
सभा-पर्व, अध्याय 56: विदुरस्य द्यूत-निन्दा (Vidura’s Censure of Dicing and Warning to the Kurus)
Upa-parva: Dyūta-nīti (Vidura’s Counsel on Dice and State Welfare)
This chapter presents Vidura’s advisory speech diagnosing dyūta (dicing) as a structural cause of quarrel, social rupture, and large-scale confrontation (1.0). He forecasts that Duryodhana’s misconduct will bring comprehensive distress upon interconnected Kuru lineages and allies (2.0), and characterizes Duryodhana’s pride as self-destructive, like an animal breaking its own horn through intoxication (3.0). Vidura cautions against adopting another’s counsel or gaze uncritically, likening it to boarding a fragile boat on a terrifying ocean—an image for imprudent dependence and political naiveté (4.0). He notes that Duryodhana’s competitive provocation toward the Pāṇḍavas, framed as affectionate rivalry, can rapidly escalate into violent collision and ruin (5.0). Vidura then contrasts ill-directed strategic ‘pull’ or persuasion with a more fruitful alignment under Yudhiṣṭhira’s temperate leadership (6.0), urging the Kurus to heed counsel that can extinguish a blazing fire before it spreads (7.0). He warns that if Yudhiṣṭhira’s forbearance fails, the combined force of Bhīma, Arjuna, and the twins would leave no refuge amid turmoil (8.0). Finally, Vidura argues that wealth gained by defeating the Pāṇḍavas in dice is strategically hollow (9.0), and identifies Śakuni as a specialist in deception within dyūta, urging recognition of the manipulative risk (10.0).
Chapter Arc: हस्तिनापुर के अंतःपुर में दुर्योधन की जलन धधकती है—युधिष्ठिर की लक्ष्मी और पाण्डव-वैभव उसे असह्य लगते हैं, और वह पिता धृतराष्ट्र के सामने अपना विष उगलता है। → शकुनि द्यूत को शस्त्र बनाकर प्रस्ताव रखता है—‘मैं पासों से युधिष्ठिर की लक्ष्मी अपहरण कर लूँगा’; धृतराष्ट्र के मन में भय और संकोच उठते हैं, पर दुर्योधन विदुर को ‘पाण्डवहितैषी’ कहकर अविश्वसनीय ठहराता है और सभा-निर्माण व द्यूत-आयोजन का दबाव बढ़ाता है। → धृतराष्ट्र का अंतर्द्वंद्व निर्णायक मोड़ लेता है—वह बलवानों से वैर के दुष्परिणाम जानता है, फिर भी पुत्रमोह और राजधर्म के भ्रम में विदुर को युधिष्ठिर को बुलाने की आज्ञा दे देता है; साथ ही द्यूत-सभा को शीघ्र सजाने का क्रम आरम्भ हो जाता है। → रत्नजटित, विचित्र और स्वर्णासन-शय्याओं से सुसज्जित सभा तैयार होती है; धृतराष्ट्र की ओर से संदेश-व्यवस्था बनती है कि युधिष्ठिर भाइयों सहित उस अद्भुत सभा में आएँ। → विदुर का बुलावा लेकर युधिष्ठिर की ओर प्रस्थान—क्या धर्मराज इस निमंत्रण के भीतर छिपे जाल को पहचानेंगे, या राजाज्ञा मानकर द्यूत के द्वार पर पहुँचेंगे?
