Adhyaya 17
Sabha ParvaAdhyaya 1754 Verses

Adhyaya 17

Jarā’s Account and the Enthronement of Jarāsandha (जरासंधोत्पत्तिः अभिषेकश्च)

Upa-parva: Jarāsandha-janma-prakaraṇa (Episode on the birth and rise of Jarāsandha)

A rākṣasī named Jarā, capable of assuming forms at will, addresses the king (Bṛhadratha), stating she had lived in his household with honor and now seeks to reciprocate. She reports having seen the king’s two infant halves and, by fate, joined them so that a single child came into being, emphasizing she was only an instrumental cause while the king’s fortune was decisive. After speaking, she disappears. The king performs the required rites for the child and orders a great celebration in Magadha. The father names the boy Jarāsandha because he was ‘joined’ (saṃdhita) by Jarā. The child grows into a powerful heir. In time the ascetic Cāṇḍakauśika arrives; Bṛhadratha receives him with ritual hospitality and presents both kingdom and son. The sage, claiming knowledge-vision, foretells Jarāsandha’s extraordinary dominance: other kings will fail to match him; weapons, even those of divine origin, will not injure him; he will eclipse consecrated rulers and draw their prosperity to himself; and he will directly behold Rudra (Mahādeva). The sage then departs. Bṛhadratha returns to the city, enthrones Jarāsandha, and later retires with his two wives to forest austerities, eventually attaining heaven. Jarāsandha, with his mothers present, subjugates other rulers by his own strength. The chapter closes with a note that certain powerful figures (Hamsa and Ḍibhaka) previously mentioned are assessed as sufficient for vast realms, and that Jarāsandha was, for reasons of policy, tolerated by some groups at that time.

Chapter Arc: इन्द्रप्रस्थ की सभा में अर्जुन का प्रस्ताव—राजसूय के लिए पहले जरासंध का दमन—और श्रीकृष्ण का उसका अनुमोदन; युधिष्ठिर के मन में प्रश्न उठता है: यह जरासंध कौन है, जिसकी छाया से राजसूय भी काँपता है? → श्रीकृष्ण युधिष्ठिर को जरासंध की उत्पत्ति का वृत्तान्त सुनाते हैं—मगधराज बृहद्रथ का दीर्घ यौवन विषयासक्ति में बीत जाना और वंश-दीप के अभाव से उसका भीतर-भीतर टूटना; मृत्यु की अनिश्चितता का बोध और ‘पुरुषार्थ’ की तात्कालिकता कथा को नैतिक तीर की तरह चुभोती है। → दो रानियों की पुत्र-लालसा, मुनि/तपस्वी का ध्यान में जाना, और फिर एक रहस्यमयी स्त्री/देवी-सी आकृति का प्रकट होना—राजा का प्रश्न ‘का त्वं… मम पुत्रप्रदायिनी’—यहीं भाग्य का द्वार खुलता है और जरासंध-जैसी असाधारण नियति का बीज पड़ता है। → कथा बृहद्रथ के गृह-जीवन, दो जुड़वाँ रानियों के साथ उसके वैभव और प्रतिष्ठा का चित्र खींचते हुए यह स्थापित करती है कि जरासंध साधारण शत्रु नहीं—उसकी जड़ें वरदान, तप, और विचित्र जन्म-रहस्य में हैं; इसलिए उसे ‘उपेक्षित’ करना भी भविष्य के लिए विपत्ति है। → जरासंध के जन्म का रहस्य और उसके आगे के कर्म—कैसे वह मगध का अजेय स्तम्भ बना और क्यों उसने राजाओं को बंदी बनाना आरम्भ किया—अगले प्रसंग की ओर कथा को धकेल देता है।

Shlokas

Verse 1

ऑपन-माज बछ। अकाल सप्तदशो<् ध्याय: श्रीकृष्णके द्वारा अर्जुनकी बातका अनुमोदन तथा युधिष्ठटिरको जरासंधकी उत्पत्तिका प्रसंग सुनाना वायुदेव उवाच जातस्य भारते वंशे तथा कुन्त्या: सुतस्य च । या वै युक्ता मति: सेयमर्जुनेन प्रदर्शिता,भगवान्‌ श्रीकृष्णने कहा--राजन्‌! भरतवंशमें उत्पन्न पुरुष और कुन्ती-जैसी माताके पुत्रकी जैसी बुद्धि होनी चाहिये, अर्जुनने यहाँ उसीका परिचय दिया है

ବାୟୁଦେବ କହିଲେ— ରାଜନ! ଭରତବଂଶରେ ଜନ୍ମିଥିବା ପୁରୁଷଙ୍କୁ, ଏବଂ କୁନ୍ତୀ ପରି ମାତାଙ୍କ ପୁତ୍ରଙ୍କୁ ଯେପରି ଯୁକ୍ତ ମତି ଥିବା ଉଚିତ, ଅର୍ଜୁନ ଏଠାରେ ସେହି ଯଥାଯଥ ବିବେକ ଦେଖାଇଛି।

