Adhyaya 23
Sabha ParvaAdhyaya 2335 Versesअनिर्णीत—बल-समता के कारण युद्ध खिंचता है; निर्णायक बढ़त ‘नीति/रहस्य’ की ओर मुड़ती है।

Adhyaya 23

अर्जुनस्य दिग्विजयारम्भः — Arjuna Initiates the Northern Campaign and Secures Bhagadattta’s Tribute

Upa-parva: Digvijaya Parva (Directional Conquests and Tribute Collection)

This chapter opens with Vaiśaṃpāyana describing Arjuna (Pārtha) reporting to Yudhiṣṭhira after receiving superior weaponry (notably the best bow and inexhaustible quivers), along with a chariot, banner, and the assembly infrastructure. Arjuna frames the immediate state objective as kośa-vivardhana—expanding the treasury—through systematic collection of kara (tribute/tax) from rulers. He proposes departing for the northern direction associated with Kubera (Dhanada), explicitly noting auspicious calendrical conditions (tithi, muhūrta, nakṣatra). Yudhiṣṭhira responds with a formal benediction, wishing success that both discourages adversaries and gladdens allies. The narrative then broadens: Bhīma and the twins also depart with forces, each assigned a cardinal direction, while Yudhiṣṭhira remains at Khāṇḍavaprastha. Janamejaya requests a detailed account of these directional conquests; Vaiśaṃpāyana begins with Arjuna’s campaign: subduing regions such as Kuṇinda and others with measured exertion, assembling allied contingents, and advancing to Prāgjyotiṣa. There, King Bhagadatta—supported by Kirātas, Cīnas, and coastal/marshland fighters—engages Arjuna for eight days. After sustained combat, Bhagadatta acknowledges Arjuna’s prowess and seeks terms. Arjuna requests that Bhagadatta provide tribute to Yudhiṣṭhira, appealing to prior friendship lines and voluntary compliance. Bhagadatta agrees, affirming goodwill and readiness to fulfill the request.

Chapter Arc: राजसूय-यज्ञ की दिशा में बढ़ते पाण्डवों के सामने मगध-सम्राट जरासंध की अजेयता एक दीवार बनकर खड़ी होती है—और श्रीकृष्ण स्वयं पूछते हैं: हम तीनों में से किसके साथ युद्ध करने का साहस वह करेगा? → श्रीकृष्ण के प्रश्न पर जरासंध का अहंकार और क्षत्रिय-धर्म जाग उठता है; वह भीमसेन को चुनता है। दोनों महाबली निकट-युद्ध में उतरते हैं—घूरती दृष्टियाँ, सिंहों-सा क्रोध, पकड़-पकड़कर घसीटना, कमर-बगल-गर्दन पर दाँव, और पत्थर-प्रहार जैसे घूंसे; गर्जना-तर्जना के साथ दिन-पर-दिन युद्ध खिंचता जाता है। → त्रयोदशी तक युद्ध चलता है; चतुर्दशी की रात मगधराज थककर विराम लेता है। निर्णायक क्षण तब आता है जब श्रीकृष्ण भीम को संकेत देते हैं कि इस प्रतिद्वन्द्वी को ‘अधिक पीड़ा’ देकर नहीं, उसकी प्रकृति/रहस्य को समझकर समता से भिड़ना चाहिए—यहीं वध-नीति का द्वार खुलता है। → कृष्ण-वचन सुनकर परवीरहा भीम जरासंध के स्वरूप/रहस्य को पहचानकर वध का निश्चय करता है; अपराजित-से दिखने वाले शत्रु को जीतने हेतु वह अपनी शक्ति और रणनीति को एकाग्र करता है। → भीम ने वध-मत बना ली—पर जरासंध का ‘अजेय’ रहस्य क्या है, और किस उपाय से उसका अंत होगा?

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३९ श्लोक मिलाकर कुल ७५ श्लोक हैं) प्याज (_) अऑपि्-छऋाज त्रयोविशो<् ध्याय: जरासंधका भीमसेनके साथ युद्ध करनेका निश्चय, भीम और जरासंधका भयानक युद्ध तथा जरासंधकी थकावट वैशम्पायन उवाच ततस्तं निश्चितात्मानं युद्धाय यदुनन्दन: । उवाच वाग्मी राजानं जरासंधमधोक्षज:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा जरासंधने अपने मनमें युद्धका निश्चय कर लिया है, यह देख बोलनेमें कुशल यदुनन्दन भगवान्‌ श्रीकृष्णने उससे कहा

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ତେବେ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ମନରେ ଦୃଢ଼ ନିଶ୍ଚୟ କରିଥିବା ରାଜା ଜରାସନ୍ଧଙ୍କୁ ଦେଖି, ବାକ୍ପଟୁ ଯଦୁନନ୍ଦନ, ପରମେଶ୍ୱର ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ତାଙ୍କୁ ଯଥୋଚିତ ବଚନ କହିଲେ।

Verse 2

श्रीकृष्ण उवाच त्रयाणां केन ते राजन्‌ योद्धुमुत्सहते मन: । अस्मदन्यतमेनेह सज्जीभवतु को युधि,श्रीकृष्णने पूछा--राजन्‌! हम तीनोंमेंसे किस एक व्यक्तिके साथ युद्ध करनेके लिये तुम्हारे मनमें उत्साह हो रहा है? हममेंसे कौन तुम्हारे साथ युद्धके लिये तैयार हो?

ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଆମ ତିନିଜଣଙ୍କ ମଧ୍ୟରୁ କାହା ସହ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ତୁମ ମନ ଉତ୍ସୁକ? ଆମ ମଧ୍ୟରୁ ଯାହାକୁ ତୁମେ ବାଛ, ସେ ଏଠାରେ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ସଜ୍ଜ ହେଉ।

Verse 3

एवमुक्त: स नृपतिर्युद्ध वव्रे महाद्युति: । जरासंधस्ततो राजा भीमसेनेन मागध:,उनके इस प्रकार पूछनेपर महातेजस्वी मगधनरेश राजा जरासंधने भीमसेनके साथ युद्ध करना स्वीकार किया

ଏପରି କୁହାଯାଇଲାପରେ ମହାତେଜସ୍ୱୀ ମଗଧରାଜ ଜରାସନ୍ଧ ଯୁଦ୍ଧକୁ ସ୍ୱୀକାର କଲେ ଏବଂ ଭୀମସେନଙ୍କ ସହିତ ଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ମନୋନୀତ କଲେ।

Verse 4

आदाय रोचनां माल्यं मड़ल्यान्यपराणि च । धारयन्नगदान्‌ मुख्यान्‌ निर्वतीर्वेदनानि च । उपतस्थे जरासंध॑ युयुत्सुं वै पुरोहित:,जरासंधको युद्ध करनेके लिये उत्सुक देख उसके पुरोहित गोरोचन, माला, अन्यान्य मांगलिक वस्तुएँ तथा उत्तम-उत्तम ओषधियाँ, जो पीड़ाके समय भी सुख देनेवाली और मूर्च्छॉाकालमें भी होश बनाये रखनेवाली थीं, लेकर उसके पास आये

ଜରାସନ୍ଧଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧପ୍ରତି ଉତ୍ସୁକ ଦେଖି ତାଙ୍କ ପୁରୋହିତ ଗୋରୋଚନା, ମାଳା ଓ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ମଙ୍ଗଳଦ୍ରବ୍ୟ, ଏବଂ ବେଦନା ଶମନ କରୁଥିବା ଓ ମୂର୍ଛାରେ ମଧ୍ୟ ଚେତନା ଧରିରଖୁଥିବା ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଔଷଧ ନେଇ ତାଙ୍କ ନିକଟକୁ ଆସିଲେ।

Verse 5

कृतस्वस्त्ययनो राजा ब्राह्मणेन यशस्विना । समनहाज्जरासंध: क्षात्रं धर्ममनुस्मरन्‌,यशस्वी ब्राह्मणके द्वारा स्वस्तिवाचन सम्पन्न हो जानेपर जरासंध क्षत्रियधर्मका स्मरण करके युद्धके लिये कमर कसकर तैयार हो गया

ଯଶସ୍ୱୀ ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସ୍ୱସ୍ତିବାଚନ ସମ୍ପନ୍ନ ହେବା ପରେ, ରାଜା ଜରାସନ୍ଧ କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମକୁ ସ୍ମରଣ କରି କଟିବନ୍ଧ ବାନ୍ଧି ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ପ୍ରସ୍ତୁତ ହେଲେ।

Verse 6

अवमुच्य किरीटं स केशान्‌ समनुगृहा[ च । उदतिष्ठज्जरासंधो वेलातिग इवार्णव:,जरासंधने किरीट उतारकर केशोंको कसकर बाँध लिया। तत्पश्चात्‌ वह युद्धके लिये उठकर खड़ा हो गया; मानो महासागर अपनी मर्यादा--तटवर्तिनी भूमिको लाँघ जानेको उद्यत हो गया हो

ଜରାସନ୍ଧ ନିଜ କିରୀଟ ଖୋଲି କେଶକୁ ଦୃଢ଼ଭାବେ ବାନ୍ଧିଲା। ତାପରେ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଉଠି ଦାଁଡ଼ାଇଲା—ଯେପରି ମହାସାଗର ତଟସୀମା ଅତିକ୍ରମ କରିବାକୁ ଉମ୍ମୁଖ ହୁଏ।

Verse 7

उवाच मतिमान्‌ राजा भीम॑ भीमपराक्रम: । भीम योत्स्ये त्वया सार्ध श्रेयसा निर्जितं वरम्‌,उस समय भयानक पराक्रम करनेवाले बुद्धिमान्‌ राजा जरासंधने भीमसेनसे कहा --'भीम! आओ, मैं तुमसे युद्ध करूँगा; क्योंकि श्रेष्ठ पुरुषसे लड़कर हारना भी अच्छा है!

