
सभा पर्व, अध्याय ३७ — युधिष्ठिरस्य भीष्मोपदेशः (Yudhiṣṭhira’s Consultation and Bhīṣma’s Counsel in the Assembly)
Upa-parva: Rājasūya-yajña Sabhā-ākhyāna (Rājasūya Episode within the Assembly Narratives)
Vaiśaṃpāyana reports Yudhiṣṭhira’s reaction upon observing a powerful, sea-like gathering of kings stirred by anger. Yudhiṣṭhira addresses Bhīṣma—portrayed as the foremost among the wise and an authoritative elder—requesting guidance on what course of action will prevent obstruction to the rājasūya sacrifice and secure the welfare of the people. Bhīṣma replies with reassurance and strategic framing: he employs a series of analogies in which lesser forces (dogs) become noisy around a superior force (a lion) when it is momentarily inactive, implying that the assembly’s agitation is opportunistic rather than decisive. He characterizes Śiśupāla as lacking discernment and suggests that when a superior agent (identified with Kṛṣṇa/Mādhava) intends to seize or end something, the opponent’s judgment becomes disordered, presenting Śiśupāla’s hostility as a symptom of impending reversal. The chapter closes as Śiśupāla, hearing Bhīṣma’s remarks, directs harsh speech toward Bhīṣma, intensifying the rhetorical confrontation within the sabhā.
Chapter Arc: राजसूय-सभा के मध्य, जहाँ समस्त नरेश उपस्थित हैं, शिशुपाल उठकर युधिष्ठिर के द्वारा कृष्ण को दी गई राजोचित अग्रपूजा को ‘अनुचित’ और ‘अपमानजनक’ ठहराता है। → वह पाण्डवों को ‘धर्म के सूक्ष्म स्वरूप’ का उपदेश देने के बहाने तिरस्कार करता है—कहता है कि इतने महात्मा राजाओं के रहते वृष्णिवंशी कृष्ण राजाओं की भाँति पूज्य नहीं हो सकते; यह सभा में लाए गए राजाओं का अवमान है। → शिशुपाल तीखे उपमानों से कृष्ण-पूजा को उपहास बताता है—‘अराजा को राजा-सा पूजन’ को नपुंसक-विवाह और अंधे को रूप-दर्शन जैसा कहकर, युधिष्ठिर, भीष्म और समस्त सभा की मर्यादा पर प्रहार करता है। → अपनी निन्दा-वाणी पूरी कर वह आसन से उठता है और कुछ राजाओं के साथ सभा से बाहर निकल जाता है, पर उसके शब्द सभा में विष की तरह रह जाते हैं। → कृष्ण का प्रत्युत्तर और शिशुपाल के अपराधों का फल—क्या सभा-धर्म शान्ति माँगेगा या दण्ड?
Verse 1
शिशुपाल बोला--कौरव्य! यहाँ इन महात्मा भूमिपतियोंके रहते हुए यह वृष्णिवंशी कृष्ण राजाओंकी भाँति राजोचित पूजाका अधिकारी कदापि नहीं हो सकता
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ହେ କୌରବ୍ୟ! ଏଠାରେ ଏହି ମହାତ୍ମା ଭୂପତିମାନେ ଥିବାବେଳେ ବୃଷ୍ଣିବଂଶୀ କୃଷ୍ଣ କେବେ ମଧ୍ୟ ରାଜାମାନଙ୍କ ପରି ରାଜୋଚିତ ପୂଜାର ଅଧିକାରୀ ହୋଇପାରିବ ନାହିଁ।
Verse 2
