
Adhyāya 39: Śiśupāla’s Censure and Bhīma’s Contained Wrath (शिशुपाल-निन्दा तथा भीमक्रोध-निग्रहः)
Upa-parva: Rājasūya-sabhā-vāda (Assembly Disputation in the Rājasūya Context)
This chapter presents a structured exchange in the royal assembly. Śiśupāla opens by praising Jarāsandha’s strength and reframes Kṛṣṇa’s role in Jarāsandha’s death as indirect and therefore, in his rhetoric, ethically or valorously suspect. He emphasizes entry “by a non-gate,” disguise, and brahminical pretext to argue that Kṛṣṇa assessed Jarāsandha’s power through stratagem rather than open contest, and he uses this to question the assembly’s standards of excellence. He then broadens the critique to the Pāṇḍavas’ judgment, implying deviation from the path of the virtuous, and attributes it to their reliance on an elder advisor whose guidance he disparages. Vaiśaṃpāyana narrates the immediate affective consequence: Bhīma’s anger manifests physically (reddened eyes, knitted brow, threatening posture), generating a crisis of decorum. Bhīṣma, acting as senior authority, physically restrains Bhīma and uses varied counsel to calm him, restoring order without immediate punitive action. Śiśupāla remains rhetorically confident, even inviting the audience to witness Bhīma’s defeat by his “splendor,” thereby further testing the assembly’s capacity for restraint. The chapter closes with Bhīṣma addressing Bhīma again, indicating continued management of escalation through institutional authority and speech.
Chapter Arc: राजसूय-यज्ञ के वैभव के बीच युधिष्ठिर की सभा में राजाओं का जमघट है; सहदेव कृष्ण के अर्घ्य-पूजन का प्रस्ताव रखकर सबके सामने एक निर्णायक कसौटी रख देता है। → सहदेव घोषणा करता है कि केशीहन्ता, अप्रमेय-पराक्रमी केशव की पूजा को जो राजा सहन नहीं करेगा, वही उसके द्वारा वध्य होगा—और वह अपना पग ‘बलिनां मूर्ध्नि’ रखने की चुनौती देता है, जिससे मान-अपमान और राज-गौरव की आग भड़क उठती है। → क्रोध से मूर्छित-से अनेक राजा भीतर ही भीतर उबलते हैं, पर सहदेव के निर्भीक वचन और धर्मसम्मत तर्क के सामने कोई प्रतिवाद का साहस नहीं कर पाता; सभा में निर्णायक मौन छा जाता है। → अंततः बुद्धिमान राजा सहदेव के अर्घ्य-निवेदन को अनुमोदित करते हैं—‘अर्च्यमर्चितमर्घाहम्’—और सहदेव के मस्तक पर आकाश से पुष्प-वर्षा होती है; अदृश्य देववाणी ‘साधु, साधु’ कहकर निर्णय को धर्म-समर्थन देती है। → कृष्ण-पूजन की स्वीकृति के साथ ही उन हृदयों में ईर्ष्या और अपमान का बीज पड़ जाता है जो इसे सहन नहीं कर सके—आगामी अध्यायों में वही बीज द्यूत और विनाश की ओर बढ़ेगा।