ସେତେବେଳେ ଭୟଙ୍କର ପରାକ୍ରମଶାଳୀ ବୁଦ୍ଧିମାନ ରାଜା ଜରାସନ୍ଧ ଭୀମସେନଙ୍କୁ କହିଲା—“ଭୀମ! ଆସ; ମୁଁ ତୋ ସହିତ ଯୁଦ୍ଧ କରିବି। କାରଣ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ପୁରୁଷଙ୍କ ହାତରେ ପରାଜିତ ହେବା ମଧ୍ୟ ଶ୍ରେୟସ୍କର।”

Verse 8

एवमुक्त्वा जरासंधो भीमसेनमरिंदम: । प्रत्युध्ययौ महातेजा: शक्रं बल इवासुर:,ऐसा कहकर महातेजस्वी शत्रुदमन जरासंध भीमसेनकी ओर बढ़ा; मानो बल नामक असुर इन्द्रसे भिड़नेके लिये बढ़ा जा रहा हो

ଏପରି କହି ମହାତେଜସ୍ବୀ ଶତ୍ରୁଦମନ ଜରାସନ୍ଧ ଭୀମସେନଙ୍କୁ ପ୍ରତିଯୁଦ୍ଧ କରିବାକୁ ଆଗେଇଲା—ଯେପରି ବଳି ନାମକ ଅସୁର ଶକ୍ର (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କୁ ସମ୍ମୁଖୀନ କରିବାକୁ ଯାଏ।

Verse 9

ततः सम्मन्त्रय कृष्णेन कृतस्वस्त्ययनो बली । भीमसेनो जरासंधमाससाद युयुत्सया,तदनन्तर बलवान भीमसेन भी श्रीकृष्णसे सलाह लेकर स्वस्तिवाचनके अनन्तर युद्धकी इच्छासे जरासंधके पास आ धमके

ତାପରେ ବଳବାନ ଭୀମସେନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ସହ ପରାମର୍ଶ କରି, ସ୍ୱସ୍ତିବାଚନ ଆଦି ମଙ୍ଗଳକ୍ରିୟା ସମ୍ପନ୍ନ କରାଇ, ଯୁଦ୍ଧେଚ୍ଛାରେ ଜରାସନ୍ଧଙ୍କ ନିକଟକୁ ପହଞ୍ଚିଲା।

Verse 10

ततस्तौ नरशार्दूलौ बाहुशस्त्रौ समीयतु: । वीरौ परमसंहृष्टावन्योन्यजयकड्क्षिणौ,फिर तो मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी वे दोनों वीर अत्यन्त हर्ष और उत्साहमें भरकर एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे अपनी भुजाओंसे ही आयुधका काम लेते हुए परस्पर भिड़ गये

ତାପରେ ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସିଂହସଦୃଶ ସେଇ ଦୁଇ ବୀର ନିଜ ଭୁଜକୁ ହିଁ ଶସ୍ତ୍ର କରି, ପରମ ହର୍ଷରେ ପରସ୍ପରକୁ ଜିତିବା ଆକାଂକ୍ଷାରେ ମୁହାଁମୁହିଁ ହୋଇ ଯୁଦ୍ଧରେ ଲିପ୍ତ ହେଲେ।

Verse 11

करग्रहणपूर्व तु कृत्वा पादाभिवन्दनम्‌ | कक्षै: कक्षां विधुन्वानावास्फोर्ट तत्र चक्रतु:ः,पहले उन दोनोंने हाथ मिलाये। फिर एक-दूसरेके चरणोंका अभिवन्दन किया। तत्पश्चात्‌ भुजाओंके मूलभागके संचालनसे वहाँ बँधे हुए बाजूबंदकी डोरको हिलाते हुए वे दोनों वीर वहीं ताल ठोंकने लगे

After first clasping hands, they paid obeisance at one another’s feet. Then, shaking their upper arms so that the cords of their armlets quivered, the two heroes began to slap their arms and stamp in challenge on the spot—an outward display of martial resolve, framed by the etiquette of mutual respect before contest.

Verse 12

स्कन्धे दोर्भ्या समाहत्य निहत्य च मुहुर्मुहु: । अड्मज्जैः समाश्लिष्य पुनरास्फालनं विभो,राजन! फिर वे दोनों हाथोंसे एक-दूसरेके कंधे-पर बार-बार चोट करते हुए अंग-अंगसे भिड़कर आपसमें गुँथ गये तथा एक-दूसरेको बार-बार रगड़ने लगे

O King, O mighty one, they struck each other again and again upon the shoulders with their arms; then, closing in and locking limb to limb, they grappled tightly and repeatedly ground and shook one another in the press of the contest. The scene underscores the raw force of physical rivalry, where pride and prowess drive men into ever-closer violence once restraint and measured conduct give way.