Verse 2

न सम मृत्युं वयं विद्य रात्रौ वा यदि वा दिवा | न चापि कंचिदमरमयुद्धेनानुशुश्रुम,महाराज! हमलोग यह नहीं जानते कि मौत कब आयेगी? रातमें आयेगी या दिनमें? (क्योंकि उसके नियत समयका ज्ञान किसीको नहीं है।) हमने यह भी नहीं सुना है कि युद्ध न करनेके कारण कोई अमर हो गया हो

ବାୟୁ କହିଲେ— ମହାରାଜ! ମୃତ୍ୟୁ କେବେ ଆସିବ—ରାତିରେ କି ଦିନରେ—ଆମେ ଜାଣୁନାହୁଁ; ତାହାର ନିଶ୍ଚିତ ସମୟ କାହାକୁ ଜଣା ନାହିଁ। ଏବଂ ଯୁଦ୍ଧ ନ କରିବାରୁ କେହି ଅମର ହୋଇଗଲା ବୋଲି ଆମେ କେବେ ଶୁଣିନାହୁଁ।

Verse 3

एतावदेव पुरुषै: कार्य हृदयतोषणम्‌ | नयेन विधिदृष्टेन यदुपक्रमते परान्‌,अतः: वीर पुरुषोंका इतना ही कर्तव्य है कि वे अपने हृदयके संतोषके लिये नीतिशास्त्रमें बतायी हुई नीतिके अनुसार शत्रुओंपर आक्रमण करें

ବାୟୁ କହିଲେ— ବୀର ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ହୃଦୟସନ୍ତୋଷର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଏତିକି ମାତ୍ର: ଶାସ୍ତ୍ରଦୃଷ୍ଟ ନୀତି-ବିଧି ଅନୁସାରେ ପ୍ରତିପକ୍ଷଙ୍କ ବିରୋଧରେ କାର୍ଯ୍ୟ ଆରମ୍ଭ କରିବା—ଆବେଗରୁ ନୁହେଁ, ଧର୍ମନୀତିର ନିୟନ୍ତ୍ରଣରେ।

Verse 4

सुनयस्यानपायस्य संयोगे परम: क्रम: । संगत्या जायतेड5साम्यं साम्यं च न भवेद्‌ द्वायो:,दैव आदिकी प्रतिकूलतासे रहित अच्छी नीति एवं सलाह प्राप्त होनेपर आरम्भ किया हुआ कार्य पूर्णरूपसे सफल होता है। शत्रुके साथ भिड़नेपर ही दोनों पक्षोंका अन्तर ज्ञात होता है। दोनों दल सभी बातोंमें समान ही हों, ऐसा सम्भव नहीं

ଅପାୟରହିତ ସୁନୀତି ଯଦି କୌଣସି କାର୍ଯ୍ୟାରମ୍ଭ ସହ ଯୁକ୍ତ ହୁଏ, ତେବେ ପରମ କ୍ରମ ସିદ્ધ ହୁଏ। ନିକଟ ସଂଘର୍ଷ-ସମ୍ପର୍କରୁ ଅସମତା ପ୍ରକାଶ ପାଏ; ଦୁଇ ପକ୍ଷରେ ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସମତା କେବେ ହୁଏ ନାହିଁ।

Verse 5

अनयस्यानुपायस्य संयुगे परम: क्षय: । संशयो जायते साम्याज्जयश्व न भवेद्‌ द्वयो:,जिसने अच्छी नीति नहीं अपनायी है और उत्तम उपायसे काम नहीं लिया है, उसका युद्धमें सर्वया विनाश होता है। यदि दोनों पक्षोंमें समानता हो तो संशय ही रहता है तथा दोनोंमेंसे किसीकी भी जय अथवा पराजय नहीं होती

ଯେ ନୀତି ଗ୍ରହଣ କରେ ନାହିଁ ଓ ଯଥୋଚିତ ଉପାୟ ବିନା ଯୁଦ୍ଧରେ ପ୍ରବେଶ କରେ, ତାହାର ପରମ କ୍ଷୟ ହୁଏ। ଦୁଇ ପକ୍ଷ ସମାନ ହେଲେ କେବଳ ସନ୍ଦେହ ଜନ୍ମେ; କାହାରି ନିଶ୍ଚିତ ଜୟ ହୁଏ ନାହିଁ।

Verse 6

ते वयं नयमास्थाय शत्र॒ुदेहसमीपगा: । कथमन्तं न गच्छेम वृक्षस्थेव नदीरया: । पररन्ध्रे पराक्रान्ता: स्वरन्ध्रावरणे स्थिता:,जब हमलोग नीतिका आश्रय लेकर शत्रुके शरीरके निकटतक पहुँच जायँगे, तब जैसे नदीका वेग किनारेके वृक्षको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार हम शत्रुका अन्त क्‍यों न कर डालेंगे? हम अपने छिठद्रोंको छिपाये रखकर शत्रुके छिद्रको देखेंगे और अवसर मिलते ही उसपर बलपूर्वक आक्रमण कर देंगे