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७२८६ श्लोक मिलाकर कुल ७६१३ “लोक हैं) न२््््स्निताथ् श््यु #ा-ान्तल्स - जिनमें ऋतुधर्म (रजस्वलावस्था)-का प्रादुर्भाव न हुआ हो, उन्हें नग्निका कहते हैं। - मूर्ति या शिवलिंगके आकारका कोई दुर्भेद्य गृह, जो पृथ्वीके भीतर गुफामें बनाया गया हो। शत्रुओंसे आत्मरक्षाकी दृष्टिसे नरकासुरने ऐसे निवासस्थानका निर्माण करा रखा था। - रोहिणीके गद और सारण आदि कई पुत्र थे। एकोनचत्वारिशोड् ध्याय: सहदेवकी राजाओंको चुनौती तथा क्षुब्ध हुए शिशुपाल आदि नरेशोंका युद्धके लिये उद्यत होना वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा ततो भीष्मो विरराम महाबल: । व्याजहारीत्तरं तत्र सहदेवो<र्थवद् वच:,वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! ऐसा कहकर महाबली भीष्म चुप हो गये। तत्पश्चात् माद्रीकुमार सहदेवने शिशुपालकी बातोंका मुँहतोड़ उत्तर देते हुए यह सार्थक बात कही--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ଏପରି କହି ମହାବଳୀ ଭୀଷ୍ମ ନିରବ ହେଲେ। ତାପରେ ସେଠାରେ ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର ସହଦେବ ଶିଶୁପାଳଙ୍କ କଥାକୁ ସିଧାସଳଖ ପ୍ରତିଉତ୍ତର ଦେଇ ଅର୍ଥବତୀ ଓ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବାଣୀ କହିଲେ।
Verse 2
केशवं केशिहन्तारमप्रमेयपराक्रमम् । पूज्यमानं मया यो व: कृष्णं न सहते नृपा:,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
ହେ ରାଜମାନେ! କେଶୀ ଦୈତ୍ୟବଧକ, ଅପ୍ରମେୟ ପରାକ୍ରମଶାଳୀ କେଶବ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ମୁଁ ଯେ ପୂଜା କରିଛି, ତାହାକୁ ତୁମମଧ୍ୟରୁ ଯେ କେହି ସହିପାରେ ନାହିଁ—ସେଇ ମୋ ହାତରେ ବଧଯୋଗ୍ୟ ହେବ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 3
सर्वेषां बलिनां मूर्थ्नि मयेदं निहितं पदम् । एवमुक्ते मया सम्यगुत्तरं प्रत्रवीतु सः,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
ହେ ରାଜମାନେ! କେଶୀହନ୍ତା, ଅନନ୍ତ ପରାକ୍ରମଶାଳୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ମୁଁ କରିଥିବା ପୂଜାକୁ ଯେମାନେ ସହିପାରୁନାହାନ୍ତି, ସେମାନଙ୍କ ସମସ୍ତ ବଳବାନଙ୍କ ମୁଣ୍ଡ ଉପରେ ମୁଁ ମୋ ପାଦ ରଖିଦେଇଛି ବୋଲି ଜାଣ। ଏହା ମୁଁ ଭଲଭାବେ ଭାବି କହିଛି। ଯେ ଉତ୍ତର ଦେବାକୁ ଚାହେ, ସେ ସାମ୍ନାକୁ ଆସୁ; ସେଇ ମୋ ହାତରେ ବଧଯୋଗ୍ୟ ହେବ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 4
मतिमन्तश्न ये केचिदाचार्य पितरं गुरुम्,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
ହେ ରାଜମାନେ! ତୁମମଧ୍ୟରୁ ଯେ କେହି—ଯେତେ ବୁଦ୍ଧିମାନ୍ ହେଉନାହିଁ—ମୋ ଦ୍ୱାରା ପୂଜିତ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ସମ୍ମାନକୁ ସହିପାରେ ନାହିଁ ଏବଂ ତାହାର ବିରୋଧରେ ଦାଁଡାଏ, ସେଇ ମୋ ହାତରେ ବଧଯୋଗ୍ୟ ହେବ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 5
ततो न व्याजहारैषां कक्रिद् बुद्धिमतां सताम्,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ସେହି ବୁଦ୍ଧିମାନ ଓ ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କେହି ମଧ୍ୟ ପ୍ରତିଉତ୍ତର ଦେଲେ ନାହିଁ। କାରଣ ଯେ କେହି ଉତ୍ତର ଦେବାକୁ ଆଗେଇ ଆସେ, ସେ ଏହି କ୍ରିୟାରେ ମୋ ଦ୍ୱାରା ବଧଯୋଗ୍ୟ ହୋଇଯାଏ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 6
ततो<5पतत् पुष्पवृष्टि: सहदेवस्य मूर्थनि,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
