Adhyaya 19
Sabha ParvaAdhyaya 1928 Verses

Adhyaya 19

मागधगिरिव्रजप्रवेशः — Entry into Girivraja and Jarāsandha’s Protocol Inquiry

Upa-parva: Giri-vraja (Māgadha) Praveśa — Jarāsandha-sanniveśa Episode

The chapter opens with Vāsudeva describing to Pārtha (Arjuna) the auspicious Māgadha settlement and the natural fortification of Girivraja by five prominent peaks, portraying the city as protected by mountain ridges and fragrant forests. The narration (Vaiśaṃpāyana) then follows Kṛṣṇa, Bhīma, and Arjuna as they proceed to the Māgadha capital, observing its populous, prosperous streets, markets, and festival-like abundance. They forcefully acquire garlands and adopt an outward appearance consistent with a chosen disguise, moving toward Jarāsandha’s residence with deliberate intent. Jarāsandha, engaged in ritual proceedings, receives them with the customary honors due to visiting brāhmaṇas, yet becomes suspicious because their bodily marks and ornamentation conflict with snātaka norms. He questions their identity, their breach of a mountain-shrine structure for entry, and the purpose of their arrival, emphasizing that truth is fitting for kings. Kṛṣṇa replies with a calibrated ethical rationale: social rules differ by class and context, kṣatriya prosperity is associated with visible signs, and entry conventions vary between hostile and friendly houses. He concludes that those who arrive with an objective do not accept honors from an adversary, presenting a principled justification for refusing ritual hospitality while maintaining truthful discourse.

Chapter Arc: तपोवन-चर महर्षि चण्डकौशिक का आगमन होता है; मथुरा के नरेश बृहद्रथ (भविष्य के जरासंध के पिता) उन्हें नगर-समेत, अमात्यों और परिवार सहित आदरपूर्वक लेने निकलते हैं। → राजा पाद्य-अर्घ्य-आचमनीय से पूजन कर महर्षि को संतुष्ट करता है और राज्य-समृद्धि सहित अपने पुत्र के विषय में जिज्ञासा/निवेदन करता है—यह पुत्र कैसा होगा, उसका भाग्य क्या लिखेगा? → चण्डकौशिक दिव्यदृष्टि से भविष्यवाणी करते हैं: यह पुत्र (जरासंध) असाधारण सामर्थ्यवान होगा; अन्य नरेश उसके आज्ञाधीन होंगे—जैसे देहधारी प्राणियों पर वायु का स्वाभाविक अधिकार होता है, वैसे ही उसका प्रभुत्व फैलेगा। → वैशम्पायन आगे बताते हैं कि दीर्घकाल तपोवन में रहकर बृहद्रथ पत्नी सहित स्वर्गगमन करते हैं; समय के साथ मथुरा-प्रदेश में गदा-परंपरा/गदावसान की ख्याति और जरासंध के राज्य-तंत्र का उभार संकेतित होता है। → मथुरा के निकट ‘गदावसान’ की सूचना नगरवासियों द्वारा श्रीकृष्ण तक पहुँचती है और जरासंध के मंत्रि-परिषद (हंस-डिम्भक आदि) का उल्लेख आगे के राजनीतिक संघर्ष की भूमिका बाँध देता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल १३ श्लोक हैं) ऑपनआक्राा बा 5 एकोनविशो< ध्याय: चण्डकौशिक मुनिके द्वारा जरासंधका भविष्यकथन तथा पिताके द्वारा उसका राज्याभिषेक करके वनमें जाना श्रीकृष्ण उवाच कस्यचित्‌ त्वथ कालस्य पुनरेव महातपा: । मगधेषूपचक्राम भगवांश्षण्डकौशिक:,श्रीकृष्ण कहते हैं--राजन्‌! कुछ कालके पश्चात्‌ महातपस्वी भगवान्‌ चण्डकौशिक मुनि पुनः मगधदेशमें घूमते हुए आये

ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! କିଛି କାଳ ପରେ ମହାତପସ୍ବୀ ଭଗବାନ୍ ଚଣ୍ଡକୌଶିକ ମୁନି ପୁନର୍ବାର ମଗଧଦେଶରେ ବିଚରଣ କରୁଥିବାବେଳେ ଆସିଲେ।

Verse 2

तस्यागमनसंदृष्ट: सामात्य: सपुर:सर: । सभार्य: सह पुत्रेण निर्जगाम बृहद्रथ:,उनके आगमनसे राजा बृहद्रथको बड़ी प्रसन्नता हुई। वे मन्त्री, अग्रगामी सेवक, रानी तथा पुत्रके साथ मुनिके पास गये

ମୁନିଙ୍କ ଆଗମନ ଦେଖି ରାଜା ବୃହଦ୍ରଥ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ। ସେ ମନ୍ତ୍ରୀମାନେ, ଆଗରେ ଚାଲୁଥିବା ସେବକମାନେ, ରାଣୀ ଓ ପୁତ୍ର ସହିତ ମୁନିଙ୍କୁ ସ୍ୱାଗତ କରିବାକୁ ବାହାରିଲେ।

Verse 3

पाद्यार्ष्याचमनीयैस्तमर्चयामास भारत | स नृपो राज्यसहितं पुत्र॑ तस्मै न्‍्यवेदयत्‌,भारत! पाद्य, अर््ध और आचमनीय आदिके द्वारा राजाने महर्षिका पूजन किया और अपने सारे राज्यके सहित पुत्रको उन्हें सौंप दिया

ହେ ଭାରତ! ରାଜା ପାଦ୍ୟ, ଅର୍ଘ୍ୟ ଓ ଆଚମନୀୟ ଆଦି ଦ୍ୱାରା ମହର୍ଷିଙ୍କୁ ପୂଜା କଲେ। ପରେ ସେ ନିଜ ସମଗ୍ର ରାଜ୍ୟ ସହିତ ପୁତ୍ରକୁ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କୁ ଅର୍ପଣ କଲେ।

Verse 4

प्रतिगृह् च तां पूजां पार्थिवाद्‌ भगवानृषि: । उवाच मागध॑ राजन प्रह्ृष्टेनान्तरात्मना,महाराज! राजाकी ओरसे प्राप्त हुई उस पूजाको स्वीकार करके ऐश्वर्यशाली महर्षिने मगधनरेशको सम्बोधित करके प्रसन्न चित्तसे कहा--“राजन्‌! जरासंधके जन्मसे लेकर अबतककी सारी बातें मुझे दिव्य दृष्टिसे ज्ञात हो चुकी हैं। राजेन्द्र! अब यह सुनो कि तुम्हारा पुत्र भविष्यमें कैसा होगा?

ରାଜାଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଦିଆଯାଇଥିବା ସେହି ପୂଜାକୁ গ্ৰହଣ କରି, ଅନ୍ତରେ ପ୍ରହର୍ଷିତ ଭଗବାନ ଋଷି ମଗଧରାଜଙ୍କୁ କହିଲେ—“ହେ ରାଜନ! ତୁମ ପୁତ୍ରର ଜନ୍ମରୁ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ସମସ୍ତ କଥା ମୋତେ ଦିବ୍ୟଦୃଷ୍ଟିରେ ଜଣା। ଏବେ ଶୁଣ—ଭବିଷ୍ୟତରେ ତୁମ ପୁତ୍ର କିପରି ହେବ।”

Verse 5

सर्वमेतन्मया ज्ञातं राजन्‌ दिव्येन चक्षुषा । पुत्रस्तु शृणु राजेन्द्र यादृशो5यं भविष्यति,महाराज! राजाकी ओरसे प्राप्त हुई उस पूजाको स्वीकार करके ऐश्वर्यशाली महर्षिने मगधनरेशको सम्बोधित करके प्रसन्न चित्तसे कहा--“राजन्‌! जरासंधके जन्मसे लेकर अबतककी सारी बातें मुझे दिव्य दृष्टिसे ज्ञात हो चुकी हैं। राजेन्द्र! अब यह सुनो कि तुम्हारा पुत्र भविष्यमें कैसा होगा?