ଆମେ ନୀତିକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ଶତ୍ରୁର ଦେହର ନିକଟକୁ ପହଞ୍ଚିଗଲେ, ନଦୀର ବେଗ ଯେପରି କୂଳସ୍ଥ ବୃକ୍ଷକୁ ଉପାଡ଼ି ଫେଙ୍ଗିଦିଏ, ସେପରି ଆମେ ତାହାର ଅନ୍ତ କାହିଁକି ନ କରିବୁ? ନିଜ ଛିଦ୍ରଗୁଡ଼ିକୁ ଢାକି ରଖି ଶତ୍ରୁର ଛିଦ୍ରକୁ ଦେଖିବୁ; ସୁଯୋଗ ମିଳିଲେ ସେଇ ଫାଟରେ ବଳପୂର୍ବକ ଆକ୍ରମଣ କରିବୁ।

Verse 7

व्यूढानीकैरतिबलैर्न युद्धयेदरिभि: सह । इति बुद्धिमतां नीतिस्तन्ममापीह रोचते,जिनकी सेनाएँ मोर्चा बाँधकर खड़ी हों और जो अत्यन्त बलवान हों, ऐसे शत्रुओंके साथ (सम्मुख होकर) युद्ध नहीं करना चाहिये; यह बुद्धिमानोंकी नीति है। यही नीति यहाँ मुझे भी अच्छी लगती है

ଯେ ଶତ୍ରୁମାନଙ୍କର ସେନା ବ୍ୟୂହବଦ୍ଧ ହୋଇ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ଓ ଯେମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବଳବାନ, ସେମାନଙ୍କ ସହ ସମ୍ମୁଖ ଯୁଦ୍ଧ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ—ଏହା ବୁଦ୍ଧିମାନଙ୍କ ନୀତି; ଏହି ନୀତି ଏଠାରେ ମୋତେ ମଧ୍ୟ ରୋଚେ।

Verse 8

अनवद्या हसम्बुद्धा: प्रविष्टा: शत्रुसझ तत्‌ । शत्रुदेहमुपाक्रम्य त॑ काम॑ प्राप्तुयामहे,यदि हम छिपे-छिपे शत्रुके घरतक पहुँच जायेँ तो यह हमारे लिये कोई निन्दाकी बात नहीं होगी। फिर हम शत्रुके शरीरपर आक्रमण करके अपना काम बना लेंगे

ଆମେ ନିର୍ଦୋଷ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ, ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ସଚେତନ ହୋଇ, ଗୁପ୍ତଭାବେ ଶତ୍ରୁସେନାରେ ପ୍ରବେଶ କରିଲେ, ତାହା ଆମ ପାଇଁ ନିନ୍ଦନୀୟ ହେବ ନାହିଁ। ପରେ ଶତ୍ରୁର ଦେହକୁ ଆକ୍ରମଣ କରି ଆମେ ଆମ କାମ ସାଧିବୁ।

Verse 9

एको होव श्रियं नित्यं बिभर्ति पुरुषर्षभ: । अन्तरात्मेव भूतानां तत्क्षयं नैव लक्षये,यह पुरुषोंमें श्रेष्ठ जरासंध प्राणियोंके भीतर स्थित आत्माकी भाँति सदा अकेला ही साम्राज्यलक्ष्मीका उपभोग करता है; अतः उसका और किसी उपायसे नाश होता नहीं दिखायी देता (उसके विनाशके लिये हमें स्वयं प्रयत्न करना होगा)

ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ ଜରାସନ୍ଧ ଏକାକୀ ନିତ୍ୟ ରାଜଲକ୍ଷ୍ମୀକୁ ଧାରଣ କରି ଭୋଗ କରେ। ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କ ଭିତରେ ଅନ୍ତରାତ୍ମା ପରି, ତାହାର ନାଶ ପାଇଁ କୌଣସି ସ୍ୱାଭାବିକ ଉପାୟ ମୋତେ ଦିଶୁନାହିଁ; ତେଣୁ ତାହାର ବିନାଶ ଆପେଆପେ ହେବ ନାହିଁ—ଆମେ ନିଜେ ପ୍ରୟାସ କରି ସାଧିବାକୁ ପଡିବ।

Verse 10

अथवैनं निहत्याजौ शेषेणापि समाहता: । प्राप्रुयाम ततः स्वर्ग ज्ञातित्राणपरायणा:,अथवा यदि जरासंधको युद्धमें मारकर उसके पक्षमें रहनेवाले शेष सैनिकोंद्वारा हम भी मारे गये तो भी हमें कोई हानि नहीं है। अपने जाति-भाइयोंकी रक्षामें संलग्न होनेके कारण हमें स्वर्गकी ही प्राप्ति होगी

ନହେଲେ ଯୁଦ୍ଧରେ ଜରାସନ୍ଧକୁ ବଧ କରି, ତାହାର ପକ୍ଷର ଅବଶିଷ୍ଟ ସେନା ଦ୍ୱାରା ଆମେ ମଧ୍ୟ ନିହତ ହେଲେ ସୁଦ୍ଧା ଆମ ପାଇଁ କୌଣସି କ୍ଷତି ନାହିଁ। କାରଣ ଜ୍ଞାତି-ବନ୍ଧୁଙ୍କ ରକ୍ଷାରେ ପରାୟଣ ଥିବାରୁ, ତାହା ପରେ ଆମେ ସ୍ୱର୍ଗକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେବୁ।

