सभामध्यं विगाहेउद्य क्व नु धर्मो महीक्षिताम्‌,इससे बढ़कर दयनीय दशा और क्‍या हो सकती है कि मुझ-जैसी शुभकर्मपरायणा सती-साध्वी स्त्री भरी सभामें विवश करके लायी गयी है। आज राजाओंका धर्म कहाँ चला गया?

ଏହାଠାରୁ ଅଧିକ କରୁଣ କ’ଣ ହୋଇପାରେ—ମୁଁ, ଶୁଭଲକ୍ଷଣା ସତୀ-ସାଧ୍ବୀ ନାରୀ, ଆଜି ବଳପୂର୍ବକ ସଭାମଧ୍ୟକୁ ଆଣାଯାଇଛି! ଆଜି ରାଜାମାନଙ୍କ ଧର୍ମ କେଉଁଠି ଗଲା?

Verse 9

धर्म्या स्त्रियं सभां पूर्वे न नयन्तीति न: श्रुतम्‌ । स नष्ट: कौरवेयेषु पूर्वो धर्म: सनातन:,मैंने सुना है, पहले लोग धर्मपरायणा स्त्रीको कभी सभामें नहीं लाते थे, किंतु इन कौरवोंके समाजमें वह प्राचीन सनातनधर्म नष्ट हो गया है

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପୂର୍ବକାଳରେ ଧର୍ମନିଷ୍ଠା ନାରୀକୁ ସଭାକୁ ନେଇଯାଉନଥିଲେ ବୋଲି ଆମେ ଶୁଣିଛୁ। କିନ୍ତୁ କୌରବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସେଇ ପ୍ରାଚୀନ, ସନାତନ ଧର୍ମ ନଷ୍ଟ ହୋଇଗଲା।

Verse 10

कथं हि भार्या पाण्डूनां पार्षतस्य स्वसा सती । वासुदेवस्य च सखी पार्थिवानां सभामियाम्‌,अन्यथा मैं पाण्डवोंकी पत्नी, धृष्टद्युम्नकी सुशीला बहन और भगवान्‌ श्रीकृष्णकी सखी होकर राजाओंकी इस सभामें कैसे लायी जा सकती थी?

ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କର ପତ୍ନୀ, ପାର୍ଷତ (ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ)ଙ୍କ ସତୀ ଭଉଣୀ ଏବଂ ବାସୁଦେବ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ସଖୀ ହୋଇଥିବା ମୋତେ ରାଜମାନଙ୍କ ଏହି ସଭାକୁ ଏଭଳି ଭାବେ କିପରି ଆଣାଯାଇପାରେ?

Verse 11

तामिमां धर्मराजस्य भारया सदृशवर्णजाम्‌ | ब्रूत दासीमदासीं वा तत्‌ करिष्यामि कौरवा:,कौरवो! मैं धर्मराज युधिष्ठिरकी धर्मपत्नी तथा उनके समान वर्णकी कन्या हूँ। आपलोग बतावें, मैं दासी हूँ या अदासी? आप जैसा कहेंगे मैं वैसा ही करूँगी

ହେ କୌରବମାନେ! ମୁଁ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଧର୍ମପତ୍ନୀ, ତାଙ୍କ ସମାନ ବର୍ଣ୍ଣରେ ଜନ୍ମିତା। କହନ୍ତୁ—ମୁଁ ଦାସୀ କି ଅଦାସୀ? ଆପଣମାନେ ଯାହା କହିବେ, ସେହିପରି ମୁଁ କରିବି।

Verse 12

अयं मां सुद॒ढं क्षुद्र: कौरवाणां यशोहर: । क्लिश्राति नाहं तत्‌ सोढुं चिरं शक्ष्यामि कौरवा:,कुरुवंशी क्षत्रियो! यह कुरुकुलकी कीर्तिमें कलंक लगानेवाला नीच दुःशासन मुझे बहुत कष्ट दे रहा है। मैं इस क्लेशको देरतक नहीं सह सकूँगी

