
Sabhā-praveśa, Dāna, and the Courtly Convergence (सभा-प्रवेशः दानं च)
Upa-parva: Sabhā-praveśa and Sabhā-upāsanā (Assembly Entry, Consecratory Hospitality, and Court Attendance)
Vaiśaṃpāyana narrates Yudhiṣṭhira’s entry into the assembly hall and the immediate establishment of auspicious order (puṇyāha). The king feeds an ayuta (ten-thousand) brāhmaṇas and distributes lavish provisions—ghṛta-pāyasa, honey, foods, roots and fruits—along with new garments and garlands. He gifts cattle in large numbers and performs worship, installing/propitiating deities within the hall. Over seven nights, performers (wrestlers, actors, bards, charioteer-bards) attend upon him, and the Pāṇḍava court is described as Indra-like in splendor. The chapter then catalogs the presence of eminent ṛṣis (including Kṛṣṇa Dvaipāyana Vyāsa and Śuka among many) seated with the Pāṇḍavas, and a wide range of visiting rulers from multiple regions. It also depicts cultured entertainment and musical performance: Tumburu, Citraseṇa, gandharvas, and apsarases coordinate song and instrumentality with measured rhythm and tempo, delighting the Pāṇḍavas and sages. The closing image frames Yudhiṣṭhira as being attended like Brahmā by devas—an ideological statement that kingship is validated through dharma, ritual propriety, and public concord.
Chapter Arc: मय-निर्मित अद्भुत सभाभवन में धर्मराज युधिष्ठिर का प्रवेश—जहाँ पृथ्वी के राजाओं की भीड़ और दिव्य-मानवी वैभव एक साथ उमड़ पड़ता है। → युधिष्ठिर अतिथियों का सत्कार करते हैं—घृत-मधु मिश्रित पायस, कूष्माण्ड/कृसर, हविष्य, विविध फल-भक्ष्य; फिर नये-नये वस्त्र, हार और उपहारों से दूर-दूर से आये विप्रों और राजाओं को तृप्त करते हैं। सभा में एक-एक कर अनेक नरेशों के नाम गूँजते हैं—किरात, यवन, शैब्य, शिशुपाल (सहपुत्र), करूँषाधिपति आदि—और पाण्डव-वैभव का सार्वजनिक प्रदर्शन बनता जाता है। → तुम्बुरु के संचोदन से गन्धर्व-किन्नर दिव्य तानों में गाते-बजाते हैं; और सभा में बैठे सत्यव्रती, सत्यसंगर पाण्डवों की उपासना ऐसे करते हैं जैसे देवगण ब्रह्मा की—युधिष्ठिर का तेज सभा-केन्द्र बनकर प्रकट होता है। → सभा ‘राजसूय-पूर्व’ की प्रतिष्ठा-भूमि बन जाती है: अतिथि-सत्कार, संगीत, और राजाओं की उपस्थिति से इन्द्रप्रस्थ की सार्वभौम गरिमा स्थापित होती है; युधिष्ठिर का राजधर्म—दान, सम्मान, और मर्यादा—सर्वत्र मान्य होता है। → इतना वैभव और सार्वजनिक प्रशंसा आगे चलकर ईर्ष्या की अग्नि को किसके हृदय में भड़काएगी—और यह सभा किस परीक्षा का द्वार बनेगी?
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६ श्लोक मिलाकर कुल ३८३ “लोक हैं) भीकम (2 अमान चतुथों5 ध्याय: मयद्वारा निर्मित सभाभवनमें धर्मराज युधिष्ठटिरका प्रवेश तथा सभामें स्थित महर्षियों और राजाओं आदिका वर्णन (वैशग्पायन उवाच तां तु कृत्वा सभां श्रेष्ठां मयश्लार्जुनमब्रवीत् । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! उस श्रेष्ठ सभाभवनका निर्माण करके मयासुरने अर्जुनसे कहा। मय उवाच एषा सभा सव्यसाचिन् ध्वजो ह्वात्र भविष्यति ।। मयासुर बोला--सव्यसाचिन्! यह है आपकी सभा, इसमें एक ध्वजा होगी। भूतानां च महावीर्यों ध्वजाग्रे किड़करो गण: । तव विस्फारघोषेण मेघवन्निनदिष्यति ।। उसके अग्रभागमें भूतोंका महापराक्रमी किंकर नामक गण निवास करेगा। जिस समय तुम्हारे धनुषकी टंकारध्वनि होगी, उस समय उस ध्वनिके साथ ये भूत भी मेघोंके समान गर्जना करेंगे। अयं हि सूर्यसंकाशो ज्वलनस्य रथोत्तम: | इमे च दिविजा: श्वेता वीर्यवन्तो हयोत्तमा: ।। मायामय: कृतो होष ध्वजो वानरलक्षण: । असज्जमानो वृक्षेषु धूमकेतुरिवोच्छित: ।। यह जो