Verse 11

युधिछिर उवाच कृष्ण को<यं जरासंध: किंवीर्य: किम्पराक्रम: । यस्त्वां स्पृष्टवाग्निसदृशं न दग्ध: शलभो यथा,युधिष्ठिरने पूछा--श्रीकृष्ण! यह जरासंध कौन है? उसका बल और पराक्रम कैसा है जो प्रज्वलित अग्निके समान आपका स्पर्श करके भी पतंगके समान जलकर भस्म नहीं हो गया?

ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ହେ କୃଷ୍ଣ! ଏହି ଜରାସନ୍ଧ କିଏ? ତାହାର ବଳ ଓ ପରାକ୍ରମ କେମିତି, ଯେ ଜ୍ୱଳନ୍ତ ଅଗ୍ନି ସମ ତୁମକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରି ମଧ୍ୟ ପତଙ୍ଗ ପରି ଦଗ୍ଧ ହୋଇ ଭସ୍ମ ହେଲା ନାହିଁ?

Verse 12

कृष्ण उवाच शृणु राजन्‌ जरासंधो यद्दीर्यो यत्पराक्रम: । यथा चोपेक्षितो<स्माभिबहुश: कृतविप्रिय:,श्रीकृष्णने कहा--राजन्‌! जरासंधका बल और पराक्रम कैसा है तथा अनेक बार हमारा अप्रिय करनेपर भी हमलोगोंने क्यों उसकी उपेक्षा कर दी, यह सब बता रा हूँ, सुनिये

କୃଷ୍ଣ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍, ଶୁଣ। ଜରାସନ୍ଧର ବଳ ଓ ପରାକ୍ରମ କେମିତି, ଏବଂ ସେ ବହୁବାର ଆମ ପ୍ରତି ଅପ୍ରିୟ କରିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଆମେ କାହିଁକି ତାକୁ ପୁନଃପୁନଃ ଉପେକ୍ଷା କଲୁ—ସେ ସବୁ ମୁଁ କହୁଛି।

Verse 13

अक्षौहिणीनां तिसृणां पति: समरदर्पित: । राजा बृहद्रथो नाम मगधाधिपतिर्बली,मगधदेशमें बृहद्रथ नामसे प्रसिद्ध एक बलवान्‌ राजा राज्य करते थे। वे तीन अक्षौहिणी सेनाओंके स्वामी और युद्धमें बड़े अभिमानके साथ लड़नेवाले थे

ମଗଧର ଅଧିପତି ବୃହଦ୍ରଥ ନାମକ ଜଣେ ବଳବାନ ରାଜା ଥିଲେ। ସେ ତିନି ଅକ୍ଷୌହିଣୀ ସେନାର ସ୍ୱାମୀ ଥିଲେ ଏବଂ ଯୁଦ୍ଧଦର୍ପରେ ମତ୍ତ ହୋଇ ମହା ଅଭିମାନରେ ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିଲେ।

Verse 14

रूपवान्‌ वीर्यसम्पन्न: श्रीमानतुलविक्रम: । नित्यं दीक्षाड॒किततनु: शतक्रतुरिवापर:,राजा बृहद्रथ बड़े ही रूपवान, बलवान, धनवान्‌ और अनुपम पराक्रमी थे। उनका शरीर दूसरे इन्द्रकी भाँति सदा यज्ञकी दीक्षाके चिह्नोंसे ही सुशोभित होता रहता था

ରାଜା ବୃହଦ୍ରଥ ଅତ୍ୟନ୍ତ ରୂପବାନ, ବଳବାନ, ଶ୍ରୀମାନ ଓ ଅତୁଳ ପରାକ୍ରମୀ ଥିଲେ। ତାଙ୍କ ଦେହ ସଦା ଯଜ୍ଞ-ଦୀକ୍ଷାର ଚିହ୍ନରେ ଶୋଭିତ ରହୁଥିଲା—ଶତକ୍ରତୁ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ପରି ଦ୍ୱିତୀୟ ଇନ୍ଦ୍ର ଯେପରି।

Verse 15

तेजसा सूर्यसंकाश: क्षमया पृथिवीसम: । यमान्तकसम: क्रोधे श्रिया वैश्रवणोपम:,वे तेजमें सूर्य, क्षमामें पृथ्वी, क्रोधमें यमराज और धन-सम्पत्तिमें कुबेरके समान थे

ତେଜରେ ସେ ସୂର୍ଯ୍ୟସଦୃଶ, କ୍ଷମାରେ ପୃଥିବୀସମ; କ୍ରୋଧରେ ଯମାନ୍ତକସମ, ଏବଂ ଶ୍ରୀ-ସମୃଦ୍ଧିରେ ବୈଶ୍ରବଣ (କୁବେର) ସଦୃଶ ଥିଲେ।