ତାପରେ ସହଦେବଙ୍କ ମୁଣ୍ଡ ଉପରେ ପୁଷ୍ପବୃଷ୍ଟି ପଡ଼ିଲା। ସହଦେବ କହିଲେ—“ହେ ରାଜମାନେ! କେଶୀ ଦୈତ୍ୟବଧକ, ଅନନ୍ତ-ପରାକ୍ରମୀ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ମୁଁ ଯେ ପୂଜା କରିଛି, ତାହା ଯେ ସହି ପାରେ ନାହିଁ, ସେହି ସମସ୍ତ ବଲବାନଙ୍କ ମସ୍ତକ ଉପରେ ମୁଁ ମୋ ପାଦ ରଖିଛି। ଭଲଭାବେ ବିଚାର କରି ଏହି କଥା କହିଛି। ଯେ ଉତ୍ତର ଦେବାକୁ ଚାହେ, ସେ ସାମ୍ନାକୁ ଆସୁ; ସେ ମୋ ଦ୍ୱାରା ବଧଯୋଗ୍ୟ ହେବ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 7
आविध्यदजितं कृष्णं भविष्यद्भूतजल्पक:,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है तदनन्तर कभी पराजित न होनेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाके ज्ञाता, भूत, वर्तमान और भविष्य--तीनों कालोंकी बातें बतानेवाले, सब लोगोंके सभी संशयोंका निवारण करनेवाले तथा सम्पूर्ण लोकोंसे परिचित देवर्षि नारद समस्त उपस्थित प्राणियोंके बीच स्पष्ट शब्दोंमें बोले--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଭୂତ ଓ ଭବିଷ୍ୟତ କଥା କହୁଥିବା ସେ ଋଷି ଅଜିତ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ କଟୁକଥାରେ ଆଘାତ କରି କହିଲେ—“ସେଇ ମୋ ଦ୍ୱାରା ବଧଯୋଗ୍ୟ ହେବ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।” ତାପରେ କେବେ ପରାଜିତ ନ ହେବା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ମହିମାଜ୍ଞ, ଭୂତ-ବର୍ତ୍ତମାନ-ଭବିଷ୍ୟତବିଦ୍, ସମସ୍ତଙ୍କ ସନ୍ଦେହ ନିବାରକ ଏବଂ ସର୍ବଲୋକପରିଚିତ ଦେବର୍ଷି ନାରଦ, ସମବେତ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସ୍ପଷ୍ଟ ଶବ୍ଦରେ କହିଲେ।
Verse 8
सर्वसंशयनिर्मोक्ता नारद: सर्वलोकवित् | उवाचाखिलभूतानां मध्ये स्पष्टतरं वच:,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है तदनन्तर कभी पराजित न होनेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाके ज्ञाता, भूत, वर्तमान और भविष्य--तीनों कालोंकी बातें बतानेवाले, सब लोगोंके सभी संशयोंका निवारण करनेवाले तथा सम्पूर्ण लोकोंसे परिचित देवर्षि नारद समस्त उपस्थित प्राणियोंके बीच स्पष्ट शब्दोंमें बोले--
ସମସ୍ତ ସନ୍ଦେହ ନିବାରକ ଏବଂ ସର୍ବଲୋକବିଦ୍ ନାରଦ, ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅଧିକ ସ୍ପଷ୍ଟ ଭାବେ କଥା କହିଲେ।
Verse 9
कृष्णं कमलपत्राक्षं नार्चयिष्यन्ति ये नरा: । जीवन्मृतास्तु ते ज्ञेया न सम्भाष्या: कदाचन,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है “जो मानव कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा नहीं करेंगे, वे जीते-जी ही मृतक- तुल्य समझे जायँगे। ऐसे लोगोंसे कभी बातचीत नहीं करनी चाहिये”
“ଯେ ମନୁଷ୍ୟ କମଳପତ୍ରାକ୍ଷ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ପୂଜା କରିବେ ନାହିଁ, ସେମାନେ ଜୀବନ୍ତ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ମୃତ ସମାନ ବୋଲି ଜାଣିବା ଉଚିତ; ଏମାନଙ୍କ ସହ କେବେ ମଧ୍ୟ କଥାବାର୍ତ୍ତା କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।”
Verse 10
वैशम्पायन उवाच पूजयित्वा च पूजाहतनि ब्रद्मक्षत्रविशेषवित् । सहदेवो नृणां देव: समापद्यत कर्म तत्,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! वहाँ आये हुए ब्राह्मणों और क्षत्रियोंमें विशिष्ट व्यक्तियोंको पहचानने-वाले नरदेव सहदेवने क्रमशः पूज्य व्यक्तियोंकी पूजा करके वह अर्घ्यनिवेदनका कार्य पूरा कर दिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପୂଜ୍ୟ ଲୋକମାନଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି ସମ୍ମାନ କରି, ବ୍ରାହ୍ମଣ ଓ କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠଙ୍କୁ ଚିହ୍ନିବାରେ ପାରଦର୍ଶୀ ନରଦେବ ସହଦେବ ସେଇ ଅର୍ଘ୍ୟ-ନିବେଦନ କର୍ମକୁ ସମାପ୍ତ କଲେ। ଏବଂ ଯେ ଏହି (ନିର୍ବାଚିତ ପାତ୍ରଙ୍କ) ସମ୍ମାନ ସହିପାରେ ନାହିଁ, ସେ ନିଶ୍ଚୟ ମୋ ଦ୍ୱାରା ବଧଯୋଗ୍ୟ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।