Verse 13

चित्रहस्तादिकं कृत्वा कक्षाबन्धं च चक्रतुः । गलगण्डाभिघातेन सस्फुलिड्रेन चाशनिम्‌,वे कभी हाथोंको बड़े वेगसे सिकोड़ लेते, कभी फैला देते, कभी ऊपर-नीचे चलाते और कभी मुट्ठी बाँध लेते। इस प्रकार चित्रहस्त आदि दाँव दिखाकर उन दोनोंने कक्षाबन्धका प्रयोग किया अर्थात्‌ एक-दूसरेकी काख या कमरमें दोनों हाथ डालकर प्रतिद्वद्दीको बाँध लेनेकी चेष्टा की। फिर गलेमें और गालमें ऐसे-ऐसे हाथ मारने लगे कि आगकी चिनगारी-सी निकलने लगी और वज्रपातका-सा शब्द होने लगा

Displaying a variety of wrestling feints such as the ‘citra-hasta’ (deceptive hand-movements), the two grappled and attempted the kakṣābandha hold—thrusting both arms into the opponent’s armpit/waist to bind and control him. Then they struck at neck and cheek with such force that sparks seemed to fly, and the blows resounded like a thunderbolt—an image of raw physical power unrestrained by gentleness, as the contest escalated into a test of dominance.

Verse 14

बाहुपाशादिकं कृत्वा पादाहतशिरावुभौ । उरोहस्तं ततश्नक्रे पूर्णकुम्भौ प्रयुज्य तो,तत्पश्चात्‌ वे 'बाहुपाश!श और “चरणपाश' आदि दाँव-पेंचोंसे काम लेते हुए एक-दूसरेपर पैरोंसे ऐसा भीषण प्रहार करने लगे कि शरीरकी नस-नाड़ियाँतक पीड़ित हो उठीं। तदनन्तर दोनोंने दोनोंपर 'पूर्णकुम्भ” नामक दाँव लगाया (दोनों हाथोंकी अंगुलियोंको परस्पर गूँथकर उन हाथोंकी हथेलियोंसे शत्रुके सिरको दबाया)। इसके बाद “उरोहस्त” का प्रयोग किया (छातीपर थप्पड़ मारना शुरू कर दिया)

Having first employed holds such as the “arm-noose,” the two then struck one another with their feet so fiercely that even the head was battered. Thereafter, both applied the maneuver called “pūrṇakumbha,” interlacing the fingers and pressing down upon the opponent’s head with the joined palms; and then they used “urohasta,” beginning to slap and strike upon the chest. The scene underscores how, once rivalry hardens into contest, skill and force can eclipse restraint, turning a display of prowess into a dangerous escalation.

Verse 15

करसम्पीडनं कृत्वा गर्जन्ती वारणाविव । नर्दन्तौ मेघसंकाशौ बाहुप्रहरणावुभौ,फिर एक-दूसरेके हाथ दबाकर वे दोनों दो गजराजोंकी भाँति गर्जने लगे। दोनों ही भुजाओंसे प्रहार करते हुए मेघके समान गम्भीर स्वरसे सिंहनाद करने लगे

After gripping and pressing each other’s hands, the two began to roar like a pair of lordly elephants. Both, striking with their arms, bellowed with a deep, cloud-like resonance—each displaying fearless strength and unyielding resolve in the contest.

Verse 16

तलेनाहन्यमानौ तु अन्योन्यं कृतवीक्षणौ । सिंहाविव सुसंक्रुद्धावाकृष्याकृष्य युध्यताम्‌,थप्पड़ोंकी मार खाकर वे परस्पर घूर-घूरकर देखते और अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए दो सिंहोंके समान एक-दूसरेको खींच-खींचकर लड़ने लगे

ହସ୍ତତଳର ଆଘାତ ଖାଇଲେ ମଧ୍ୟ ସେମାନେ ପରସ୍ପରଙ୍କୁ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଦୃଷ୍ଟିରେ ନିହାରିଲେ; ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧରେ ଉନ୍ମତ୍ତ ଦୁଇ ସିଂହ ପରି ଏକେ ଅନ୍ୟକୁ ଟାଣି-ହେଉଁଚି ଯୁଦ୍ଧ କଲେ।

Verse 17

अज्ञेनाज़ं समापीड्य बाहुभ्यामुभयोरपि । आवृत्य बाहुभिश्चापि उदरं च प्रचक्रतु:,उस समय दोनों अपने अंगों और भुजाओंसे प्रतिद्वन्द्ीके शरीरको दबाकर शत्रुकी पीठमें अपने गलेकी हँसली भिड़ाकर उसके पेटको दोनों बाँहोंसे कस लेते और उठाकर दूर फेंकते थे

ସେତେବେଳେ ଅକୌଶଳ ଗୁଠାଗୁଠିର ତାପରେ ଉଭୟେ ଦୁଇ ଭୁଜାରେ ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦୀକୁ ଭଲଭାବେ ଚାପିଲେ; ପରେ ଆଲିଙ୍ଗନରେ ଜକଡ଼ି ତାହାର ଉଦରକୁ ବାହୁବନ୍ଧରେ କସି ମୋଡ଼ି-ଟାଣି ଯୁଦ୍ଧ କଲେ।

