Adhyaya 41
Sabha ParvaAdhyaya 4141 Verses

Adhyaya 41

Bhīṣma–Śiśupāla-saṃvādaḥ (Bhishma and Shishupala’s exchange in the assembly)

Upa-parva: Rājasūya-sabhā: Śiśupāla–Bhīṣma dispute (within the assembly proceedings)

The chapter opens with Bhīṣma interpreting Śiśupāla’s challenge as operating under a larger inevitability tied to Kṛṣṇa’s will, framing the confrontation as more than personal rivalry (1–4). Vaiśaṃpāyana narrates Śiśupāla’s immediate refusal to tolerate Bhīṣma’s assessment, leading to a sustained verbal attack that accuses Bhīṣma of improper praise and urges him instead to laud other eminent warriors and kings (5–13). Śiśupāla then turns the critique into a moralizing indictment of rhetorical misconduct—self-deprecation, self-praise, blaming others, and praising others—presented as a fourfold pattern outside ārya conduct (14–16). He illustrates his point with the Bhūliṅga bird analogy, warning against reckless speech and misread devotion (18–23). Bhīṣma replies with uncompromising stance: he claims he does not depend on the approval of earthly rulers and treats their hostility as inconsequential (24–31). He closes by pointing to Govinda present and honored in the assembly, and calls for Kṛṣṇa to be summoned in combat, presenting the dispute as reaching a decisive threshold (32–33).

Chapter Arc: राजसूय-यज्ञ की सभा में, कृष्ण के अग्रपूजन से जली हुई शिशुपाल की वाणी अचानक भीष्म पर टूट पड़ती है—वह पूछता है कि भीष्म इतने राजाओं के सामने निर्लज्ज होकर कृष्ण की प्रशंसा क्यों कर रहे हैं। → शिशुपाल भीष्म को अपमानित करने के लिए कटु उपमाएँ और आरोपों की वर्षा करता है—भीष्म को ‘तीसरी प्रकृति’ में स्थित कहकर तिरस्कृत करता, कौरवों को अंधों की तरह अंधे का अनुसरण करने वाला बताता, और कृष्ण के पूतना-वध आदि कर्मों का उल्लेख कर यह जताता है कि ऐसी कथाएँ सुनकर उसका मन और अधिक व्यथित होता है। सभा में बैठे राजाओं का क्रोध और असहजता बढ़ती जाती है। → शिशुपाल का चरम प्रहार तब आता है जब वह भीष्म को ‘कौरवाधम’ कहकर संबोधित करता और यह आरोप लगाता है कि भीष्म सत्पुरुषों के मार्ग से गिर चुके हैं—जिनके लिए कृष्ण परम पूजनीय हैं, उनके ‘प्रदर्शक’ होकर भीष्म धर्मज्ञ होने का ढोंग कर रहे हैं। वह पुराण-गाथाओं और दृष्टांतों का सहारा लेकर भीष्म की प्रतिष्ठा को सार्वजनिक रूप से तोड़ने का प्रयास करता। → अध्याय का अंत शिशुपाल के वाक्य-प्रवाह पर ही होता है—यह एक ‘आरोप-पर्व’ की तरह सभा को विषाक्त कर देता है, पर तत्काल दंड/प्रतिउत्तर का वर्णन यहाँ नहीं आता; केवल यह स्पष्ट होता है कि शिशुपाल ने मर्यादा-रेखा लांघ दी है और सभा का संतुलन डगमगा गया है। → शिशुपाल की यह निर्भीक निंदा अब किस सीमा तक जाएगी—और कृष्ण/भीष्म/सभा इसका उत्तर कैसे देंगे—यह तनाव अगले प्रसंग पर छोड़ दिया जाता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन- माल बछ। अकाल एकचत्वारिशो< ध्याय: शिशुपालद्दारा भीष्मकी निन्दा शिशुपाल उवाच विभीषिकाभिर्बलद्वीभिभभीषयन्‌ सर्वपार्थिवान्‌ । न व्यपत्रपसे कस्माद्‌ वृद्ध: सन्‌ कुलपांसन,शिशुपाल बोला--कुलको कलंकित करनेवाले भीष्म! तुम अनेक प्रकारकी विभीषिकाओंद्वारा इन सब राजाओंको डरानेकी चेष्टा कर रहे हो। बड़े-बूढ़े होकर भी तुम्हें अपने इस कृत्यपर लज्जा क्‍यों नहीं आती?

ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ହେ ଭୀଷ୍ମ, କୁଳର କଳଙ୍କ! ଭୟଙ୍କର ଧମକ ଓ ବଳଦର୍ପ ଦେଖାଇ ତୁମେ ଏହି ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କୁ ଭୟଭୀତ କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କରୁଛ। ବୃଦ୍ଧ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଏପରି ଆଚରଣରେ ତୁମକୁ ଲଜ୍ଜା କାହିଁକି ହୁଏନି?

Verse 2

युक्तमेतत्‌ तृतीयायां प्रकृतौ वर्तता त्वया । दक्तुं धर्मादपेतार्थ त्वं हि सर्वकुरूत्तम:,तुम तीसरी प्रकृतिमें स्थित (नपुंसक) हो, अतः तुम्हारे लिये इस प्रकार धर्मविरुद्ध बातें कहना उचित ही है। फिर भी यह आश्चर्य है कि तुम समूचे कुरुकुलके श्रेष्ठ पुरुष कहे जाते हो

ତୁମେ ତୃତୀୟ ପ୍ରକୃତିରେ (ନପୁଂସକତାରେ) ଅବସ୍ଥିତ; ତେଣୁ ଧର୍ମବିରୋଧୀ କଥା କହିବା ତୁମ ପାଇଁ ଯଥାଯଥ ମନେ ହୁଏ। ତଥାପି ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ—ତୁମକୁ ସମସ୍ତ କୁରୁମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷ କୁହାଯାଏ!