Verse 11
तस्मिन्नभ्यर्चिते कृष्णे सुनीथ: शत्रुकर्षण: । अतिताम्रेक्षण: कोपादुवाच मनुजाधिपान्,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है इस प्रकार श्रीकृष्णका पूजन सम्पन्न हो जानेपर शत्रुविजयी शिशुपालने क्रोधसे अत्यन्त लाल आँखें करके समस्त राजाओंसे कहा--
ଏପରି ଭାବେ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଯଥାବିଧି ପୂଜା କରାଯାଇଲା ପରେ, ଶତ୍ରୁଦମନକାରୀ ସୁନୀଥପୁତ୍ର ଶିଶୁପାଳ କ୍ରୋଧରେ ଚକ୍ଷୁ ଲାଲ କରି ସମବେତ ରାଜାମାନଙ୍କୁ କହିଲା—“ସେଇ ପୁରୁଷ ମୋ ଦ୍ୱାରା ବଧଯୋଗ୍ୟ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 12
स्थित: सेनापतिर्यो5हं मन्यध्वं कि तु साम्प्रतम् । युधि तिष्ठाम संनहा समेतान् वृष्णिपाण्डवान्,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है 'भूमिपालो! मैं सबका सेनापति बनकर खड़ा हूँ। अब तुमलोग किस चिन्तामें पड़े हो। आओ, हम सब लोग युद्धके लिये सुसज्जित हो पाण्डवों और यादवोंकी सम्मिलित सेनाका सामना करनेके लिये डट जाये
“ହେ ଭୂପାଳମାନେ! ମୁଁ ତୁମମାନଙ୍କ ସେନାପତି ଭାବେ ଏଠାରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ; ତେବେ ଏବେ ତୁମେ କ’ଣ ଭାବୁଛ? ଆସ, ଆମେ ସମସ୍ତେ ଶସ୍ତ୍ରସଜ୍ଜ ହୋଇ ଯୁଦ୍ଧରେ ଦୃଢ଼ ହୋଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ରହିବା, ଏବଂ ବୃଷ୍ଣି ଓ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ସଂଯୁକ୍ତ ସେନାକୁ ସାମ୍ନା କରିବା। ଯେ ମୋ ସମ୍ମୁଖରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହେବ, ସେ ନିଶ୍ଚୟ ମୋ ଦ୍ୱାରା ବଧଯୋଗ୍ୟ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 13
इति सर्वान् समुत्साहा राज्ञस्तांश्चैदिपुड़व: । यज्ञोपघाताय तत: सोअमन्त्रयत राजभि:,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है इस प्रकार उन सब राजाओंको युद्धके लिये उत्साहित करके चेदिराजने युधिष्ठिरके यज्ञमें विघ्न डालनेके उद्देश्यसे राजाओंसे सलाह की। शिशुपालके इस प्रकार बुलानेपर उसके सेनापतित्वमें सुनीथ आदि कुछ प्रमुख नरेशगण चले आये। वे सब-के-सब अत्यन्त क्रोधसे भर रहे थे एवं उनके मुखकी कान्ति बदली हुई दिखायी देती थी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଏପରି ଭାବେ ସେ ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କୁ ଉତ୍ସାହିତ କରି ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଉକ୍ତେଜିତ କରି, ଚେଦିରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଯଜ୍ଞକୁ ବିଘ୍ନ କରିବା ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ରାଜାମାନଙ୍କ ସହ ପରାମର୍ଶ କଲା। ସେ ନିଶ୍ଚୟରେ କହିଲା—“ସେଇ ପୁରୁଷ ମୋ ଦ୍ୱାରା ବଧଯୋଗ୍ୟ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 14