सूर्यके समान तेजस्वी अग्निदेवका उत्तम रथ है और ये जो श्वेत वर्णवाले दिव्य एवं बलवान अश्वरत्न हैं तथा यह जो वानरचिह्नसे उपलक्षित ध्वज है, इन सबका निर्माण मायासे ही हुआ है। यह ध्वज वृक्षोंमें कहीं अटकता नहीं है तथा अग्निकी लपटोंके समान सदा ऊपरकी ओर ही उठा रहता है। बहुवर्ण हि लक्ष्येत ध्वजं वानरलक्षणम् । ध्वजोत्कटं हाुनवमं युद्धे द्रक्ष्यसि विष्ठितम् ।। आपका यह वानरचिह्वित ध्वज अनेक रंगका दिखायी देता है। आप युद्धमें इस उत्कट एवं स्थिर ध्वजको कभी झुकता नहीं देखेंगे। इत्युक्त्वा5डलिड्ग्य बीभत्सुं विसृष्ट: प्रययौ मय: ।) ऐसा कहकर मयासुरने अर्जुनको हृदयसे लगा लिया और उनसे विदा लेकर (अभीष्ट स्थानको) चला गया। वैशम्पायन उवाच ततः प्रवेशनं तस्यां चक्रे राजा युधिष्ठिर: । अयुतं भोजयित्वा तु ब्राह्मणानां नराधिप:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने घी और मधु मिलायी हुई खीर, खिचड़ी, जीवन्तिकाके साग, सब प्रकारके हविष्य, भाँति-भाँतिके भक्ष्य तथा फल, ईख आदि नाना प्रकारके चोष्य और बहुत अधिक पेय (शर्बत) आदि सामग्रियों-द्वारा दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उस सभा-भवनमें प्रवेश किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସେ ସଭାଭବନରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ। କିନ୍ତୁ ପ୍ରବେଶ ପୂର୍ବରୁ ନରାଧିପ ଦଶହଜାର ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ଘିଅ-ମଧୁ ମିଶ୍ରିତ ପାୟସ, ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ହବିଷ୍ୟ, ନାନାଭିଦ ଭକ୍ଷ୍ୟ, ଫଳ, ଚୋଷ୍ୟ ଓ ବହୁ ପେୟ ପଦାର୍ଥରେ ସନ୍ତର୍ପିତ କରି, ତା’ପରେ ସଭାରେ ପଦାର୍ପଣ କଲେ।
Verse 2
साज्येन पायसेनैव मधुना मिश्रितेन च । कूृसरेणाथ जीवन्त्या हविष्येण च सर्वश:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने घी और मधु मिलायी हुई खीर, खिचड़ी, जीवन्तिकाके साग, सब प्रकारके हविष्य, भाँति-भाँतिके भक्ष्य तथा फल, ईख आदि नाना प्रकारके चोष्य और बहुत अधिक पेय (शर्बत) आदि सामग्रियों-द्वारा दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उस सभा-भवनमें प्रवेश किया
ଘିଅ ଯୁକ୍ତ ପାୟସକୁ ମଧୁ ସହ ମିଶାଇ, କୃସର (ଖିଚୁଡ଼ି), ଜୀବନ୍ତୀ ଶାଗ ଏବଂ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ହବିଷ୍ୟ ଦ୍ୱାରା—ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏହି ସବୁ ପଦାର୍ଥରେ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଦଶହଜାର ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ସନ୍ତର୍ପିତ କରି, ପରେ ସଭାଭବନରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ।
Verse 3
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापव॑के अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें सभानिर्माणविषयक तीयरा अध्याय पूरा हुआ,भनक्ष्यप्रकारैविंविधै: फलैश्वापि तथा नृप । चोष्यैश्न विविध राजन् पेयैश्व बहुविस्तरै: वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने घी और मधु मिलायी हुई खीर, खिचड़ी, जीवन्तिकाके साग, सब प्रकारके हविष्य, भाँति-भाँतिके भक्ष्य तथा फल, ईख आदि नाना प्रकारके चोष्य और बहुत अधिक पेय (शर्बत) आदि सामग्रियों-द्वारा दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उस सभा-भवनमें प्रवेश किया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍ (ଜନମେଜୟ)! ତା’ପରେ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଘିଅ-ମଧୁ ମିଶ୍ରିତ ପାୟସ, ଖିଚୁଡ଼ି, ଜୀବନ୍ତିକା ଶାଗ, ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ହବିଷ୍ୟ, ନାନାଭିଦ ଭକ୍ଷ୍ୟ, ଫଳ, ଇଖ ପରି ଚୋଷ୍ୟ ଦ୍ରବ୍ୟ ଏବଂ ବହୁ ପେୟ ପଦାର୍ଥରେ ଦଶହଜାର ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ସନ୍ତର୍ପିତ କରି, ନବନିର୍ମିତ ସଭାଭବନରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ।
Verse 4