Verse 1
ऑपनआक्ात बछ। आर: षट्पज्चाशत्तमो< ध्याय: धृतराष्ट्र और दुर्योधनकी बातचीत, द्यूतक्रीड़ाके लिये सभानिर्माण और धृतराष्ट्रका युधिष्ठिरको बुलानेके लिये विदुरको आज्ञा देना शकुनिरुवाच यां त्वमेतां श्रियं दृष्टवा पाण्डुपुत्रे युधिष्ठिरे । तप्यसे तां हरिष्यामि द्यूतेन जयतां वर
ଶକୁନି କହିଲା—“ହେ ବିଜୟୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ! ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କର ଏହି ଶ୍ରୀ-ସମୃଦ୍ଧି ଦେଖି ତୁମେ ଈର୍ଷ୍ୟାରେ ଜଳୁଛ। ମୁଁ ଦ୍ୟୂତ ଦ୍ୱାରା ସେଇ ଐଶ୍ୱର୍ୟ ତାଙ୍କଠାରୁ ହରିନେବି।”
Verse 2
शकुनि बोला--विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ दुर्योधन! तुम पाण्डुपुत्र युधिष्ठटिकी जिस लक्ष्मीको देखकर संतप्त हो रहे हो, उसका मैं द्यूतके द्वारा अपहरण कर लूँगा ।। आहृयतां परं राजन् कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । अगत्वा संशयमहमयुद्ध्वा च चमूमुखे,परंतु राजन! तुम कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको बुला लो। मैं किसी संशयमें पड़े बिना, सेनाके सामने युद्ध किये बिना केवल पासे फेंककर स्वयं किसी प्रकारकी क्षति उठाये बिना ही पाण्डवोंको जीत लूँगा; क्योंकि मैं द्यूतविद्याका ज्ञाता हूँ और पाण्डव इस कलासे अनभिज्ञ हैं। भारत! दावोंको मेरे धनुष समझो और पासोंको मेरे बाण
ଶକୁନି କହିଲା—ରାଜନ୍! କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ତୁରନ୍ତ ଡାକନ୍ତୁ। ମୁଁ ଦ୍ୟୂତବିଦ୍ୟାରେ ପାରଙ୍ଗତ; କୌଣସି ସନ୍ଦେହ ନ ରଖି, ସେନା ସମ୍ମୁଖରେ ଯୁଦ୍ଧ ନ କରି, କେବଳ ପାଶା ଛାଡ଼ି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ଜିତିନେବି—ମୋର ଶରୀରକୁ କୌଣସି କ୍ଷତି ହେବ ନାହିଁ।
Verse 3
अक्षान क्षिपन्नक्षतः सन् विद्वानविदुषो जये । ग्लहान् धनूंषि मे विद्धि शरानक्षांश्ष भारत,परंतु राजन! तुम कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरको बुला लो। मैं किसी संशयमें पड़े बिना, सेनाके सामने युद्ध किये बिना केवल पासे फेंककर स्वयं किसी प्रकारकी क्षति उठाये बिना ही पाण्डवोंको जीत लूँगा; क्योंकि मैं द्यूतविद्याका ज्ञाता हूँ और पाण्डव इस कलासे अनभिज्ञ हैं। भारत! दावोंको मेरे धनुष समझो और पासोंको मेरे बाण
ପାଶା ଛାଡ଼ି ମୁଁ ଅକ୍ଷତ ରହି, ବିଦ୍ୱାନ ହୋଇ ଅବିଦ୍ୱମାନଙ୍କୁ ଜିତିବି। ହେ ଭାରତ! ମୋର ଦାଉକୁ ଧନୁଷ ଭାବ, ଏବଂ ପାଶାକୁ ବାଣ।
Verse 4
अक्षाणां हृदयं मे ज्यां रथं विद्धि ममास्तरम्,पासोंका जो हृदय (मर्म) है, उसीको मेरे धनुषकी प्रत्यंचा समझो और जहाँसे पासे फेंके जाते हैं, वह स्थान ही मेरा रथ है
ପାଶାର ହୃଦୟ (ମର୍ମ) ମୋର ଧନୁଷର ଜ୍ୟା ଭାବ; ଏବଂ ଯେଉଁଠାରୁ ପାଶା ଛାଡ଼ାଯାଏ, ସେଇ ସ୍ଥାନ ମୋର ରଥ।
Verse 5
दुर्योधन उवाच अयमुत्सहते राजज्छियमाहर्तुमक्षवित् । द्यूतेन पाण्डुपुत्रेभ्यस्तदनुज्ञातुमहसि,दुर्योधन बोला--राजन्! ये मामाजी पासे फेंकनेकी कलामें निपुण हैं। ये द्यूतके द्वारा पाण्डवोंसे उनकी सम्पत्ति ले लेनेका उत्साह रखते हैं। उसके लिये इन्हें आज्ञा दीजिये
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ରାଜନ୍! ଏହି ଅକ୍ଷବିତ୍ (ପାଶାରେ ନିପୁଣ) ପୁରୁଷ ଦ୍ୟୂତ ଦ୍ୱାରା ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ଶ୍ରୀ-ସମ୍ପତ୍ତି ହରଣ କରିବାକୁ ଉତ୍ସୁକ। ତେଣୁ ଆପଣ ତାହାକୁ ଅନୁମତି ଦିଅନ୍ତୁ।
Verse 6
धघतयाट्र उवाच स्थितो5स्मि शासने क्रातुर्विदुरस्य महात्मन: । तेन संगम्य वेत्स्यामि कार्यस्यास्य विनिश्चयम्,धृतराष्ट्र बोले--बेटा! मैं अपने भाई महात्मा विदुरकी सम्मतिके अनुसार चलता हूँ। उनसे मिलकर यह जान सकूँगा कि इस कार्यके विषयमें क्या निश्चय करना चाहिये?