Verse 3

नावि नौरिव सम्बद्धा यथान्धो बान्धमन्वियात्‌ | तथाभूता हि कौरव्या येषां भीष्म त्वमग्रणी:,भीष्म! जैसे एक नाव दूसरी नावमें बाँध दी जाय, एक अंधा दूसरे अंधेके पीछे चले; वही दशा इन सब कौरवोंकी है, जिन्हें तुम-जैसा अगुआ मिला है

ହେ ଭୀଷ୍ମ! ଯେପରି ଗୋଟିଏ ନାଉ ଅନ୍ୟ ନାଉ ସହ ବାନ୍ଧି ଦିଆଯାଏ, କିମ୍ବା ଯେପରି ଗୋଟିଏ ଅନ୍ଧ ଅନ୍ୟ ଅନ୍ଧଙ୍କ ପଛେ ଚାଲେ—ସେପରି ଅବସ୍ଥା ଏହି କୌରବମାନଙ୍କର; ଯାହାଙ୍କ ଅଗ୍ରଣୀ ତୁମେ।

Verse 4

पूतनाघातपूर्वाणि कर्माण्यस्य विशेषत: । त्वया कीर्तयतास्माकं भूय: प्रव्यथितं मन:,तुमने श्रीकृष्णके पूतना-वध आदि कर्मोका जो विशेषरूपसे वर्णन किया है, उससे हमारे मनको पुन: बहुत बड़ी चोट पहुँची है

ପୂତନାବଧ ଆଦି ତାହାର କର୍ମଗୁଡ଼ିକୁ ତୁମେ ବିଶେଷ ଭାବେ କୀର୍ତ୍ତନ କରି କହିଲ; ତାହାରେ ଆମ ମନ ପୁଣି ଅତ୍ୟନ୍ତ ବ୍ୟଥିତ ହୋଇଉଠିଲା।

Verse 5

अवलिप्तस्य मूर्खस्य केशवं स्तोतुमिच्छत: । कथं भीष्म न ते जिह्ला शतधेयं विदीर्यते,भीष्म! तुम्हें अपने ज्ञानीपनका बड़ा घमंड है, परंतु तुम हो वास्तवमें बड़े मूर्ख! ओह! इस केशवकी स्तुति करनेकी इच्छा होते ही तुम्हारी जीभके सैकड़ों टुकड़े क्यों नहीं हो जाते?

ହେ ଭୀଷ୍ମ! ଜ୍ଞାନର ଅହଂକାର ଧରିଥିବା ତୁମେ ପ୍ରକୃତରେ ମୂର୍ଖ। କେଶବଙ୍କୁ ସ୍ତୁତି କରିବା ଇଚ୍ଛା ହେଲେ ମାତ୍ର ତୁମ ଜିଭ କାହିଁକି ଶତ ଖଣ୍ଡରେ ଫାଟିଯାଏନି?

Verse 6

यत्र कुत्सा प्रयोक्तव्या भीष्म बालतरैनरै: | तमिमं ज्ञानवृद्धः सन्‌ गोपं संस्तोतुमिच्छसि,भीष्म! जिसके प्रति मूर्ख-से-मूर्ख मनुष्योंको भी घृणा करनी चाहिये, उसी ग्वालियेकी तुम ज्ञानवृद्ध होकर भी स्तुति करना चाहते हो (यह आश्चर्य है!)

ଭୀଷ୍ମ! ଯାହା ପ୍ରତି ଅତ୍ୟନ୍ତ ବାଳିଶ ଓ ମୂର୍ଖ ଲୋକମାନେ ମଧ୍ୟ କେବଳ ଅବହେଳା ହିଁ କରିବା ଉଚିତ, ସେଇ ଗୋପକୁ ତୁମେ ଜ୍ଞାନବୃଦ୍ଧ ହୋଇ ସ୍ତୁତି କରିବାକୁ ଚାହୁଁଛ—ଏହା ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ!

Verse 7

यद्यनेन हतो बाल्ये शकुनिश्ित्रमत्र किम्‌ । तौ वाश्ववृषभौ भीष्म यौ न युद्धविशारदौ,भीष्म! यदि इसने बचपनमें एक पक्षी (बकासुर)-को अथवा जो युद्धकी कलासे सर्वथा अनभिज्ञ थे, उन अश्व (केशी) और वृषभ (अरिष्टासुर) नामक पशुओंको मार डाला तो इसमें क्या आश्वर्यकी बात हो गयी?

ଭୀଷ୍ମ! ଯଦି ସେ ବାଳ୍ୟକାଳରେ କୌଣସି ପକ୍ଷୀକୁ ମାରିଦେଲା, କିମ୍ବା ଯୁଦ୍ଧକଳାରେ ସର୍ବଥା ଅନଭିଜ୍ଞ କେଶୀ ନାମକ ଅଶ୍ୱ ଓ ଅରିଷ୍ଟ ନାମକ ବୃଷଭକୁ ହତ କଲା—ତେବେ ତାହାରେ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ କଣ?

Verse 8

चेतनारहितं काष्ठं यद्यनेन निपातितम्‌ । पादेन शकटं भीष्म तत्र कि कृतमद्भुतम्‌,भीष्म! छकड़ा क्या है, चेतनाशून्य लकड़ियोंका ढेर ही तो, यदि इसने पैरसे उसको उलट ही दिया तो कौन अनोखी करामात कर डाली?

ଭୀଷ୍ମ! ଶକଟ ତ ଚେତନାହୀନ କାଠର ଢେର ମାତ୍ର; ସେ ଯଦି ପାଦରେ ତାହାକୁ ଉଲଟାଇଦେଲା, ତେବେ ତାହାରେ କେଉଁ ଅଦ୍ଭୁତ କାର୍ଯ୍ୟ ହେଲା?