ହେ କୌରବମାନେ! କୌରବମାନଙ୍କ ଯଶ ହରଣ କରୁଥିବା ଏହି ନୀଚ ଦୁଃଶାସନ ମୋତେ ଭୟଙ୍କର ଭାବେ କଷ୍ଟ ଦେଉଛି। ଏହି ପୀଡାକୁ ମୁଁ ଦୀର୍ଘ ସମୟ ସହିପାରିବି ନାହିଁ।

Verse 13

जितां वाप्यजितां वापि मन्यध्वं मां यथा नृपा: । तथा प्रत्युक्तमिच्छामि तत्‌ करिष्यामि कौरवा:,कुरुवंशियो! आप क्‍या मानते हैं? मैं जीती गयी हूँ या नहीं। मैं आपके मुँहसे इसका ठीक-ठीक उत्तर सुनना चाहती हूँ। फिर उसीके अनुसार कार्य करूँगी

ହେ କୁରୁବଂଶୀ ରାଜମାନେ! ଆପଣମାନେ କ’ଣ ଭାବୁଛନ୍ତି—ମୁଁ ଜିତାଯାଇଛି କି ନୁହେଁ? ଆପଣମାନଙ୍କ ମୁଖରୁ ଏହାର ନିଶ୍ଚିତ ଉତ୍ତର ଶୁଣିବାକୁ ଚାହୁଁଛି; ତା’ପରେ ସେହିଅନୁସାରେ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବି।

Verse 14

भीष्म उवाच उक्तवानस्मि कल्याणि धर्मस्य परमा गति: । लोके न शक्‍्यते ज्ञातुमपि विज्ञैर्महात्मभि:,भीष्मजीने कहा--कल्याणि! मैं पहले ही कह चुका हूँ कि धर्मकी गति बड़ी सूक्ष्म है। लोकमें विज्ञ महात्मा भी उसे ठीक-ठीक नहीं जान सकते

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—କଲ୍ୟାଣି! ଧର୍ମର ଗତି ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୂକ୍ଷ୍ମ ବୋଲି ମୁଁ ପୂର୍ବରୁ କହିଛି। ଏହି ଲୋକରେ ତାହାକୁ ଠିକ୍-ଠିକ୍ ଜାଣିବା ସମ୍ଭବ ନୁହେଁ; ବିଜ୍ଞ ମହାତ୍ମାମାନେ ମଧ୍ୟ ତାହାକୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଜାଣିପାରନ୍ତି ନାହିଁ।

Verse 16

संसारमें बलवान्‌ मनुष्य जिसको धर्म समझता है, धर्मविचारके समय लोग उसीको धर्म मान लेते हैं और बलहीन पुरुष जो धर्म बतलाता है, वह बलवान पुरुषके बताये धर्मसे दब जाता है (अत: इस समय कर्ण और दुर्योधनका बताया हुआ धर्म ही सर्वोपरि हो रहा है।) ।। नविवेक्तुं च ते प्रश्रमिमं शकनोमि निश्चयात्‌ । सूक्ष्मत्वाद्‌ गहनत्वाच्च कार्यस्यास्य च गौरवात्‌

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟରେ ତୁମ ଏହି ପ୍ରଶ୍ନର ନିର୍ଣ୍ଣୟ କରିପାରୁନି। ବିଷୟଟି ସୂକ୍ଷ୍ମ, ଗଭୀର ଭାବେ ଜଟିଳ, ଏବଂ ପରିଣାମରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଗୁରୁତର।

Verse 17

मैं तो धर्मका स्वरूप सूक्ष्म और गहन होनेके कारण तथा इस धर्मनिर्णयके कार्यके अत्यन्त गुरुतर होनेसे तुम्हारे इस प्रश्नका निश्चितरूपसे यथार्थ विवेचन नहीं कर सकता ।। नूनमन्त: कुलस्यायं भविता नचिरादिव । तथा हि कुरव: सर्वे लोभमोहपरायणा:,अवश्य ही बहुत शीघ्र इस कुलका नाश होनेवाला है; क्योंकि समस्त कौरव लोभ और मोहके वशीभूत हो गये हैं