तत्राहूता गता: सर्वे सुनीथप्रमुखा गणा: । समदृश्यन्त संक्रुद्धा विवर्णवदनास्तथा,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है इस प्रकार उन सब राजाओंको युद्धके लिये उत्साहित करके चेदिराजने युधिष्ठिरके यज्ञमें विघ्न डालनेके उद्देश्यसे राजाओंसे सलाह की। शिशुपालके इस प्रकार बुलानेपर उसके सेनापतित्वमें सुनीथ आदि कुछ प्रमुख नरेशगण चले आये। वे सब-के-सब अत्यन्त क्रोधसे भर रहे थे एवं उनके मुखकी कान्ति बदली हुई दिखायी देती थी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ଡାକ ଦିଆଯାଇବା ସହିତ ସୁନୀଥପ୍ରମୁଖ ସମସ୍ତ ଦଳ ସେଠାକୁ ଆସି ପହଞ୍ଚିଲେ। ସେମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧିତ ଦେଖାଯାଉଥିଲେ ଏବଂ ତାଙ୍କର ମୁଖମଣ୍ଡଳ ବିବର୍ଣ୍ଣ ଲାଗୁଥିଲା। (ଶିଶୁପାଳଙ୍କ ଘୋଷଣା ଅଟୁଟ ରହିଲା:) “ସେଇ ପୁରୁଷ ମୋ ଦ୍ୱାରା ବଧଯୋଗ୍ୟ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 15
युधिष्ठिराभिषेकं च वासुदेवस्य चार्हणम् । न स्याद् यथा तथा कार्यमेवं सर्वे तदाब्रुवन्,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है उन सबने यह कहा कि “युधिष्ठिरके अभिषेक और श्रीकृष्णकी पूजाका कार्य सफल न हो, वैसा प्रयत्न करना चाहिये”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତେବେ ସମସ୍ତ ରାଜା କହିଲେ—ଯେପରି ହେଉ, ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଅଭିଷେକ ଓ ବାସୁଦେବଙ୍କ ଅର୍ହଣ ସଫଳ ନ ହେବ, ସେପରି ପ୍ରୟାସ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 16
निष्कर्षन्निश्चयात् सर्वे राजान: क्रोधमूर्छिता: । अब्लुव॑ंस्तत्र राजानो निर्वेदादात्मनिश्चयात्,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है इस निर्णय एवं निष्कर्षपर पहुँचकर वे सभी नरेश क्रोधसे मोहित हो गये। सहदेवकी बातोंसे अपमानका अनुभव करके अपनी शक्तिकी प्रबलताका विश्वास करके राजाओंने उपर्युक्त बातें कही थीं
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଦୃଢ଼ ନିଷ୍କର୍ଷକୁ ପହଞ୍ଚି ସମସ୍ତ ରାଜା କ୍ରୋଧରେ ମୂର୍ଛିତ ହୋଇ ସେଠାରେ କହିଲେ। ଅପମାନରେ ଦଗ୍ଧ ହୋଇ ଓ ନିଜ ବଳ-ନିଶ୍ଚୟରେ ଭରସା କରି ସେମାନେ କହିଲେ—“ସେ ନିଶ୍ଚୟ ମୋ ହାତରେ ବଧ ହେବ; ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 17
सुहृद्धिवार्यमाणानां तेषां हि वपुराबभौ । आमिषादपकृष्टानां सिंहानामिव गर्जताम्,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସୁହୃଦମାନେ ରୋକୁଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କ ଦେହ କ୍ରୋଧରେ ଜ୍ୱଳି ଉଠିଲା; ଯେପରି ଆହାରରୁ ଟାଣି ନେଇଯାଇଥିବା ଗର୍ଜନ କରୁଥିବା ସିଂହ। ଏବଂ ସେ କହିଲା—“ଏହି ଆହ୍ୱାନକୁ ଯେ କେହି ପ୍ରତିଉତ୍ତର ଦେବ, ସେ ନିଶ୍ଚୟ ମୋ ହାତରେ ବଧ ହେବ; ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 18
अपने सगे-सम्बन्धियोंके मना करनेपर भी उनका क्रोधसे तमतमाता हुआ शरीर उन सिंहोंके समान सुशोभित हुआ, जो मांससे वंचित कर दिये जानेके कारण दहाड़ रहे हों। त॑ बलौघमपर्यन्तं राजसागरमक्षयम् | कुर्वाणं समयं कृष्णो युद्धाय बुबुधे तदा,स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है राजाओंका वह समुदाय अक्षय समुद्रकी भाँति उमड़ रहा था। उसका कहीं अन्त नहीं दिखायी देता था। सेनाएँ ही उसकी अपार जलराशि थीं। उसे इस प्रकार शपथ करते देख भगवान् श्रीकृष्णने यह समझ लिया कि अब ये नरेश युद्धके लिये तैयार हैं