ହେ ରାଜନ! ଏ ସବୁ ମୋତେ ଦିବ୍ୟଦୃଷ୍ଟିରେ ଜଣା। ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ଏବେ ଶୁଣ—ଭବିଷ୍ୟତରେ ଏହି ପୁତ୍ର କିପରି ହେବ।

Verse 6

अस्य रूपं च सत्त्वं च बलमूर्जितमेव च । एष श्रिया समुदित: पुत्रस्तव न संशय:,“इसमें रूप, सत्त्व, बल और ओजका विशेष आविर्भाव होगा। इसमें संदेह नहीं कि तुम्हारा यह पुत्र साम्राज्यलक्ष्मीसे सम्पन्न होगा

ଏହି ପୁତ୍ରରେ ରୂପ, ସତ୍ତ୍ୱ, ବଳ ଓ ଓଜର ବିଶେଷ ପ୍ରକାଶ ହେବ। ସନ୍ଦେହ ନାହିଁ—ତୁମର ଏହି ପୁତ୍ର ଶ୍ରୀ-ସମୃଦ୍ଧିରେ ସମୁଦ୍ଧତ ହେବ।

Verse 7

प्रापयिष्यति तत्‌ सर्व विक्रमेण समन्वित: । अस्य वीर्यवतो वीर्य नानुयास्यन्ति पार्थिवा:,“यह पराक्रमयुक्त होकर सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेगा। जैसे उड़ते हुए गरुडके वेगको दूसरे पक्षी नहीं पा सकते, उसी प्रकार इस बलवान्‌ राजकुमारके शौर्यका अनुसरण दूसरे राजा नहीं कर सकेंगे। जो लोग इससे शत्रुता करेंगे, वे नष्ट हो जायूँगे

ଏହି ବୀର ପରାକ୍ରମସମ୍ପନ୍ନ ହୋଇ ନିଜ ପୌରୁଷରେ ସମସ୍ତ ଅଭୀଷ୍ଟ ପ୍ରାପ୍ତ କରିବ। ଯେପରି ଉଡୁଥିବା ଗରୁଡ଼ର ବେଗକୁ ଅନ୍ୟ ପକ୍ଷୀମାନେ ଧରିପାରନ୍ତି ନାହିଁ, ସେପରି ଏହି ବଳବାନ ରାଜକୁମାରଙ୍କ ଶୌର୍ୟକୁ ଅନ୍ୟ ରାଜାମାନେ ଅନୁସରଣ କରିପାରିବେ ନାହିଁ।

Verse 8

पततो वैनतेयस्य गतिमन्ये यथा खगा: । विनाशमुपयास्यन्ति ये चास्य परिपन्थिन:,“यह पराक्रमयुक्त होकर सम्पूर्ण अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त कर लेगा। जैसे उड़ते हुए गरुडके वेगको दूसरे पक्षी नहीं पा सकते, उसी प्रकार इस बलवान्‌ राजकुमारके शौर्यका अनुसरण दूसरे राजा नहीं कर सकेंगे। जो लोग इससे शत्रुता करेंगे, वे नष्ट हो जायूँगे

ଯେପରି ଉଡୁଥିବା ବୈନତେୟ (ଗରୁଡ଼)ର ଗତିକୁ ଅନ୍ୟ ପକ୍ଷୀମାନେ ପାଇପାରନ୍ତି ନାହିଁ, ସେପରି ଏହାର ପରାକ୍ରମକୁ କେହି ସମକକ୍ଷ ହୋଇପାରିବେ ନାହିଁ। ଯେମାନେ ଏହାର ପଥରେ ପ୍ରତିବନ୍ଧକ ହୋଇ ଶତ୍ରୁତା କରିବେ, ସେମାନେ ନିଶ୍ଚୟ ବିନାଶକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେବେ।