Verse 9

(अर्कप्रमाणौ तौ वृक्षौ यद्यनेन निपातितौ । नागश्न पातितो$नेन तत्र को विस्मय: कृत: ।।) आकके पौधोंके बराबर दो अर्जुन वृक्षोंको यदि श्रीकृष्णने गिरा दिया अथवा एक नागको ही मार गिराया तो कौन बड़े आश्वर्यका काम कर डाला?। वल्मीकमात्र: सप्ताहं यद्यनेन धृतो5चल: । तदा गोवर्धनो भीष्म न तच्चित्रं मतं मम,भीष्म! यदि इसने गोवर्धनपर्वतको सात दिनतक अपने हाथपर उठाये रखा तो उसमें भी मुझे कोई आश्वर्यकी बात नहीं जान पड़ती; क्योंकि गोवर्धन तो दीमकोंकी खोदी हुई मिट्टीका ढेरमात्र है

ଯଦି ସେ ଅର୍କ ଗଛ ପରି ଛୋଟ ସେଇ ଦୁଇଟି ବୃକ୍ଷକୁ ପତିତ କଲା, କିମ୍ବା ଗୋଟିଏ ନାଗକୁ ମାତ୍ର ମାରିଦେଲା—ତେବେ ତାହାରେ କେଉଁ ବିସ୍ମୟ? ଏବଂ ଯଦି ସେ ସପ୍ତାହ ଧରି ଗୋଟିଏ ପର୍ବତକୁ ଉଠାଇ ଧରିଥିଲା, ତଥାପି, ଭୀଷ୍ମ, ମୋତେ ତାହା ଚିତ୍ର ଲାଗେନି; କାରଣ ମୋ ମତରେ ଗୋବର୍ଧନ ତ ଭଲ୍ମୀକ ସମାନ ମାଟିର ଢେର ମାତ୍ର।

Verse 10

भुक्तमेतेन बद्धन्नं क्रीडता नगमूर्थनि । इति ते भीष्म शृण्वाना: परे विस्मयमागता:,भीष्म! कृष्णने गोवर्धनपर्वतके शिखरपर खेलते हुए अकेले ही बहुत-सा अन्न खा लिया, यह बात भी तुम्हारे मुँहले सुनकर दूसरे लोगोंको ही आश्चर्य हुआ होगा (मुझे नहीं)

ଭୀଷ୍ମ! ‘ପର୍ବତଶିଖରରେ ଖେଳୁଥିବାବେଳେ ସେ ଏକାକୀ ବହୁ ପକା ଅନ୍ନ ଭୋଜନ କଲା’—ଏହି କଥା ତୁମ ମୁଖରୁ ଶୁଣି ଅନ୍ୟମାନେ ହିଁ ବିସ୍ମିତ ହୋଇଥିବେ; ମୁଁ ନୁହେଁ।

Verse 11

यस्य चानेन धर्मज्ञ भुक्तमन्नं बलीयस: । स चानेन हतः कंस इत्येतन्न महाद्भुतम्‌,धर्मज्ञ भीष्म! जिस महाबली कंसका अन्न खाकर यह पला था, उसीको इसने मार डाला। यह भी इसके लिये कोई बड़ी अदभुत बात नहीं है

ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ହେ ଧର୍ମଜ୍ଞ! ଯେ ମହାବଳୀ କଂସର ଅନ୍ନ ଖାଇ ଏ ଲାଳିତ-ପାଳିତ ହୋଇଥିଲା, ସେଇ କଂସକୁ ଏ ହତ କଲା; ହେ ଧର୍ମଜ୍ଞ ଭୀଷ୍ମ! ଏଥିରେ କିଛି ବିଶେଷ ଆଶ୍ଚର୍ଯ୍ୟ ନାହିଁ।

Verse 12

न ते श्रुतमिदं भीष्म नूनं कथयतां सताम्‌ | यद्‌ वक्ष्ये त्वामधर्मज्ञं वाक्यं कुरुकुलाधम,कुरुकुलाधम भीष्म! तुम धर्मको बिलकुल नहीं जानते। मैं तुमसे धर्मकी जो बात कहूँगा, वह तुमने संत-महात्माओंके मुखसे भी नहीं सुनी होगी

ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ହେ ଭୀଷ୍ମ! ନିଶ୍ଚୟ ତୁମେ ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ମୁଖରୁ ଏହା ଶୁଣିନାହ। ହେ ଅଧର୍ମଜ୍ଞ, କୁରୁକୁଳାଧମ! ମୁଁ ତୁମକୁ ତୁମର ଯୋଗ୍ୟ ଏମିତି କଥା କହିବି।

Verse 13

स्त्रीषु गोषु न शस्त्राणि पातयेद्‌ ब्राह्मणेषु च । यस्य चान्नानि भुञ्जीत यत्र च स्यात्‌ प्रतिश्रयः,स्त्रीपर, गौपर, ब्राह्मणोंपर तथा जिसका अन्न खाय अथवा जिनके यहाँ अपनेको आश्रय मिला हो, उनपर भी हथियार न चलाये

ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ଉପରେ, ଗୋମାତାଙ୍କ ଉପରେ ଓ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଉପରେ ଶସ୍ତ୍ର ପ୍ରହାର କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ; ଏବଂ ଯାହାର ଅନ୍ନ ଖାଇଛ, କିମ୍ବା ଯେଉଁଠାରେ ଆଶ୍ରୟ ପାଇଛ, ସେଠାରେ ମଧ୍ୟ ଅସ୍ତ୍ର ଉଠାଇବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।

Verse 14

इति सन्तो5नुशासन्ति सज्जन धर्मिण: सदा । भीष्म लोके हि तत्‌ सर्व वितथं त्वयि दृश्यते,भीष्म! जगत्‌में साधु धर्मात्मा पुरुष सज्जनोंको सदा इसी धर्मका उपदेश देते रहते हैं; किंतु तुम्हारे निकट यह सब धर्म मिथ्या दिखायी देता है

