सभा-पर्यवसान-प्रस्थानवचनम् | Counsel at the Point of Departure
जितां वाप्यजितां वापि मन्यध्वं मां यथा नृपा: । तथा प्रत्युक्तमिच्छामि तत् करिष्यामि कौरवा:,कुरुवंशियो! आप क्या मानते हैं? मैं जीती गयी हूँ या नहीं। मैं आपके मुँहसे इसका ठीक-ठीक उत्तर सुनना चाहती हूँ। फिर उसीके अनुसार कार्य करूँगी
jitāṃ vāpy ajitāṃ vāpi manyadhvaṃ māṃ yathā nṛpāḥ | tathā pratyuktam icchāmi tat kariṣyāmi kauravāḥ ||
ହେ କୁରୁବଂଶୀ ରାଜମାନେ! ଆପଣମାନେ କ’ଣ ଭାବୁଛନ୍ତି—ମୁଁ ଜିତାଯାଇଛି କି ନୁହେଁ? ଆପଣମାନଙ୍କ ମୁଖରୁ ଏହାର ନିଶ୍ଚିତ ଉତ୍ତର ଶୁଣିବାକୁ ଚାହୁଁଛି; ତା’ପରେ ସେହିଅନୁସାରେ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବି।
वैशम्पायन उवाच