
नकुलस्य प्रतीची-दिग्विजयः (Nakula’s Conquest of the Western Quarter)
Upa-parva: Digvijaya (Nakula’s Western Campaign) — within the Rājasūya/Digvijaya sequence
Vaiśaṃpāyana narrates Nakula’s campaign to the west from Khāṇḍavaprastha as part of the broader rājasūya-oriented digvijaya. The march is described with martial acoustics—lion-roars, soldiers’ shouts, and chariot-wheel resonance—marking the performative dimension of royal power. Nakula brings under control a sequence of territories and groups, including Rohītaka (associated with Kārttikeya), and a range of named polities and communities (e.g., Śibī, Trigarta, Ambaṣṭha, Mālava, Pañcakarpaṭa), as well as populations linked to the Sindhu region and Sarasvatī corridor, and mountain dwellers. He rapidly subordinates western rulers such as the Ramaṭha, Hāra, and Hūṇa groupings, often described as yielding to command rather than prolonged battle. From his station, Nakula sends communication to Vāsudeva; Vāsudeva acknowledges governance arrangements involving ten kingdoms. Nakula proceeds to Śākala, where he respectfully aligns his maternal uncle Śalya (Madra), receives honors and abundant jewels, then subdues coastal/sea-basin Mleccha groups including Pahlavas and Barbaras. He returns with collected wealth—transported by thousands of camels—and delivers the tribute to Yudhiṣṭhira at Indraprastha, concluding the western quarter’s integration under Varuṇa’s direction as already secured in association with Vāsudeva’s prior victories.
Chapter Arc: राजसूय-यज्ञ की तैयारी में पाण्डवों का दिग्विजय आरम्भ होता है—और इस अध्याय में भीमसेन, ‘महता बलचक्रेण’ सुसज्जित सेना के साथ दक्षिण दिशा को जीतने निकल पड़ते हैं। → भीम का रथ-चक्र आगे बढ़ता जाता है: पहले पांचालों की महानगरी (अहिच्छत्र) में पहुँचकर वे विविध उपायों से उन्हें अनुकूल करते हैं; फिर दशार्ण, पुलिन्द-नगर आदि जनपदों की ओर बढ़ते हुए राजाओं को या तो साम से, या बल से अधीन करते हैं। हर नए राज्य के साथ यह प्रश्न तीखा होता जाता है—कौन स्वेच्छा से कर देगा और कौन युद्ध को बुलाएगा। → दशार्ण-देश में राजा सुधर्मा के साथ भीमसेन का ‘निरायुध’ (अस्त्र-रहित) महायुद्ध—जहाँ केवल बाहुबल, धैर्य और राज-गौरव आमने-सामने खड़े होते हैं। → भीम अल्पकाल में दशार्ण को जीतकर आगे दक्षिण में पुलिन्द-नगर के राजा सुमित्र को वश में करते हैं; चेदिराज भी पाण्डव की चिकीर्षा सुनकर नगर से निकलकर सम्मानपूर्वक भेंट करता है—इस प्रकार दक्षिण-दिग्विजय का मार्ग प्रशस्त होता है और राजसूय हेतु कर/स्वीकृति का संकलन बढ़ता है। → भीम का विजय-चक्र अभी रुका नहीं—दक्षिण की आगे की रियासतें और संभावित प्रतिरोध अगले अध्यायों में प्रतीक्षा करते हैं।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५८ श्लोक मिलाकर कुल ७९ श्लोक हैं) > तीतरके समान चितकबरे रंगवाले। एकोनत्रिशो<ड ध्याय: भीमसेनका फट जीतनेके लिये प्रस्थान और देशोंपर विजय पाना वैशम्पायन उवाच एतस्मिन्नेव काले तु भीमसेनो5पि वीर्यवान् । धर्मराजमनुप्राप्य ययौ प्राचीं दिशं प्रति,महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ସେଇ ସମୟରେ ପରାକ୍ରମଶାଳୀ ଭୀମସେନ ମଧ୍ୟ ଧର୍ମରାଜ ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କୁ ସମୀପସ୍ଥ ହୋଇ ତାଙ୍କ ଅନୁମତି ନେଇ ପୂର୍ବ ଦିଗ ପ୍ରତି ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ। ଶତ୍ରୁରାଜ୍ୟକୁ ଚୂର୍ଣ୍ଣ କରିଦେବା ମହାନ ବଳଚକ୍ର ସହ, ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ, ଶସ୍ତ୍ର-କବଚରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ବିଶାଳ ସେନା ନେଇ ସେ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ। ଏଭଳି ଭରତଶାର୍ଦୂଳ, ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶୋକ ବଢ଼ାଇବାଳା ଭୀମ ଆଗକୁ ବଢ଼ିଲେ।