ସଜ୍ଜନ ଧର୍ମୀ ପୁରୁଷମାନେ ସଦା ଏହିପରି ଉପଦେଶ ଦେଇଥାନ୍ତି; କିନ୍ତୁ ହେ ଭୀଷ୍ମ! ଲୋକଦୃଷ୍ଟିରେ ତୁମ ପ୍ରତି ଏ ସମସ୍ତ ଧର୍ମବାଣୀ ମିଥ୍ୟା ପରି ଦିଶେ।

Verse 15

ज्ञानवृद्धं च वृद्धं च भूयांसं केशवं मम । अजानत इवाख्यासि संस्तुवन्‌ कौरवाधम,कौरवाधम! तुम मेरे सामने इस कृष्णकी स्तुति करते हुए इसे ज्ञानवृद्ध और वयोवृद्ध बता रहे हो, मानो मैं इसके विषयमें कुछ जानता ही न होऊँ

ହେ କୌରବାଧମ! ମୋ ସାମ୍ନାରେ କେଶବଙ୍କୁ ସ୍ତୁତି କରି ତୁମେ ତାଙ୍କୁ ଜ୍ଞାନରେ ପରିପକ୍ୱ ଓ ବୟସରେ ବୃଦ୍ଧ ବୋଲି କହୁଛ—ମନେ ହେଉଛି ମୁଁ ତାଙ୍କ ବିଷୟରେ କିଛି ଜାଣେ ନାହିଁ।

Verse 16

गोघ्नः स्त्रीघ्नश्व सन्‌ भीष्म त्वद्वाक्याद्‌ यदि पूज्यते । एवंभूतश्न यो भीष्म कथं संस्तवमहति,भीष्म! यदि तुम्हारे कहनेसे गोघाती और स्त्रीहन्ता होते हुए भी इस कृष्णकी पूजा हो रही है तो तुम्हारी धर्मज्ञताकी हद हो गयी। तुम्हीं बताओ, जो इन दोनों ही प्रकारकी हत्याओंका अपराधी है, वह स्तुतिका अधिकारी कैसे हो सकता है?

ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ହେ ଭୀଷ୍ମ! ତୁମ ବାକ୍ୟବଳରେ ଗୋହନ୍ତା ଓ ସ୍ତ୍ରୀହନ୍ତା ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଏହି କୃଷ୍ଣ ପୂଜିତ ହେଉଛି, ତେବେ ତୁମ ଧର୍ମବିବେକର ସୀମା ପହଞ୍ଚିଗଲା। କହ ଭୀଷ୍ମ—ଏପରି ଅପରାଧବୋଝା ଧାରଣ କରିଥିବା ଲୋକ କିପରି ସ୍ତୁତିଯୋଗ୍ୟ ହେବ?

Verse 17

असोौ मतिमतां श्रेष्ठी य एब जगत: प्रभु: । सम्भावयति चाप्येवं त्वद्वाक्याच्च जनार्दन: । एवमेतत्‌ सर्वमिति तत्‌ सर्व वितथं ध्रुवम्‌,तुम कहते हो--ये बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं, ये ही सम्पूर्ण जगतके ईश्वर हैं” और तुम्हारे ही कहनेसे यह कृष्ण अपनेको ऐसा ही समझने भी लगा है। वह इन सभी बातोंको ज्यों-की त्यों ठीक मानता है; परंतु मेरी दृष्टिमें कृष्णके सम्बन्धमें तुम्हारे द्वारा जो कुछ कहा गया है, वह सब निश्चय ही झूठा है

ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ତୁମେ କହୁଛ, ‘ଏ ଜ୍ଞାନୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଏହିଁ ସମଗ୍ର ଜଗତର ପ୍ରଭୁ’; ଏବଂ ତୁମ ବାକ୍ୟରେ ଜନାର୍ଦନ (କୃଷ୍ଣ) ମଧ୍ୟ ନିଜକୁ ସେହିପରି ଭାବିବାକୁ ଲାଗିଛି। ସେ ଏ ସବୁ କଥାକୁ ଯଥାତଥ୍ୟ ସତ୍ୟ ମାନେ; କିନ୍ତୁ ମୋ ଦୃଷ୍ଟିରେ କୃଷ୍ଣ ବିଷୟରେ ତୁମେ କହିଥିବା ସବୁ ନିଶ୍ଚୟ ମିଥ୍ୟା।

Verse 18

न गाथागाथिनं शास्ति बहु चेदपि गायति । प्रकृतिं यान्ति भूतानि भूलिड्गशकुनिर्यथा,कोई भी गीत गानेवालेको कुछ सिखा नहीं सकता, चाहे वह कितनी ही बार क्‍यों न गाता हो। भूलिंग पक्षीकी भाँति सब प्राणी अपनी प्रकृतिका ही अनुसरण करते हैं

ଗୀତ ଗାଉଥିବା ଲୋକକୁ କେହି ସତ୍ୟରୂପେ ଶିଖାଇ ପାରେ ନାହିଁ, ସେ ଯେତେଥର ଗାଉ ନା କାହିଁକି। ଭୂଲିଙ୍ଗ ପକ୍ଷୀ ପରି ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ନିଜ ନିଜ ପ୍ରକୃତିକୁ ହିଁ ଅନୁସରଣ କରନ୍ତି।

Verse 19

नूनं प्रकृतिरेषा ते जघन्या नात्र संशय: । अति पापीयसी चैषा पाण्डवानामपीष्यते,निश्चय ही तुम्हारी यह प्रकृति बड़ी अधम है, इसमें संशय नहीं है। अतएव इन पाण्डवोंकी प्रकृति भी तुम्हारे ही समान अत्यन्त पापमयी होती जा रही है

ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ନିଶ୍ଚୟ ଏହି ତୁମ ପ୍ରକୃତି ନୀଚ ଓ ଅଧମ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। ଏବେ ସେହି ଅତ୍ୟନ୍ତ ପାପମୟ ପ୍ରବୃତ୍ତି ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ମଧ୍ୟ ସମର୍ଥିତ ହେଉଛି।