Verse 18

उभौ कट्यां सुपाश्चे तु तक्षवन्तौ च शिक्षितौ । अधोहस्तं स्वकण्ठे तूदरस्योरसि चाक्षिपत्‌,इसी प्रकार कमरमें और बगलमें भी हाथ लगाकर दोनों प्रतिद्वन्द्ीको पछाड़नेकी चेष्टा करते थे। अपने शरीरको सिकोड़कर शत्रुकी पकड़से छूट जानेकी कला दोनों जानते थे। दोनों ही मल्लयुद्धकी शिक्षामें प्रवीण थे। वे उदरके नीचे हाथ लगाकर दोनों हाथोंसे पेटको लपेट लेते और विपक्षीको कण्ठ एवं छातीतक ऊँचे उठाकर धरतीपर दे मारते थे

ଏହିପରି କଟି ଓ ବଗଳରେ ହାତ ଲଗାଇ ସେମାନେ ପରସ୍ପରକୁ ପଛାଡ଼ିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କଲେ। ଶରୀରକୁ ସଙ୍କୋଚିତ କରି ପକଡ଼ରୁ ଛୁଟିଯିବା କଳା ଉଭୟେ ଜାଣୁଥିଲେ; ଉଭୟେ ମଲ୍ଲଯୁଦ୍ଧରେ ପ୍ରଶିକ୍ଷିତ। ଉଦର ତଳେ ହାତ ଦେଇ ଦୁଇ ବାହୁରେ ମଧ୍ୟଭାଗକୁ ଲପେଟି, ପ୍ରତିପକ୍ଷକୁ କଣ୍ଠ-ଉରସ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଉଠାଇ ଭୂମିରେ ଆଛାଡ଼ି ଦେଉଥିଲେ।

Verse 19

सर्वातिक्रान्तमर्याद पृष्ठभज़ च चक्रतुः । सम्पूर्णमूर्च्छा बाहुभ्यां पूर्णकुम्भं प्रचक्रतु:,फिर वे सारी मर्यादाओंसे ऊँचे उठे हुए 'पृष्ठभंग” नामक दाँव-पेंचसे काम लेने लगे (अर्थात्‌ एक-दूसरेकी पीठको धरतीसे लगा देनेकी चेष्टामें लग गये)। दोनों भुजाओंसे सम्पूर्ण मूर्च्छा (उदर आदिमें आघात करके मूच्छित करनेका प्रयत्न) तथा पूर्वोक्त पूर्णकुम्भका प्रयोग करने लगे

ତାପରେ ସେମାନେ ସମସ୍ତ ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଅତିକ୍ରମ କରି ‘ପୃଷ୍ଠଭଙ୍ଗ’ ନାମକ ଦାଉ ଧରିଲେ—ଅର୍ଥାତ୍ ଏକେ ଅନ୍ୟର ପିଠିକୁ ଭୂମିରେ ଲଗାଇବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କଲେ। ଦୁଇ ବାହୁରେ ସେମାନେ ‘ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣମୂର୍ଛା’—ମର୍ମସ୍ଥାନରେ ଆଘାତ କରି ମୂର୍ଛିତ କରିବା ପ୍ରୟାସ—ଏବଂ ‘ପୂର୍ଣ୍ଣକୁମ୍ଭ’ ଦାଉ ମଧ୍ୟ ପ୍ରୟୋଗ କଲେ।

Verse 20

तृणपीडं यथाकामं पूर्णयोगं समुष्टिकम्‌ । एवमादीनि युद्धानि प्रकुर्वन्ती परस्परम्‌,तदनन्तर वे अपनी इच्छाके अनुसार “तृणपीड” (रस्सी बनानेके लिये बटे जानेवाले तिनकोंकी भाँति हाथ-पैर आदिको ऐंठना) तथा मुष्टिकाघातसहित पूर्णयोग (मुक्केकी एक अंगमें मारनेकी चेष्टा दिखाकर दूसरे अंगमें आघात करना) आदि युद्धके दाँव-पेंचोंका प्रयोग एक-दूसरेपर करने लगे

ତାପରେ ସେମାନେ ଇଚ୍ଛାମତେ ‘ତୃଣପୀଡ’—ଦୋରି ପାଇଁ ତିନକୁ ବଟିବା ପରି ହାତ-ପାଦ ଆଦିକୁ ଏଁଠାଇବା—ଏବଂ ମୁଷ୍ଟିଘାତ ସହିତ ‘ପୂର୍ଣ୍ଣଯୋଗ’—ଏକ ଅଙ୍ଗରେ ଆଘାତର ଭାଣ କରି ଅନ୍ୟ ଅଙ୍ଗରେ ହଠାତ୍ ପ୍ରହାର—ଇତ୍ୟାଦି ଯୁଦ୍ଧଦାଉ ପରସ୍ପର ଉପରେ ପ୍ରୟୋଗ କଲେ।