अहतैश्नैव वासोभिममल्यैरुच्चावचैरपि । तर्पयामास विप्रेन्द्रान नानादिग्भ्य:ः समागतान्,उन्होंने नये-नये वस्त्र और छोटे-बड़े अनेक प्रकारके हार आदिके उपहार देकर अनेक दिशाओंसे आये हुए श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको तृप्त किया इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि सभाक्रियापर्वणि सभाप्रवेशो नाम चतुर्थो5ध्याय: ।। ४ ।। इस प्रकार श्रीमह्या भारत सभथापवके अन्तर्गत सभाक्रियापर्वमें सभाप्रवेश नामक चौथा अध्याय पूरा हुआ
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ନୂଆ, ନିର୍ମଳ ବସ୍ତ୍ର ଏବଂ ଛୋଟ-ବଡ଼ ନାନା ପ୍ରକାର ମାଳା ଆଦି ଉପହାର ଦେଇ, ନାନା ଦିଗରୁ ଆସିଥିବା ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ତୃପ୍ତ କଲେ।
Verse 5
ददौ तेभ्य: सहस्राणि गवां प्रत्येकश: पुन: । पुण्याहघोषस्तत्रासीद् दिवस्पृगिव भारत,भारत! तत्पश्चात् उन्होंने प्रत्येक ब्राह्मणको एक-एक हजार गौएँ दीं। उस समय वहाँ ब्राह्मणोंके पुण्याह-वाचनका गम्भीर घोष मानो स्वर्गलोकतक गूँज उठा
ହେ ଭାରତ! ତା’ପରେ ସେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କୁ ପୃଥକ୍ ପୃଥକ୍ ଏକ ଏକ ହଜାର ଗାଈ ଦାନ କଲେ। ସେ ସମୟରେ ସେଠାରେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କର ପୁଣ୍ୟାହ-ଘୋଷର ଗମ୍ଭୀର ଧ୍ୱନି ଯେନେ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଗୁଞ୍ଜି ଉଠିଲା।
Verse 6
वादिन्रैविविषधीर्दिव्यैर्गन्धैरुच्चावचैरपि । पूजयित्वा कुरुश्रेष्ठो दैवतानि निवेश्य च,कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिने अनेक प्रकारके बाजे तथा भाँति-भाँतिके दिव्य सुगन्धित पदार्थोद्वारा उस भवनमें देवताओंकी स्थापना एवं पूजा की। इसके बाद वे उस भवनमें प्रविष्ट हुए
କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ନାନା ପ୍ରକାର ବାଦ୍ୟର ନାଦ ଓ ବିଭିନ୍ନ ଦିବ୍ୟ ସୁଗନ୍ଧିତ ଦ୍ରବ୍ୟ ଦ୍ୱାରା ସେହି ଭବନରେ ଦେବତାମାନଙ୍କୁ ପ୍ରତିଷ୍ଠା କରି ପୂଜା କଲେ; ତା’ପରେ ସେ ଭବନରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ।
Verse 7
तत्र मल्ला नटा झल्ला: सूता वैतालिकास्तथा | उपतस्थुर्महात्मानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम्,वहाँ धर्मपुत्र महात्मा युधिष्ठिरकी सेवामें कितने ही मल्ल (बाहुयुद्ध करनेवाले), नट, झल्ल (लकुटियोंसे युद्ध करनेवाले), सूत और वैतालिक उपस्थित हुए
ସେଠାରେ ଧର୍ମପୁତ୍ର ମହାତ୍ମା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସେବାରେ ଅନେକ ମଲ୍ଲ, ନଟ, ଝଲ୍ଲ, ସୂତ ଏବଂ ବୈତାଳିକ ମଧ୍ୟ ଉପସ୍ଥିତ ହେଲେ।
Verse 8
तथा स कृत्वा पूजां तां भ्रातृभि: सह पाण्डव: । तस्यां सभायां रम्यायां रेमे शक्रो यथा दिवि,इस प्रकार पूजनका कार्य सम्पन्न करके भाइयोंसहित पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर स्वर्ममें इन्द्रकी भाँति उस रमणीय सभामें आनन्दपूर्वक रहने लगे
ଏଭଳି ଭାବେ ଭାଇମାନଙ୍କ ସହିତ ସେ ପୂଜା ସମ୍ପନ୍ନ କରି, ପାଣ୍ଡବ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସେହି ରମ୍ୟ ସଭାରେ ସ୍ୱର୍ଗରେ ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର) ଯେପରି ଆନନ୍ଦ କରେ, ସେପରି ଆନନ୍ଦରେ ରହିଲେ।
Verse 9
सभायामृषयस्तस्यां पाण्डवै: सह आसते । आसांचक्रुनरिन्द्राश्न नानादेशसमागता:,उस सभामें ऋषि तथा विभिन्न देशोंसे आये हुए नरेश पाण्डवोंके साथ बैठा करते थे
ସେଇ ରାଜସଭାରେ ଋଷିମାନେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସହ ଉପବିଷ୍ଟ ଥିଲେ; ଏବଂ ନାନା ଦେଶରୁ ଆସିଥିବା ନରେନ୍ଦ୍ରମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଆସି ନିଜ ନିଜ ଆସନ ଗ୍ରହଣ କରିଥିଲେ।
Verse 10
असितो देवल: सत्य: सर्पिर्माली महाशिरा: । अर्वावसु: सुमित्रश्न मैत्रेय: शुनको बलि:
ସେଠାରେ ଅସିତ, ଦେବଳ, ସତ୍ୟ, ସର୍ପିର୍ମାଳୀ, ମହାଶିରା, ଅର୍ୱାବସୁ, ସୁମିତ୍ର, ମୈତ୍ରେୟ, ଶୁନକ ଓ ବଲି—ଏହି ଋଷିମାନେ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ।
Verse 11
बको दाल्भ्य: स्थूलशिरा: कृष्णद्वैपायन: शुक: । सुमन्तुर्जैमिनि: पैलो व्यासशिष्यास्तथा वयम्
ବକ ଦାଲ୍ଭ୍ୟ, ସ୍ଥୂଳଶିରା, କୃଷ୍ଣଦ୍ୱୈପାୟନ (ବ୍ୟାସ), ଶୁକ, ସୁମନ୍ତୁ, ଜୈମିନି ଓ ପୈଲ—ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ବ୍ୟାସଙ୍କ ଶିଷ୍ୟ; ଆମେ ମଧ୍ୟ ସେହି ପରମ୍ପରାର।