ସ୍ୱଜନମାନେ ମନା କରିଲେ ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କ ଦେହ କ୍ରୋଧରେ ରକ୍ତିମ ହୋଇ କମ୍ପି ଉଠିଲା; ଯେପରି ମାଂସରୁ ବଞ୍ଚିତ ସିଂହ ଗର୍ଜନ କରେ। ରାଜାମାନଙ୍କ ସେ ଦଳ ଅକ୍ଷୟ ସମୁଦ୍ର ପରି ଉମଡ଼ି ପଡ଼ୁଥିଲା—ତାହାର ଅନ୍ତ ଦିଶୁନଥିଲା; ସେନାମାନେ ହିଁ ତାହାର ଅପାର ଜଳରାଶି। ଏପରି ଶପଥ ଓ ଆହ୍ୱାନ କରୁଥିବାକୁ ଦେଖି ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ବୁଝିଲେ—ଏହି ନରେଶମାନେ ଏବେ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ କୃତନିଶ୍ଚୟ।
Verse 19
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
“ସେ ନିଶ୍ଚୟ ମୋ ହାତରେ ବଧ ହେବ; ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 20
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ସେଇ ପୁରୁଷଟି ମୋ ହାତରେ ନିଶ୍ଚୟ ନିହତ ହେବ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। ହେ ରାଜମାନେ! କେଶୀ ଦୈତ୍ୟବଧକାରୀ ଅନନ୍ତ-ପରାକ୍ରମୀ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ମୁଁ ଯେ ପୂଜା କରିଛି, ତାହାକୁ ତୁମମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଯେମାନେ ସହିପାରୁନାହାନ୍ତି, ସେ ସମସ୍ତ ବଳବାନଙ୍କ ମସ୍ତକ ଉପରେ ମୁଁ ଏହି ପାଦ ରଖିଛି। ଭଲଭାବେ ଭାବିଚିନ୍ତି ମୁଁ ଏ କଥା କହିଛି। ଯେ ଉତ୍ତର ଦେବାକୁ ଚାହେ, ସେ ସାମ୍ନାକୁ ଆସୁ। ସେ ମୋ ଦ୍ୱାରା ବଧଯୋଗ୍ୟ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 21
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ସେ ନିଶ୍ଚୟ ମୋ ହାତରେ ନିହତ ହେବ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। ହେ ରାଜମାନେ! କେଶୀ ଦୈତ୍ୟବଧକାରୀ ଅନନ୍ତ-ପରାକ୍ରମୀ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ମୁଁ କରିଥିବା ପୂଜାକୁ ତୁମମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଯେମାନେ ସହିପାରୁନାହାନ୍ତି, ସେ ସମସ୍ତ ବଳବାନଙ୍କ ମସ୍ତକ ଉପରେ ମୁଁ ଏହି ପାଦ ରଖିଛି। ଭାବିଚିନ୍ତି ମୁଁ ଏ କଥା କହିଛି। ଯେ ଉତ୍ତର ଦେବାକୁ ଚାହେ, ସେ ସାମ୍ନାକୁ ଆସୁ। ସେ ମୋ ଦ୍ୱାରା ବଧଯୋଗ୍ୟ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 22
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ସେଇ ପୁରୁଷଟି ମୋ ହାତରେ ନିଶ୍ଚୟ ନିହତ ହେବ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 23
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ସେଇ ପୁରୁଷଟି ମୋ ହାତରେ ନିଶ୍ଚୟ ନିହତ ହେବ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 24
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ସେଇ ପୁରୁଷଟି ମୋ ହାତରେ ନିଶ୍ଚୟ ନିହତ ହେବ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 25
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ସେଇ ପୁରୁଷଟି ନିଶ୍ଚୟ ମୋ ହାତରେ ବଧ ହେବ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। ହେ ରାଜମାନେ! କେଶୀ ଦୈତ୍ୟଙ୍କୁ ବଧ କରିଥିବା ଅନନ୍ତ-ପରାକ୍ରମୀ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ମୁଁ ଯେ ପୂଜା କରିଛି, ତାହାକୁ ତୁମମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଯେ ସହିପାରେ ନାହିଁ, ସେମାନେ ସମସ୍ତ ବଳବାନଙ୍କ ମସ୍ତକ ଉପରେ ମୁଁ ଏହି ପାଦ ରଖିଛି। ଭଲଭାବେ ଭାବି-ଚିନ୍ତି ମୁଁ ଏହି କଥା କହିଛି। ଯେ ଏହାର ଉତ୍ତର ଦେବାକୁ ଚାହେ, ସେ ସାମ୍ନାକୁ ଆସୁ। ସେ ମୋ ଦ୍ୱାରା ବଧଯୋଗ୍ୟ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 26
