Adhyaya 62
Sabha ParvaAdhyaya 6220 Verses

Adhyaya 62

याज्ञसेनी-प्रश्नः (Draupadī’s Question in the Assembly)

Upa-parva: Dyūta–Sabha Dharmavicāra Upa-Parva (Dice-Assembly Ethical Inquiry)

Adhyāya 62 records Draupadī’s speech in the Kuru assembly after she is forcibly brought in. She laments the inversion of customary restraint—being seen and handled publicly—contrasting prior domestic seclusion with the present exposure (1–10). She frames a precise juridical query: the assembly must declare whether she is dāsī or adāsī (slave or not), and she will conform to the verdict, thereby shifting the episode from mere humiliation to an adjudicable dharma problem (11–13). Bhīṣma responds by acknowledging he has spoken of dharma’s highest course but that its true determination is difficult even for learned persons; he cannot decide the question due to its subtlety, complexity, and gravity, and he notes the court’s moral decline under greed and delusion (14–20). He then indicates that Yudhiṣṭhira is the proper authority to answer whether she is won or not won, since the wager’s legitimacy hinges on his status and agency (21). The assembled kings remain silent out of fear, after which Dhṛtarāṣṭra’s son (Duryodhana) provocatively urges the Pāṇḍavas to declare Yudhiṣṭhira powerless so Draupadī may be released, effectively inviting falsehood and institutional collapse (22–27). The assembly reacts with noisy approval of this rhetoric, while attention turns to what Yudhiṣṭhira and the brothers will say (28–30). Bhīma then declares his readiness to retaliate but admits restraint by dharma-bonds, deference, and Arjuna’s control; elders counsel him toward forbearance, underscoring the tension between moral outrage and institutional constraint (31–38).

Chapter Arc: सभा के भीतर द्यूत की धूल अभी बैठी नहीं है; उसी धुँध में विदुर धृतराष्ट्र के सामने खड़े होकर कहते हैं—जो बात मरने वाले को औषधि-सी अप्रिय लगती है, वही आज तुम्हें सुननी होगी। → विदुर दुर्योधन के जन्म-लक्षणों और स्वभाव को ‘गोमायु-सा कर्कश रुदन’ और ‘कुलघ्न’ कहकर उजागर करते हैं, और धृतराष्ट्र की आसक्ति को लोभ-रूपी मदिरा से तुलना करते हैं—मधु के छत्ते के लोभ में मनुष्य ऊँचाई पर चढ़कर गिरता है, वैसे ही राजा मोह में चढ़कर विनाश में उतरता है। वे दृष्टान्तों की शृंखला से बताते हैं कि राज्य-लाभ का लोभ, पुत्र-स्नेह और अन्याय का समर्थन एक ही रस्सी के तीन रेशे हैं जो अंततः गला घोंटते हैं। → विदुर का निर्णायक आग्रह: दुर्योधन ही ‘काल-हेतु’ है—भरतवंश के विनाश का कारण। अभी भी अवसर है; यदि आज्ञा हो तो अर्जुन जैसे वीर उसे बंदी बना सकते हैं, और समस्त बंधु-बान्धव दीर्घकाल के लिए सुखी हो सकते हैं। यह चेतावनी नहीं, अंतिम घंटी है। → विदुर धृतराष्ट्र को पश्चात्ताप के भय से जगाते हैं—जैसे लोभ में पक्षियों को सताने वाला राजा अंत में पछताता है, वैसे ही तुम भी ‘मोहात्मा’ होकर बाद में तपोगे। वे नीति का सार रख देते हैं: पुत्र-स्नेह को धर्म के ऊपर मत रखो; अन्याय को रोकना ही राजधर्म है। → धृतराष्ट्र इस हित-वचन को स्वीकार करेंगे या पुत्र-मोह के अंधकार में और गहरे उतरेंगे—सभा की अगली चाल इसी पर टिकी है।

Shlokas

Verse 1

औपनआक्ात छा 2 - प्राचीनकालमें प्रचलित एक सिक्का, जो एक कर्ष अथवा सोलह मासे सोनेका बना होता था। द्विषष्टितमो5 ध्याय: धृतराष्ट्रको विदुरकी चेतावनी वैशम्पायन उवाच एवं प्रवर्तिते द्यूते घोरे सर्वापहारिणि | सर्वसंशयनिर्मोक्ता विदुरो वाक्यमब्रवीत्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार जब सर्वस्वका अपहरण करनेवाली वह भयानक द्यूतक्रीड़ा चल रही थी, उसी समय समस्त संशयोंका निवारण करनेवाले विदुरजी बोल उठे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ସର୍ବସ୍ୱ ହରଣକାରୀ ସେଇ ଭୟଙ୍କର ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡା ଚାଲିଥିବାବେଳେ, ସମସ୍ତ ସନ୍ଦେହ ନିବାରକ ବିଦୁର ଏହି ବଚନ କହିଲେ।