Verse 21

तयोरयुद्ध॑ ततो द्रष्ट॑ समेता: पुरवासिन: । ब्राह्मणा वणिजल्चैव क्षत्रियाश्षन सहस्रश:,जनमेजय! उस समय उनका मल्लयुद्ध देखनेके लिये हजारों पुरवासी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्रियाँ एवं वृद्ध इकट्ठे हो गये। मनुष्योंकी अपार भीड़से वह स्थान ठसाठस भर गया

ଜନମେଜୟ! ସେ ସମୟରେ ତାଙ୍କର ମଲ୍ଲଯୁଦ୍ଧ ଦେଖିବାକୁ ନଗରବାସୀ ହଜାରେ ହଜାରେ—ବ୍ରାହ୍ମଣ, କ୍ଷତ୍ରିୟ, ବୈଶ୍ୟ, ଶୂଦ୍ର, ନାରୀ ଓ ବୃଦ୍ଧ—ଏକତ୍ର ହେଲେ। ମନୁଷ୍ୟଙ୍କ ଅପାର ଭିଡ଼ରେ ସେ ସ୍ଥାନ ଠସାଠସ ଭରିଗଲା।

Verse 22

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापव॑के अन्तर्गत जरासंधवधपर्वमें जरासंधका युद्धके लिये उद्योगविषयक बाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ,शूद्राश्न नरशार्दूल स्त्रियो वृद्धाश्व सर्वशः । निरन्तरम भूत्‌ तत्र जनौघैरभिसंवृतम्‌ जनमेजय! उस समय उनका मल्लयुद्ध देखनेके लिये हजारों पुरवासी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, स्त्रियाँ एवं वृद्ध इकट्ठे हो गये। मनुष्योंकी अपार भीड़से वह स्थान ठसाठस भर गया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ, ନରଶାର୍ଦୂଳ! ସେଠାରେ ଶୂଦ୍ର, ନାରୀ ଓ ବୃଦ୍ଧ ସହ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଲୋକ ନିର୍ବିଶେଷରେ ଏକତ୍ର ହେଲେ। ଜନସମୂହର ଉଠୁଥିବା ଭିଡ଼ରେ ସେ ସ୍ଥାନ ନିରନ୍ତର ଠସାଠସ ଭରି ସବୁଦିଗରୁ ଆବୃତ ହୋଇଗଲା।

Verse 23

तयोरथ भुजाघातान्निग्रहप्रग्रहात्‌ तथा । आसीत्‌ सुभीमसम्पातो वज्रपर्वतयोरिव,उन दोनोंकी भुजाओंके आघातसे तथा एक-दूसरेके निग्रह-प्रग्रहसे- ऐसा भयंकर चटचट शब्द होता था, मानो वज्र और पर्वत परस्पर टकरा रहे हों इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि जरासंधवधपर्वणि जरासंधक्लान्तौ त्रयोविंशो5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापववके अन्तर्गत जरायंधवधपर्वमें जरायंधकी थकावटसे सम्बन्ध रखनेवाला तेईसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ତାପରେ ତାଙ୍କ ଭୁଜାଘାତ ଓ ପରସ୍ପରକୁ ଧରି-ଛାଡ଼ି ଟାଣାଟାଣିରେ ପୁନଃପୁନଃ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଭୟଙ୍କର ଚଟଚଟ ଶବ୍ଦ ଉଠିଲା—ଯେପରି ବଜ୍ର ଓ ପର୍ବତ ପରସ୍ପର ଧକ୍କା ଖାଉଛନ୍ତି।

Verse 24

उभौ परमसंदहृष्टौ बलेन बलिनां वरौ | अन्योन्यस्यान्तरं प्रेप्सू परस्परजयैषिणौ,बलवानोंमें श्रेष्ठ वे दोनों वीर अत्यन्त हर्ष एवं उत्साहमें भरे हुए थे और एक-दूसरेकी दुर्बलता या असावधानीपर दृष्टि रखते हुए परस्पर बलपूर्वक विजय पानेकी इच्छा रखते थे

ବଳବାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସେ ଦୁଇ ବୀର ନିଜ ବଳରେ ପରମ ହର୍ଷିତ ଥିଲେ। ପରସ୍ପରର ଚୁକ୍ କିମ୍ବା ଦୁର୍ବଳତାର ଅବସର ଖୋଜି, ଦୁହେଁ ବଳପ୍ରୟୋଗରେ ଜୟ ଲାଭ କରିବାକୁ ଚାହୁଁଥିଲେ।

Verse 25

तद्‌ भीममुत्सार्यजनं युद्धमासीदुपप्लवे । बलिनो: संयुगे राजन्‌ वृत्रवासवयोरिव,राजन्‌! उस समरभूमिमें जहाँ वृत्रासुर और इन्द्रकी भाँति उन दोनों बलवान वीरोंमें संघर्ष छिड़ा था, ऐसा भयंकर युद्ध हुआ कि दर्शकलोग दूर भाग खड़े हुए