Verse 16

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत सभापव॑के अन्तर्गत राजसूयारम्भपर्वमें जरासंधवधके लिये मन्त्रणाविषयक सोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ,तस्याभिजनसंयुक्ति्गुणैर्भरतसत्तम । व्याप्तेयं पृथिवी सर्वा सूर्यस्येव गभस्तिभि: भरतश्रेष्ठ! जैसे सूर्यकी किरणोंसे यह सारी पृथ्वी आच्छादित हो जाती है, उसी प्रकार उनके उत्तम कुलोचित सदगुणोंसे समस्त भूमण्डल व्याप्त हो रहा था--सर्वत्र उनके गुणोंकी चर्चा एवं प्रशंसा होती रहती थी

ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସୂର୍ଯ୍ୟର କିରଣ ଯେପରି ସମଗ୍ର ପୃଥିବୀକୁ ଆବୃତ କରେ, ସେପରି ତାଙ୍କର ଉତ୍ତମ କୁଳୋଚିତ ସଦ୍ଗୁଣରେ ସମସ୍ତ ଭୂମଣ୍ଡଳ ବ୍ୟାପ୍ତ ଥିଲା—ସର୍ବତ୍ର ତାଙ୍କ ଗୁଣକୀର୍ତ୍ତି ଓ ପ୍ରଶଂସା ଚାଲିଥିଲା।

Verse 17

स काशिराजस्य सुते यमजे भरतर्षभ । उपयेमे महावीर्यों रूपद्रविणसंयुते । तयोश्व॒कार समयं मिथ: स पुरुषर्षभ:,प्रियाभ्यामनुरूपाभ्यां करेणुभ्यामिव द्विप: । भरतकुलभूषण! महापराक्रमी राजा बृहद्रथने काशिराजकी दो जुड़वीं कन्याओंके साथ, जो अपनी रूप-सम्पत्तिसे अपूर्व शोभा पा रही थीं, विवाह किया और उन नरश्रेष्ठने एकान्तमें अपनी दोनों पत्नियोंके समीप यह प्रतिज्ञा की कि मैं तुम दोनोंके साथ कभी विषम व्यवहार नहीं करूँगा (अर्थात्‌ दोनोंके प्रति समानरूपसे मेरा प्रेमभाव बना रहेगा)। जैसे दो हथिनियोंके साथ गजराज सुशोभित होता है, उसी प्रकार वे महाराज बृहद्रथ अपने मनके अनुरूप दोनों प्रिय पत्नियोंके साथ शोभा पाने लगे इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि राजसूयारम्भपर्वणि जरासंधोत्पत्तौ सप्तदशो<ध्याय:

ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମହାବୀର୍ୟବାନ ବୃହଦ୍ରଥ କାଶୀରାଜଙ୍କ ଯମଜ ଦୁଇ କନ୍ୟାଙ୍କୁ—ରୂପ ଓ ଧନସମ୍ପଦରେ ସମୃଦ୍ଧ—ବିବାହ କଲେ। ପରେ ସେ ନରଶ୍ରେଷ୍ଠ ଏକାନ୍ତରେ ଦୁହିଁଜଣଙ୍କ ସହ ପ୍ରତିଜ୍ଞା କଲେ: “ମୁଁ ତୁମ ଦୁହିଁଙ୍କ ପ୍ରତି କେବେ ପକ୍ଷପାତ କରିବି ନାହିଁ।” ଯେପରି ଦୁଇ ଅନୁରୂପ ହସ୍ତିନୀ ସହ ଗଜରାଜ ଶୋଭିତ ହୁଏ, ସେପରି ସେ ନିଜ ଦୁଇ ପ୍ରିୟ ରାଣୀଙ୍କ ସହ ଶୋଭା ପାଇଲେ।

Verse 18

नातिवर्तिष्य इत्येवं पत्नीभ्यां संनिधौ तदा । स ताभ्यां शुशुभे राजा पत्नी भ्यां वसुधाधिप:

ତେବେ ରାଜା ନିଜ ଦୁଇ ରାଣୀଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ କହିଲେ—“ମୁଁ ଏହା ଅତିକ୍ରମ କରିବି ନାହିଁ।” ଏବଂ ସେ ଭୂପତି ଦୁହିଁ ପତ୍ନୀଙ୍କ ସହ ଅଧିକ ଶୋଭିତ ହେଲେ।

Verse 19

तयोम॑ध्यगतश्चापि रराज वसुधाधिप:

ସେ ଦୁଇଜଣଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହୋଇ ପୃଥିବୀପତି ରାଜା ଅପୂର୍ବ ଦ୍ୟୁତିରେ ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଲେ; ମଧ୍ୟସ୍ଥାନରେ ତାଙ୍କ ଉପସ୍ଥିତି ସାର୍ବଭୌମ ଅଧିକାର ଓ ସେ ମୁହୂର୍ତ୍ତର ଧର୍ମଭାରକୁ ପ୍ରକାଶ କଲା।