Verse 2

विदुर उवाच महाराज विजानीहि यतृ्‌ त्वां वक्ष्यामि भारत । मुमूर्षोरौषधमिव न रोचेतापि ते श्रुतम्‌,विदुरजीने कहा--भरतकुलतिलक महाराज धुृतराष्ट्र! मरणासन्न रोगीको जैसे ओषधि अच्छी नहीं लगती, उसी प्रकार आपलोगोंको मेरी शास्त्रसम्मत बात भी अच्छी नहीं लगेगी। फिर भी मैं आपसे जो कुछ कह रहा हूँ, उसे अच्छी तरह सुनिये और समझिये

ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ମହାରାଜ, ହେ ଭାରତ! ମୁଁ ଯାହା କହିବାକୁ ଯାଉଛି, ତାହା ଭଲଭାବେ ଜାଣ। ମରଣାସନ୍ନ ରୋଗୀଙ୍କୁ ଯେପରି ଔଷଧ ରୁଚେ ନାହିଁ, ସେପରି ମୋ କଥା ତୁମକୁ ପ୍ରିୟ ନ ଲାଗିପାରେ; ତଥାପି ଶୁଣି ଗ୍ରହଣ କର।

Verse 3

यद्‌ वै पुरा जातमात्रो रुराव गोमायुवद्‌ विस्वरं पापचेता: । दुर्योधनो भरतानां कुलघ्न: सो<यं युक्तो भवतां कालहेतु:,यह भरतवंशका विनाश करनेवाला पापी दुर्योधन पहले जब गर्भसे बाहर निकला था, गीदड़के समान जोर-जोरसे चिल्लाने लगा था; अतः यह निश्चय ही आप सब लोगोंके विनाशका कारण बनेगा

ସେଇ ପାପଚେତା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ—ଭାରତକୁଳଘାତକ—ଜନ୍ମମାତ୍ରେ ଗୋମାୟୁ ପରି ବେସୁରା, କର୍କଶ ସ୍ୱରେ ରୋଦନ କରିଥିଲା। ତେଣୁ ଏହି ପୁରୁଷ ହିଁ ତୁମମାନଙ୍କ ବିନାଶର କାରଣ ଓ ନିମିତ୍ତ ବୋଲି ଯଥାର୍ଥ ଗଣ୍ୟ।

Verse 4

गृहे वसन्तं गोमायु त्वं वै मोहान्न बुध्यसे । दुर्योधनस्य रूपेण शृणु काव्यां गिरं मम,राजन! दुर्योधनके रूपमें आपके घरके भीतर एक गीदड़ निवास कर रहा है; परंतु आप मोहवश इस बातको समझ नहीं पाते। सुनिये, मैं आपको शुक्राचार्यकी कही हुई नीतिकी बात बतलाता हूँ

ହେ ରାଜନ୍! ତୁମ ଘରେ ଗୋଟିଏ ଗୋମାୟୁ ବସିଛି; କିନ୍ତୁ ମୋହବଶେ ତୁମେ ତାକୁ ଚିହ୍ନି ପାରୁନାହଁ। ସେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନର ରୂପ ଧରିଛି। ମୋର ଏହି ନୀତିବାଣୀ ଶୁଣ।

Verse 5

मधु वै माध्विको लब्ध्वा प्रपातं नैव बुध्यते । आरुह्यु तं मज्जति वा पतन चाधिगच्छति,मधु बेचनेवाला मनुष्य जब कहीं ऊँचे वृक्ष आदिपर मधुका छत्ता देख लेता है, तब वहाँसे गिरनेकी सम्भावनाकी ओर ध्यान नहीं देता। वह ऊँचे स्थानपर चढ़कर या तो मधु पाकर मग्न हो जाता है अथवा उस स्थानसे नीचे गिर जाता है