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ପୁତ୍ର! ମୁଁ ମୋର ଭାଇ ମହାତ୍ମା ବିଦୁରଙ୍କ ଶାସନ/ପରାମର୍ଶ ଅନୁସାରେ ଚାଲେ। ତାଙ୍କୁ ଭେଟି ଏହି କାର୍ଯ୍ୟରେ କ’ଣ ନିଶ୍ଚୟ କରିବା ଉଚିତ ଜାଣିବି।
Verse 7
दुर्योधन उवाच व्यपनेष्यति ते बुद्धि विदुरो मुक्तसंशय: । पाण्डवानां हिते युक्तो न तथा मम कौरव,दुर्योधन बोला--पिताजी! विदुर सब प्रकारसे संशयरहित हैं। वे आपकी बुद्धिको जूएके निश्चयसे हटा देंगे। कुरुनन्दन! वे जैसे पाण्डवोंके हितमें संलग्न रहते हैं, वैसे मेरे हितमें नहीं
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ପିତା! ସନ୍ଦେହରହିତ ବିଦୁର ଆପଣଙ୍କ ବୁଦ୍ଧିକୁ ଏହି ନିଶ୍ଚୟରୁ ହଟାଇଦେବେ। ହେ କୌରବ! ସେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ହିତରେ ଯେପରି ନିବିଷ୍ଟ, ସେପରି ମୋ ହିତରେ ନୁହେଁ।
Verse 8
नारभेतान्यसामर्थ्यात् पुरुष: कार्यमात्मन: । मतिसाम्यं द्वयोर्नास्ति कार्येषु कुरुनन्दन,मनुष्यको चाहिये कि वह अपना कार्य दूसरेके बलपर न करे। कुरुगाज! किसी भी कार्यमें दो पुरुषोंकी राय पूर्णरूपसे नहीं मिलती
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ମନୁଷ୍ୟ ନିଜ କାର୍ଯ୍ୟକୁ ଅନ୍ୟର ବଳ ଉପରେ ଭରସା କରି ଆରମ୍ଭ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ, ବିଶେଷକରି ନିଜେ ଅସମର୍ଥ ଥିଲେ। ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ! କାର୍ଯ୍ୟବିଷୟରେ ଦୁଇଜଣଙ୍କ ମତ କେବେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଏକ ହୁଏ ନାହିଁ।
Verse 9
भयं परिहरन् मन्द आत्मानं परिपालयन् | वर्षासु क्लिन्नकटवत् तिष्ठन्नेवावसीदति,मूर्ख मनुष्य भयका त्याग और आत्मरक्षा करते हुए भी यदि चुपचाप बैठा रहे, उद्योग न करे, तो वह वर्षाकालमें भींगी हुई चटाईके समान नष्ट हो जाता है
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ମନୁଷ୍ୟ ଭୟକୁ ତ୍ୟାଗ କରି ନିଜକୁ ରକ୍ଷା କରୁଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ଯଦି ଚୁପଚାପ ବସି ଉଦ୍ୟମ ନ କରେ, ତେବେ ସେ ବର୍ଷାରେ ଭିଜିଥିବା ଚଟାଇ ପରି ଧୀରେଧୀରେ ନଷ୍ଟ ହୋଇଯାଏ।
Verse 10
न व्याधयो नापि यम: प्राप्तुं श्रेय: प्रतीक्षते । यावदेव भवेत् कल्पस्तावच्छेय: समाचरेत्,रोग अथवा यमराज इस बातकी प्रतीक्षा नहीं करते कि इसने श्रेय प्राप्त कर लिया या नहीं। अतः जबतक अपनेमें सामर्थ्य हो, तभीतक अपने हितका साधन कर लेना चाहिये