Verse 9

देवैरपि विसृष्टानि शस्त्राण्यस्य महीपते । न रुजं जनयिष्यन्ति गिरेरिव नदीरया:,“महीपते! जैसे नदीका वेग किसी पर्वतको पीड़ा नहीं पहुँचा सकता, उसी प्रकार देवताओंके छोड़े हुए अस्त्र-शस्त्र भी इसे चोट नहीं पहुँचा सकेंगे

ହେ ମହୀପତେ! ଦେବତାମାନେ ମଧ୍ୟ ଛାଡ଼ିଥିବା ଅସ୍ତ୍ର-ଶସ୍ତ୍ର ଏହାକୁ ବେଦନା ଦେଇପାରିବେ ନାହିଁ; ଯେପରି ନଦୀର ବେଗ ପର୍ବତକୁ ଆହତ କରିପାରେ ନାହିଁ।

Verse 10

सर्वमूर्धाभिषिक्तानामेष मुर्धश्नि ज्वलिष्यति । प्रभाहरो<यं सर्वेषां ज्योतिषामिव भास्कर:,“जिनके मस्तकपर राज्याभिषेक हुआ है, उन सभी राजाओंके ऊपर रहकर यह अपने तेजसे प्रकाशित होता रहेगा। जैसे सूर्य समस्त ग्रह-नक्षत्रोंकी कान्ति हर लेते हैं, उसी प्रकार यह राजकुमार समस्त राजाओंके तेजको तिरस्कृत कर देगा

ମୁଣ୍ଡରେ ରାଜ୍ୟାଭିଷେକ ପାଇଥିବା ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କ ଉପରେ ଏହି ରାଜକୁମାର ଶିରୋମଣି ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ ହୋଇ ଜ୍ୱଳିବ। ଯେପରି ଭାସ୍କର ସମସ୍ତ ଜ୍ୟୋତିର ପ୍ରଭାକୁ ମ୍ଲାନ କରେ, ସେପରି ଏହା ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କ ତେଜକୁ ଅତିକ୍ରମ କରିବ।

Verse 11

एनमासाद्य राजान: समृद्धबलवाहना: । विनाशमुपयास्यन्ति शलभा इव पावकम्‌,“जैसे फतिंगे आगमें जलकर भस्म हो जाते हैं, उसी प्रकार सेना और सवारियोंसे भरे- पूरे समृद्धिशाली नरेश भी इससे टक्कर लेते ही नष्ट हो जायँगे

ସେନା ଓ ବାହନରେ ସମୃଦ୍ଧ ରାଜାମାନେ ମଧ୍ୟ ଏହାକୁ ସମ୍ମୁଖୀନ ହେଲେ ବିନାଶକୁ ଧାଉଥିବେ—ଯେପରି ଶଲଭ ଅଗ୍ନିରେ ପଡ଼େ।

Verse 12

एष श्रिय: समुदिता: सर्वराज्ञां ग्रहीष्यति । वर्षास्विवोदीर्णजला नदीर्नदनदीपति:,“यह समस्त राजाओंकी संगृहीत सम्पदाओंको उसी प्रकार अपने अधिकारमें कर लेगा, जैसे नदों और नदियोंका अधिपति समुद्र वर्षा-ऋतुमें बढ़े हुए जलवाली नदियोंको अपनेमें मिला लेता है

ଏ ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କର ସଞ୍ଚିତ ଶ୍ରୀ-ସମ୍ପଦକୁ ସେହିପରି ନିଜ ଅଧିକାରରେ ନେଇଯିବ, ଯେପରି ବର୍ଷାକାଳରେ ଜଳରେ ଉଦ୍ଧତ ନଦୀମାନଙ୍କୁ ନଦ-ନଦୀର ଅଧିପତି ସମୁଦ୍ର ନିଜ ମଧ୍ୟରେ ଲୀନ କରେ।