ମଧୁ ଛତା ମିଳିଲେ ମଧୁ ସଂଗ୍ରାହକ ଲୋକ ପତନର ଭୟକୁ ଧ୍ୟାନ ଦିଏ ନାହିଁ। ସେ ଉପରକୁ ଚଢ଼ି ମଧୁର ମାଧୁର୍ୟରେ ମଗ୍ନ ହୁଏ, କିମ୍ବା ସେଠାରୁ ପଡ଼ି ପତନ ପାଏ।

Verse 6

सो<यं मत्तो$क्षद्यूतेन मधुवन्न परीक्षते | प्रपातं बुध्यते नैव वैरं कृत्वा महारथै:,वैसे ही यह दुर्योधन जूएके नशेमें इतना उन्मत्त हो गया है कि मधुमत्त पुरुषकी भाँति अपने ऊपर आनेवाले संकटको नहीं देखता। महारथी पाण्डवोंके साथ वैर करके हमें पतनके गर्तमें गिरकर मरना पड़ेगा, इस बातको समझ नहीं पा रहा है

ଏହି ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଅକ୍ଷଦ୍ୟୂତର ମଦରେ ମଧୁମତ୍ତ ଲୋକ ପରି ଆଗକୁ କ’ଣ ଅଛି ତାହା ପରୀକ୍ଷା କରେ ନାହିଁ। ମହାରଥୀ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ବୈର କରି ଆମେ ପତନ ଓ ମୃତ୍ୟୁ ଦିଗକୁ ଯାଉଛୁ—ସେ ଖାଇଁକୁ ସେ କିଛିମାତ୍ରେ ବୁଝେ ନାହିଁ।

Verse 7

विदितं मे महाप्राज्ञ भोजेष्वेवासमठ्जसम्‌ । पुत्रं संत्यक्तवान्‌ पूर्व पौराणां हितकाम्यया,महाप्राज्ञ! मुझे मालूम है कि भोजवंशके एक नरेशने पूर्वकालमें पुरवासियोंके हितकी इच्छासे अपने कुमार्गगामी पुत्रका परित्याग कर दिया था

ହେ ମହାପ୍ରାଜ୍ଞ! ମୋତେ ଜଣା ଅଛି—ଭୋଜମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପୂର୍ବକାଳରେ ଜଣେ ରାଜା ପୌରମାନଙ୍କ ହିତକାମନାରେ କୁମାର୍ଗଗାମୀ ନିଜ ପୁତ୍ରକୁ ପରିତ୍ୟାଗ କରିଥିଲେ।

Verse 8

अन्धका यादवा भोजा: समेता: कंसमत्यजन्‌ । नियोगात्‌ तु हते तस्मिन्‌ कृष्णेनामित्रघातिना,अन्धकों, यादवों और भोजोंने मिलकर कंसको त्याग दिया तथा उन्हींके आदेशसे शत्रुघाती श्रीकृष्णने उसको मार डाला

ଅନ୍ଧକ, ଯାଦବ ଓ ଭୋଜ—ସମସ୍ତେ ଏକତ୍ର ହୋଇ କଂସକୁ ପରିତ୍ୟାଗ କଲେ; ଏବଂ ସେମାନଙ୍କ ନିୟୋଗରେ ଶତ୍ରୁଘାତୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ତାହାକୁ ବଧ କଲେ।

Verse 9

एवं ते ज्ञातय: सर्वे मोदमाना: शतं समा: । त्वन्नियुक्त: सव्यसाची निगृह्नलातु सुयोधनम्‌

ଏହିପରି ତୁମର ସମସ୍ତ ଜ୍ଞାତିଜନ ଶତବର୍ଷ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଆନନ୍ଦରେ ରହୁନ୍ତୁ। ତୁମ ନିୟୋଗରେ ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନ ସୁୟୋଧନ (ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ)କୁ ନିଗ୍ରହ କରୁନ୍ତୁ।

Verse 10

इस प्रकार उसके मारे जानेसे समस्त बन्धु-बान्धव सदाके लिये सुखी हो गये हैं। आप भी आज्ञा दें तो ये सव्यसाची अर्जुन इस दुर्योधनको बंदी बना ले सकते हैं ।। निग्रहादस्य पापस्य मोदन्तां कुरव: सुखम्‌ । काकेनेमांश्षित्रब्हन्‌ शार्दूलान्‌ क्रो्टकेन च | क्रीणीष्व पाण्डवान्‌ राजन्‌ मा मज्जी: शोकसागरे,इसी पापीके कैद हो जानेसे समस्त कौरव सुख और आनन्दसे रह सकते हैं। राजन! दुर्योधन कौवा है और पाण्डव मोर। इस कौवेको देकर आप विचित्र पंखवाले मयूरोंको खरीद लीजिये। इस गीदड़के द्वारा इन पाण्डवरूपी शेरोंको अपनाइये। शोकके समुद्रमें डूबकर प्राण न दीजिये