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ନ ରୋଗ ଅପେକ୍ଷା କରେ, ନ ଯମ; ମନୁଷ୍ୟ ଶ୍ରେୟ ପାଇଲା କି ନାହିଁ ବୋଲି। ତେଣୁ ଯେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସାମର୍ଥ୍ୟ ଓ ସୁଯୋଗ ଅଛି, ସେପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଶ୍ରେୟର ସାଧନ କରିବା ଉଚିତ୍।
Verse 11
धृतराष्ट्र रवाच सर्वथा पुत्र बलिभिरवींग्रहो मे न रोचते । वैरं विकारं सृजति तद् वै शस्त्रमनायसम्,धृतराष्ट्रने कहा--बेटा! मुझे तो बलवानोंके साथ विरोध करना किसी प्रकार भी अच्छा नहीं लगता; क्योंकि वैर-विरोध बड़ा भारी झगड़ा खड़ा कर देता है, जो (कुलके विनाशके लिये) बिना लोहेका शस्त्र है
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ପୁତ୍ର! ବଳବାନମାନଙ୍କ ସହିତ ବିରୋଧ କରିବା ମୋତେ କେବେ ମଧ୍ୟ ଭଲ ଲାଗେ ନାହିଁ। ବୈର ଓ ବିରୋଧ ଭାରି ବିକାର ଏବଂ ଘୋର କଳହ ସୃଷ୍ଟି କରେ; ଏହା ଲୋହା ବିନା ମଧ୍ୟ କୁଳନାଶ କରୁଥିବା ଶସ୍ତ୍ର।
Verse 12
अनर्थमर्थ मन्यसे राजपुत्र संग्रन्थनं कलहस्याति घोरम् । तद् वै प्रवृत्तं तु यथा कथंचित् सृजेदसीन् निशितान् सायकांश्ष,राजकुमार! तुम द्यूतरूपी अनर्थको ही अर्थ मान रहे हो। यह जूआ कलहको ही गूँथनेवाला एवं अत्यन्त भयंकर है। यदि किसी प्रकार यह शुरू हो गया तो तीखी तलवारों और बाणोंकी भी सृष्टि कर देगा
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ରାଜପୁତ୍ର! ତୁମେ ଯାହା ସତ୍ୟରେ ଅନର୍ଥ, ତାହାକୁ ଅର୍ଥ ଭାବୁଛ। ଏହି ଦ୍ୟୁତ କଳହକୁ ଗଠି ଦେଉଥିବା ଅତି ଭୟଙ୍କର। ଯଦି କିଛିପରି ଆରମ୍ଭ ହୋଇଯାଏ, ତେବେ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ତଳୱାର ଓ ବାଣବର୍ଷାକୁ ମଧ୍ୟ ଜନ୍ମ ଦେବ।
Verse 13
दुर्योधन उवाच द्यूते पुराणैर्व्यवहार: प्रणीत- स्तत्रात्ययो नास्ति न सम्प्रहार: । तद् रोचतां शकुनेर्वाक्यमद्य सभां क्षिप्र॑ं त्वमिहाज्ञापयस्व,दुर्योधन बोला--पिताजी! पुराने लोगोंने भी द्यूतक्रीड़ाका व्यवहार किया है। उसमें न तो दोष है और न युद्ध ही होता है। अतः आप शकुनि मामाकी बात मान लीजिये और शीघ्र ही यहाँ (द्यूतके लिये) सभामण्डप बन जानेकी आज्ञा दीजिये
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ପିତା! ଦ୍ୟୁତର ବ୍ୟବହାର ପୁରାତନମାନେ ପ୍ରଚଳିତ କରିଛନ୍ତି; ତାହାରେ ନ ଅତିକ୍ରମ ଅଛି, ନ ଶସ୍ତ୍ରସଂଘର୍ଷ। ତେଣୁ ଆଜି ଶକୁନିଙ୍କ ପରାମର୍ଶ ମାନନ୍ତୁ ଏବଂ ଏଠାରେ ଦ୍ୟୁତ ପାଇଁ ସଭାମଣ୍ଡପ ଶୀଘ୍ର ସଜାଇବାକୁ ଆଜ୍ଞା ଦିଅନ୍ତୁ।
Verse 14
स्वर्गद्वारं दीव्यतां नो विशिष्ट तद्धर्तिनां चापि तथैव युक्तम् । भवेदेवं हात्मना तुल्यमेव दुरोदरं पाण्डवैस्त्वं कुरुष्व
ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ କହିଲା—ହେ ବିଶିଷ୍ଟ! ଆମ ପାଇଁ ଏହି ଦ୍ୟୁତ ଯେନେ ସ୍ୱର୍ଗଦ୍ୱାର; ଏହାର ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଧାରଣ କରୁଥିବାମାନେ ମଧ୍ୟ ସେହିପରି ଆଚରଣ କରିବା ଯୁକ୍ତ। ତେଣୁ ଏମିତି ହେଉ—ସମାନ ଶର୍ତ୍ତରେ, କୌଣସି ପକ୍ଷପାତ ବିନା। ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ନ୍ୟାୟସଙ୍ଗତ ଭାବେ ଦ୍ୟୁତକ୍ରୀଡାର ବ୍ୟବସ୍ଥା କର।
Verse 15
यह जूआ हम खेलनेवालोंके लिये एक विशिष्ट स्वर्गीय सुखका द्वार है। उसके आस- पास बैठनेवाले लोगोंके लिये भी वह वैसा ही सुखद होता है। इस प्रकार इसमें पाण्डवोंको भी हमारे समान ही सुख प्राप्त होगा। अतः आप पाण्डवोंके साथ द्यूतक्रीड़ाकी व्यवस्था कीजिये ।। धृतराष्ट उवाच वाक्यं न मे रोचते यत् त्वयोक्तं यत् ते प्रियं तत् क्रियतां नरेन्द्र । पश्चात् तप्स्यसे तदुपाक्रम्य वाक््यं न हीदृशं भावि वचो हि धर्म्यम्,धृतराष्ट्रने कहा--बेटा! तुमने जो बात कही है, वह मुझे अच्छी नहीं लगती। नरेन्द्र! जैसी तुम्हारी रुचि हो, वैसा करो। जूएका आरम्भ करनेपर मेरी बातोंको याद करके तुम पीछे पछताओगे; क्योंकि ऐसी बातें जो तुम्हारे मुखसे निकली हैं, धर्मानुकूल नहीं कही जा सकतीं
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ପୁତ୍ର! ତୁମେ କହିଥିବା କଥା ମୋତେ ଭଲ ଲାଗୁନାହିଁ। ହେ ନରେନ୍ଦ୍ର, ତୁମ ଇଚ୍ଛା ଯାହା, ସେହି କର। କିନ୍ତୁ ଏହି ଦ୍ୟୁତ ଆରମ୍ଭ କଲେ ପରେ ମୋ କଥା ସ୍ମରଣ କରି ତୁମେ ପଶ୍ଚାତ୍ତାପରେ ଦଗ୍ଧ ହେବ; କାରଣ ତୁମ ମୁଖରୁ ନିଷ୍କ୍ରାନ୍ତ ଏପରି ବାଣୀକୁ ଧର୍ମ୍ୟ ବୋଲି କୁହାଯାଇପାରେ ନାହିଁ।
Verse 16
दृष्ट होतद् विदुरेणैव सर्व विपक्षिता बुद्धिविद्यानुगेन । तदेवैतदवशस्याभ्युपैति महदू भयं क्षत्रियजीवधाति,बुद्धि और विद्याका अनुसरण करनेवाले विद्वान् विदुरने यह सब परिणाम पहलेसे ही देख लिया था। क्षत्रियोंके लिये विनाशकारी वही यह महान् भय मुझ विवशके सामने आ रहा है
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ବୁଦ୍ଧି ଓ ବିଦ୍ୟାର ଅନୁଗାମୀ ପଣ୍ଡିତ ବିଦୁର ଏ ସବୁକୁ ପୂର୍ବରୁ ଦେଖି ଫଳାଫଳ ତୁଳନା କରିଥିଲେ। ସେହି ମହାଭୟ—ଯାହା କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କ ପ୍ରାଣନାଶକ—ଏବେ ଅବଶ ମୋ ସମ୍ମୁଖକୁ ଅଗ୍ରସର ହେଉଛି।
Verse 17