Verse 13

एष धारयिता सम्यक्‌ चातुर्वर्ण्य महाबल: । शुभाशुभमिव स्फीता सर्वसस्यधरा धरा,“यह महाबली राजकुमार चारों वर्णोको भलीभाँति धारण करेगा (उन्हें आश्रय देगा;) ठीक वैसे ही, जैसे सभी प्रकारके धान्योंको धारण करनेवाली समृद्धिशालिनी पृथ्वी शुभ और अशुभ सबको आश्रय देती है

ଏ ମହାବଳୀ ରାଜକୁମାର ଚାତୁର୍ବର୍ଣ୍ୟକୁ ସମ୍ୟକ୍ ଭାବେ ଧାରଣ କରିବ (ଆଶ୍ରୟ ଦେବ); ଯେପରି ସମସ୍ତ ଶସ୍ୟକୁ ଧାରଣ କରୁଥିବା ସମୃଦ୍ଧ ଧରା ଶୁଭ-ଅଶୁଭ ସବୁକୁ ଆଶ୍ରୟ ଦେଇଥାଏ।

Verse 14

अस्याज्ञावशगा: सर्वे भविष्यन्ति नराधिपा: । सर्वभूतात्मभूतस्य वायोरिव शरीरिण:,“जैसे सब देहधारी समस्त प्राणियोंके आत्मारूप वायुदेवके अधीन होते हैं, उसी प्रकार सभी नरेश इसकी आज्ञाके अधीन होंगे

ଯେପରି ସମସ୍ତ ଭୂତମାନଙ୍କର ଆତ୍ମସ୍ୱରୂପ ବାୟୁର ଅଧୀନରେ ସମସ୍ତ ଦେହଧାରୀ ରହନ୍ତି, ସେପରି ସମସ୍ତ ନରାଧିପ ଏହାର ଆଜ୍ଞାବଶଗ ହେବେ।

Verse 15

एष रुद्रं महादेवं त्रिपुरान्तकरं हरम्‌ | सर्वलोकेष्वतिबल: साक्षाद्‌ द्रक्ष्यति मागध:,“यह मगधराज सम्पूर्ण लोकोंमें अत्यन्त बलवान्‌ होगा और त्रिपुरासुरका नाश करनेवाले सर्वदुःखहारी महादेव रुद्रकी आराधना करके उनका प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त करेगा”

ଏ ମଗଧରାଜ ସମସ୍ତ ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଅତିବଳବାନ୍ ହେବ ଏବଂ ତ୍ରିପୁରାନ୍ତକ, ସର୍ବଦୁଃଖହାରୀ ମହାଦେବ ରୁଦ୍ରଙ୍କୁ ଆରାଧନା କରି ସାକ୍ଷାତ୍ ଦର୍ଶନ ପାଇବ।

Verse 16

एवं ब्रुवन्नेव मुनि: स्वकार्यमिव चिन्तयन्‌ । विसर्जयामास नृपं बृहद्रथमथारिहन्‌,शत्रुसूदन नरेश! ऐसा कहकर अपने कार्यके चिन्तनमें लगे हुए मुनिने राजा बृहद्रथको विदा कर दिया

ଶତ୍ରୁସୂଦନ ନରେଶ! ଏପରି କହି, ନିଜ କାର୍ଯ୍ୟ ଚିନ୍ତାରେ ଲୀନ ଥିବା ପରି ମୁନି ତାପରେ ରାଜା ବୃହଦ୍ରଥଙ୍କୁ ବିଦା କରିଦେଲେ।

Verse 17

प्रविश्य नगरीं चापि ज्ञातिसम्बन्धिभिववृत: । अभिषिच्य जरासंधं मगधाधिपतिस्तदा,राजधानीमें प्रवेश करके अपने जाति-भाइयों और सगे-सम्बन्धियोंसे घिरे हुए मगधनरेश बृहद्रथने उसी समय जरासंधका राज्याभिषेक कर दिया। ऐसा करके उन्हें बड़ा संतोष हुआ। जरासंधका अभिषेक हो जानेपर महाराज बृहद्रथ अपनी दोनों पत्नियोंके साथ तपोवनमें चले गये