Verse 12
तित्तिरियज्ञवल्क्यश्न॒ ससुतो लोमहर्षण: । अप्सुहोम्यश्न धौम्यश्न अणीमाण्डव्यकौशिकौ
ତିତ୍ତିରି, ଯାଜ୍ଞବଲ୍କ୍ୟ, ପୁତ୍ରସହିତ ଲୋମହର୍ଷଣ; ଏବଂ ଅପ୍ସୁହୋମ୍ୟ, ଧୌମ୍ୟ, ଅଣୀମାଣ୍ଡବ୍ୟ ଓ କୌଶିକ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଥିଲେ।
Verse 13
दामोष्णीषस्त्रैबलिश्व पर्णादो घटजानुक: । मौज्जायनो वायुभक्ष: पाराशर्यश्ष सारिक:
ସେଠାରେ ଦାମୋଷ୍ଣୀଷ, ତ୍ରୈବଲି, ପର୍ଣାଦ, ଘଟଜାନୁକ, ମୌଜ୍ଜାୟନ, ବାୟୁଭକ୍ଷ, ପାରାଶର୍ୟ ଓ ସାରିକ—ଏପରି ବିଚିତ୍ର ବ୍ରତଚିହ୍ନଧାରୀ ତପସ୍ବୀମାନେ ମଧ୍ୟ ଥିଲେ।
Verse 14
बलिवाक: सिनीवाक: सत्यपाल: कृतश्रम: । जातूकर्ण: शिखावांश्व॒ आलम्ब: पारिजातक:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେଠାରେ ବଲିବାକ, ସିନୀବାକ, ସତ୍ୟପାଳ ଓ କୃତଶ୍ରମ; ଜାତୂକର୍ଣ୍ଣ ଓ ଶିଖାବାନ; ଏବଂ ଆଲମ୍ବ ଓ ପାରିଜାତକ ମଧ୍ୟ ଥିଲେ।
Verse 15
पर्वतश्न महाभागो मार्कण्डेयो महामुनि: । पवित्रपाणि: सावर्णो भालुकिर्गालवस्तथा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେଠାରେ ପର୍ବତଶ୍ନ; ମହାଭାଗ୍ୟବାନ ମହାମୁନି ମାର୍କଣ୍ଡେୟ; ପବିତ୍ରପାଣି; ସାବର୍ଣ୍ଣ; ଭାଲୁକି; ଏବଂ ଗାଲବ ମଧ୍ୟ ଥିଲେ।
Verse 16
जड्घाबन्धुश्न रैभ्यश्व॒ कोपवेगस्तथा भृगुः । हरिबभ्ुश्न कौण्डिन्यो बश्रुमाली सनातन:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେଠାରେ ଜଡ୍ଘାବନ୍ଧୁ, ରୈଭ୍ୟାଶ୍ୱ, କୋପବେଗ ଓ ଭୃଗୁ; ତଥା ହରିବଭ୍ରୁ, କୌଣ୍ଡିନ୍ୟ, ବଶ୍ରୁମାଳୀ ଏବଂ ପ୍ରାଚୀନ ଋଷି ସନାତନ ମଧ୍ୟ ଥିଲେ।
Verse 17
काक्षीवानौशिजश्चनैव नाचिकेतो5थ गौतम: । पैड़यो वराह: शुनक: शाण्डिल्यश्व महातपा:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେଠାରେ କାକ୍ଷୀବାନ, ଔଶିଜ, ନାଚିକେତ ଓ ଗୌତମ; ତଥା ପୈଡ୍ୟ, ବରାହ, ଶୁନକ ଏବଂ ମହାତପସ୍ବୀ ଶାଣ୍ଡିଲ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଥିଲେ।
Verse 18
कुक्कुरो वेणुजड्यो5थ कालाप: कठ एव च | मुनयो धर्मविद्वांसो धृतात्मानो जितेन्द्रिया:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— କୁକ୍କୁର, ବେଣୁଜଡ୍ୟ, କାଲାପ ଓ କଠ— ଏହେ ମୁନିମାନେ ଧର୍ମବିଦ୍, ଧୃତାତ୍ମା ଏବଂ ଇନ୍ଦ୍ରିୟଜୟୀ ଥିଲେ।
Verse 19
असित, देवल, सत्य, सर्पिर्माली, महाशिरा, अर्वावसु, सुमित्र, मैत्रेय, शुनक, बलि, बक, दाल्भ्य, स्थूलशिरा, कृष्णद्वैपायन, शुकदेव, व्यासजीके शिष्य सुमन्तु, जैमिनि, पैल तथा हमलोग, तित्तिरि, याज्ञवल्क्य, पुत्रसहित लोमहर्षण, अप्सुहोम्य, धौम्य, अणीमाण्डव्य, कौशिक, दामोष्णीष, त्रैबलि, पर्णाद, घटजानुक, मौंजायन, वायुभक्ष, पाराशर्य, सारिक, बलिवाक, सिनीवाक, सत्यपाल, कृतश्रम, जातूकर्ण, शिखावानू, आलम्ब, पारिजातक, महाभाग पर्वत, महामुनि मार्कण्डेय, पवित्रपाणि, सावर्ण, भालुकि, गालव, जंघाबन्धु, रैभ्य, कोपवेग, भृगु, हरिबभ्रु, कौण्डिन्य, बभ्रुमाली, सनातन, काक्षीवान्ू, औशिज, नाचिकेत, गौतम, पैंगय, वराह, शुनक (द्वितीय), महातपस्वी शाण्डिल्य, कुक्कुर, वेणुजंघ, कालाप तथा कठ आदि धर्मज्ञ, जितात्मा और जितेन्द्रिय मुनि उस सभामें विराजते थे || १०-- १८ || एते चान्ये च बहवो वेदवेदाड्गपारगा: । उपासते महात्मानं सभायामृषिसत्तमा:,ये तथा और भी वेद-वेदांगोंके पारंगत बहुत-से मुनिश्रेष्ठ उस सभामें महात्मा युधिष्ठिरके पास बैठा करते थे
ସେହି ରାଜସଭାରେ ବେଦ ଓ ବେଦାଙ୍ଗରେ ପାରଙ୍ଗତ, ଜିତାତ୍ମା ଓ ଜିତେନ୍ଦ୍ରିୟ, ଧର୍ମଜ୍ଞ ଓ ଶୁଚି ଅନେକ ଋଷିଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆସୀନ ଥିଲେ ଏବଂ ମହାତ୍ମା ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଉପାସନା କରୁଥିଲେ। ଏହି ଦୃଶ୍ୟ ଦର୍ଶାଏ—ଯେତେବେଳେ ବିଦ୍ୟା, ସଂଯମ ଓ ଆଧ୍ୟାତ୍ମିକ ପ୍ରାମାଣ୍ୟକୁ ସାର୍ବଜନୀନ ଜୀବନର କେନ୍ଦ୍ରରେ ସମ୍ମାନ ମିଳେ, ସେତେବେଳେ ଧର୍ମାଧିଷ୍ଠିତ ରାଜ୍ୟ ଅଧିକ ସୁଦୃଢ଼ ହୁଏ।
Verse 20