वैशम्पायन उवाच एवमुकक््त्वा धृतराष्ट्रो मनीषी दैवं मत्वा परमं दुस्तरं च । शशासोच्चै: पुरुषान् पुत्रवाक्ये स्थितो राजा दैवसम्मूढचेता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्रने दैवको परम दुस्तर माना और दैवके प्रतापसे ही उनके चित्तपर मोह छा गया। वे कर्तव्याकर्तव्यका निर्णय करनेमें असमर्थ हो गये। फिर पुत्रकी बात मानकर उन्होंने सेवकोंको आज्ञा दी कि शीघ्र ही तत्पर होकर तोरणस्फाटिक नामक सभा तैयार कराओ। उसमें सुवर्ण तथा वैदूर्यसे जटित एक हजार खम्भे और सौ दरवाजे हों। उस सुन्दर सभाकी लंबाई और चौड़ाई एक- एक कोसकी होनी चाहिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ଏପରି କହି ବୁଦ୍ଧିମାନ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଦୈବକୁ ପରମ ଓ ଦୁସ୍ତର ବୋଲି ମନେ କଲେ। ଦୈବର ପ୍ରଭାବରେ ତାଙ୍କ ଚିତ୍ତ ମୋହଗ୍ରସ୍ତ ହୋଇ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ–ଅକର୍ତ୍ତବ୍ୟର ବିଚାର ହରାଇଲେ। ପରେ ପୁତ୍ରର କଥାରେ ଅଟୁଟ ରହି ରାଜା ଉଚ୍ଚ ସ୍ୱରେ ସେବକମାନଙ୍କୁ ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ କାମକୁ ଲାଗିବାକୁ ଆଦେଶ ଦେଲେ।
Verse 18
सहस्रस्तम्भां हेमवैदूर्यचित्रां शतद्वारां तोरणस्फाटिकाख्याम् | सभामग्रयां क्रोशमात्रायतां मे तद्विस्तारामाशु कुर्वन्तु युक्ता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ऐसा कहकर बुद्धिमान राजा धृतराष्ट्रने दैवको परम दुस्तर माना और दैवके प्रतापसे ही उनके चित्तपर मोह छा गया। वे कर्तव्याकर्तव्यका निर्णय करनेमें असमर्थ हो गये। फिर पुत्रकी बात मानकर उन्होंने सेवकोंको आज्ञा दी कि शीघ्र ही तत्पर होकर तोरणस्फाटिक नामक सभा तैयार कराओ। उसमें सुवर्ण तथा वैदूर्यसे जटित एक हजार खम्भे और सौ दरवाजे हों। उस सुन्दर सभाकी लंबाई और चौड़ाई एक- एक कोसकी होनी चाहिये
“‘ତୋରଣସ୍ଫାଟିକା’ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ମୋର ଅଗ୍ର୍ୟ ସଭାଗୃହକୁ ଯୋଗ୍ୟ କାରିଗରମାନେ ଶୀଘ୍ର ନିର୍ମାଣ କରନ୍ତୁ। ତାହା ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଓ ବୈଦୂର୍ୟରେ ଚିତ୍ରିତ ହେଉ, ସହସ୍ର ସ୍ତମ୍ଭଯୁକ୍ତ ହେଉ, ଶତ ଦ୍ୱାର ଥାଉ, ଏବଂ ଲମ୍ବ-ପ୍ରସ୍ଥ ଉଭୟ ଏକ-ଏକ କ୍ରୋଶ ପରିମାଣ ହେଉ।”
Verse 19
श्रुत्वा तस्य त्वरिता निर्विशड्का: प्राज्ञा दक्षास्तां तदा चक्कुराशु । सर्वद्रव्याण्युपजहुः सभायां सहस्रश: शिल्पिनश्वैव युक्ता:,उनकी यह आज्ञा सुनकर तेज काम करनेवाले चतुर एवं बुद्धिमान् सहस्रों शिल्पी निर्भीक होकर काममें लग गये। उन्होंने शीघ्र ही वह सभा तैयार कर दी और उसमें सब तरहकी वस्तुएँ यथास्थान सजा दीं
ତାଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଶୁଣି, ତ୍ୱରିତକାର୍ଯ୍ୟକୁଶଳ, ନିର୍ଭୟ, ଦକ୍ଷ ଓ ପ୍ରାଜ୍ଞ ସହସ୍ର ସହସ୍ର ଶିଳ୍ପୀ ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ କାମରେ ଲାଗିଗଲେ। ସେମାନେ ଶୀଘ୍ରେ ସେହି ସଭାଗୃହକୁ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ କରି, ଭିତରେ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଆବଶ୍ୟକ ବସ୍ତୁ ଯଥାସ୍ଥାନରେ ସଜାଇଦେଲେ।
Verse 20
कालेनाल्पेनाथ निष्ठां गतां तां सभां रम्यां बहुरत्नां विचित्राम् । चित्रैहैमैरासनैर भ्युपेता- माचख्युस्ते तस्य राज्ञ: प्रतीता:
ଅଳ୍ପ ସମୟରେ ସେହି ରମ୍ୟ, ବହୁରତ୍ନରେ ବିଚିତ୍ର ଭାବେ ଶୋଭିତ ସଭାଗୃହ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ହୋଇଗଲା। ତାହାରେ ନାନା ପ୍ରକାର ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଆସନ ସଜାଯାଇଥିଲା। ଯେମାନେ ଏହାକୁ ଭଲଭାବେ ଜାଣୁଥିଲେ, ସେମାନେ ରାଜାଙ୍କୁ ଯାଇ ତାହାର ବର୍ଣ୍ଣନା କଲେ।
Verse 22
तत्पश्चात् विद्वान् राजा धृतराष्ट्रने मन्त्रियोंमें प्रधान विदुरको यह आज्ञा दी कि तुम राजकुमार युधिष्ठिरके पास जाकर मेरी आज्ञासे उन्हें शीघ्र यहाँ लिवा लाओ ।। सभेयं मे बहुरत्ना विचित्रा शय्यासनैरुपपन्ना महादें: । सा दृश्यतां भ्रातृभि: सार्धमेत्य सुह्ृद्द्यूतं वर्ततामत्र चेति
ତା’ପରେ ବିଦ୍ୱାନ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ପ୍ରଧାନ ବିଦୁରଙ୍କୁ ଆଦେଶ ଦେଲେ—“ତୁମେ ରାଜକୁମାର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଅ ଏବଂ ମୋ ଆଜ୍ଞାରେ ତାଙ୍କୁ ଶୀଘ୍ର ଏଠାକୁ ନେଇଆସ। ମୋର ଏହି ସଭାଗୃହ ବହୁରତ୍ନରେ ବିଚିତ୍ର, ଶୟ୍ୟା ଓ ଆସନରେ ସୁସଜ୍ଜିତ, ଏବଂ ମହାଧନରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ। ସେ ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ ଆସି ଏହାକୁ ଦେଖୁନ୍ତୁ; ଏବଂ ଏଠାରେ ସୁହୃଦ୍ଭାବରେ ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡ଼ା ହେଉ।”
Verse 23
थोड़े ही समयमें तैयार हुई उस असंख्य रत्नोंसे सुशोभित रमणीय एवं विचित्र सभाको अद्भुत सोनेके आसनोंद्वारा सजा दिया गया। तत्पश्चात् विश्वस्त सेवकोंने राजा धृतराष्ट्रको उस सभाभवनके तैयार हो जानेकी सूचना दी ।। ततो विद्वान् विदुरं मन्त्रिमुख्य- मुवाचेदं धृतराष्ट्रो नरेन्द्र: । युधिष्छिरं राजपुत्रं च गत्वा मद्वाक्येन क्षिप्रमिहानयस्व