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ସେଇ ପୁରୁଷଟି ମୋ ଦ୍ୱାରା ବଧ ହେବ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 27
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ସେଇ ପୁରୁଷଟି ମୋ ହାତରେ ବଧ ହେବ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।” ଏହା ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଓ ପ୍ରତିଶୋଧର ଖୋଲା ଆହ୍ୱାନ—କେଶୀ-ବଧକର୍ତ୍ତା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଦିଆଯାଇଥିବା ସମ୍ମାନକୁ ଯେ ସହିପାରେ ନାହିଁ ଏବଂ ବୈରରେ ଆଗେଇ ଆସେ, ସେ ବଧଯୋଗ୍ୟ ବୋଲି ଘୋଷିତ ହେଲା।
Verse 28
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ସେଇ ପୁରୁଷଟି ମୋ ହାତରେ ବଧ ହେବ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।” ପ୍ରସଙ୍ଗରେ ଏହା ଜାଣିଶୁଣି ଦିଆଯାଇଥିବା ଚ୍ୟାଲେଞ୍ଜ—କେଶୀ-ବଧକର୍ତ୍ତା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଦିଆ ସମ୍ମାନ ଯେ ସହିପାରେ ନାହିଁ, ସେ ସାମ୍ନାକୁ ଆସୁ; ସେ ବଧଯୋଗ୍ୟ ବୋଲି ଧରାହେବ।
Verse 29
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—“ସେଇ ପୁରୁଷଟି ମୋ ହାତରେ ବଧ ହେବ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।” ଏହି ଆଦାନ-ପ୍ରଦାନରେ ଧମକକୁ ଜାଣିଶୁଣି ସାର୍ବଜନୀନ ଚ୍ୟାଲେଞ୍ଜ କରାଗଲା—ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଦିଆ ସମ୍ମାନ ଯେ ସହିପାରେ ନାହିଁ ଏବଂ ବିରୋଧ କରିବାକୁ ଚାହେ, ସେ ଆଗକୁ ଆସୁ; ସେ ବଧଯୋଗ୍ୟ ବୋଲି ଠରାଗଲା।
Verse 30
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
“ସେଇ ଲୋକଟି ମୋ ହାତରେ ନିହତ ହେବ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। ହେ ରାଜମାନେ! କେଶୀ ଦୈତ୍ୟବଧକାରୀ ଅନନ୍ତ-ପରାକ୍ରମୀ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ମୁଁ ଯେ ପୂଜା କରିଛି, ତାହାକୁ ତୁମମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଯେମାନେ ସହିପାରୁନାହାନ୍ତି, ସେ ସମସ୍ତ ବଳବାନଙ୍କ ମସ୍ତକ ଉପରେ ମୁଁ ଏହି ପାଦ ରଖିଦେଲି। ଭଲଭାବେ ଭାବିଚିନ୍ତି ମୁଁ ଏହି କଥା କହିଛି। ଯେ ଉତ୍ତର ଦେବାକୁ ଚାହେ, ସେ ସମ୍ମୁଖକୁ ଆସୁ। ମୋ ହାତରେ ସେ ବଧଯୋଗ୍ୟ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 31
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
“ସେ ଏକା ମୋ ହାତରେ ନିହତ ହେବ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ। ହେ ରାଜମାନେ! କେଶୀ ଦୈତ୍ୟବଧକାରୀ ଅନନ୍ତ-ପରାକ୍ରମୀ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ମୁଁ ଯେ ପୂଜା କରିଛି, ତାହାକୁ ତୁମମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ ଯେମାନେ ସହିପାରୁନାହାନ୍ତି, ସେ ସମସ୍ତ ବଳବାନଙ୍କ ମସ୍ତକ ଉପରେ ମୁଁ ଏହି ପାଦ ରଖିଦେଲି। ଭଲଭାବେ ଭାବିଚିନ୍ତି ମୁଁ ଏହି କଥା କହିଛି। ଯେ ଉତ୍ତର ଦେବାକୁ ଚାହେ, ସେ ସମ୍ମୁଖକୁ ଆସୁ। ମୋ ହାତରେ ସେ ବଧଯୋଗ୍ୟ; ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 32
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
“ସେଇ ଲୋକଟି ମୋ ହାତରେ ନିହତ ହେବ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 33
स एव हि मया वध्यो भविष्यति न संशय: । “राजाओ! केशी दैत्यका वध करनेवाले अनन्त-पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्णकी मेरे द्वारा जो पूजा की गयी है, उसे आपलोगोंमेंसे जो सहन न कर सकें, उन सब बलवानोंके मस्तकपर मैंने यह पैर रख दिया। मैंने खूब सोच-समझकर यह बात कही है। जो इसका उत्तर देना चाहे, वह सामने आ जाय। मेरे द्वारा वह वधके योग्य होगा; इसमें संशय नहीं है