ହେ ରାଜନ! ତେବେ ଭୟରେ ଦର୍ଶକମାନେ ଦୂରକୁ ସରିଗଲେ, ଏବଂ ଉପପ୍ଲବରେ ଯୁଦ୍ଧ ଆରମ୍ଭ ହେଲା। ସେ ଦୁଇ ବଳବାନଙ୍କ ସଂଘର୍ଷ ଯେପରି ବୃତ୍ର ଓ ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର)ର ଯୁଦ୍ଧ।

Verse 26

प्रकर्षणाकर्षणा भ्यामनुकर्षविकर्षणै: । आचर्कर्षतुरन्योन्यं जानुभिश्वावजघ्नतु:,वे एक-दूसरेको पीछे ढकेलते और आगे खींचते थे। बार-बार खींचतान और छीना- झपटी करते थे। दोनोंने अपने प्रहारोंसे एक-दूसरेके शरीरमें खरौंच एवं घाव पैदा कर दिये और दोनों दोनोंको पटककर घुटनोंसे मारने तथा रगड़ने लगे

ସେମାନେ ପରସ୍ପରକୁ ଜୋରେ ଠେଲି ଓ ଟାଣି—ବାରମ୍ବାର ଟାଣାଟାଣି କରି—ନିକଟ ଯୁଦ୍ଧରେ ଗୁଞ୍ଜିଗଲେ। ପୁନଃପୁନଃ ପ୍ରହାରରେ ଦେହରେ ଖରୋଚ ଓ ଘାଉ ହେଲା; ତାପରେ ଏକାପରକୁ ପକାଇ ଘୁଁଟିରେ ମାରି ଓ ଚେପି ଘସିଲେ—ପ୍ରତିସ୍ପର୍ଧାର ତାପରେ ସଂଯମ ଭୁଲି।

Verse 27

ततः शब्देन महता भर्त्सयन्तौ परस्परम्‌ | पाषाणसंघातनिभै: प्रहारैरभिजघ्नतु:,फिर बड़े भारी गर्जन-तर्जनके द्वारा आपसमें डाँट बताते हुए एक-दूसरेपर ऐसे प्रहार करने लगे मानो पत्थरोंकी वर्षा कर रहे हों

ତାପରେ ମହା ଶବ୍ଦ କରି ପରସ୍ପରକୁ ଭର୍ତ୍ସନା କରୁଥିବା ସେମାନେ, ପାଷାଣବର୍ଷା ପରି ଲାଗୁଥିବା ପ୍ରହାରରେ ଏକାପରକୁ ଆଘାତ କରିଲେ—କଟୁ କଥା ଶୀଘ୍ର ହିଂସାରେ ପରିଣତ ହେଲା।

Verse 28

व्यूढोरस्कौ दीर्घभुजौ नियुद्धकुशलावुभौ । बाहुभि: समसज्जेतामायसै: परिघैरिव,दोनोंकी छाती चौड़ी और भुजाएँ बड़ी-बड़ी थीं। दोनों ही मल्लयुद्धमें कुशल थे और लोहेकी परिघ-जैसी मोटी भुजाओंको भिड़ाकर आपसमें गुँथ जाते थे

ଦୁହେଁଙ୍କର ବିସ୍ତୃତ ବକ୍ଷ ଓ ଦୀର୍ଘ, ପ୍ରବଳ ବାହୁ ଥିଲା। ଦୁହେଁ ନିୟୁଦ୍ଧରେ କୁଶଳ; ଏବଂ ଲୋହାର ପରିଘ ପରି ଦୃଢ଼ ବାହୁ ଭିଡ଼ାଇ, ଲୋହଦଣ୍ଡ ଟକ୍କର ମାରୁଥିବା ପରି ପରସ୍ପରେ ଗୁଞ୍ଜିଗଲେ।

Verse 29

कार्तिकस्य तु मासस्य प्रवृत्तं प्रथमेडहनि । अनाहार दिवारात्रमविश्रान्तमवर्तत,कार्तिक मासके पहले दिन उन दोनोंका युद्ध प्रारम्भ हुआ और दिन-रात बिना खाये- पिये अविरामगतिसे चलता रहा

କାର୍ତ୍ତିକ ମାସର ପ୍ରଥମ ଦିନରୁ ତାଙ୍କର ଯୁଦ୍ଧ ଆରମ୍ଭ ହେଲା; ଏବଂ ତାହା ଅନ୍ନ-ଜଳ ବିନା, ଦିନ-ରାତି, ବିଶ୍ରାମ ଛଡ଼ା ଅବିରତ ଚାଲିଲା।

Verse 30

तद्‌ वृत्तं तु त्रयोदश्यां समवेतं महात्मनो: । चतुर्दश्यां निशायां तु निवृत्तो मागध: क्लमातू्‌,उन महात्माओंका वह युद्ध इसी रूपमें त्रयोदशी-तक होता रहा। चतुर्दशीकी रातमें मगधनरेश जरासंध क्लेशसे थककर युद्धसे निवृत्त-सा होने लगा