ରାଜଧାନୀରେ ପ୍ରବେଶ କରି, ଜାତି‑ଭାଇ ଓ ସଗା‑ସମ୍ବନ୍ଧୀମାନଙ୍କ ଘେରାଉରେ ଥିବା ମଗଧାଧିପତି ବୃହଦ୍ରଥ ସେହି କ୍ଷଣେ ଜରାସନ୍ଧଙ୍କର ରାଜ୍ୟାଭିଷେକ କଲେ। ତାଙ୍କୁ ସିଂହାସନରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠା କରି ରାଜା ପରମ ସନ୍ତୋଷ ପାଇଲେ; ଏବଂ ଅଭିଷେକ ସମାପ୍ତ ହେବା ପରେ ବୃହଦ୍ରଥ ନିଜ ଦୁଇ ରାଣୀ ସହିତ ତପୋବନକୁ ଚାଲିଗଲେ।

Verse 18

बृहद्रथो नरपति: परां निर्वतिमाययौ । अभिषिक्ते जरासंधे तदा राजा बूृहद्रथ: । पत्नीद्रयेनानुगतस्तपोवनचरो5भवत्‌,राजधानीमें प्रवेश करके अपने जाति-भाइयों और सगे-सम्बन्धियोंसे घिरे हुए मगधनरेश बृहद्रथने उसी समय जरासंधका राज्याभिषेक कर दिया। ऐसा करके उन्हें बड़ा संतोष हुआ। जरासंधका अभिषेक हो जानेपर महाराज बृहद्रथ अपनी दोनों पत्नियोंके साथ तपोवनमें चले गये

ନରପତି ବୃହଦ୍ରଥ ପରମ ନିର୍ବୃତିକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲେ। ଜରାସନ୍ଧଙ୍କର ବିଧିବତ୍ ଅଭିଷେକ ସମ୍ପନ୍ନ ହେବା ପରେ, ବୃହଦ୍ରଥ ନିଜ ଦୁଇ ରାଣୀ ସହିତ ତପୋବନବାସୀ ହେଲେ।

Verse 19

ततो वनस्थे पितरि मात्रोश्वैव विशाम्पते । जरासंध: स्ववीर्येण पार्थिवानकरोद्‌ वशे,महाराज! दोनों माताओं और पिताके वनवासी हो जानेपर जरासंधने अपने पराक्रमसे समस्त राजाओंको वशमें कर लिया इति श्रीमहा भारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि जरासंधप्रशंसायामेकोनविंशतितमो<5 ध्याय: इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापर्वके अन्तर्गत राजयूयारग्भपर्वमें जरासंधप्रशंसाविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ହେ ପ୍ରଜାପତି! ପିତା ବନବାସୀ ହେଲେ ଓ ଦୁଇ ମାତା ମଧ୍ୟ ତପୋବନକୁ ଯାଇଥିବା ପରେ, ଜରାସନ୍ଧ ନିଜ ପରାକ୍ରମବଳରେ ପୃଥିବୀର ରାଜାମାନଙ୍କୁ ବଶ କରିଦେଲେ।

Verse 20

वैशम्पायन उवाच अथ दीर्घस्य कालस्य तपोवनचरो नृपः । सभार्य: स्वर्गमगमत्‌ तपस्तप्त्वा बृहद्रथ:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर दीर्घकालतक तपोवनमें रहकर तपस्या करते हुए महाराज बृहद्रथ अपनी पत्नियोंके साथ स्वर्गवासी हो गये

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଜନମେଜୟ! ଦୀର୍ଘକାଳ ତପୋବନରେ ରହି ତପସ୍ୟା କରିଥିବା ମହାରାଜ ବୃହଦ୍ରଥ ନିଜ ପତ୍ନୀମାନଙ୍କ ସହିତ ସ୍ୱର୍ଗକୁ ଗମନ କଲେ।