Verse 20

येषामर्च्यतम: कृष्णस्त्वं च येषां प्रदर्शक: । धर्मवांस्त्वमधर्मज्ञ: सतां मार्गादवप्लुत:,अथवा क्‍यों न हो, जिनका परम पूजनीय कृष्ण है और सत्पुरुषोंके मार्गसे गिरा हुआ तुम-जैसा धर्मज्ञानशून्य धर्मात्मा जिनका मार्गदर्शक है

ଯେମାନଙ୍କର ପରମ ପୂଜ୍ୟ କୃଷ୍ଣ, ଏବଂ ଯେମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ମାର୍ଗରୁ ଖସିପଡ଼ିଥିବା ତୁମ ପରି ଅଧର୍ମ-ଅଜ୍ଞକୁ ‘ଧର୍ମବାନ’ ବୋଲି ଦେଖାଇ ମାର୍ଗଦର୍ଶକ କରାଯାଏ—ତେବେ ତାଙ୍କର ଏପରି ହେବାରେ ଆଶ୍ଚର୍ୟ କ’ଣ? ତୁମେ ଧର୍ମବାନ ବୋଲି ପ୍ରଚାରିତ, କିନ୍ତୁ ଅଧର୍ମକୁ ଜାଣ ନାହିଁ; ସଜ୍ଜନମାନଙ୍କ ପଥରୁ ତୁମେ ସ୍ଖଳିତ।

Verse 21

को हि धर्मिणमात्मानं जानन्‌ ज्ञानविदां वर: | कुर्याद्‌ यथा त्वया भीष्म कृतं धर्ममवेक्षता,भीष्म! कौन ऐसा पुरुष होगा, जो अपनेको ज्ञानवानोंमें श्रेष्ठ और धर्मात्मा जानते हुए भी ऐसे नीच कर्म करेगा, जो धर्मपर दृष्टि रखते हुए भी तुम्हारे द्वारा किये गये हैं

ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ଭୀଷ୍ମ! ଯେ ନିଜକୁ ଧର୍ମାତ୍ମା ଓ ଜ୍ଞାନୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୋଲି ଜାଣେ, ସେ ଧର୍ମକୁ ଦୃଷ୍ଟିରେ ରଖି ମଧ୍ୟ ତୁମେ କରିଥିବା ପରି ଏମିତି ନୀଚ କର୍ମ କିପରି କରିପାରିବ?

Verse 22

चेत्‌ त्वं धर्म विजानासि यदि प्राज्ञा मतिस्तव । अन्यकामा हि धर्मज्ञा कन्यका प्राज्ञमानिना । अम्बा नामेति भद्रं ते कथं सापहता त्वया,यदि तुम धर्मको जानते हो, यदि तुम्हारी बुद्धि उत्तम ज्ञान और विवेकसे सम्पन्न है तो तुम्हारा भला हो, बताओ, काशिराजकी जो धर्मज्ञ कन्या अम्बा दूसरे पुरुषमें अनुरक्त थी, उसका अपनेको पण्डित माननेवाले तुमने क्यों अपहरण किया?

ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ଯଦି ତୁମେ ଧର୍ମକୁ ସତ୍ୟସତ୍ୟ ଜାଣ, ଯଦି ତୁମର ବୁଦ୍ଧି ପ୍ରଜ୍ଞାରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ, ତେବେ ତୁମର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ—କୁହ, କାଶୀରାଜଙ୍କ ଧର୍ମଜ୍ଞ କନ୍ୟା ଅମ୍ବା, ଯାହାର ମନ ଅନ୍ୟ ପୁରୁଷରେ ଆସକ୍ତ ଥିଲା, ସେକୁ ନିଜକୁ ପଣ୍ଡିତ ଭାବୁଥିବା ତୁମେ କାହିଁକି ଅପହରଣ କଲ?

Verse 23

तां त्वयापि हतां भीष्म कन्यां नैषितवान्‌ यतः । भ्राता विचित्रवीर्यस्ते सतां मार्गमनुछित:,भीष्म! तुम्हारे द्वारा अपहरण की गयी उस काशिराजकी कन्याको तुम्हारे भाई विचित्रवीर्यने अपनानेकी इच्छा नहीं की, क्योंकि वे सन्मार्गपर स्थित रहनेवाले थे

ଭୀଷ୍ମ! ତୁମେ ଅପହରଣ କରିଥିବା ସେଇ କନ୍ୟାକୁ ମଧ୍ୟ ତୁମ ଭ୍ରାତା ବିଚିତ୍ରବୀର୍ୟ ପତ୍ନୀରୂପେ ଗ୍ରହଣ କଲେ ନାହିଁ; କାରଣ ସେ ସଜ୍ଜନମାନେ ଅନୁସରୁଥିବା ଧର୍ମମାର୍ଗରେ ଅବିଚଳ ଥିଲେ।

Verse 24

दारयोर्यस्य चान्येन मिषत:ः प्राज्ञमानिन: । तव जातान्यपत्यानि सज्जनाचरिते पथि,उन्हींकी दोनों विधवा पत्नियोंके गर्भसे तुम-जैसे पण्डितमानीके देखते-देखते दूसरे पुरुषद्वारा संतानें उत्पन्न की गयीं, फिर भी तुम अपनेको साधु पुरुषोंके मार्गपर स्थिर मानते हो

ନିଜକୁ ପଣ୍ଡିତ ବୋଲି ମାନୁଥିବା ତୁମେ ଦେଖୁଥିବାବେଳେ, ତୁମର ଦୁଇ ବିଧବା ପତ୍ନୀଙ୍କ ଗର୍ଭରୁ ଅନ୍ୟ ପୁରୁଷ ଦ୍ୱାରା ସନ୍ତାନ ଜନ୍ମିଲା; ତଥାପି ତୁମେ ନିଜକୁ ସଜ୍ଜନମାନଙ୍କ ଆଚରଣ-ପଥରେ ଅବସ୍ଥିତ ବୋଲି ମାନୁଛ।