कथयन्तः कथा: पुण्या धर्मज्ञा: शुचयो5मला: । तथैव क्षत्रियश्रेष्ठा धर्मराजमुपासते,वे धर्मज्ञ, पवित्रात्मा और निर्मल महर्षि राजा युधिष्ठिरको पवित्र कथाएँ सुनाया करते थे। इसी प्रकार क्षत्रियोंमें श्रेष्ठ नरेश भी वहाँ धर्मराज युधिष्ठिरकी उपासना करते थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଧର୍ମଜ୍ଞ, ଶୁଚି ଓ ନିର୍ମଳ ଋଷିମାନେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ପୁଣ୍ୟ ଓ ପବିତ୍ର କଥାମାନ କହୁଥିଲେ। ସେହିପରି କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନରେଶମାନେ ମଧ୍ୟ ସେବାଭାବ ଓ ବିନୟପୂର୍ଣ୍ଣ ଉପସ୍ଥିତିରେ ଧର୍ମରାଜଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ କରି ସେଠାରେ ରହୁଥିଲେ।
Verse 21
श्रीमान् महात्मा धर्मात्मा मुण्जकेतुर्विवर्धन: । संग्रामजिद् दुर्मुखश्न॒ उग्रसेनश्व॒ वीर्यवान्,श्रीमान् महामना धर्मात्मा मुंजकेतु, विवर्धन, संग्रामजित, दुर्मुख, पराक्रमी उग्रसेन, राजा कक्षसेन, अपराजित क्षेमक, कम्बोजराज कमठ और महाबली कम्पन, जो अकेले ही बल-पौरुषसम्पन्न, अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा अमिततेजस्वी यवनोंको सदा उसी प्रकार कँपाते रहते थे, जैसे वज्रधारी इन्द्रने कालकेय नामक असुरोंको कम्पित किया था। (ये सभी नरेश धर्मराज युधिष्ठिरकी उपासना करते रहते थे)
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେଠାରେ ମୁଞ୍ଜକେତୁ, ବିବର୍ଧନ, ସଙ୍ଗ୍ରାମଜିତ, ଦୁର୍ମୁଖ ଏବଂ ପରାକ୍ରମୀ ଉଗ୍ରସେନ ପ୍ରମୁଖ ଶ୍ରୀସମ୍ପନ୍ନ, ମହାତ୍ମା ଓ ଧର୍ମାତ୍ମା ରାଜାମାନେ ଥିଲେ। ସେମାନେ ବଳ-ପୌରୁଷରେ ସମ୍ପନ୍ନ, ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାରେ ନିପୁଣ, ଅମିତତେଜସ୍ବୀ; ବଜ୍ରଧାରୀ ଇନ୍ଦ୍ର ଯେପରି ପୂର୍ବେ କାଳକେୟ ଅସୁରମାନଙ୍କୁ କମ୍ପିତ କରିଥିଲେ, ସେପରି ସେମାନେ ଯବନମାନଙ୍କୁ ସଦା କମ୍ପାଇ ରଖୁଥିଲେ। ଏହି ସମସ୍ତ ନରେଶ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଉପାସନା କରୁଥିଲେ।
Verse 22
कक्षसेन: क्षितिपति: क्षेमकश्चापराजित: । कम्बोजराज: कमठ: कम्पनश्न महाबल:,श्रीमान् महामना धर्मात्मा मुंजकेतु, विवर्धन, संग्रामजित, दुर्मुख, पराक्रमी उग्रसेन, राजा कक्षसेन, अपराजित क्षेमक, कम्बोजराज कमठ और महाबली कम्पन, जो अकेले ही बल-पौरुषसम्पन्न, अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा अमिततेजस्वी यवनोंको सदा उसी प्रकार कँपाते रहते थे, जैसे वज्रधारी इन्द्रने कालकेय नामक असुरोंको कम्पित किया था। (ये सभी नरेश धर्मराज युधिष्ठिरकी उपासना करते रहते थे)
କ୍ଷିତିପତି କକ୍ଷସେନ, ଅପରାଜିତ କ୍ଷେମକ, କମ୍ବୋଜରାଜ କମଠ ଏବଂ ମହାବଳୀ କମ୍ପନ—ତଥା ମୁଞ୍ଜକେତୁ ପ୍ରମୁଖ ଅନ୍ୟ ଶ୍ରୀସମ୍ପନ୍ନ, ମହାମନା ଓ ଧର୍ମାତ୍ମା ନରେଶମାନେ—ସମସ୍ତେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ନିତ୍ୟ ଉପାସନା କରୁଥିଲେ। ତାଙ୍କର ଅଟଳ ନିଷ୍ଠା ଦର୍ଶାଏ ଯେ ସତ୍ୟ ସାର୍ବଭୌମତ୍ୱ ଧର୍ମରେ ଭିତ୍ତିକୃତ, ଏବଂ ନ୍ୟାୟବାନ ଓ ସଂଯମୀ ରାଜାଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ କଲେ ତାହା ଅଧିକ ସୁଦୃଢ଼ ହୁଏ।
Verse 23
सततं कम्पयामास यवनानेक एव यः । बलपौरुषसम्पन्नान् कृतास्त्राममितौजस: । यथासुरान् कालकेयान् देवो वज्रधरस्तथा,श्रीमान् महामना धर्मात्मा मुंजकेतु, विवर्धन, संग्रामजित, दुर्मुख, पराक्रमी उग्रसेन, राजा कक्षसेन, अपराजित क्षेमक, कम्बोजराज कमठ और महाबली कम्पन, जो अकेले ही बल-पौरुषसम्पन्न, अस्त्रविद्याके ज्ञाता तथा अमिततेजस्वी यवनोंको सदा उसी प्रकार कँपाते रहते थे, जैसे वज्रधारी इन्द्रने कालकेय नामक असुरोंको कम्पित किया था। (ये सभी नरेश धर्मराज युधिष्ठिरकी उपासना करते रहते थे)
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେ ଏକା ହିଁ ଅନେକ ଯବନଙ୍କୁ ସତତ କମ୍ପାଇ ରଖୁଥିଲା—ଯେମାନେ ବଳ-ପୌରୁଷରେ ସମ୍ପନ୍ନ, ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାରେ ପ୍ରଶିକ୍ଷିତ ଓ ଅମିତଔଜସ୍ବୀ—ଯେପରି ବଜ୍ରଧାରୀ ଇନ୍ଦ୍ର କାଳକେୟ ଅସୁରମାନଙ୍କୁ କମ୍ପିତ କରିଥିଲେ। ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଉପାସନା କରୁଥିବାମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମୁଞ୍ଜକେତୁ, ବିବର୍ଧନ, ସଙ୍ଗ୍ରାମଜିତ, ଦୁର୍ମୁଖ, ପରାକ୍ରମୀ ଉଗ୍ରସେନ, ରାଜା କକ୍ଷସେନ, ଅପରାଜିତ କ୍ଷେମକ, କମ୍ବୋଜରାଜ କମଠ ଏବଂ ମହାବଳୀ କମ୍ପନ ମଧ୍ୟ ଥିଲେ।
Verse 24