नायं युक्त: समाचार: पाण्डवेषु महात्मसु । यत् कामात् पुण्डरीकाक्षं पाण्डवार्चितवानसि,महात्मा पाण्डवोंके लिये यह विपरीत आचार कभी उचित नहीं है। पाण्डुकुमार! तुमने स्वार्थवश कमलनयन श्रीकृष्णका पूजन किया है। पाण्डवो! अभी तुमलोग बालक हो। तुम्हें धर्मका पता नहीं है, क्योंकि धर्मका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है। ये गंगानन्दन भीष्म बहुत बूढ़े हो गये हैं। अब इनकी स्मरणशक्ति जवाब दे चुकी है। इनकी सूझ और समझ भी बहुत कम हो गयी है (तभी इन्होंने श्रीकृष्णपूजाकी सम्मति दी है)
ମହାତ୍ମା ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଏହି ଆଚାର ଯୁକ୍ତ ନୁହେଁ। ହେ ପାଣ୍ଡୁକୁମାର! ତୁମେ ସ୍ୱାର୍ଥବଶତଃ ପୁଣ୍ଡରୀକାକ୍ଷ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ପୂଜା କରିଛ। ହେ ପାଣ୍ଡବମାନେ! ତୁମେ ଏଯାବତ୍ ଶିଶୁ; ଧର୍ମର ସ୍ୱରୂପ ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୂକ୍ଷ୍ମ, ତେଣୁ ତୁମେ ତାହା ଜାଣ ନାହିଁ। ଗଙ୍ଗାନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମ ମଧ୍ୟ ଏବେ ଅତିବୃଦ୍ଧ; ତାଙ୍କର ସ୍ମୃତିଶକ୍ତି କ୍ଷୀଣ, ବୁଦ୍ଧି ମଧ୍ୟ ମନ୍ଦ—ସେହି କାରଣରୁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣପୂଜାକୁ ସେ ସମ୍ମତି ଦେଇଛନ୍ତି।
Verse 3
बाला यूयं न जानीध्वं धर्म: सूक्ष्मो हि पाण्डवा: । अयं च स्मृत्यतिक्रान्तो ह्वापगेयो5ल्पदर्शन:,महात्मा पाण्डवोंके लिये यह विपरीत आचार कभी उचित नहीं है। पाण्डुकुमार! तुमने स्वार्थवश कमलनयन श्रीकृष्णका पूजन किया है। पाण्डवो! अभी तुमलोग बालक हो। तुम्हें धर्मका पता नहीं है, क्योंकि धर्मका स्वरूप अत्यन्त सूक्ष्म है। ये गंगानन्दन भीष्म बहुत बूढ़े हो गये हैं। अब इनकी स्मरणशक्ति जवाब दे चुकी है। इनकी सूझ और समझ भी बहुत कम हो गयी है (तभी इन्होंने श्रीकृष्णपूजाकी सम्मति दी है)
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ହେ ପାଣ୍ଡବମାନେ, ତୁମେ ଏଯାବତ୍ ଶିଶୁ; ଧର୍ମକୁ ତୁମେ ଜାଣ ନାହ, କାରଣ ଧର୍ମ ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୂକ୍ଷ୍ମ। ଆଉ ଏହି ଭୀଷ୍ମ ବୃଦ୍ଧାବସ୍ଥାରେ ସ୍ମୃତିହୀନ, ଦୃଷ୍ଟି-ବିବେକ କ୍ଷୀଣ; ତେଣୁ ତାଙ୍କ ବୁଦ୍ଧି ମଧ୍ୟ ମନ୍ଦ ହୋଇଛି।
Verse 4
त्वादृशो धर्मयुक्तो हि कुर्वाण: प्रियकाम्यया । भवत्यभ्यधिकं भीष्म लोकेष्ववमत: सताम्,भीष्म तुम्हारे-जैसा धर्मात्मा पुरुष भी जब मनमाना अथवा किसीका प्रिय करनेके लिये मुँहदेखी करने लगता है, तब वह साधु पुरुषोंके समाजमें अधिक अपमानका पात्र बन जाता है
ହେ ଭୀଷ୍ମ, ତୁମ ପରି ଧର୍ମନିଷ୍ଠ ପୁରୁଷ ଯଦି ପ୍ରିୟ କରିବାର ଆକାଂକ୍ଷାରେ ମୁହଁଦେଖା କରେ, ତେବେ ସେ ଲୋକର ସଜ୍ଜନମାନଙ୍କ ଦୃଷ୍ଟିରେ ଆଉ ଅଧିକ ନିନ୍ଦିତ ହୁଏ।
Verse 5
कथं हाराजा दाशाहो मध्ये सर्वमहीक्षिताम् । अर्हणामहति तथा यथा युष्माभिरचिंत:,यह सभी जानते हैं कि यदुवंशी कृष्ण राजा नहीं है, फिर सम्पूर्ण भूपालोंके बीच तुमलोगोंने जिस प्रकार इसकी पूजा की है, वैसी पूजाका अधिकारी यह कैसे हो सकता है?
ସମସ୍ତେ ଜାଣନ୍ତି ଯେ ଏହି ଦାଶାର୍ହ କୃଷ୍ଣ ରାଜା ନୁହେଁ; ତଥାପି ସମସ୍ତ ଭୂପାଳଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ତୁମେ ଯେପରି ତାଙ୍କୁ ଅଗ୍ର-ଅର୍ହଣା ଦେଲ, ସେପରି ପୂଜାର ଅଧିକାରୀ ସେ କିପରି ହେବ?
Verse 6
अथ वा मन्यसे कृष्णं स्थविरं कुरुपुड्रव । वसुदेवे स्थिते वृद्धे कथमर्हति तत्सुत:,कुरुपुंगव! अथवा यदि तुम श्रीकृष्णको बड़ा-बूढ़ा समझते हो तो इसके पिता वृद्ध वसुदेवजीके रहते हुए उनका यह पुत्र कैसे पूजाका पात्र हो सकता है?