ବିଦୁର କହିଲେ—ଏହି ପାପୀକୁ ନିଗ୍ରହ କଲେ କୁରୁମାନେ ଶାନ୍ତିସୁଖରେ ଆନନ୍ଦ କରିବେ। ରାଜନ, ବିଚିତ୍ର ପଙ୍ଖ ଥିବା ଏହି ମୟୂରମାନଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ଗୋଟିଏ କାଉକୁ କାହିଁକି ନେଉଛ? ବାଘ-ସଦୃଶ ବୀରମାନଙ୍କୁ ଛାଡ଼ି ଗୋଟିଏ ଶିଆଳକୁ କାହିଁକି ବଦଳାଉଛ? ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ପୁଣି ନିଜ କର; ଶୋକସାଗରେ ଡୁବି ନଶିଯାଅନି।

Verse 11

त्यजेत्‌ कुलार्थ पुरुषं ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्‌ । ग्रामं जनपदस्यार्थ आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्‌,समूचे कुलकी भलाईके लिये एक मनुष्यको त्याग दे, गाँवके हितके लिये एक कुलको छोड़ दे, देशकी भलाईके लिये एक गाँवको त्याग दे और आत्माके उद्धारके लिये सारी पृथ्वीका ही परित्याग कर दे

କୁଳର ହିତ ପାଇଁ ଗୋଟିଏ ପୁରୁଷକୁ ତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ; ଗାଁର ହିତ ପାଇଁ ଗୋଟିଏ କୁଳକୁ ତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ; ଜନପଦର ହିତ ପାଇଁ ଗୋଟିଏ ଗାଁକୁ ତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ; ଏବଂ ଆତ୍ମହିତ ପାଇଁ ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ମଧ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ।

Verse 12

सर्वज्ञ: सर्वभावज्ञ: सर्वशत्रुभयंकर: । इति सम भाषते काव्यो जम्भत्यागे महासुरान्‌,सबके मनोभावोंको जाननेवाले तथा सब शत्रुओंके लिये भयंकर सर्वज्ञ शुक्राचार्यने जम्भ दैत्यको त्याग करनेके समय समस्त बड़े-बड़े असुरोंसे यह कथा सुनायी थी

ସର୍ବଜ୍ଞ, ସମସ୍ତଙ୍କ ମନୋଭାବ ଜାଣୁଥିବା, ଏବଂ ସମସ୍ତ ଶତ୍ରୁଙ୍କ ପାଇଁ ଭୟଙ୍କର—ଏପରି କାବ୍ୟ (ଶୁକ୍ରାଚାର୍ଯ୍ୟ) ଜମ୍ଭକୁ ତ୍ୟାଗ କରିବା ସମୟରେ ମହାସୁରମାନଙ୍କୁ ଏଭଳି କହିଥିଲେ।

Verse 13

हिरण्यष्ठीविन: कांश्चित्‌ पक्षिणो वनगोचरान्‌ | गृहे किल कृतावासान्‌ लोभाद्‌ राजा न्यपीडयत्‌ | स चोपभोगलोभान्धो हिरण्यार्थी परंतप,एक वनमें कुछ पक्षी रहते थे, जो अपने मुखसे सोना उगला करते थे। एक दिन जब वे अपने घोंसलोंमें आरामसे बैठे थे, उस देशके राजाने उन्हें लोभवश मरवा डाला। शत्रुओंको संताप देनवाले नरेश! उस राजाको एक साथ बहुत-सा सुवर्ण पा लेनेकी इच्छा थी। उपभोगके लोभने उसे अंधा बना दिया था

ବିଦୁର କହିଲେ—ବନରେ କିଛି ପକ୍ଷୀ ଥିଲେ, ଯେମାନେ ସୁନା ବିସର୍ଜନ କରୁଥିଲେ। ଗୋଟିଏ ଦିନ ସେମାନେ ନିଜ ଘୋସାରେ ନିଶ୍ଚିନ୍ତ ଥିବାବେଳେ, ସେ ଦେଶର ରାଜା ଲୋଭରେ ପଡ଼ି ସେମାନଙ୍କୁ ନଷ୍ଟ କରାଇଲା। ହେ ଶତ୍ରୁସନ୍ତାପକ! ସେ ରାଜା ସୁବର୍ଣ୍ଣଲୋଭୀ ଥିଲା; ଭୋଗଲାଲସା ତାକୁ ଅନ୍ଧ କରିଦେଇଥିଲା।