Verse 2
महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ଜନମେଜୟ! ସେହି ସମୟରେ ଭରତବଂଶର ବ୍ୟାଘ୍ର, ମହାବଳୀ ଭୀମସେନ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଗ୍ରହଣ କରି ପୂର୍ବଦିଗ୍ବିଜୟ ପାଇଁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ। ଶତ୍ରୁରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରୁଥିବା ବିଶାଳ ବଳଚକ୍ର ତାଙ୍କୁ ଘେରିଥିଲା—ହାତୀ, ଘୋଡ଼ା ଓ ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ, କବଚ-ଶସ୍ତ୍ରରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ମହାସେନା ସହ। ସେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶୋକ ବଢ଼ାଉଥିବା ପ୍ରତାପୀ ଥିଲେ।
Verse 3
स गत्वा नरशार्दूल: पज्चालानां पुरं महत्,महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ନରଶାର୍ଦୂଳ ଭୀମସେନ ଶତ୍ରୁରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ଦଳନ କରୁଥିବା ବିଶାଳ ବଳଚକ୍ର ସହ ଅଗ୍ରସର ହୋଇ ପାଞ୍ଚାଳମାନଙ୍କ ମହାନଗରକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ। ସେ ସେନା ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଓ କବଚ-ଶସ୍ତ୍ରରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ଥିଲା। ଭରତବଂଶର ବ୍ୟାଘ୍ର ସେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶୋକ ବଢ଼ାଇଲେ।
Verse 4
ततः स गण्डकाउछूरो विदेहान् भरतर्षभ:,महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले वहाँसे आगे जाकर उन भरतवंशशिरोमणि शूर-वीर भीमने गण्डक (गण्डकी नदीके तटवर्ती) और विदेह (मिथिला) देशोंको थोड़े ही समयमें जीतकर दशार्ण देशको भी अपने अधिकारमें कर लिया। वहाँ दशार्णनरेश सुधर्माने भीमसेनके साथ बिना अस्त्र-शस्त्रके ही महान् युद्ध किया। उन दोनोंका वह मल्लयुद्ध रोंगटे खड़े कर देनेवाला था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ତାପରେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ମହାବଳୀ ଭୀମସେନ ଅଗ୍ରସର ହୋଇ ଗଣ୍ଡକ ଅଞ୍ଚଳ ଓ ବିଦେହ ଦେଶକୁ ଶୀଘ୍ର ଜୟ କଲେ। ଶତ୍ରୁରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ଦଳନ କରୁଥିବା ବିଶାଳ ବଳଚକ୍ର—ହାତୀ, ଘୋଡ଼ା, ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଓ କବଚ-ଶସ୍ତ୍ରରେ ସୁସଜ୍ଜିତ—ତାଙ୍କୁ ଘେରିଥିଲା; ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶୋକ ବଢ଼ାଇ ସେ ଆଗେଇଲେ।
Verse 5
विजित्याल्पेन कालेन दशार्णानजयत प्रभु: । तत्र दाशार्णको राजा सुधर्मा लोमहर्षणम् । कृतवान् भीमसेनेन महद् युद्ध निरायुधम्,महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले वहाँसे आगे जाकर उन भरतवंशशिरोमणि शूर-वीर भीमने गण्डक (गण्डकी नदीके तटवर्ती) और विदेह (मिथिला) देशोंको थोड़े ही समयमें जीतकर दशार्ण देशको भी अपने अधिकारमें कर लिया। वहाँ दशार्णनरेश सुधर्माने भीमसेनके साथ बिना अस्त्र-शस्त्रके ही महान् युद्ध किया। उन दोनोंका वह मल्लयुद्ध रोंगटे खड़े कर देनेवाला था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ପ୍ରଭୁ ଭୀମସେନ ଅଳ୍ପ ସମୟରେ ଦଶାର୍ଣ୍ଣ ଦେଶକୁ ମଧ୍ୟ ଜୟ କଲେ। ସେଠାରେ ଦଶାର୍ଣ୍ଣରାଜ ସୁଧର୍ମା ଭୀମସେନ ସହ ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ବିନା ଏକ ମହାନ, ଲୋମହର୍ଷକ ଯୁଦ୍ଧ କଲେ—କେବଳ ବଳର ମଲ୍ଲଯୁଦ୍ଧ।
Verse 6