ହେ କୁରୁପୁଙ୍ଗବ, ଯଦି ତୁମେ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ବୋଲି ମାନ, ତେବେ ତାଙ୍କ ବୃଦ୍ଧ ପିତା ବସୁଦେବ ଜୀବିତ ଓ ଉପସ୍ଥିତ ଥିବାବେଳେ ସେ ପୁତ୍ର କିପରି ପୂଜାର୍ହ ହେବ?
Verse 7
अथ वा वासुदेवो5पि प्रियकामो<नुवृत्तवान् । द्रपदे तिष्ठति कथं माधवो5हति पूजनम्,अथवा यह मान लिया जाय कि वासुदेव कृष्ण तुमलोगोंका प्रिय चाहनेवाला और तुम्हारा अनुसरण करनेवाला सुहृद् है, इसीलिये तुमने इसकी पूजा की है, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि तुम्हारे सबसे बड़े सुहृद् तो राजा ट्रुपद हैं। उनके रहते यह माधव पूजा पानेका अधिकारी कैसे हो सकता है। कुरुनन्दन! अथवा यह समझ लें कि तुम कृष्णको आचार्य मानते हो, फिर भी आचार्योमें भी बड़े-बूढ़े द्रोणाचार्यके रहते हुए इस यदुवंशीकी पूजा तुमने क्यों की है?
କିମ୍ବା ଧରାଯାଉ ଯେ ବସୁଦେବ-କୃଷ୍ଣ ତୁମକୁ ପ୍ରିୟ କରିବାକୁ ଚାହେ ଓ ତୁମ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ଚାଲେ, ସେଥିପାଇଁ ତୁମେ ତାଙ୍କୁ ପୂଜିଲ—ତଥାପି ଏହା ଯୁକ୍ତିସଙ୍ଗତ ନୁହେଁ। କାରଣ ତୁମର ସର୍ବଶ୍ରେଷ୍ଠ ସୁହୃଦ୍ ରାଜା ଦ୍ରୁପଦ ଏଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ; ତାଙ୍କ ଥିବାବେଳେ ମାଧବ କିପରି ପୂଜାର୍ହ ହେବ? ଆଉ ଯଦି ତୁମେ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଆଚାର୍ଯ୍ୟ ବୋଲି କହ, ତେବେ ଆଚାର୍ଯ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ଦ୍ରୋଣ ଥିବାବେଳେ ଏହି ଯାଦବକୁ କାହିଁକି ଅଗ୍ର-ଅର୍ହଣା ଦେଲ?
Verse 8
आचार्य मन्यसे कृष्णमथ वा कुरुनन्दन । द्रोणे तिष्ठति वाष्णेयं कस्मादर्चितवानसि,अथवा यह मान लिया जाय कि वासुदेव कृष्ण तुमलोगोंका प्रिय चाहनेवाला और तुम्हारा अनुसरण करनेवाला सुहृद् है, इसीलिये तुमने इसकी पूजा की है, तो यह भी ठीक नहीं है, क्योंकि तुम्हारे सबसे बड़े सुहृद् तो राजा ट्रुपद हैं। उनके रहते यह माधव पूजा पानेका अधिकारी कैसे हो सकता है। कुरुनन्दन! अथवा यह समझ लें कि तुम कृष्णको आचार्य मानते हो, फिर भी आचार्योमें भी बड़े-बूढ़े द्रोणाचार्यके रहते हुए इस यदुवंशीकी पूजा तुमने क्यों की है?
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ! ତୁମେ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଆଚାର୍ଯ୍ୟ ବୋଲି ମନେ କରୁଛ କି? ଆଚାର୍ଯ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବୃଦ୍ଧ ଦ୍ରୋଣ ଥିବାବେଳେ ଏହି ବୃଷ୍ଣିବଂଶୀଙ୍କୁ ତୁମେ କାହିଁକି ଅର୍ଚ୍ଚନା କଲ?
Verse 9
भीष्मका युधिष्ठटिरको श्रीकृष्णकी महिमा बताना 5 है 22 + 64 ॥/ ५ शिशुपालका युद्धके लिये उद्योग ऋत्विजं मन्यसे कृष्णमथ वा कुरुनन्दन । द्वैपायने स्थिते वृद्धे कं कृष्णो<र्चितस्त्वया,कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले युधिष्ठिर! अथवा यदि यह कहा जाय कि तुम कृष्णको अपना ऋत्विज् समझते हो तो ऋत्विजोंमें भी सबसे वृद्ध द्वैधायन वेदव्यासके रहते हुए तुमने कृष्णकी अग्रपूजा कैसे की?