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଧର୍ମର ସ୍ୱରୂପ ସୂକ୍ଷ୍ମ ଓ ଗଭୀର; ଏହି ଧର୍ମ-ନିର୍ଣ୍ଣୟ କାର୍ଯ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଗୁରୁତର। ତେଣୁ ତୁମ ପ୍ରଶ୍ନର ନିଶ୍ଚିତ ଓ ଯଥାର୍ଥ ବିବେଚନ ମୁଁ କରିପାରୁନି। କିନ୍ତୁ ନିଶ୍ଚୟ ଲାଗୁଛି ଯେ ଏହି କୁଳର ଅନ୍ତ ଶୀଘ୍ର ଆସିବ; କାରଣ ସମସ୍ତ କୌରବ ଲୋଭ ଓ ମୋହରେ ପରାୟଣ ହୋଇପଡ଼ିଛନ୍ତି।

Verse 18

कुलेषु जाता: कल्याणि व्यसनैराहता भृशम्‌ | धर्म्यान्मार्गान्नि च्यवन्ते येषां नस्त्वं वधू: स्थिता,कल्याणि! तुम जिनकी पत्नी हो, वे पाण्डव हमारे उत्तम कुलमें उत्पन्न हैं और भारी- से-भारी संकटमें पड़कर भी धर्मके मार्गसे विचलित नहीं होते हैं

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—କଲ୍ୟାଣୀ! ଯେମାନଙ୍କ ଘରେ ତୁମେ ବଧୂ ହୋଇ ଅଛ, ସେହି ପାଣ୍ଡବମାନେ ଆମ ଉତ୍ତମ କୁଳରେ ଜନ୍ମିତ; ଏବଂ ଭୟଙ୍କର ବିପଦରେ ଆଘାତ ପାଇଲେ ମଧ୍ୟ ସେମାନେ ଧର୍ମମାର୍ଗରୁ ଚ୍ୟୁତ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ।

Verse 19

उपपन्नं च पाज्चालि तवेदं वृत्तमीदृशम्‌ । यत्‌ कृच्छूमपि सम्प्राप्ता धर्ममेवान्ववेक्षसे,पांचालराजकुमारी! तुम्हारा यह आचार-व्यवहार तुम्हारे योग्य ही है; क्योंकि भारी संकटमें पड़कर भी तुम धर्मकी ओर ही देख रही हो

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ହେ ପାଞ୍ଚାଳୀ! ତୁମର ଏହି ଆଚରଣ ତୁମକୁ ଯଥାଯଥ; କାରଣ ଭୟଙ୍କର ସଙ୍କଟରେ ପଡ଼ିଲେ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ଧର୍ମକୁ ହିଁ ଦୃଷ୍ଟିରେ ରଖୁଛ।

Verse 20

एते द्रोणादयश्नैव वृद्धा धर्मविदो जना: । शून्यै: शरीरैस्तिष्ठन्ति गतासव इवानता:,ये द्रोणाचार्य आदि वृद्ध एवं धर्मज्ञ पुरुष भी सिर लटकाये शून्य शरीरसे इस प्रकार बैठे हैं; मानो निष्प्राण हो गये हों। मेरी राय यह है कि इस प्रश्नका निर्णय करनेके लिये धर्मराज युधिष्ठिर ही सबसे प्रामाणिक व्यक्ति हैं। तुम जीती गयी हो या नहीं? यह बात स्वयं इन्हें बतलानी चाहिये