Verse 21

जरासंधो<पि नृपतिर्यथोक्तं कौशिकेन तत्‌ | वरप्रदानमखिलं प्राप्पय राज्यमपालयत्‌,इधर जरासंध भी चण्डकौशिक मुनिके कथनानुसार भगवान्‌ शंकरसे सारा वरदान पाकर राज्यकी रक्षा करने लगा

ଏପଟେ ନୃପତି ଜରାସନ୍ଧ ମଧ୍ୟ କୌଶିକ ମୁନିଙ୍କ କଥାନୁସାରେ (ଭଗବାନ ଶଙ୍କରଙ୍କ ଠାରୁ) ସମସ୍ତ ବରଦାନ ପୂର୍ଣ୍ଣରୂପେ ପାଇ, ରାଜ୍ୟର ରକ୍ଷା ଓ ପାଳନ କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।

Verse 22

निहते वासुदेवेन तदा कंसे महीपतौ । जातो वै वैरनिर्बन्ध: कृष्णेन सह तस्य वै,वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके द्वारा अपने जामाता राजा कंसके मारे जानेपर श्रीकृष्णके साथ उसका वैर बहुत बढ़ गया

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବାସୁଦେବନନ୍ଦନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଯେତେବେଳେ ଭୂପତି ରାଜା କଂସଙ୍କୁ ବଧ କଲେ, ସେତେବେଳେ ତାହାର ମନରେ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ପ୍ରତି ଦୃଢ଼ ଓ ବନ୍ଧା ଶତ୍ରୁତା ଜନ୍ମ ନେଲା।

Verse 23

भ्रामयित्वा शतगुणमेकोनं येन भारत । गदा क्षिप्ता बलवता मागधेन गिरिव्रजात्‌,भारत! उसी वैरके कारण बलवान्‌ मगधराजने अपनी गदा निन्यानबे बार घुमाकर गिरिव्रजसे मथुराकी ओर फेंकी। उन दिनों अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीकृष्ण मथुरामें ही रहते थे। वह उत्तम गदा निन्यानबे योजन दूर मथुरामें जाकर गिरी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ସେହି ବୈରର କାରଣରୁ ବଳବାନ ମଗଧରାଜ ଗିରିବ୍ରଜରୁ ନିଜ ଗଦାକୁ ନିରାନବ୍ବେଥର ଘୁମାଇ ମହାବଳରେ ଛାଡ଼ିଦେଲେ।

Verse 24

तिष्ठतो मथुरायां वै कृष्णस्याद्भुतकर्मण: । एकोनयोजनशते सा पपात गदा शुभा,भारत! उसी वैरके कारण बलवान्‌ मगधराजने अपनी गदा निन्यानबे बार घुमाकर गिरिव्रजसे मथुराकी ओर फेंकी। उन दिनों अद्भुत कर्म करनेवाले श्रीकृष्ण मथुरामें ही रहते थे। वह उत्तम गदा निन्यानबे योजन दूर मथुरामें जाकर गिरी

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଅଦ୍ଭୁତକର୍ମା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ମଥୁରାରେ ରହୁଥିବାବେଳେ, ସେହି ଶୁଭ ଗଦା ଶତ ଯୋଜନରୁ ଗୋଟିଏ ଯୋଜନ କମ୍ ଦୂର ଅତିକ୍ରମ କରି ମଥୁରାରେ ଆସି ପଡ଼ିଲା।

Verse 25

दृष्टवा पौरैस्तदा सम्यग्‌ गदा चैव निवेदिता । गदावसानं तत्‌ ख्यातं मथुराया: समीपत:,पुरवासियोंने उसे देखकर उसकी सूचना भगवान्‌ श्रीकृष्णको दी। मथुराके समीपका वह स्थान, जहाँ गदा गिरी थी, गदावसानके नामसे विख्यात हुआ