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ହେ କୁରୁବଂଶର ଆନନ୍ଦ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ଯଦି ତୁମେ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ନିଜ ଋତ୍ୱିଜ (ଯଜ୍ଞ-ପୁରୋହିତ) ବୋଲି ମନେ କର, ତେବେ ଋତ୍ୱିଜମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ବୃଦ୍ଧ ଦ୍ୱୈପାୟନ ବ୍ୟାସ ଥିବାବେଳେ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଅଗ୍ରପୂଜା କିପରି ଦେଲ?
Verse 10
भीष्मे शान्तनवे राजन् स्थिते पुरुषसत्तमे | स्वच्छन्दमृत्युके राजन् कथं कृष्णोड<र्चितस्त्वया,राजन! शान्तनुनन्दन भीष्म पुरुषशिरोमणि तथा स्वच्छन्दमृत्यु हैं। इनके रहते तुमने कृष्णकी अर्चना कैसे की? कुरुनन्दन युधिष्ठिर! सम्पूर्ण शास्त्रोंके निपुण विद्वान् वीर अश्व॒ृत्थामाके रहते हुए तुमने कृष्णकी पूजा कैसे कर डाली?
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ହେ ରାଜନ! ଶାନ୍ତନୁନନ୍ଦନ ଭୀଷ୍ମ—ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ଏବଂ ସ୍ୱେଚ୍ଛାମୃତ୍ୟୁଧାରୀ—ଉପସ୍ଥିତ ଥିବାବେଳେ ତୁମେ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ କିପରି ଅର୍ଚ୍ଚନା କଲ?
Verse 11
अभश्रृत्थाम्नि स्थिते वीरे सर्वशास्त्रविशारदे | कथं कृष्णस्त्वया राजन्नर्चित: कुरुनन्दन,राजन! शान्तनुनन्दन भीष्म पुरुषशिरोमणि तथा स्वच्छन्दमृत्यु हैं। इनके रहते तुमने कृष्णकी अर्चना कैसे की? कुरुनन्दन युधिष्ठिर! सम्पूर्ण शास्त्रोंके निपुण विद्वान् वीर अश्व॒ृत्थामाके रहते हुए तुमने कृष्णकी पूजा कैसे कर डाली?
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ହେ ରାଜନ, ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ! ସମସ୍ତ ଶାସ୍ତ୍ରରେ ପାରଙ୍ଗତ ବୀର ଅଶ୍ୱତ୍ଥାମା ଉପସ୍ଥିତ ଥିବାବେଳେ ତୁମେ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ କିପରି ଅର୍ଚ୍ଚନା କଲ?
Verse 12
दुर्योधने च राजेन्द्रे स्थिते पुरुषसत्तमे । कृपे च भारताचार्ये कथं कृष्णस्त्वयार्चित:,पुरुषप्रवर राजाधिराज दुर्योधन और भरतवंशके आचार्य महात्मा कृपके रहते हुए तुमने कृष्णकी पूजाका औचित्य कैसे स्वीकार किया? तुमने किम्पुरुषोंके आचार्य ट्रुमका उल्लंघन करके कृष्णकी अग्रपूजा क्यों की? पाण्डुके समान दुर्धर्ष वीर तथा राजोचित शुभ- लक्षणोंसे सम्पन्न भीष्मक, राजा रुक्मी और उसी प्रकार श्रेष्ठ धनुर्धर एकलव्य तथा मद्रराज शल्यके रहते हुए तुम्हारे द्वारा कृष्णकी पूजा किस दृष्टिसे की गयी?
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାଜା ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ଏବଂ ଭାରତାଚାର୍ଯ୍ୟ କୃପ ଉପସ୍ଥିତ ଥିବାବେଳେ ତୁମେ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ କିପରି ଅର୍ଚ୍ଚନା କଲ?
Verse 13
द्रुमं किम्पुरुषाचार्यमतिक्रम्य तथार्चित: । भीष्मके चैव दुर्धर्षे पाण्डुवत् कृतलक्षणे,पुरुषप्रवर राजाधिराज दुर्योधन और भरतवंशके आचार्य महात्मा कृपके रहते हुए तुमने कृष्णकी पूजाका औचित्य कैसे स्वीकार किया? तुमने किम्पुरुषोंके आचार्य ट्रुमका उल्लंघन करके कृष्णकी अग्रपूजा क्यों की? पाण्डुके समान दुर्धर्ष वीर तथा राजोचित शुभ- लक्षणोंसे सम्पन्न भीष्मक, राजा रुक्मी और उसी प्रकार श्रेष्ठ धनुर्धर एकलव्य तथा मद्रराज शल्यके रहते हुए तुम्हारे द्वारा कृष्णकी पूजा किस दृष्टिसे की गयी?