Verse 20

विषयेषु निमग्नस्य तस्य यौवनमभ्यगात्‌,विषयोंमें डूबे हुए राजाकी सारी जवानी बीत गयी, परंतु उन्हें कोई वंश चलानेवाला पुत्र नहीं प्राप्त हुआ। उन श्रेष्ठ नरेशने बहुत-से मांगलिक कृत्य, होम और पुत्रेष्टियज्ञ कराये, तो भी उन्हें वंशकी वृद्धि करनेवाले पुत्रकी प्राप्ति नहीं हुई

ବିଷୟଭୋଗରେ ନିମଗ୍ନ ଥିବା ତାହାର ଯୌବନ କଟିଗଲା; ତଥାପି ବଂଶ ଚାଲାଇବା ଯୋଗ୍ୟ ପୁତ୍ର ମିଳିଲା ନାହିଁ। ସେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ନରେଶ ଅନେକ ମାଙ୍ଗଳିକ କର୍ମ, ହୋମ ଓ ପୁତ୍ରେଷ୍ଟି ଯଜ୍ଞ କରାଇଲେ, ତଥାପି କୁଳବୃଦ୍ଧିକାରୀ ପୁତ୍ର ପ୍ରାପ୍ତ ହେଲା ନାହିଁ।

Verse 21

न च वंशकर: पुत्रस्तस्याजायत कश्नन । मड्लैर्बहुभिहोंमि: पुत्रकामाभिरिष्टिभि: । नाससाद नृपश्रेष्ठ: पुत्रं कुलविवर्धनम्‌,विषयोंमें डूबे हुए राजाकी सारी जवानी बीत गयी, परंतु उन्हें कोई वंश चलानेवाला पुत्र नहीं प्राप्त हुआ। उन श्रेष्ठ नरेशने बहुत-से मांगलिक कृत्य, होम और पुत्रेष्टियज्ञ कराये, तो भी उन्हें वंशकी वृद्धि करनेवाले पुत्रकी प्राप्ति नहीं हुई

ତାହାର ବଂଶକର ପୁତ୍ର କେହି ଜନ୍ମିଲେ ନାହିଁ। ପୁତ୍ରକାମନାରେ ସେ ନୃପଶ୍ରେଷ୍ଠ ଅନେକ ମାଙ୍ଗଳିକ କର୍ମ, ବହୁ ହୋମ ଓ ଇଷ୍ଟି କଲେ; ତଥାପି କୁଳବିବର୍ଧକ ପୁତ୍ରକୁ ପ୍ରାପ୍ତ କରିପାରିଲେ ନାହିଁ।

Verse 22

अथ काक्षीवत: पुत्रं गौतमस्य महात्मन: । शुश्राव तपसि श्रान्तमुदारं चण्डकौशिकम्‌,एक दिन उन्होंने सुना कि गौतमगोत्रीय महात्मा काक्षीवानके पुत्र परम उदार चण्डकौशिक मुनि तपस्यासे उपरत होकर अकस्मात्‌ इधर आ गये हैं और एक वृक्षके नीचे बैठे हैं। यह समाचार पाकर राजा बृहद्रथ अपनी दोनों पत्नियों (एवं पुरवासियों)-के साथ उनके पास गये तथा सब प्रकारके रत्नों (मुनिजनोचित उत्कृष्ट वस्तुओं)-की भेंट देकर उन्हें संतुष्ट किया

ତାପରେ ସେ ଶୁଣିଲେ—ଗୌତମବଂଶୀୟ ମହାତ୍ମା କାକ୍ଷୀବାନଙ୍କ ପୁତ୍ର, ପରମ ଉଦାର ଚଣ୍ଡକୌଶିକ ମୁନି ତପସ୍ୟାରେ ଶ୍ରାନ୍ତ ହୋଇ ଅକସ୍ମାତ୍ ସେଠାକୁ ଆସି ଗୋଟିଏ ବୃକ୍ଷମୂଳେ ବସିଛନ୍ତି। ଏହି ସମ୍ବାଦ ପାଇ ରାଜା ବୃହଦ୍ରଥ ଦୁଇ ରାଣୀ ଓ ପୁରବାସୀମାନଙ୍କ ସହ ସେଠାକୁ ଯାଇ, ମୁନିଜନୋଚିତ ଉତ୍କୃଷ୍ଟ ରତ୍ନାଦି ଭେଟ ଦେଇ ମୁନିଙ୍କୁ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କଲେ।

Verse 23

यदृच्छया55गतं त॑ तु वृक्षमूलमुपाश्रितम्‌ । पत्नीभ्यां सहितो राजा सर्वरत्नैरतोषयत्‌,एक दिन उन्होंने सुना कि गौतमगोत्रीय महात्मा काक्षीवानके पुत्र परम उदार चण्डकौशिक मुनि तपस्यासे उपरत होकर अकस्मात्‌ इधर आ गये हैं और एक वृक्षके नीचे बैठे हैं। यह समाचार पाकर राजा बृहद्रथ अपनी दोनों पत्नियों (एवं पुरवासियों)-के साथ उनके पास गये तथा सब प्रकारके रत्नों (मुनिजनोचित उत्कृष्ट वस्तुओं)-की भेंट देकर उन्हें संतुष्ट किया