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଦ୍ରୋଣାଚାର୍ଯ୍ୟ ଆଦି ଏହି ବୃଦ୍ଧ ଧର୍ମଜ୍ଞମାନେ ମୁଣ୍ଡ ନମାଇ, ଶରୀର ଶୂନ୍ୟ ହୋଇଯାଇଥିବା ପରି, ପ୍ରାଣ ଚାଲିଯାଇଥିବା ଲୋକମାନଙ୍କ ଭଳି ବସିଛନ୍ତି। ମୋ ମତରେ ଏହି ପ୍ରଶ୍ନର ନିର୍ଣ୍ଣୟ ପାଇଁ ସର୍ବାଧିକ ପ୍ରମାଣିକ ବ୍ୟକ୍ତି ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ହିଁ। ତୁମେ ଜିତାଯାଇଛ କି ନାହିଁ—ଏହା ସେ ନିଜେ ଘୋଷଣା କରୁନ୍ତୁ।

Verse 21

युधिष्ठिरस्तु प्रश्नेडस्मिन्‌ प्रमाणमिति मे मतिः । अजितां वा जितां वेति स्वयं व्याहर्तुमहति,ये द्रोणाचार्य आदि वृद्ध एवं धर्मज्ञ पुरुष भी सिर लटकाये शून्य शरीरसे इस प्रकार बैठे हैं; मानो निष्प्राण हो गये हों। मेरी राय यह है कि इस प्रश्नका निर्णय करनेके लिये धर्मराज युधिष्ठिर ही सबसे प्रामाणिक व्यक्ति हैं। तुम जीती गयी हो या नहीं? यह बात स्वयं इन्हें बतलानी चाहिये

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଏହି ବିବାଦରେ ମୋ ମତରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ହିଁ ପ୍ରମାଣ। ସେ ଜିତା ହୋଇଛି କି ନୁହେଁ—ଏହା ସେ ନିଜେ କହିବାକୁ ଯୋଗ୍ୟ।

Verse 68

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापरववके अन्तर्गत झ्टूतपर्वमें द्रौपदीको भरी सभागें खींचना' इस विषयसे सम्बन्ध रखनेवाला अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ‘ଭରା ସଭାରେ ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କୁ ଟାଣି ଆଣିବା’ ବିଷୟକ ଅଷ୍ଟଷଷ୍ଟିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା। ଉପସଂହାରରେ ଦର୍ଶାଯାଇଛି—ସାର୍ବଜନୀନ ଅପମାନ ଓ ବଳପ୍ରୟୋଗ ଧର୍ମର ଘୋର ଉଲ୍ଲଂଘନ; ଏହା ଆଗାମୀ ନୈତିକ-ରାଜନୈତିକ ପତନ ଓ ଯୁଦ୍ଧର ପୂର୍ବାଭାସ।

Verse 69

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि भीष्मवाक्ये एकोनसप्ततितमो<थध्याय: ।। ६९ || इस प्रकार श्रीमह्ाभारत सभापरववके अन्तर्गत झ्टूतपर्वमें भीष्मवाक्यविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଭୀଷ୍ମବାକ୍ୟବିଷୟକ ଏକୋନସପ୍ତତିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 215

बलवांश्व यथा धर्म लोके पश्यति पूरुष: । स धर्मों धर्मवेलायां भवत्यभिहत: पर:

ଭୀଷ୍ମ କହିଲେ—ଲୋକରେ ବଳବାନ ପୁରୁଷ ଯେପରି ‘ଧର୍ମ’କୁ ଦେଖେ, ଧର୍ମ-ନିର୍ଣ୍ଣୟର ବେଳା ଆସିଲେ ସେଇ ଧର୍ମ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଆଘାତ ପାଇ ଦମିତ ହୋଇଯାଏ।

Frequently Asked Questions

The tension lies in responding to an adverse court outcome with procedural dignity and moral steadiness—preserving duty, relationships, and dependents’ welfare without escalating disorder within the sabhā framework.

Vidura teaches that a loss incurred without adharma need not destabilize the virtuous; one should protect the vulnerable (notably Kuntī), maintain composure, and rely on disciplined, complementary capacities within the group.

No formal phalaśruti is stated; the closest meta-layer is the benedictory framing (svasti/agada) and the narrator’s note on the assembly’s inward well-wishing, which positions the counsel as ethically authoritative within the epic’s didactic texture.