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା— କିମ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ଆଚାର୍ଯ୍ୟ ଦ୍ରୁମଙ୍କୁ ଅତିକ୍ରମ କରି ତୁମେ କିପରି କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଅଗ୍ରପୂଜାରେ ସମ୍ମାନିତ କଲ? ଏବଂ ପାଣ୍ଡୁସଦୃଶ ରାଜୋଚିତ ଶୁଭଲକ୍ଷଣଯୁକ୍ତ ଦୁର୍ଧର୍ଷ ଭୀଷ୍ମକ ଉପସ୍ଥିତ ଥିବାବେଳେ କେଉଁ ଯୁକ୍ତିରେ କୃଷ୍ଣଙ୍କ ଏହି ସର୍ବୋଚ୍ଚ ପୂଜା କରାଗଲା?
Verse 14
नृपे च रुक्मिणि श्रेष्ठे एकलव्ये तथैव च । शल्ये मद्राधिपे चैव कथं कृष्णस्त्वयार्चित:,पुरुषप्रवर राजाधिराज दुर्योधन और भरतवंशके आचार्य महात्मा कृपके रहते हुए तुमने कृष्णकी पूजाका औचित्य कैसे स्वीकार किया? तुमने किम्पुरुषोंके आचार्य ट्रुमका उल्लंघन करके कृष्णकी अग्रपूजा क्यों की? पाण्डुके समान दुर्धर्ष वीर तथा राजोचित शुभ- लक्षणोंसे सम्पन्न भीष्मक, राजा रुक्मी और उसी प्रकार श्रेष्ठ धनुर्धर एकलव्य तथा मद्रराज शल्यके रहते हुए तुम्हारे द्वारा कृष्णकी पूजा किस दृष्टिसे की गयी?
ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନୃପ ରୁକ୍ମୀ, ମହାଧନୁର୍ଧର ଏକଲବ୍ୟ ଏବଂ ମଦ୍ରାଧିପ ଶଲ୍ୟ ଉପସ୍ଥିତ ଥିବାବେଳେ ମଧ୍ୟ ତୁମେ କିପରି କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ପୂଜା କଲ?
Verse 15
अयं च सर्वराज्ञां वै बलश्लाघी महाबल: । जामदग्न्यस्य दयित: शिष्यो विप्रस्थ भारत,भारत! ये जो अपने बलके द्वारा सब राजाओंसे होड़ लेते हैं, विप्रवर परशुरामजीके प्रिय शिष्य हैं तथा जिन्होंने अपने बलका भरोसा करके युद्धमें अनेक राजाओंको परास्त किया है, उन महाबली कर्णको छोड़कर तुमने कृष्णकी आराधना कैसे की?
ହେ ଭାରତ! ଏଠାରେ ମହାବଳୀ କର୍ଣ୍ଣ ଦଣ୍ଡାୟମାନ—ଯେ ନିଜ ବଳର ଗର୍ବ କରି ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କୁ ଚ୍ୟାଲେଞ୍ଜ କରେ; ସେ ଜାମଦଗ୍ନ୍ୟ ପରଶୁରାମଙ୍କ ପ୍ରିୟ ଶିଷ୍ୟ।
Verse 16
येनात्मबलमरश्रित्य राजानो युधि निर्जिता: । तं च कर्णमतिक्रम्य कथं कृष्णस्त्वयार्चित:,भारत! ये जो अपने बलके द्वारा सब राजाओंसे होड़ लेते हैं, विप्रवर परशुरामजीके प्रिय शिष्य हैं तथा जिन्होंने अपने बलका भरोसा करके युद्धमें अनेक राजाओंको परास्त किया है, उन महाबली कर्णको छोड़कर तुमने कृष्णकी आराधना कैसे की?
ହେ ଭାରତ! ଯିଏ ନିଜ ବଳକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ଯୁଦ୍ଧରେ ରାଜାମାନଙ୍କୁ ପରାଜିତ କରିଛି, ସେହି କର୍ଣ୍ଣଙ୍କୁ ଅତିକ୍ରମ କରି ତୁମେ କିପରି କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ପୂଜା କଲ?
Verse 17
नैवर्त्विंग नैव चाचार्यो न राजा मधुसूदन: । अर्चितश्न कुरुश्रेष्ठ किमन्यत्प्रियकाम्यया,कुरुश्रेष्ठ! मधुसूदन कृष्ण न ऋत्विज् है, न आचार्य है और न राजा ही है; फिर तुमने किस प्रिय कामनासे इसकी पूजा की है?