जटासुरो मद्रकाणां च राजा कुन्ति: पुलिन्दश्च॒ किरातराज: । तथा<<ड्रवाज्ौ सह पुण्ड्रकेण पाण्ड्योड्रराजौ च सहान्ध्रकेण
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଜଟାସୁର, ମଦ୍ରକମାନଙ୍କ ରାଜା; କୁନ୍ତି, ପୁଲିନ୍ଦମୁଖ୍ୟ ଓ କିରାତରାଜା; ତଥା ପୁଣ୍ଡ୍ରନୃପ ସହ ଦ୍ରବାଜମାନେ, ଏବଂ ଆନ୍ଧ୍ରନୃପ ସହ ପାଣ୍ଡ୍ୟ ଓ ଉଡ୍ର ରାଜାମାନେ—ସମସ୍ତେ ସେଠାରେ ସମବେତ ଥିଲେ।
Verse 25
अड्ढो वड्ढः सुमित्रश्न शैब्यश्चामित्रकर्शन: । किरातराज: सुमना यवनाधिपतिस्तथा
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଅଡ୍ଢ, ବଡ୍ଢ, ସୁମିତ୍ରଶ୍ନ ଓ ଶୈବ୍ୟ—ଶତ୍ରୁଦମନକାରୀ; ସହିତ କିରାତରାଜ ସୁମନା, ଏବଂ ଯବନାଧିପତି ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଥିଲେ।
Verse 26
चाणूरो देवरातश्न भोजो भीमरथश्न यः । श्रुतायुधश्न॒ कालिड्रो जयसेनश्व॒ मागध:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଚାଣୂର, ଦେବରାତ, ଭୋଜ, ଭୀମରଥ; ଶ୍ରୁତାୟୁଧ, କାଲିଡ୍ର, ଜୟସେନ, ଏବଂ ମାଗଧ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଥିଲେ।
Verse 27
सुकर्मा चेकितानश्व पुरुश्चामित्रकर्शन: । केतुमान् वसुदानश्च वैदेहो&थ कृतक्षण:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସୁକର୍ମା, ଚେକିତାନଶ୍ୱ, ଏବଂ ପୁରୁ—ଶତ୍ରୁନିଗ୍ରାହକ; ତଥା କେତୁମାନ ଓ ବସୁଦାନ; ଏବଂ ପରେ ବିଦେହର ରାଜକୁମାର କୃତକ୍ଷଣ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଥିଲେ।
Verse 28
सुधर्मा चानिरुद्धश्न श्रुतायुश्न महाबल: । अनूपराजो दुर्धर्ष: क्रमजिच्च सुदर्शन:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସୁଧର୍ମା ଓ ଅନିରୁଦ୍ଧ; ମହାବଳୀ ଶ୍ରୁତାୟୁ; ଦୁର୍ଧର୍ଷ ଅନୂପରାଜ; କ୍ରମଜିତ; ଏବଂ ସୁଦର୍ଶନ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଥିଲେ।
Verse 29
शिशुपाल: सहसुतः करूषाधिपतिस्तथा । वृष्णीनां चैव दुर्धर्षा: कुमारा देवरूपिण:
ଶିଶୁପାଳ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ, ଏବଂ କରୂଷର ଅଧିପତି ମଧ୍ୟ; ତଥା ବୃଷ୍ଣିବଂଶର ଦୁର୍ଧର୍ଷ, ଦେବରୂପ ରାଜକୁମାରମାନେ—ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଥିଲେ।
Verse 30
आहुको विपृथुश्चैव गद: सारण एव च । अक्रूरः कृतवर्मा च सत्यकश्न शिने: सुत:
ଆହୁକ, ବିପୃଥୁ ଓ ଗଦ; ତଥା ସାରଣ; ଅକ୍ରୂର; କୃତବର୍ମା; ଏବଂ ଶିନିଙ୍କ ପୁତ୍ର ସତ୍ୟକ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଥିଲେ।
Verse 31
भीष्मको<थाकृतिश्रैव द्युमत्सेनश्व वीर्यवान् । केकयाश्न महेष्वासा यज्ञसेनश्षु सौमकि:
ଭୀଷ୍ମକ ଓ ଆକୃତି; ପରାକ୍ରମୀ ଦ୍ୟୁମତ୍ସେନ; ମହାଧନୁର୍ଧର କେକୟମାନେ; ଏବଂ ସୋମକବଂଶୀ ଯଜ୍ଞସେନ—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଥିଲେ।
Verse 32
केतुमान् वसुमांश्वैव कृतास्त्रश्न महाबल: । एते चान्ये च बहव: क्षत्रिया मुख्यसम्मता:
କେତୁମାନ ଓ ବସୁମାନ; ତଥା ଅସ୍ତ୍ରବିଦ୍ୟାରେ ପାରଙ୍ଗତ ମହାବଳୀ ଯୋଦ୍ଧା—ଏମାନେ ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଅନେକ, ମୁଖ୍ୟ ବୋଲି ସ୍ୱୀକୃତ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନେ ସେଠାରେ ଥିଲେ।
Verse 33
उपासते सभायां सम कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् । इनके सिवा जटासुर, मद्रराज शल्य, राजा कुन्तिभोज, किरातराज पुलिन्द, अंगराज, वंगराज, पुण्ड्रक, पाण्ड्य, उड़्राज, आन्ध्रनरेश, अंग, वंग, सुमित्र, शत्रुसूदन शैब्य, किरातराज सुमना, यवननरेश, चाणूर, देवरात, भोज, भीमरथ, कलिंगराज श्रुतायुध, मगधदेशीय जयसेन, सुकर्मा, चेकितान, शत्रुसंहारक पुरु, केतुमानू, वसुदान, विदेहराज कृतक्षण, सुधर्मा, अनिरुद्ध, महाबली श्रुतायु, दुर्धर्ष वीर अनूपराज, क्रमजित्, सुदर्शन, पुत्रसहित शिशुपाल, करूषराज दन्तवक्त्र, वृष्णिवंशियोंके देवस्वरूप दुर्धर्ष राजकुमार, आहुक, विपृथु, गद, सारण, अक्रूर, कृतवर्मा, शिनिपुत्र सत्यक, भीष्मक, आकृति, पराक्रमी द्ुमत्सेन, महान् धनुर्धर केकयराजकुमार, सोमक-पौत्र द्रुपद, केतुमान् (द्वितीय) तथा अस्त्रविद्यामें निपुण महाबली वसुमान--ये तथा और भी बहुत-से प्रधान क्षत्रिय उस सभामें कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरकी सेवामें बैठते थे || २४--३२ ह ।। अर्जुन ये च संश्रित्य राजपुत्रा महाबला:,जो महाबली राजकुमार अर्जुनके पास रहकर कृष्णमृगचर्म धारण किये धरनुर्वेदकी शिक्षा लेते थे (वे भी उस सभाभवनमें बैठकर राजा युधिष्ठिरकी उपासना करते थे)। राजन! वृष्णिवंशको आनन्दित करनेवाले राजकुमारोंको वहीं शिक्षा मिली थी
ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ସେହି ସଭାରେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି ଉପାସନା କରୁଥିଲେ। ସେଠାରେ ମଦ୍ରରାଜ ଶଲ୍ୟ, କୁନ୍ତିଭୋଜ ରାଜା, କିରାତରାଜ ପୁଲିନ୍ଦ, ଅଙ୍ଗରାଜ, ବଙ୍ଗରାଜ, ପୁଣ୍ଡ୍ରକ, ପାଣ୍ଡ୍ୟ, ଉଡ୍ରରାଜ, ଆନ୍ଧ୍ରନରେଶ; ଅଙ୍ଗ, ବଙ୍ଗ, ସୁମିତ୍ର, ଶତ୍ରୁସୂଦନ ଶୈବ୍ୟ, କିରାତରାଜ ସୁମନା, ଯବନନରେଶ; ଚାଣୂର, ଦେବରାତ, ଭୋଜ, ଭୀମରଥ; କଳିଙ୍ଗରାଜ ଶ୍ରୁତାୟୁଧ, ମଗଧଦେଶୀୟ ଜୟସେନ; ସୁକର୍ମା, ଚେକିତାନ, ଶତ୍ରୁସଂହାରକ ପୁରୁ; କେତୁମାନ, ବସୁଦାନ, ବିଦେହରାଜ କୃତକ୍ଷଣ; ସୁଧର୍ମା, ଅନିରୁଦ୍ଧ, ମହାବଳୀ ଶ୍ରୁତାୟୁ; ଦୁର୍ଧର୍ଷ ଅନୂପରାଜ, କ୍ରମଜିତ୍, ସୁଦର୍ଶନ; ପୁତ୍ରସହିତ ଶିଶୁପାଳ, କରୂଷରାଜ ଦନ୍ତବକ୍ତ୍ର; ବୃଷ୍ଣିବଂଶର ଦେବରୂପ ଦୁର୍ଧର୍ଷ ରାଜକୁମାରମାନେ; ଆହୁକ, ବିପୃଥୁ, ଗଦ, ସାରଣ, ଅକ୍ରୂର, କୃତବର୍ମା, ଶିନିପୁତ୍ର ସତ୍ୟକ; ଭୀଷ୍ମକ, ଆକୃତି, ପରାକ୍ରମୀ ଦ୍ୟୁମତ୍ସେନ; ମହାଧନୁର୍ଧର କେକୟ; ସୋମକ-ପୌତ୍ର ଦ୍ରୁପଦ; ଏବଂ (ଦ୍ୱିତୀୟ) କେତୁମାନ ଓ ମହାବଳୀ ବସୁମାନ—ଏମାନେ ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଅନେକ ପ୍ରଧାନ କ୍ଷତ୍ରିୟ ସେଠାରେ ବସିଥିଲେ। ଏବଂ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ଆଶ୍ରୟ ନେଇ, କୃଷ୍ଣମୃଗଚର୍ମ ଧାରଣ କରି ଧନୁର୍ବେଦରେ ଶିକ୍ଷା ଗ୍ରହଣ କରୁଥିବା ମହାବଳ ରାଜପୁତ୍ରମାନେ ମଧ୍ୟ ସେହି ସଭାଗୃହରେ ବସି ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ସେବା-ଉପାସନା କରୁଥିଲେ। ଏଭଳି ଧର୍ମାଧୀନ ରାଜତ୍ୱ ତଳେ ସେହି ସଭା ରାଜନୀତିକ ନିଷ୍ଠା, ସାର୍ବଭୌମତ୍ୱର ସ୍ୱୀକୃତି ଓ ଯୋଦ୍ଧାଶିକ୍ଷାର ଶାସନ—ସବୁର ସଙ୍ଗମ ହୋଇ ଦେଖାଗଲା।
Verse 34
अशिक्षन्त थनुर्वेदे रौरवाजिनवासस: । तत्रैव शिक्षिता राजन् कुमारा वृष्णिनन्दना:,जो महाबली राजकुमार अर्जुनके पास रहकर कृष्णमृगचर्म धारण किये धरनुर्वेदकी शिक्षा लेते थे (वे भी उस सभाभवनमें बैठकर राजा युधिष्ठिरकी उपासना करते थे)। राजन! वृष्णिवंशको आनन्दित करनेवाले राजकुमारोंको वहीं शिक्षा मिली थी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରୌରବ ମୃଗଚର୍ମ ପରିଧାନ କରି ସେମାନେ ସେଠାରେ ଧନୁର୍ବେଦ ଶିକ୍ଷା ଗ୍ରହଣ କରୁଥିଲେ। ହେ ରାଜନ! ବୃଷ୍ଣିବଂଶକୁ ଆନନ୍ଦିତ କରୁଥିବା ରାଜକୁମାରମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଯଥାବିଧି ଶିକ୍ଷା ପାଇଥିଲେ।
Verse 35
रौक्मिणेयश्व साम्बश्न युयुधानश्व सात्यकि: । सुधर्मा चानिरुद्धश्न शैब्यश्न नरपुड्व:,रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न, जाम्बवतीकुमार साम्ब, सत्यकपुत्र (सात्यकि) युयुधान, सुधर्मा, अनिरुद्ध, नरश्रेष्ठ शैब्य--ये और दूसरे भी बहुत-से राजा उस सभामें बैठते थे। पृथ्वीपते! अर्जुनके सखा तुम्बुरु गन्धर्व भी उस सभामें नित्य विराजमान होते थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରୁକ୍ମିଣୀନନ୍ଦନ ପ୍ରଦ୍ୟୁମ୍ନ, ଜାମ୍ବବତୀପୁତ୍ର ସାମ୍ବ, ସତ୍ୟକପୁତ୍ର ଯୁୟୁଧାନ (ସାତ୍ୟକି), ସୁଧର୍ମା, ଅନିରୁଦ୍ଧ ଓ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ଶୈବ୍ୟ—ଏମାନେ ଏବଂ ଅନ୍ୟ ଅନେକ ରାଜା ସେହି ସଭାରେ ବସୁଥିଲେ। ଏବଂ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ସଖା ଗନ୍ଧର୍ବ ତୁମ୍ବୁରୁ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ନିତ୍ୟ ବିରାଜମାନ ଥିଲେ।
Verse 36
एते चान्ये च बहवो राजान: पृथिवीपते । धनंजयसखा चात्र नित्यमास्ते सम तुम्बुरु:,रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न, जाम्बवतीकुमार साम्ब, सत्यकपुत्र (सात्यकि) युयुधान, सुधर्मा, अनिरुद्ध, नरश्रेष्ठ शैब्य--ये और दूसरे भी बहुत-से राजा उस सभामें बैठते थे। पृथ्वीपते! अर्जुनके सखा तुम्बुरु गन्धर्व भी उस सभामें नित्य विराजमान होते थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପୃଥିବୀପତେ! ଏମାନେ ଓ ଅନ୍ୟ ଅନେକ ରାଜା ସେହି ସଭାରେ ବସୁଥିଲେ; ଏବଂ ସେଠାରେ ଧନଞ୍ଜୟ (ଅର୍ଜୁନ)ଙ୍କ ସଖା ଗନ୍ଧର୍ବ ତୁମ୍ବୁରୁ ମଧ୍ୟ ନିତ୍ୟ ଉପସ୍ଥିତ ଥିଲେ।