ଯଦୃଚ୍ଛାବଶତଃ ସେଠାକୁ ଆସି ବୃକ୍ଷମୂଳରେ ଆଶ୍ରୟ ନେଇଥିବା ସେ ମୁନିଙ୍କୁ ରାଜା ଦୁଇ ପତ୍ନୀ ସହିତ ଯାଇ ସର୍ବପ୍ରକାର ରତ୍ନାଦି ଦେଇ ସନ୍ତୁଷ୍ଟ କଲେ।

Verse 24

(बृहद्रथं च स ऋषि: यथावत्‌ प्रत्यनन्दत । उपविष्टश्न॒ तेनाथ अनुज्ञातो महात्मना ।। तमपृच्छत्‌ तदा विप्र: किमागमनमित्यथ । पौरैरनुगतस्यैव पत्नीभ्यां सहितस्य च ।। महर्षिने भी यथोचित बर्तावद्वारा बृहद्रथको प्रसन्न किया। उन महात्माकी आज्ञा पाकर राजा उनके निकट बैठे। उस समय ब्रह्मर्षि चण्डकौशिकने उनसे पूछा--“राजन्‌! अपनी दोनों पत्नियों और पुरवासियोंके साथ यहाँ तुम्हारा आगमन किस उद्देश्यसे हुआ है?/। स उवाच मुनि राजा भगवन्‌ नास्ति मे सुतः । अपुत्रस्थ वृथा जन्म इत्याहुर्मुनिसत्तम ।। तब राजाने मुनिसे कहा--“भगवन्‌! मेरे कोई पुत्र नहीं है। मुनिश्रेष्ठ! लोग कहते हैं कि पुत्रहीन मनुष्यका जन्म व्यर्थ है। तादृशस्य हि राज्येन वृद्धत्वे कि प्रयोजनम्‌ । सो<हं तपश्चरिष्यामि पत्नीभ्यां सहितो वने ।। “इस बुढ़ापेमें पुत्रहीन रहकर मुझे राज्यसे क्‍या प्रयोजन है? इसलिये अब मैं दोनों पत्नियोंके साथ तपोवनमें रहकर तपस्या करूँगा। नाप्रजस्य मुने कीर्ति: स्वर्गश्नैवाक्षयो भवेत्‌ । एवमुक्तस्य राज्ञा तु मुने: कारुण्यमागतम्‌ ।।) “मुने! संतानहीन मनुष्यको न तो इस लोकमें कीर्ति प्राप्त होती है और न परलोकमें अक्षय स्वर्ग ही प्राप्त होता है।' राजाके ऐसा कहनेपर महर्षिको दया आ गयी। तमब्रवीत्‌ सत्यधृति: सत्यवागृषिसत्तम: । परितुष्टोस्मि राजेन्द्र वरं वरय सुव्रत,तब धैर्यसे सम्पन्न और सत्यवादी मुनिवर चण्डकौशिकने राजा बृहद्रथसे कहा--“उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजेन्द्र! मैं तुमपर संतुष्ट हूँ। तुम इच्छानुसार वर माँगो।' यह सुनकर राजा बृहद्रथ अपनी दोनों रानियोंके साथ मुनिके चरणोंमें पड़ गये और पुत्रदर्शनसे निराश होनेके कारण नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए गदगद वाणीमें बोले

ରାଜା ମୁନିଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଭଗବନ୍! ମୋର କୌଣସି ପୁତ୍ର ନାହିଁ। ମୁନିଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଲୋକେ କହନ୍ତି, ସନ୍ତାନହୀନ ମନୁଷ୍ୟର ଜନ୍ମ ବ୍ୟର୍ଥ।”

Verse 25

ततः सभार्य: प्रणतस्तमुवाच बृहद्रथ: । पुत्रदर्शननैराश्याद्‌ वाष्पसंदिग्धया गिरा,तब धैर्यसे सम्पन्न और सत्यवादी मुनिवर चण्डकौशिकने राजा बृहद्रथसे कहा--“उत्तम व्रतका पालन करनेवाले राजेन्द्र! मैं तुमपर संतुष्ट हूँ। तुम इच्छानुसार वर माँगो।' यह सुनकर राजा बृहद्रथ अपनी दोनों रानियोंके साथ मुनिके चरणोंमें पड़ गये और पुत्रदर्शनसे निराश होनेके कारण नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए गदगद वाणीमें बोले

ତାପରେ ରାଜା ବୃହଦ୍ରଥ ରାଣୀଦ୍ୱୟ ସହିତ ପ୍ରଣାମ କରି ମୁନିଙ୍କୁ କହିଲେ। ପୁତ୍ରଦର୍ଶନର ଦୀର୍ଘ ନିରାଶାରେ ତାଙ୍କର କଣ୍ଠ ଅଶ୍ରୁରେ ଆବୃତ ହୋଇ ରୁଦ୍ଧ ହେଲା।

Verse 26

राजोवाच भगवन्‌ राज्यमुत्सृज्य प्रस्थितो5हं तपोवनम्‌ । कि वरेणाल्पभाग्यस्य कि राज्येनाप्रजस्य मे,राजाने कहा--भगवन्‌! मैं तो अब राज्य छोड़कर तपोवनकी ओर चल पड़ा हूँ। मुझ अभागे और संतानहीनको वर अथवा राज्यकी क्या आवश्यकता?