ହେ କୁରୁଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମଧୁସୂଦନ କୃଷ୍ଣ ନ ତୁମ ଋତ୍ୱିଜ, ନ ଆଚାର୍ଯ୍ୟ, ନ ରାଜା; ତେବେ କେଉଁ ଅନ୍ୟ ପ୍ରିୟ-କାମନାରେ ତୁମେ ତାଙ୍କୁ ପୂଜା କଲ?
Verse 18
अथ वाभ्यर्चनीयो<यं युष्माकं॑ मधुसूदन: । कि राजभिरिहानीतैरवमानाय भारत,भारत! अथवा यदि यह मधुसूदन ही तुमलोगोंका पूजनीय देवता है, इसलिये इसकी ही पूजा तुम्हें करनी थी तो इन राजाओंको केवल अपमानित करनेके लिये बुलानेकी क्या आवश्यकता थी?
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା— ଯଦି ସତ୍ୟସତ୍ୟ ତୁମମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଏହି ମଧୁସୂଦନ ହିଁ ପୂଜ୍ୟ, ତେବେ ହେ ଭାରତ! ଏହି ରାଜାମାନଙ୍କୁ ଏଠାକୁ କାହିଁକି ଆଣାଗଲା—କେବଳ ଅପମାନ ପାଇଁ?
Verse 19
वयं तु न भयादस्य कौन्तेयस्य महात्मन: । प्रयच्छाम: करान् सर्वे न लोभान्न च सान्त्वनात्,राजाओ! हम सब लोग इन महात्मा कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरको जो कर दे रहे हैं, वह भय, लोभ अथवा कोई विशेष आश्वासन मिलनेके कारण नहीं
ହେ ରାଜାମାନେ! ଏହି ମହାତ୍ମା କୌନ୍ତେୟଙ୍କୁ ଆମେ ଯେ କର ଦେଉଛୁ, ସେ ଭୟରୁ ନୁହେଁ, ଲୋଭରୁ ନୁହେଁ, କିମ୍ବା କୌଣସି ସାନ୍ତ୍ୱନା-ଆଶ୍ୱାସନରୁ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ।
Verse 20
अस्य धर्मप्रवृत्तस्य पार्थिवत्वं चिकीर्षत: । करानस्मै प्रयच्छाम: सो5यमस्मान् न मन्यते,हमने तो यही समझा था कि यह धर्माचरणमें संलग्न रहनेवाला क्षत्रिय सम्राट्का पद पाना चाहता है तो अच्छा ही है। यही सोचकर हम उसे कर देते हैं, परंतु यह राजा युधिष्ठिर हमलोगोंको नहीं मानता है
ଆମେ ଭାବିଥିଲୁ— ‘ଏ ଧର୍ମରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ ଓ ସାମ୍ରାଟ୍ୟ ପଦ ଚାହୁଁଛି; ଏହା ଯଥାଯଥ।’ ସେଇ ଭାବନାରେ ଆମେ କର ଦେଲୁ; କିନ୍ତୁ ଏହି ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଆମକୁ ମାନ୍ୟ କରୁନାହାନ୍ତି।
Verse 21
किमन्यदवमानाद्धि यदेनं राजसंसदि । अप्राप्तलक्षणं कृष्णमध्येणार्चितवानसि,युधिष्ठिर! इससे बढ़कर दूसरा अपमान और क्या हो सकता है कि तुमने राजाओंकी सभामें जिसे राजोचित चिह्न छत्र-चँवर आदि प्राप्त नहीं हुआ है, उस कृष्णकी अर्घ्यके द्वारा पूजा की है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ଏହାଠାରୁ ବଡ଼ ଅପମାନ ଆଉ କ’ଣ—ରାଜସଭାରେ ଯାହାଙ୍କୁ ଛତ୍ର-ଚାମର ଆଦି ରାଜଲକ୍ଷଣ ମିଳିନାହିଁ, ସେଇ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ତୁମେ ଅର୍ଘ୍ୟ ଦେଇ ଅଗ୍ରସ୍ଥାନରେ ପୂଜିଲ?
Verse 22
अकस्माद् धर्मपुत्रस्य धर्मात्मेति यशो गतम् | को हि धर्मच्युते पूजामेवं युक्तां नियोजयेत्,धर्मपुत्र युधिष्ठिरको अकस्मात् ही धर्मात्मा होनेका यश प्राप्त हो गया है, अन्यथा कौन ऐसा धर्मनिष्ठ पुरुष होगा जो किसी धर्मच्युतकी इस प्रकार पूजा करेगा
ଧର୍ମପୁତ୍ରଙ୍କୁ ହଠାତ୍ ‘ଧର୍ମାତ୍ମା’ ବୋଲି ଯଶ ମିଳିଗଲା; ନଚେତ୍ ଧର୍ମଚ୍ୟୁତ ଜଣଙ୍କ ପାଇଁ ଏପରି ଯଥୋଚିତ ପୂଜା କିଏ ଧର୍ମନିଷ୍ଠ ପୁରୁଷ ବ୍ୟବସ୍ଥା କରିଥାନ୍ତା?