ତେବେ ନରାଧିପ ରାଜା ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ମନ୍ତ୍ରୀମୁଖ୍ୟ ଜ୍ଞାନୀ ବିଦୁରଙ୍କୁ କହିଲେ— “ତୁମେ ରାଜପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ, ମୋର ସନ୍ଦେଶରେ ତାଙ୍କୁ ଶୀଘ୍ର ଏଠାକୁ ଆଣ।” ସେଇ ସମୟରେ ଅସଂଖ୍ୟ ରତ୍ନରେ ଶୋଭିତ, ରମଣୀୟ ଓ ବିଚିତ୍ର ସେହି ସଭା ଅଦ୍ଭୁତ ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଆସନରେ ସଜି ସଜ୍ଜ ହୋଇଥିଲା; ବିଶ୍ୱସ୍ତ ସେବକମାନେ ସଭାଭବନ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହୋଇଥିବା ସୂଚନା ରାଜାଙ୍କୁ ଦେଇଥିଲେ।
Verse 56
उनसे कहना, “मेरी यह विचित्र सभा अनेक प्रकारके रत्नोंसे जटित है। इसे बहुमूल्य शय्याओं और आसनोंद्वारा सजाया गया है। युधिष्ठिर! तुम अपने भाइयोंके साथ यहाँ आकर इसे देखो और इसमें सुहृदोंकी द्यूतक्रीड़ा प्रारम्भ हो' ।। इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि द्यूतपर्वणि युधिष्ठिरानयने षट्पञ्चाशत्तमो<थध्याय: ।। ५६ || इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत द्यूतपर्वमें युधिष्ठिरके बुलानेसे सम्बन्ध रखनेवाला छप्पनवाँ अध्याय पूरा हुआ
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେମାନଙ୍କୁ କହ: “ମୋର ଏହି ବିଚିତ୍ର ସଭା ନାନା ପ୍ରକାର ରତ୍ନରେ ଜଡିତ ଓ ବହୁମୂଲ୍ୟ ଶୟ୍ୟା ଏବଂ ଆସନରେ ସୁଶୋଭିତ। ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ତୁମେ ଭାଇମାନଙ୍କ ସହ ଏଠାକୁ ଆସି ଏହାକୁ ଦେଖ, ଏବଂ ଏଠାରେ ସୁହୃଦମାନଙ୍କ ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡ଼ା ଆରମ୍ଭ ହେଉ।” ଏହିପରି ମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବର ଦ୍ୟୂତପର୍ବରେ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଡାକିବା ସମ୍ବନ୍ଧୀୟ ଛପ୍ପନତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
The dilemma is whether rulers should permit a formally accepted but predictably harmful practice (dyūta) for prestige and competitive satisfaction, despite its high likelihood of producing coercion, factional rupture, and long-term instability.
Vidura’s takeaway is preventive governance: restrain pride-driven provocation, avoid adversarial games that institutionalize hostility, and prioritize policies that preserve kinship cohesion and state welfare over short-term symbolic victories.
No explicit phalaśruti is presented in these verses; the chapter functions as pragmatic admonition, with its ‘result’ implied as the preservation of stability if counsel is followed and the escalation of conflict if ignored.