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ନଗରବାସୀମାନେ ତାହାକୁ ସ୍ପଷ୍ଟ ଭାବେ ଦେଖି ସେହି ଗଦାର ସମ୍ବାଦ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଜଣାଇଲେ। ମଥୁରା ସମୀପରେ ଯେଉଁଠାରେ ଗଦା ଆସି ଥମ୍କିଲା, ସେ ସ୍ଥାନ ‘ଗଦାବସାନ’ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ହେଲା।

Verse 26

तस्यास्तां हंसडिम्भकावशस्त्रनिधनावुभौ । मन्त्रे मतिमतां श्रेष्ठो नीतिशास्त्रे विशारदौ,जरासंधको सलाह देनेके लिये बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ तथा नीतिशास्त्रमें निपुण दो मन्त्री थे, जो हंस और डिम्भकके नामसे विख्यात थे। वे दोनों किसी भी शस्त्रसे मरनेवाले नहीं थे

ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଜରାସନ୍ଧଙ୍କ ପାଖରେ ହଂସ ଓ ଡିମ୍ଭକ ନାମରେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଦୁଇ ମନ୍ତ୍ରୀ ଥିଲେ; ପରାମର୍ଶରେ ସେମାନେ ବୁଦ୍ଧିମାନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଏବଂ ନୀତିଶାସ୍ତ୍ରରେ ବିଶାରଦ। ଏହା ମଧ୍ୟ କୁହାଯାଉଥିଲା ଯେ କୌଣସି ଶସ୍ତ୍ରରେ ସେମାନଙ୍କୁ ବଧ କରାଯାଇପାରେ ନାହିଁ।

Verse 27

यौ तौ मया ते कथितौ पूर्वमेव महाबलौ । त्रयस्त्रयाणां लोकानां पर्याप्ता इति मे मति:,जनमेजय! उन दोनों महाबली वीरोंका परिचय मैंने तुम्हें पहले ही दे दिया है। मेरा ऐसा विश्वास है, जरासंध और वे तीनों मिलकर तीनों लोकोंका सामना करनेके लिये पर्याप्त थे

ଜନମେଜୟ! ଯେ ଦୁଇ ମହାବଳୀ ବୀରଙ୍କ ପରିଚୟ ମୁଁ ପୂର୍ବରୁ ତୁମକୁ କହିଥିଲି, ମୋ ମତରେ ସେମାନେ (ଏବଂ ସେମାନଙ୍କ ସହ) ସେ ତିନିଜଣ ମିଶି ତିନି ଲୋକକୁ ମୁକାବିଲା କରିବାକୁ ପର୍ଯ୍ୟାପ୍ତ ଥିଲେ।

Verse 28

एवमेव तदा वीर बलिभि: कुकुरान्धकै: । वृष्णिभ्रिश्न महाराज नीतिहेतोरुपेक्षित:,वीरवर महाराज! इस प्रकार नीतिका पालन करनेके लिये ही उस समय बलवान कुकुर, अन्धक और वृष्णिवंशके योद्धाओंने जरासंधकी उपेक्षा कर दी

ବୀରବର ମହାରାଜ! ଏହିପରି ସେ ସମୟରେ ନୀତିଧର୍ମ ରକ୍ଷାର ହେତୁ ବଳବାନ କୁକୁର, ଅନ୍ଧକ ଓ ବୃଷ୍ଣିବଂଶୀ ଯୋଦ୍ଧାମାନେ ଜାଣିଶୁଣି ଜରାସନ୍ଧଙ୍କୁ ଉପେକ୍ଷା କଲେ।

Frequently Asked Questions

The tension lies between strategic concealment and public truth: the visitors employ disguise and unconventional entry, while Jarāsandha insists that identity and intent be stated truthfully within the norms of royal hospitality and accountability.

Kṛṣṇa frames dharma as context-sensitive: social markers and rules vary by role, yet truthful speech remains a stabilizing virtue; additionally, accepting honors from an adversary is not obligatory when one arrives with a defined political objective.

No explicit phalaśruti is stated; the chapter’s meta-function is structural—establishing the ethical vocabulary (satya, ātithya, nīti) and procedural setting necessary for the ensuing confrontation with Jarāsandha.