Verse 23
यो<यं वृष्णिकुले जातो राजानं हतवान् पुरा | जरासंध॑ महात्मानमन्यायेन दुरात्मवान्,वृष्णिकुलमें पैदा हुए इस दुरात्माने तो कुछ ही दिन पहले महात्मा राजा जरासंधका अन्यायपूर्वक वध किया है
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ଏହି ବୃଷ୍ଣିକୁଳଜ ଦୁରାତ୍ମା ପୂର୍ବରୁ ମହାତ୍ମା ରାଜା ଜରାସନ୍ଧଙ୍କୁ ଅନ୍ୟାୟରେ ବଧ କରିଛି।
Verse 24
अद्य धर्मात्मता चैव व्यपकृष्टा युधिष्ठिरात् । दर्शितं कृपणत्वं च कृष्णे<र्घ्यस्य निवेदनात्,आज युधिष्ठिरका धर्मात्मापन दूर निकल गया, क्योंकि इन्होंने कृष्णको अर्घ्य निवेदन करके अपनी कायरता ही दिखायी है
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ଆଜି ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଧର୍ମାତ୍ମତା ଦୂରେ ସରିଗଲା; କାରଣ କୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଅର୍ଘ୍ୟ ନିବେଦନ କରି ସେ ନିଜ କୃପଣତା ଓ କାୟରତା ଦେଖାଇଲେ।
Verse 25
यदि भीताश्न कौन्तेया: कृपणाश्न॒ तपस्विन: । ननु त्वयापि बोद्धव्यं यां पूजां माधवाहसि,(अब शिशुपालने भगवान् श्रीकृष्णको देखकर कहा--) माधव! कुन्तीके पुत्र डरपोक, कायर और तपस्वी हैं। इन्होंने तुम्हें ठीक-ठीक न जानकर यदि तुम्हारी पूजा कर दी तो तुम्हें तो समझना चाहिये था कि तुम किस पूजाके अधिकारी हो?
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ହେ ମାଧବ! କୁନ୍ତୀପୁତ୍ରମାନେ ଭୀତ, କୃପଣ ଓ ତପସ୍ବୀ ହେଲେ ମଧ୍ୟ, ତୁମେ କେମିତି ପୂଜାର ଅଧିକାରୀ ତାହା ତୁମେ ନିଜେ ବୁଝିବା ଉଚିତ୍ ଥିଲା। ସେମାନେ ତୁମକୁ ଠିକ୍ ଭାବେ ନ ଜାଣି ପୂଜା କଲେ ମଧ୍ୟ, ତୁମେ ତାହାର ଯୋଗ୍ୟତା ବିଚାର କରିବା ଥିଲା।
Verse 26
अथ वा कृपणैरेतामुपनीतां जनार्दन | पूजामनर्ह: कस्मात् त्वमभ्यनुज्ञातवानसि,अथवा जनार्दन! इन कायरोंद्वारा उपस्थित की हुई इस अग्रपूजाको उसके योग्य न होते हुए भी तुमने क्यों स्वीकार कर लिया?
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ଅଥବା ହେ ଜନାର୍ଦନ! ଏହି କୃପଣମାନେ ଉପସ୍ଥାପିତ କରିଥିବା ଏହି ଅଗ୍ରପୂଜାକୁ, ତୁମେ ଅନର୍ହ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ, କାହିଁକି ଅନୁମୋଦନ କରି ଗ୍ରହଣ କଲ?