भीमसेनस्तु तद् दृष्टवा तस्य कर्म महात्मन: । अधिसेनापतिं चक्रे सुधर्माणं महाबलम्,महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले भीमसेनने उस महामना राजाका यह अद्भुत पराक्रम देखकर महाबली सुधर्माको अपना प्रधान सेनापति बना दिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ସେହି ମହାତ୍ମା ରାଜାଙ୍କ ଅଦ୍ଭୁତ ପରାକ୍ରମ ଦେଖି ଭୀମସେନ ମହାବଳୀ ସୁଧର୍ମାଙ୍କୁ ନିଜ ପ୍ରଧାନ ସେନାପତି କରିଲେ।
Verse 7
ततः प्राचीं दिशं भीमो ययौ भीमपराक्रम: । सैन्येन महता राजन् कम्पयन्निव मेदिनीम्,महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले राजन्! इसके बाद भयानक पराक्रमी भीमसेन पुनः विशाल सेनाके साथ पृथ्वीको कँपाते हुए पूर्व दिशाकी ओर बढ़े
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ତାପରେ ଭୟଙ୍କର ପରାକ୍ରମଶାଳୀ ଭୀମ ବିଶାଳ ସେନା ସହ ପୂର୍ବ ଦିଗକୁ ଯାତ୍ରା କଲେ; ଯେନେ ପୃଥିବୀ କମ୍ପିଉଥିଲା। ପରରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରୁଥିବା ମହାବଳଚକ୍ରରେ ଘେରା, ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ, ଶସ୍ତ୍ର-କବଚରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ସେଇ ଭାରତଶାର୍ଦୂଳ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶୋକ ବଢ଼ାଇ, ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ପୂର୍ବବିଜୟ ପାଇଁ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 8
सो<श्वमेधेश्वरं राजन् रोचमानं सहानुगम् । जिगाय समरे वीरो बलेन बलिनां वर:,महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले जनमेजय! बलवानोंमें श्रेष्ठ वीरवर भीमने अश्वमेध-देशके राजा रोचमानको उनके सेवकोंसहित बलपूर्वक जीत लिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ ରାଜନ୍! ବଳବାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେଇ ବୀର ଭୀମ, ଅଶ୍ୱମେଧ-ଦେଶର ଅଧିପତି ରାଜା ରୋଚମାନଙ୍କୁ ତାଙ୍କ ଅନୁଚରମାନଙ୍କ ସହ ଯୁଦ୍ଧରେ ବଳପୂର୍ବକ ଜୟ କଲେ। ପରରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରୁଥିବା ମହାବଳଚକ୍ରରେ ଘେରା, ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଓ ଶସ୍ତ୍ର-କବଚରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ସେଇ ଭାରତଶାର୍ଦୂଳ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶୋକ ବଢ଼ାଇ, ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 9
सतं निर्जित्य कौन्तेयो नातितीव्रेण कर्मणा । पूर्वदेशं महावीरयों विजिग्ये कुरुनन्दन:,महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले उन्हें हराकर महापराक्रमी कुरुनन्दन कुन्तीकुमार भीमने कोमल बर्तावके द्वारा ही पूर्ववेशपर विजय प्राप्त कर ली
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ଶତ୍ରୁ ମୁଖିଆମାନଙ୍କୁ ଦମନ କରି କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ମହାବୀର କୁରୁନନ୍ଦନ ଭୀମ ପୂର୍ବଦେଶ ଜୟ କଲେ; କିନ୍ତୁ ଅତ୍ୟଧିକ କଠୋର ଉପାୟରେ ନୁହେଁ—ସଂୟମିତ କାର୍ଯ୍ୟ ଓ ମୃଦୁ ବ୍ୟବହାରରେ। ପରରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରୁଥିବା ମହାବଳଚକ୍ରରେ ଘେରା, ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଓ ଶସ୍ତ୍ର-କବଚରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ସେଇ ଭାରତଶାର୍ଦୂଳ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶୋକ ବଢ଼ାଇ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 10