“ସେଇ ଲୋକଟି ମୋ ହାତରେ ନିହତ ହେବ—ଏଥିରେ ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ।”
Verse 39
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि अर्घाभिहररणपर्वणि राजमन्त्रणे एकोनचत्वारिंशो5ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବର ଅର୍ଘାଭିହରଣପର୍ବରେ ରାଜମନ୍ତ୍ରଣା-ପ୍ରସଙ୍ଗର ଏକୋଣଚତ୍ୱାରିଂଶ (ଉଣଚାଳିଶ) ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 43
अर्च्यमर्चितमर्घाहमनुजानन्तु ते नृपा: । 'जो बुद्धिमान् राजा हों वे मेरे द्वारा की हुई आचार्य, पिता, गुरु, पूजनीय तथा अर्घ्यनिवेदनके सर्वथा योग्य भगवान् श्रीकृष्णकी पूजाका हृदयसे अनुमोदन करें”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଯେ ନୃପମାନେ ସତ୍ୟରେ ବୁଦ୍ଧିମାନ, ସେମାନେ ମୋ ଦ୍ୱାରା କୃତ ଏହି ପୂଜାକୁ ହୃଦୟପୂର୍ବକ ଅନୁମୋଦନ କରନ୍ତୁ— ଆଚାର୍ଯ୍ୟ, ପିତା ଓ ଗୁରୁ ସମ ପୂଜ୍ୟ ଏବଂ ଅର୍ଘ୍ୟ-ନିବେଦନର ପରମ ଯୋଗ୍ୟ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ପୂଜା।
Verse 53
मानिनां बलिनां राज्ञां मध्ये वै दर्शिते पदे । सहदेवने महामानी और बलवान् राजाओंके बीच खड़े होकर अपना पैर दिखाया था, तो भी जो बुद्धिमान एवं श्रेष्ठ नरेश थे, उनमेंसे कोई कुछ न बोला
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଗର୍ବିତ ଓ ବଳବାନ ରାଜମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସହଦେବ ଦାଁଡ଼ି ନିଜ ପାଦ ଦେଖାଇଲେ; ତଥାପି ସେଠାରେ ଥିବା ବୁଦ୍ଧିମାନ ଓ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନୃପମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କେହି ମଧ୍ୟ କିଛି କହିଲେ ନାହିଁ।
Verse 66
अदृश्यरूपा वाचश्चाप्यब्रुवन् साधु साध्विति । उस समय सहदेवके मस्तकपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी और अदृश्यरूपसे खड़े हुए देवताओंने 'साधु', 'साधु” कहकर उनके सत्साहसकी प्रशंसा की
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଅଦୃଶ୍ୟ ବାଣୀ “ସାଧୁ! ସାଧୁ!” ବୋଲି ଉଚ୍ଚାରଣ କଲା। ସେହି ସମୟରେ ସହଦେବଙ୍କ ମସ୍ତକ ଉପରେ ଆକାଶରୁ ପୁଷ୍ପବୃଷ୍ଟି ହେଲା, ଏବଂ ଅଦୃଶ୍ୟ ଦେବମାନେ ତାଙ୍କ ସତ୍ସାହସକୁ ପ୍ରଶଂସା କଲେ।
The dilemma is whether a provoked warrior response (Bhīma’s impulse to act) should override assembly order, or whether restraint under institutional authority (Bhīṣma’s intervention) better serves dharma in a public, multi-king setting.
The chapter underscores that dharma in governance includes managing anger and preserving procedural stability; senior counsel and self-restraint are portrayed as necessary correctives when rhetoric threatens to convert deliberation into immediate violence.
No explicit phalaśruti appears in the provided passage; the meta-level emphasis is conveyed narratively through Vaiśaṃpāyana’s depiction of anger’s effects and Bhīṣma’s successful de-escalation as an implicit lesson on sabhā-dharma.