Verse 25

को हि धर्मोडस्ति ते भीष्म ब्रह्म॒चर्यमिदं वृथा । यद्‌ धारयसि मोहाद्‌ वा क्लीबत्वाद्‌ वा न संशय:,भीष्म! तुम्हारा धर्म कया है! तुम्हारा यह ब्रह्मचर्य भी व्यर्थका ढकोसलामात्र है, जिसे तुमने मोहवश अथवा नपुंसकताके कारण धारण कर रखा है, इसमें संशय नहीं

ଭୀଷ୍ମ! ତୁମର ଧର୍ମ ଆସଲେ କ’ଣ? ତୁମର ଏହି ବ୍ରହ୍ମଚର୍ଯ୍ୟ ବ୍ୟର୍ଥ—କେବଳ ଢୋଙ୍ଗ—ଯାହାକୁ ତୁମେ ମୋହବଶତଃ କିମ୍ବା ନପୁଂସକତାର କାରଣରେ ଧାରଣ କରିଛ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।

Verse 26

न त्वहं तव धर्मज्ञ पश्याम्युपचयं क्वचित्‌ | नहि ते सेविता वृद्धा य एवं धर्ममब्रवी:,धर्मज्ञ भीष्म! मैं तुम्हारी कहीं कोई उन्नति भी तो नहीं देख रहा हूँ। मेरा तो विश्वास है, तुमने ज्ञानवृद्ध पुरुषोंका कभी संग नहीं किया है। तभी तो तुम ऐसे धर्मका उपदेश करते हो

ଧର୍ମଜ୍ଞ ଭୀଷ୍ମ! ମୁଁ ତୁମର କେଉଁଠି ମଧ୍ୟ ସତ୍ୟ ଉନ୍ନତି ଦେଖୁନାହିଁ। ନିଶ୍ଚୟ ତୁମେ ଜ୍ଞାନବୃଦ୍ଧ ବୃଦ୍ଧଜନଙ୍କ ସେବା-ସଙ୍ଗ କେବେ କରିନାହ; ସେହିପାଇଁ ତୁମେ ଏଭଳି ଧର୍ମ କହୁଛ।

Verse 27

इष्टं दत्तमधीतं च यज्ञाश्व बहुदक्षिणा: । सर्वमेतदपत्यस्य कलां नाहन्ति षोडशीम्‌,यज्ञ, दान, स्वाध्याय तथा बहुत दक्षिणावाले बड़े-बड़े यज्ञ--ये सब संतानकी सोलहवीं कलाके बराबर भी नहीं हो सकते

ଯଜ୍ଞ, ଦାନ, ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟ ଏବଂ ବହୁ ଦକ୍ଷିଣାସହ ମହାଯଜ୍ଞ—ଏସବୁ ମଧ୍ୟ ସନ୍ତାନର ମୂଲ୍ୟର ଷୋଡ଼ଶମ ଅଂଶକୁ ମଧ୍ୟ ସମାନ ନୁହେଁ।

Verse 28

ब्रतोपवासैर्बहुभि: कृतं भवति भीष्म यत्‌ | सर्व तदनपत्यस्य मोघं भवति निश्चयात्‌,भीष्म! अनेक व्रतों और उपवासोंद्वारा जो पुण्य कार्य किया जाता है, वह सब संतानहीन पुरुषके लिये निश्चय ही व्यर्थ हो जाता है

ଭୀଷ୍ମ! ଅନେକ ବ୍ରତ ଓ ଉପବାସରେ ଯେ ପୁଣ୍ୟ ସଞ୍ଚିତ ହୁଏ, ସନ୍ତାନହୀନ ପୁରୁଷ ପାଇଁ ତାହା ନିଶ୍ଚୟ ନିଷ୍ଫଳ ହୋଇଯାଏ।

Verse 29

सो<नपत्यश्व वृद्धश्न॒ मिथ्याधर्मानुसारक: । हंसवत्‌ त्वमपीदानी ज्ञातिभ्य: प्राप्तुया वधम्‌,तुम संतानहीन, वृद्ध और मिथ्याधर्मका अनुसरण करनेवाले हो; अत: इस समय हंसकी भाँति तुम भी अपने जातिभाइयोंके हाथसे ही मारे जाओगे

ତୁମେ ସନ୍ତାନହୀନ, ବୃଦ୍ଧ ଏବଂ ମିଥ୍ୟାଧର୍ମର ଅନୁସରୀ; ତେଣୁ ଏବେ ହଂସ ପରି ତୁମେ ମଧ୍ୟ ନିଜ ଜ୍ଞାତିମାନଙ୍କ ହାତରେ ବଧ ପାଇବ।

Verse 30

एवं हि कथयन्त्यन्ये नरा ज्ञानविद: पुरा । भीष्म यत्‌ तदहं सम्यग्‌ वक्ष्यामि तव शृण्वतः,भीष्म! पहलेके विवेकी मनुष्य एक प्राचीन वृत्तान्त सुनाया करते हैं, वही मैं ज्यों-का- त्यों तुम्हारे सामने उपस्थित करता हूँ, सुनो

ଭୀଷ୍ମ! ପୁରାତନ କାଳରେ ଜ୍ଞାନୀ ଲୋକେ ଏଭଳି ଗୋଟିଏ ପ୍ରାଚୀନ ବୃତ୍ତାନ୍ତ କହୁଥିଲେ; ତୁମେ ଶୁଣୁଥିବାବେଳେ ସେହିଟିକୁ ମୁଁ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ କହିବି—ଶୁଣ।