ततो दक्षिणमागम्य पुलिन्दनगरं महत् | सुकुमारं वशे चक्रे सुमित्रं च नराधिपम्,महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले तदनन्तर दक्षिण आकर पुलिन्दोंके महान् नगर सुकुमार और वहाँके राजा सुमित्रको अपने अधीन कर लिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ତାପରେ ଦକ୍ଷିଣକୁ ଆସି ସେଇ ମହାବୀର ପୁଲିନ୍ଦମାନଙ୍କ ମହାନଗର ସୁକୁମାରକୁ ନିଜ ଅଧୀନ କଲେ ଏବଂ ସେଠାର ନରାଧିପ ସୁମିତ୍ରଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ବଶ କଲେ। ପରରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରୁଥିବା ମହାବଳଚକ୍ରରେ ଘେରା, ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଓ ଶସ୍ତ୍ର-କବଚରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ସେଇ ଭାରତଶାର୍ଦୂଳ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶୋକ ବଢ଼ାଇ ଅଭିଯାନରେ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 11
ततस्तु धर्मराजस्य शासनाद् भरतर्षभ: । शिशुपालं महावीर्यमभ्यगाज्जनमेजय,महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले जनमेजय! तत्पश्चात् भरतश्रेष्ठ भीम धर्मराजकी आज्ञासे महापराक्रमी शिशुपालके यहाँ गये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ତାପରେ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ଭାରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ମହାବୀର୍ୟ ଭୀମ ମହାପରାକ୍ରମୀ ଶିଶୁପାଳଙ୍କ ନିକଟକୁ ଗଲେ। ପରରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରୁଥିବା ମହାବଳଚକ୍ରରେ ଘେରା, ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଓ ଶସ୍ତ୍ର-କବଚରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ସେଇ ଭାରତଶାର୍ଦୂଳ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶୋକ ବଢ଼ାଇ, ରାଜାଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ପାଳନାର୍ଥେ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 12
चेदिराजो5पि तच्छुत्वा पाण्डवस्य चिकीर्षितम् । उपनिष्क्रम्य नगरात् प्रत्यगृह्नात् परंतप,महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले परंतप! चेदिराज शिशुपालने भी पाण्डुकुमार भीमका अभिप्राय जानकर नगरसे बाहर आ स्वागत-सत्कारके साथ उन्हें अपनाया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ପରନ୍ତପ! ପାଣ୍ଡବଙ୍କ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ଶୁଣି ଚେଦିରାଜ ମଧ୍ୟ ନଗରରୁ ବାହାରି ଆସି ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ସ୍ୱାଗତ-ସତ୍କାର କରି ତାଙ୍କୁ ଗ୍ରହଣ କଲେ। ସେ ପ୍ରତାପବାନ୍ ଭରତଶାର୍ଦୂଳ, ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶୋକବର୍ଧକ; ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ, କବଚ-ଶସ୍ତ୍ରରେ ସଜ୍ଜ, ପରରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ଦଳିଦେବା ମହାବଳଚକ୍ର ସଦୃଶ ବିଶାଳ ସେନାରେ ପରିବୃତ ଥିଲେ।
Verse 13
तौ समेत्य महाराज कुरुचेदिवृषौ तदा । उभयोरात्मकुलयो: कौशल्यं पर्यपृच्छताम्,महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले महाराज! कुरुकुल और चेदिकुलके वे श्रेष्ठ पुरुष परस्पर मिलकर दोनोंने दोनों कुलोंके कुशल-प्रश्न पूछे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ସେତେବେଳେ କୁରୁ ଓ ଚେଦି କୁଳର ସେଇ ଦୁଇ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷ ମିଶି, ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ଅଭିବାଦନ କରି, ପରସ୍ପର ନିଜ-ନିଜ କୁଳର କୁଶଳ-କ୍ଷେମ ପଚାରିଲେ।
Verse 14
ततो निवेद्य तद् राष्ट्र चेदिराजो विशाम्पते । उवाच भीम॑ प्रहसन् किमिदं कुरुषेडनघ,महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले राजन! तदनन्तर चेदिराजने अपना राष्ट्र भीमसेनको सौंपकर हँसते हुए पूछा--“अनघ! यह क्या करते हो?”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାଜନ! ତାପରେ ଚେଦିରାଜ ନିଜ ରାଷ୍ଟ୍ରର ବ୍ୟବସ୍ଥା ନିବେଦନ କରି, ହସିହସି ଭୀମଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଅନଘ! ଏହା କ’ଣ କରୁଛ? ତୁମେ ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ, କବଚ-ଶସ୍ତ୍ରରେ ସଜ୍ଜ, ପରରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ଦଳିଦେବା ମହାବଳଚକ୍ର ସଦୃଶ ସେନାରେ ପରିବୃତ।”