ଏହିପରି ସେଇ ମହାତ୍ମା ଦୁଇଜଣଙ୍କର ସଂଘର୍ଷ ତ୍ରୟୋଦଶୀ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଚାଲିଲା। କିନ୍ତୁ ଚତୁର୍ଦ୍ଦଶୀର ରାତିରେ ମାଗଧରାଜ ଜରାସନ୍ଧ ପରିଶ୍ରମରେ କ୍ଲାନ୍ତ ହୋଇ ଯୁଦ୍ଧରୁ ଯେନ ନିବୃତ୍ତ ହେବାକୁ ଲାଗିଲେ।

Verse 31

त॑ राजानं तथा क्लान्तं दृष्टवा राजज्जनार्दन: । उवाच भीमकर्माणं भीम॑ सम्बोधयन्निव,राजन! उसे इस प्रकार थका देख भगवान्‌ श्रीकृष्ण भयानक कर्म करनेवाले भीमसेनको समझाते हुए-से बोले--

ରାଜାଙ୍କୁ ଏପରି ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ଲାନ୍ତ ଦେଖି, ରାଜନ୍-ଜନାର୍ଦ୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ, ଯେନେ ଉପଦେଶ ଦେଇ ଜାଗେଇ ଦେଉଛନ୍ତି, ଭୟଙ୍କର କର୍ମକର୍ତ୍ତା ଭୀମସେନଙ୍କୁ କହିଲେ।

Verse 32

क्लान्त:ः शत्रुर्न कौन्तेय लभ्य: पीडयितुं रणे । पीड्यमानो हि कार्त्स्येन जह्माज्जीवितमात्मन:,“कुन्तीनन्दन! शत्रु थक गया हो तो युद्धमें उसे अधिक पीड़ा देना उचित नहीं है। यदि उसे पूर्णतः: पीड़ा दी जाय तो वह अपने प्राण त्याग देगा

କୌନ୍ତେୟ! ଶତ୍ରୁ କ୍ଲାନ୍ତ ହୋଇଗଲେ ରଣରେ ତାକୁ ଆଉ ଅଧିକ ପୀଡ଼ା ଦେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ; କାରଣ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ଭାବେ ପୀଡ଼ିତ ହେଲେ ସେ ନିଜ ପ୍ରାଣ ତ୍ୟାଗ କରିପାରେ।

Verse 33

तस्मात्‌ ते नैव कौन्तेय पीडनीयो जनाधिप: । सममेतेन युध्यस्व बाहुभ्यां भरतर्षभ,“अतः पार्थ! तुम्हें राजा जरासंधको अधिक पीड़ा नहीं देनी चाहिये। भरतश्रेष्ठ! तुम अपनी भुजाओंद्वारा इनके साथ समभावसे ही युद्ध करो”

ଏହେତୁ କୌନ୍ତେୟ! ଏହି ଜନାଧିପଙ୍କୁ ତୁମେ ଆଉ ଅଧିକ ପୀଡ଼ା ଦେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ। ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ନିଜ ଭୁଜବଳରେ ତାଙ୍କ ସହ ସମଭାବରେ ଯୁଦ୍ଧ କର।

Verse 34

एवमुक्त: स कृष्णेन पाण्डव: परवीरहा । जरासंधस्य तद्‌ रूपं ज्ञात्वा चक्रे मतिं वधे,भगवान्‌ श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका नाश करनेवाले पाण्डुकुमार भीमसेनने जरासंधको थका हुआ जानकर उसके वधका विचार किया

ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଏପରି କହିବା ପରେ, ପରବୀରହା ପାଣ୍ଡବ ଭୀମସେନ, ଜରାସନ୍ଧଙ୍କ ସେହି ଅବସ୍ଥା ଜାଣି, ତାଙ୍କ ବଧ ପାଇଁ ମନେ ନିଶ୍ଚୟ କଲେ।

Verse 35

ततस्तमजितं जेतुं जरासंधं वृकोदर: । संरम्भं बलिनां श्रेष्ठो जग्राह कुरुनन्दन:,तदनन्तर कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले बलवानोंमें श्रेष्ठ वकोदरने उस अपराजित शत्रु जरासंधको जीतनेके लिये भारी क्रोध धारण किया

ତାପରେ, ସେହି ଅଜିତ ଜରାସନ୍ଧକୁ ଜିତିବା ପାଇଁ, ବଳବାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୃକୋଦର—ହେ କୁରୁନନ୍ଦନ—ପ୍ରଚଣ୍ଡ ଉଦ୍ୟମ-ଆବେଶ ଧାରଣ କଲେ।

Frequently Asked Questions

The chapter balances coercive capacity with claims of legitimacy: tribute is sought to consolidate Yudhiṣṭhira’s sovereignty, yet the narrative stresses auspicious protocol, measured force, and voluntary compliance to frame expansion as orderly governance rather than mere predation.

Political power is portrayed as accountable to procedure and purpose: martial success is subordinated to state-building aims (kośa, stability, recognition) and ideally moderated by restraint, diplomacy, and respect-based persuasion.

No explicit phalaśruti is presented here; the meta-layer instead appears through Janamejaya’s request for expanded narration, signaling that the ethical and historical significance lies in careful hearing and contextual understanding of statecraft episodes.