Verse 37
उपासते महात्मानमासीनं सप्तविंशति: । चित्रसेन: सहामात्यो गन्धर्वाप्सरसस्तथा,मन्त्रीसहित चित्रसेन आदि सत्ताईस गन्धर्व और अप्सराएँ सभामें बैठे हुए महात्मा युधिष्ठिरकी उपासना करती थीं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସଭାରେ ଆସୀନ ମହାତ୍ମା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଚିତ୍ରସେନ ନିଜ ମନ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କ ସହ, ସତ୍ତାଇଶ ଗନ୍ଧର୍ବ ଓ ଅପ୍ସରାମାନେ ଭକ୍ତିପୂର୍ବକ ଉପାସନା କରୁଥିଲେ।
Verse 38
गीतवादित्रकुशला: साम्यतालविशारदा: । प्रमाणे5थ लये स्थाने किन्नरा: कृतनिश्रमा:,गाने-बजानेमें कुशल, साम्य5 और तालकेः विशेषज्ञ तथा प्रमाण, लय और स्थानकी जानकारीके लिये विशेष परिश्रम किये हुए मनस्वी किन्नर तुम्बुरुकी आज्ञासे वहाँ अन्य गन्धर्वोके साथ दिव्य तान छेड़ते हुए यथोचित रीतिसे गाते और पाण्डवों तथा महर्षियोंका मनोरंजन करते हुए धर्मराजकी उपासना करते थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଗୀତ ଓ ବାଦ୍ୟରେ କୁଶଳ, ସାମ୍ୟ ଓ ତାଳରେ ପାରଙ୍ଗତ, ଏବଂ ପ୍ରମାଣ, ଲୟ, ସ୍ଥାନ ବିଷୟରେ ବିଶେଷ ପରିଶ୍ରମରେ ସିଦ୍ଧ କିନ୍ନରମାନେ ତୁମ୍ବୁରୁଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ସେଠାରେ ଅନ୍ୟ ଗନ୍ଧର୍ବମାନଙ୍କ ସହ ଦିବ୍ୟ ତାନ ଉଦ୍ଘାଟନ କରି ଯଥୋଚିତ ରୀତିରେ ଗାଇଥିଲେ। ପାଣ୍ଡବମାନେ ଓ ମହର୍ଷିମାନଙ୍କୁ ଆନନ୍ଦ ଦେଇ, ସେହି ସେବା ଦ୍ୱାରା ଧର୍ମରାଜଙ୍କୁ ଶ୍ରଦ୍ଧାପୂର୍ବକ ଉପାସନା କରୁଥିଲେ।
Verse 39
संचोदितास्तुम्बुरुणा गन्धर्वसहितास्तदा । गायन्ति दिव्यतानैस्ते यथान्यायं मनस्विन: । पाण्डुपुत्रानृषीश्वैव रमयन्त उपासते,गाने-बजानेमें कुशल, साम्य5 और तालकेः विशेषज्ञ तथा प्रमाण, लय और स्थानकी जानकारीके लिये विशेष परिश्रम किये हुए मनस्वी किन्नर तुम्बुरुकी आज्ञासे वहाँ अन्य गन्धर्वोके साथ दिव्य तान छेड़ते हुए यथोचित रीतिसे गाते और पाण्डवों तथा महर्षियोंका मनोरंजन करते हुए धर्मराजकी उपासना करते थे
ତେବେ ତୁମ୍ବୁରୁଙ୍କ ପ୍ରେରଣାରେ, ଗନ୍ଧର୍ବମାନଙ୍କ ସହିତ ସେଇ ଉଚ୍ଚମନସ୍କ କଳାକାରମାନେ ଦିବ୍ୟ ତାନରେ ଶାସ୍ତ୍ରସମ୍ମତ ରୀତିଅନୁସାରେ ଗାନ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ। ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଓ ମହର୍ଷିମାନଙ୍କୁ ଆନନ୍ଦ ଦେଇ, ସୁସଂସ୍କୃତ ସଙ୍ଗୀତ ଓ ଶିଷ୍ଟବଦ୍ଧ ପ୍ରଦର୍ଶନ ଦ୍ୱାରା ସେମାନେ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ସେବା-ଉପାସନା କରୁଥିଲେ।
Verse 40
तस्यां सभायामासीना: सुव्रता: सत्यसंगरा: । दिवीव देवा ब्रह्माणं युधिष्ठिरमुपासते,जैसे देवतालोग दिव्यलोककी सभामें ब्रह्माजीकी उपासना करते हैं, उसी प्रकार कितने ही सत्यप्रतिज्ञ और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महापुरुष उस सभामें बैठकर महाराज युधिष्ठिरकी आराधना करते थे
ସେଇ ସଭାରେ ଉତ୍ତମ ବ୍ରତଧାରୀ ଓ ସତ୍ୟପ୍ରତିଜ୍ଞ ଅନେକ ମହାପୁରୁଷ ଆସୀନ ଥିଲେ। ଯେପରି ଦେବଲୋକର ସଭାରେ ଦେବମାନେ ବ୍ରହ୍ମାଙ୍କୁ ଉପାସନା କରନ୍ତି, ସେପରି ଧର୍ମର ଅଧିଷ୍ଠାତା ମହାରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ସେମାନେ ସମ୍ମାନରେ ଆରାଧନା ଓ ସେବା କରୁଥିଲେ।
No explicit dharma-saṅkaṭa is staged as a dispute; the ethical focus is normative: how a ruler should inaugurate and legitimize a public institution through generosity, ritual propriety, and inclusive court protocol.
Sovereignty is portrayed as a moral performance anchored in dāna, hospitality, and respect for learned and sacred authority; the sabhā’s splendor is meaningful only when aligned with dharmic order and social responsibility.
A formal phalaśruti is not stated here; the meta-commentary is implicit in the framing similes (Indra/Brahmā): righteous kingship gains cosmic-style legitimacy when public auspiciousness, worship, and ethical distribution are established at the court’s foundation.