Verse 31

वृद्ध: किल समुद्रान्ते कश्चिद्धंसो5भवत्‌ पुरा । धर्मवागन्यथावृत्त: पक्षिण: सोडनुशास्ति च,पूर्वकालकी बात है, समुद्रके निकट कोई बूढ़ा हंस रहता था। वह धर्मकी बातें करता; परंतु उसका आचरण ठीक उसके विपरीत होता था। वह पक्षियोंको सदा यह उपदेश किया करता कि धर्म करो, अधर्मसे दूर रहो। सदा सत्य बोलनेवाले उस हंसके मुखसे दूसरे-दूसरे पक्षी यही उपदेश सुना करते थे

ପୂର୍ବକାଳରେ ସମୁଦ୍ରତଟରେ ଜଣେ ବୃଦ୍ଧ ହଂସ ରହୁଥିଲା। ସେ ଧର୍ମର ଉଚ୍ଚ କଥା କହୁଥିଲା, କିନ୍ତୁ ତାହାର ଆଚରଣ ସେହି କଥାର ପୂରା ବିପରୀତ ଥିଲା। ତଥାପି ସେ ଅନ୍ୟ ପକ୍ଷୀମାନଙ୍କୁ ସଦା ଉପଦେଶ ଦେଉଥିଲା—“ଧର୍ମ କର, ଅଧର୍ମରୁ ଦୂରେ ରୁହ।”

Verse 32

धर्म चरत माधर्ममिति तस्य वच: किल । पक्षिण: शुश्रुवुर्भीष्म सततं सत्यवादिन:,पूर्वकालकी बात है, समुद्रके निकट कोई बूढ़ा हंस रहता था। वह धर्मकी बातें करता; परंतु उसका आचरण ठीक उसके विपरीत होता था। वह पक्षियोंको सदा यह उपदेश किया करता कि धर्म करो, अधर्मसे दूर रहो। सदा सत्य बोलनेवाले उस हंसके मुखसे दूसरे-दूसरे पक्षी यही उपदेश सुना करते थे

“ଧର୍ମ କର, ଅଧର୍ମ କରନି”—ଏହି ଥିଲା ତାହାର କଥା। ହେ ଭୀଷ୍ମ, ସଦା ସତ୍ୟବାଦୀ ବୋଲି ପରିଚିତ ସେହି ହଂସର ମୁଖରୁ ପକ୍ଷୀମାନେ ପୁନଃପୁନଃ ଏହି ଉପଦେଶ ଶୁଣୁଥିଲେ।

Verse 33

अथास्य भक्ष्यमाजहु: समुद्रजलचारिण: । अण्डजा भीष्म तस्यान्ये धर्मार्थमिति शुश्रुम,भीष्म! ऐसा सुननेमें आया है कि वे समुद्रके जलमें विचरनेवाले पक्षी धर्म समझकर उसके लिये भोजन जुटा दिया करते थे

ହେ ଭୀଷ୍ମ, ଶୁଣାଯାଏ—ସମୁଦ୍ରଜଳରେ ବିଚରଣ କରୁଥିବା ଅନ୍ୟ ଅଣ୍ଡଜ ପକ୍ଷୀମାନେ ‘ଏହା ଧର୍ମକର୍ତ୍ତବ୍ୟ’ ବୋଲି ଭାବି ତାହା ପାଇଁ ଭୋଜନ ଆଣି ଦେଉଥିଲେ।

Verse 34

ते च तस्य समभ्याशे निक्षिप्याण्डानि सर्वश: । समुद्राम्भस्यमज्जन्त चरन्तो भीष्म पक्षिण: । तेषामण्डानि सर्वेषां भक्षयामास पापकृत्‌,भीष्म! हंसपर विश्वास हो जानेके कारण वे सभी पक्षी अपने अण्डे उसके पास ही रखकर समुद्रके जलमें गोते लगाते और विचरते थे; परंतु वह पापी हंस उन सबके अण्डे खा जाता था

ହେ ଭୀଷ୍ମ, ତାହାର ଉପରେ ଭରସା କରି ସେହି ପକ୍ଷୀମାନେ ନିଜ ନିଜ ସମସ୍ତ ଅଣ୍ଡା ତାହାର ନିକଟରେ ରଖି, ପରେ ସମୁଦ୍ରଜଳରେ ଡୁବି ବିଚରଣ କରୁଥିଲେ। କିନ୍ତୁ ସେ ପାପୀ ହଂସ ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତଙ୍କ ଅଣ୍ଡା ଖାଇ ଦେଉଥିଲା।

Verse 35

स हंस: सम्प्रमत्तानामप्रमत्त: स्वकर्मणि । ततः प्रक्षीयमाणेषु तेषु तेष्वण्डजो5पर: । अशड्कत महाप्राज्ञ: स कदाचिद्‌ ददर्श ह,वे बेचारे पक्षी असावधान थे और वह अपना काम बनानेके लिये सदा चौकन्ना रहता था। तदनन्तर जब वे अण्डे नष्ट होने लगे, तब एक बुद्धिमान्‌ पक्षीको हंसपर कुछ संदेह हुआ और एक दिन उसने उसकी सारी करतूत देख भी ली

ସେହି ପକ୍ଷୀମାନେ ଅସାବଧାନ ଥିଲେ, କିନ୍ତୁ ସେ ହଂସ ନିଜ କାମରେ ସଦା ସଚେତନ ଥିଲା। ପରେ ଯେତେବେଳେ ସେମାନଙ୍କ ଅଣ୍ଡା ଧୀରେ ଧୀରେ ନଷ୍ଟ ହେବାକୁ ଲାଗିଲା, ତେବେ ଜଣେ ମହାପ୍ରାଜ୍ଞ ପକ୍ଷୀର ମନେ ତାହା ପ୍ରତି ସନ୍ଦେହ ଜାଗିଲା; ଏବଂ ଗୋଟିଏ ଦିନ ସେ ତାହାର କୁକର୍ମ ନିଜ ଚକ୍ଷୁରେ ଦେଖିଲା।