Verse 15
तस्य भीमस्तदा55चख्यौ धर्मराजचिकीर्षितम् । सचतं प्रतिगृहौव तथा चक्रे नराधिप:,महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले तब भीमने उससे धर्मराज जो कुछ करना चाहते थे, वह सब कह सुनाया। तदनन्तर राजा शिशुपालने उनकी बात मानकर कर देना स्वीकार कर लिया
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତେବେ ଭୀମ ଧର୍ମରାଜ ଯାହା କରିବାକୁ ଚାହୁଁଥିଲେ, ସେ ସବୁ ତାଙ୍କୁ କହିଦେଲେ। ଏହା ଶୁଣି ସେ ନରାଧିପ ତାହା ଅଙ୍ଗୀକାର କରି ଯଥାବିଧି କାର୍ଯ୍ୟ କଲେ।
Verse 16
ततो भीमस्तत्र राजन्नुषित्वा त्रिदश क्षपा: । सत्कृत: शिशुपालेन ययौ सबलवाहन:,महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले राजन्! उसके बाद शिशुपालसे सम्मानित हो भीमसेन अपनी सेना और सवारियोंके साथ तेरह दिन वहाँ रह गये। तत्पश्चात् वहाँसे विदा हुए
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ରାଜନ! ତାପରେ ଶିଶୁପାଳଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସତ୍କୃତ ହୋଇ ଭୀମସେନ ନିଜ ସେନା ଓ ବାହନ ସହିତ ସେଠାରେ ତେର ରାତି ରହିଲେ; ପରେ ସେଠାରୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 17
महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ସେହି ସମୟରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶୋକ ବଢ଼ାଇବାଳା, ଭରତବଂଶର ବ୍ୟାଘ୍ର ସମ ମହାପ୍ରତାପୀ ଭୀମସେନ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଗ୍ରହଣ କରି, ଶତ୍ରୁରାଜ୍ୟକୁ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରୁଥିବା, ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ କବଚାଦିରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ବିଶାଳ ସେନା ସହ ପୂର୍ବ ଦିଗ ଜୟ କରିବାକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 18
महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତାପରେ ଭରତବଂଶର ବ୍ୟାଘ୍ର, ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶୋକ ବଢ଼ାଇବାଳା ମହାପ୍ରତାପୀ ଭୀମସେନ, ଶତ୍ରୁରାଜ୍ୟକୁ ପଦଦଳିତ କରୁଥିବା ମହାବଳଚକ୍ର ସଦୃଶ ସେନାରେ ଘେରା ହୋଇ, ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଓ କବଚ-ଶସ୍ତ୍ରରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ସେନା ସହ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ପୂର୍ବ ଦିଗ ଜୟ କରିବାକୁ ଚାଲିଲେ।
Verse 19
महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଶତ୍ରୁରାଜ୍ୟକୁ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରୁଥିବା ମହାବଳଚକ୍ର ସଦୃଶ ସେନାରେ ଘେରା ହୋଇ, ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଓ କବଚ-ଶସ୍ତ୍ରରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ସେହି ବିଶାଳ ସେନା ସହ, ଭରତବଂଶର ବ୍ୟାଘ୍ର ଓ ଶତ୍ରୁଶୋକବିବର୍ଧକ ମହାପ୍ରତାପୀ ଭୀମସେନ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଗ୍ରହଣ କରି ପୂର୍ବ ଦିଗ ଜୟ କରିବାକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 20
महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଶତ୍ରୁରାଜ୍ୟକୁ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରୁଥିବା, ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଓ କବଚ-ଶସ୍ତ୍ରରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ମହାବଳଚକ୍ର ସଦୃଶ ସେନାରେ ଘେରା ଭରତବଂଶର ବ୍ୟାଘ୍ର ମହାପ୍ରତାପୀ ଭୀମସେନ, ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶୋକ ବଢ଼ାଇ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ପାଳନ କରିବାକୁ ଅଗ୍ରସର ହେଲେ।
Verse 21
महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଶତ୍ରୁରାଜ୍ୟକୁ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରୁଥିବା ମହାବଳଚକ୍ର ସଦୃଶ ସେନାରେ ଘେରା, ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଓ କବଚ-ଶସ୍ତ୍ରରେ ସୁସଜ୍ଜିତ, ଭରତବଂଶର ବ୍ୟାଘ୍ର ଓ ଶତ୍ରୁଶୋକବିବର୍ଧକ ମହାପ୍ରତାପୀ ଭୀମସେନ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଗ୍ରହଣ କରି ପୂର୍ବ ଦିଗ ଜୟ କରିବାକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 22
महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ସେଇ ସମୟରେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶୋକ ବଢ଼ାଇବାଳା, ଭରତବଂଶର ବ୍ୟାଘ୍ର ସମ ମହାପ୍ରତାପୀ ଭୀମସେନ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଗ୍ରହଣ କରି, ଶତ୍ରୁରାଜ୍ୟକୁ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରିଦେବାକୁ ସକ୍ଷମ, ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଏବଂ ଶସ୍ତ୍ର-କବଚରେ ସୁସଜ୍ଜିତ ବିଶାଳ ସେନାରେ ଘେରା ହୋଇ, ପୂର୍ବଦିଗ୍ ଜୟ କରିବାକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 23
महता बलचक्रेण परराष्ट्रावमर्दिना । हस्त्यश्वरथपूर्णेन दंशितेन प्रतापवान् २ ।। वृतो भरतशार्टूलो द्विषच्छोकविवर्द्धन: । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इसी समय शत्रुओंका शोक बढ़ानेवाले भरतवंशशिरोमणि महाप्रतापी एवं पराक्रमी भीमसेन भी धर्मराजकी आज्ञा ले, शत्रुके राज्यको कुचल देनेवाली और हाथी, घोड़े एवं रथसे भरी हुई, कवच आदिसे सुसज्जित विशाल सेनाके साथ पूर्व दिशाको जीतनेके लिये चले
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜନମେଜୟ! ସେଇ ସମୟରେ ଭରତବଂଶର ବ୍ୟାଘ୍ର ସମ, ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କ ଶୋକ ବଢ଼ାଇବାଳା ମହାପ୍ରତାପୀ ଭୀମସେନ ଧର୍ମରାଜଙ୍କ ଆଜ୍ଞାନୁସାରେ, ହାତୀ-ଘୋଡ଼ା-ରଥରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ ଓ ଶସ୍ତ୍ର-କବଚରେ ସୁସଜ୍ଜିତ, ଶତ୍ରୁରାଜ୍ୟକୁ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରୁଥିବା ସୁସଂଗଠିତ ବିଶାଳ ସେନାରେ ଘେରା ହୋଇ, ପ୍ରତିପକ୍ଷ ରାଜ୍ୟମାନଙ୍କୁ ଜୟ କରିବାକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କଲେ।
Verse 29
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि दिग्विजयपर्वणि भीमदिग्विजये एकोनत्रिंशो5ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବର ଦିଗ୍ବିଜୟପର୍ବରେ ଭୀମଦିଗ୍ବିଜୟ-ବର୍ଣ୍ଣନାନ୍ତର୍ଗତ ଏକୋନତ୍ରିଂଶ (୨୯ତମ) ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 33
पज्चालान् विविधोपायै: सान्त्वयामास पाण्डव: । नरश्रेष्ठ भीमसेनने पहले पांचालोंकी महानगरी अहिच्छत्रामें जाकर भाँति-भाँतिके उपायोंसे पांचाल वीरोंको समझा-बुझाकर वशमें किया
ପାଣ୍ଡବ ଭୀମସେନ ବିଭିନ୍ନ ଉପାୟରେ ପାଞ୍ଚାଳମାନଙ୍କୁ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଇ ବୁଝାଇ-ଶୁଝାଇ ନିଜ ବଶରେ ଆଣିଲେ।
The chapter implicitly stages a governance dilemma: how to reconcile coercive expansion (kṣātra action) with ordered legitimacy—seeking submission, tribute, and administrative compliance rather than unchecked violence—so that conquest serves a recognized political-ritual objective.
Power is depicted as most durable when institutionalized: conquest is followed by communication, acknowledgment, and redistribution to the sovereign center, indicating that authority is sustained through procedure, accountability, and integration of diverse regions into a coherent polity.
No explicit phalaśruti appears in this adhyāya; its meta-function is archival and administrative—recording the scope of Nakula’s western alignment and the material basis it provides for Yudhiṣṭhira’s rājasūya trajectory.