Verse 27
अयुक्तामात्मन: पूजां त्वं पुनर्बहु मन््यसे । हविष: प्राप्य निष्यन्दं प्राशिता श्वेव निर्जने,जैसे कुत्ता एकान्तमें चूकर गिरे हुए थोड़े-से हविष्य (घृत)-को चाट ले और अपनेको धन्य धन्य मानने लगे, उसी प्रकार तुम अपने लिये अयोग्य पूजा स्वीकार करके अपने- आपको बहुत बड़ा मान रहे हो
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—ନିଜ ପାଇଁ ଅଯୁକ୍ତ ପୂଜା ପାଇ ତୁମେ ପୁଣି ନିଜକୁ ବହୁତ ବଡ଼ ଭାବୁଛ। ଯେପରି ନିର୍ଜନ ସ୍ଥାନରେ ପଡ଼ିଥିବା ହବିଷ୍ୟ (ଘୃତ)ର ଅଳ୍ପ ଧାରାକୁ କୁକୁର ଚାଟି ନିଜକୁ ଧନ୍ୟ ମାନେ, ସେପରି ଅନର୍ହ ସମ୍ମାନ ପାଇ ତୁମେ ଅହଂକାରେ ଫୁଲୁଛ।
Verse 28
न त्वयं पार्थिवेन्द्राणामपमान: प्रयुज्यते । त्वामेव कुरवो व्यक्त प्रलम्भन्ते जनार्दन,कृष्ण! तुम्हारी इस अग्रपूजासे हम राजाधिराजोंका कोई अपमान नहीं होता, परंतु ये कुरुवंशी पाण्डव तुम्हें अर्घ्य देकर वास्तवमें तुम्हींको ठग रहे हैं
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—“ହେ ଜନାର୍ଦନ! ଏହି ଅଗ୍ରପୂଜାରେ ପୃଥିବୀର ରାଜମାନଙ୍କର କୌଣସି ଅପମାନ ହୁଏ ନାହିଁ; କିନ୍ତୁ କୁରୁମାନେ ତୁମକୁ ଅର୍ଘ୍ୟ ଦେଇ ଓ ତୁମକୁ ଅଗ୍ରଗଣ୍ୟ କହି ପ୍ରକୃତରେ ସ୍ପଷ୍ଟଭାବେ ତୁମକୁ ଠକୁଛନ୍ତି।”
Verse 29
क्लीबे दारक्रिया यादृगन्धे वा रूपदर्शनम् । अराज्ञो राजवत् पूजा तथा ते मधुसूदन,मधुसूदन! जैसे नपुंसकका ब्याह रचाना और अंधेको रूप दिखाना उनका उपहास ही करना है, उसी प्रकार तुम-जैसे राज्यहीनकी यह राजाओंके समान पूजा भी विडम्बनामात्र ही है
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—“ହେ ମଧୁସୂଦନ! ଯେପରି ନପୁଂସକଙ୍କ ବିବାହ କରାଇବା କିମ୍ବା ଅନ୍ଧକୁ ରୂପ ଦେଖାଇବା କେବଳ ଉପହାସ, ସେପରି ରାଜ୍ୟହୀନ ତୁମକୁ ରାଜାମାନଙ୍କ ପରି ପୂଜା କରିବା ମଧ୍ୟ ମାତ୍ର ଭଣ୍ଡାମି—ବିଡମ୍ବନା।”
Verse 30
दृष्टो युधिष्ठिरो राजा दृष्टो भीष्मश्न यादृश: । वासुदेवो5प्ययं दृष्ट: सर्वमेतद् यथातथम्,आज मैंने राजा युधिष्ठटिरको देख लिया; भीष्म भी जैसे हैं, उनको भी देख लिया और इस वासुदेव कृष्णका भी वास्तविक रूप क्या है, यह भी देख लिया। वास्तवमें ये सब ऐसे ही हैं
ଶିଶୁପାଳ କହିଲା—“ଆଜି ମୁଁ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ଦେଖିଲି; ଭୀଷ୍ମ ଯେପରି, ସେପରି ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି; ଏହି ବାସୁଦେବଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲି। ଏଠାରେ ସବୁକିଛି ଯଥାର୍ଥ ଯେପରି, ସେପରି ଅଛି।”
Verse 31
इत्युक्त्वा शिशुपालस्तानुत्थाय परमासनात् । निर्यया सदसस्तस्मात् सहितो राजभिस्तदा,उनसे ऐसा कहकर शिशुपाल अपने उत्तम आसनसे उठकर कुछ राजाओंके साथ उस सभाभवनसे जानेको उद्यत हो गया
ଏପରି କହି ଶିଶୁପାଳ ନିଜ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଆସନରୁ ଉଠି, କିଛି ରାଜାଙ୍କ ସହିତ ସେହି ସଭାଗୃହରୁ ବାହାରିବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ହେଲା।
Verse 37
इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि अर्घाभिहरणपर्वणि शिशुपालक्रोधे सप्तत्रिंशो 5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत सभापव॑के अन्तर्गत अर्घाभिहरणपर्वमें शिशुपालका क्रोधविषयक सैंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଅର୍ଘାଭିହରଣପର୍ବରେ ଶିଶୁପାଳକ୍ରୋଧ ବିଷୟକ ସତତ୍ରିଂଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
He must balance restraint and institutional responsibility: responding to provocation in a charged assembly without allowing the yajña to be obstructed or public welfare to be destabilized by reactive escalation.
Bhīṣma teaches that public anger can be opportunistic and performative; sound governance prioritizes composure, senior counsel, and protection of communal order over immediate retaliation to hostile speech.
No explicit phalaśruti is presented in these verses; the meta-level function is structural, positioning the sabhā as a moral-political arena where counsel and speech-ethics determine whether ritual and governance remain stable under provocation.