Verse 14

आयतिं च तदात्वं च उभे सद्यो व्यनाशयत्‌ । तदर्थकामस्तद्वत्‌ त्वं मा द्रुह: पाण्डवान्‌ नूप,अतः उसने उस धनके लोभसे उन पक्षियोंका वध करके वर्तमान और भविष्य दोनों लाभोंका तत्काल नाश कर दिया। राजन! इसी प्रकार आप पाण्डवोंका सारा धन हड़प लेनेके लोभसे उनके साथ द्रोह न करें

ଏଭଳି ଧନଲୋଭରେ ସେ ପକ୍ଷୀମାନଙ୍କୁ ମାରି, ବର୍ତ୍ତମାନ ଓ ଭବିଷ୍ୟତ—ଦୁଇ ଲାଭକୁ ତୁରନ୍ତ ନଷ୍ଟ କରିଦେଲା। ରାଜନ, ସେହିପରି ତୁମେ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କ ଧନ ହଡ଼ପ କରିବା ଆଶାରେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଦ୍ରୋହ କରନି।

Verse 15

मोहात्मा तप्स्यसे पश्चात्‌ पत्रिहा पुरुषो यथा । (एतेन तव नाश: स्याद्‌ बडिशाच्छफरो यथा ।) जातं॑ जात॑ पाण्डवेभ्य: पुष्पमादत्स्व भारत

ବିଦୁର କହିଲେ—ମୋହରେ ଅନ୍ଧ ହୋଇ ତୁମେ ପରେ ନିଶ୍ଚୟ ପଶ୍ଚାତ୍ତାପରେ ଦଗ୍ଧ ହେବ, ଯେପରି ପକ୍ଷୀହନ୍ତା ପୁରୁଷ ପରେ ଖେଦ କରେ। ଏହି ପଥରେ ତୁମର ନାଶ ହେବ, ଯେପରି ବଡିଶ (ଗାଁଠି)ରେ ଧରା ମାଛ। ତେଣୁ, ହେ ଭରତ, ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କଠାରୁ ପୁନଃପୁନଃ ଜନ୍ମୁଥିବା ‘ପୁଷ୍ପ’—ତାଙ୍କର ସଦ୍ଭାବ, ସନ୍ଧି ଓ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଭାଗ—ସେହିଟି ଗ୍ରହଣ କର; ଧ୍ୱଂସର ପଥ ନେଉନି।

Verse 16

वृक्षानज्रारकारीव मैनान्‌ धाक्षी: समूलकान्‌ | मा गम: ससुतामात्य: सबलश्न यमक्षयम्‌,जैसे कोयला बनानेवाला वृक्षोंको जलाकर भस्म कर देता है, उसी प्रकार आप इन्हें जड़मूलसहित जलानेकी चेष्टा न कीजिये। कहीं ऐसा न हो कि पाण्डवोंके साथ विरोध करनेके कारण आपको पुत्र, मन्त्री और सेनाके साथ यमलोकमें जाना पड़े

ବିଦୁର କହିଲେ—ଯେପରି କୋଇଲା କରୁଥିବା ଲୋକ ଗଛକୁ ପୋଡ଼ି ଭସ୍ମ କରେ, ସେପରି ଏମାନଙ୍କୁ ମୂଳସହିତ ଦହନ କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରନି। ସାବଧାନ—ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ବିରୋଧ କରି ତୁମେ ପୁତ୍ର, ମନ୍ତ୍ରୀ ଓ ସେନାସହିତ ଯମଧାମକୁ, ଅର୍ଥାତ୍ ସର୍ବନାଶକୁ, ଯାଇନ ପଡ଼।

Verse 17

समवेतान्‌ हि कः पार्थान्‌ प्रतियुध्येत भारत । मरुद्धिः सहितो राजन्नपि साक्षान्मरुत्पति:,भरतवंशीय राजन! देवताओंसहित साक्षात्‌ देवराज इन्द्र ही क्‍यों न हों, जब कुन्तीपुत्र संगठित होकर युद्धके लिये तैयार होंगे, उनका मुकाबला कौन कर सकता है?

ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ଭରତ! ପୃଥାପୁତ୍ରମାନେ ଏକତ୍ର ହୋଇ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହେଲେ, ତାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖେ କିଏ ପ୍ରତିଯୁଦ୍ଧ କରିପାରିବ? ହେ ରାଜନ, ଦେବମାନଙ୍କ ସହ ସାକ୍ଷାତ୍ ମରୁତ୍ପତି ଇନ୍ଦ୍ର ମଧ୍ୟ ଥିଲେ, ସେମାନେ ଦୁର୍ଜୟ ହେବେ।

Verse 61

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत ट्टूतपर्वमें झूतक्रीडराविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଜୁଆ ଓ ପାଶାକ୍ରୀଡା-ବିଷୟକ ଏକଷଷ୍ଟିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 62

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि विदुरहितवाक्ये द्विषष्टितमो5ध्याय: ।। ६२ || इस प्रकार श्रीमह्ाभारत सभापव॑के अन्तर्गत झ्यूतपर्वमें विदुरके हितकारक वचनसम्बन बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ବିଦୁରଙ୍କ ହିତବାକ୍ୟ-ବିଷୟକ ଦ୍ୱିଷଷ୍ଟିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା। (୬୨)

Verse 153

मालाकार इवारामे स्नेहं कुर्वन्‌ पुनः पुन: । अन्यथा उन पक्षियोंकी हिंसा करनेवाले राजाकी भाँति आपको भी मोहवश पकश्चात्ताप करना पड़ेगा। इस द्रोहले आपका उसी तरह सर्वनाश हो जायगा, जैसे बंसीका काँटा निगल लेनेसे मछलीका नाश हो जाता है। भरतकुलभूषण! जैसे माली उद्यानके वृक्षोंको बार-बार सींचता रहता है और समय-समयपर उनसे खिले पुष्पोंको चुनता भी रहता है, उसी प्रकार आप पाण्डवरूपी वृक्षोंको स्नेहजलसे सींचते हुए उनसे उत्पन्न होनेवाले धनरूपी पुष्पोंको लेते रहिये

ଭରତକୁଳଭୂଷଣ! ଯେପରି ଉଦ୍ୟାନର ମାଳୀ ପୁନଃପୁନଃ ସ୍ନେହରେ ଗଛମାନଙ୍କୁ ପାଣି ଦେଇ ପୋଷେ ଏବଂ ଋତୁ ଆସିଲେ ସେମାନଙ୍କର ଫୁଟିଥିବା ପୁଷ୍ପ ମଧ୍ୟ ଚୟନ କରେ, ସେହିପରି ଆପଣ ପାଣ୍ଡବ-ରୂପୀ ବୃକ୍ଷମାନଙ୍କୁ ସଦ୍ଭାବ ଓ ସୁରକ୍ଷାର ଜଳରେ ପୋଷଣ କରନ୍ତୁ ଏବଂ ଯଥାସମୟରେ ସେମାନଙ୍କୁ ନେଇ ଉତ୍ପନ୍ନ ହେଉଥିବା ସମୃଦ୍ଧି-ରୂପୀ ପୁଷ୍ପ ଗ୍ରହଣ କରନ୍ତୁ। ନହେଲେ ପକ୍ଷୀହିଂସକ ରାଜା ପରି ମୋହବଶ ହୋଇ ପରେ ପଶ୍ଚାତ୍ତାପ କରିବାକୁ ପଡିବ। ଏହି ଦ୍ରୋହ ଆପଣଙ୍କର ସର୍ବନାଶ କରିଦେବ—ଯେପରି ବାଁସୀର କାଁଟା ଗିଳିଲେ ମାଛ ନଶ୍ଟ ହୁଏ।

Frequently Asked Questions

The chapter centers on whether a person’s status can be transformed by a wager when the wagering party’s own agency and legitimacy are in question—i.e., whether Draupadī can be declared dāsī/adāsī given the contested validity of the prior stake and the coercive setting.

Dharma is not merely rule-following but requires conditions of truthful deliberation; when fear, power, and desire distort the sabhā, even experts may hesitate, revealing the need for integrity in institutions as well as individuals.

No explicit phalaśruti appears in this unit; the meta-commentary is functional rather than devotional—Bhīṣma’s statement that dharma’s determination is subtle and hard to adjudicate operates as an internal hermeneutic warning about ethical judgment in complex cases.