Verse 36

ततः स कथयामास दृष्टवा हंसस्य किल्बिषम्‌ | तेषां परमदु:खार्त: स पक्षी सर्वपक्षिणाम्‌,हंसका यह पापपूर्ण कृत्य देखकर वह पक्षी दुःखसे अत्यन्त आतुर हो उठा और उसने अन्य सब पक्षियोंसे सारा हाल कह सुनाया

ତାପରେ ହଂସର ପାପକର୍ମ ଦେଖି ସେ ପକ୍ଷୀ ତାଙ୍କମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଗଭୀର ଦୁଃଖରେ ଆକୁଳ ହୋଇ, ଅନ୍ୟ ସମସ୍ତ ପକ୍ଷୀଙ୍କୁ ସମଗ୍ର ବୃତ୍ତାନ୍ତ କହିଦେଲା।

Verse 37

ततः प्रत्यक्षतो दृष्टवा पक्षिणस्ते समीपगा: । निजलघ्नुस्तं तदा हंसं मिथ्यावृत्तं कुरूद्वह,कुरुवंशी भीष्म! तब उन पक्षियोंने निकट जाकर सब कुछ प्रत्यक्ष देख लिया और धर्मात्माका मिथ्या ढोंग बनाये हुए उस हंसको मार डाला

ତାପରେ ସେ ପକ୍ଷୀମାନେ ନିକଟକୁ ଯାଇ ସବୁକିଛି ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦେଖି, ଧର୍ମର ମିଥ୍ୟା ଢୋଙ୍ଗ କରୁଥିବା ସେ ହଂସକୁ ତେବେ ହତ୍ୟା କଲେ—ହେ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ।

Verse 38

ते त्वां हंससधर्माणमपीमे वसुधाधिपा: । निहन्युर्भीष्म संक्रुद्धा: पक्षिणस्तं यथाण्डजम्‌,तुम भी उस हंसके ही समान हो, अतः ये सब नरेश अत्यन्त कुपित होकर आज तुम्हें उसी तरह मार डालेंगे, जैसे उन पक्षियोंने हंसकी हत्या कर डाली थी। भीष्म! इस विषयमें पुराणवेत्ता विद्वान्‌ एक गाथा गाया करते हैं। भरतकुलभूषण! मैं उसे भी तुमको भलीभाँति सुनाये देता हूँ

ତୁମେ ମଧ୍ୟ ସେହି ହଂସ ସଦୃଶ ସ୍ୱଭାବର; ତେଣୁ ଏହି ସମସ୍ତ ଭୂପତି କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ ଆଜି ତୁମକୁ ମଧ୍ୟ ସେହିପରି ନିହତ କରିବେ—ଯେପରି ପକ୍ଷୀମାନେ ସେ ଅଣ୍ଡଜ ହଂସକୁ ହତ୍ୟା କରିଥିଲେ, ହେ ଭୀଷ୍ମ।

Verse 39

गाथामप्यत्र गायन्ति ये पुराणविदो जना: । भीष्म यां तां च ते सम्यक्‌ कथयिष्यामि भारत,तुम भी उस हंसके ही समान हो, अतः ये सब नरेश अत्यन्त कुपित होकर आज तुम्हें उसी तरह मार डालेंगे, जैसे उन पक्षियोंने हंसकी हत्या कर डाली थी। भीष्म! इस विषयमें पुराणवेत्ता विद्वान्‌ एक गाथा गाया करते हैं। भरतकुलभूषण! मैं उसे भी तुमको भलीभाँति सुनाये देता हूँ

ଏହି ବିଷୟରେ ପୁରାଣବିଦ୍ ଲୋକେ ଗୋଟିଏ ଗାଥା ମଧ୍ୟ ଗାଆନ୍ତି; ହେ ଭୀଷ୍ମ—ହେ ଭାରତବଂଶଜ—ସେଇ ଗାଥାକୁ ମୁଁ ତୁମକୁ ସଠିକ୍ ଭାବେ କହିବି।

Verse 40

इस प्रकार श्रीमह्या भारत सभापव॑के अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें युधिष्ठिरको आश्वासन नामक चालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,अन्तरात्मन्यभिहते रौषि पत्ररथाशुचि । अण्डभक्षणकर्मतत्‌ तव वाचमतीयते “हंस! तुम्हारी अन्तरात्मा रागादि दोषोंसे दूषित है, तुम्हारा यह अण्डभक्षणरूप अपवित्र कर्म तुम्हारी इस धर्मोपदेशमयी वाणीके सर्वथा विरुद्ध है”

ହେ ହଂସ! ତୁମର ଅନ୍ତରାତ୍ମା ରାଗାଦି ଦୋଷରେ ଦୂଷିତ; ଅଣ୍ଡଭକ୍ଷଣରୂପ ଏହି ଅପବିତ୍ର କର୍ମ ତୁମର ଧର୍ମୋପଦେଶମୟ ବାଣୀର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ବିରୋଧୀ।

Verse 41

इति श्रीमहा भारते समापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि शिशुपालवाक्ये एकचत्वारिंशो5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ााभारत सभापव॑के अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वनें शिशुपालवाक्यविषयक इकतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଶିଶୁପାଳବଧପର୍ବରେ ଶିଶୁପାଳଙ୍କ ବାକ୍ୟବିଷୟକ ଏକଚାଳିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns legitimate dissent versus corrosive invective: whether public criticism in a royal assembly can be ethically grounded when it targets the person and the institution of honor-allocation rather than the merits of policy or conduct.

Speech is a governance instrument: praise and blame must be regulated by discernment (viveka) and proportionality, because rhetorical excess can destabilize institutions and convert deliberation into factional conflict.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary is implicit in the narrative framing—Vaiśaṃpāyana’s report of polarized reactions and Bhīṣma’s self-positioning—highlighting how assemblies reveal collective ethics under pressure.