ରାଜା କହିଲେ—“ଭଗବନ୍! ମୁଁ ରାଜ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରି ତପୋବନକୁ ପ୍ରସ୍ଥାନ କରିଛି। ଅଲ୍ପଭାଗ୍ୟ ଓ ସନ୍ତାନହୀନ ମୋ ପାଇଁ ବରର କି ଆବଶ୍ୟକ? ରାଜ୍ୟର କି ଆବଶ୍ୟକ?”

Verse 27

श्रीकृष्ण उवाच एतच्छुत्वा मुनिर्ध्यानमगमत्‌ क्षुभितेन्द्रिय: । तस्यैव चाम्रवृक्षस्यथच्छायायां समुपाविशत्‌,श्रीकृष्ण कहते हैं--राजाका यह कातर वचन सुनकर मुनिकी इन्द्रियाँ क्षुब्ध हो गयीं (उनका हृदय पिघल गया)। तब वे ध्यानस्थ हो गये और उसी आम्रवृक्षकी छायामें बैठे रहे

ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ—ରାଜାଙ୍କର ଆକୁଳ ବଚନ ଶୁଣି ମୁନିଙ୍କ ଇନ୍ଦ୍ରିୟଗୁଡ଼ିକ କ୍ଷୁବ୍ଧ ହେଲା, ହୃଦୟ କରୁଣାରେ ଦ୍ରବିତ ହେଲା। ତାପରେ ସେ ଧ୍ୟାନରେ ପ୍ରବେଶ କରି ସେହି ଆମ୍ବ ଗଛର ଛାୟାରେ ବସି ରହିଲେ।

Verse 28

तस्योपविष्टस्य मुनेरुत्सड़ेश निपपात ह । अवातमशुकादष्टमेकमाम्रफलं किल,उसी समय वहाँ बैठे हुए मुनिकी गोदमें एक आमका फल गिरा। वह न हवाके चलनेसे गिरा था, न किसी तोतेने ही उस फलमें अपनी चोंच गड़ायी थी

ସେହି ସମୟରେ ବସିଥିବା ମୁନିଙ୍କ ଉତ୍ସଙ୍ଗରେ ଗୋଟିଏ ଆମ୍ବ ଫଳ ପଡ଼ିଲା। ତାହା ନ ପବନରେ ଖସିଥିଲା, ନ କୌଣସି ଶୁଆ ଠୁଣ୍ଠି ମାରିଥିଲା।

Verse 29

तत्‌ प्रगृहा मुनिश्रेष्ठो हृदयेनाभिमन्त्रय च । राज्ञे ददावप्रतिमं पुत्रसम्प्राप्तिकारणम्‌,मुनिश्रेष्ठ चण्डकौशिकने उस अनुपम फलको हाथमें ले लिया और उसे मन-ही-मन अभिमन्त्रित करके पुत्रकी प्राप्ति करानेके लिये राजाको दे दिया

ମୁନିଶ୍ରେଷ୍ଠ ଚଣ୍ଡକୌଶିକ ସେଇ ଅପ୍ରତିମ ଫଳଟିକୁ ହାତେ ଧରି ହୃଦୟରେ ମନ୍ତ୍ରଦ୍ୱାରା ଅଭିମନ୍ତ୍ରିତ କରି, ପୁତ୍ରପ୍ରାପ୍ତିର କାରଣ ଭାବେ ରାଜାଙ୍କୁ ଦାନ କଲେ।

Verse 30

उवाच च महाप्राज्ञस्तं राजानं महामुनि: । गच्छ राजन्‌ कृतार्थोडसि निवर्तस्व नराधिप,तत्पश्चात्‌ उन महाज्ञानी महामुनिने राजासे कहा--“राजन्‌! तुम्हारा मनोरथ पूर्ण हो गया। नरेश्वर! अब तुम अपनी राजधानीको लौट जाओ

ତାପରେ ମହାପ୍ରାଜ୍ଞ ମହାମୁନି ସେଇ ରାଜାଙ୍କୁ କହିଲେ—“ହେ ରାଜନ୍, ତୁମ ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହୋଇଛି। ହେ ନରାଧିପ, ଏବେ ନିଜ ରାଜଧାନୀକୁ ଫେରିଯାଅ।”

Verse 31

(एष ते तनयो राजन्‌ मा तप्सीस्त्वं तपो वने । प्रजा: पालय धर्मेण एष धर्मो महीक्षिताम्‌ ।। महाराज! यह फल तुम्हें पुत्रप्राप्ति करायेगा, अब तुम वनमें जाकर तपस्या न करो; धर्मपूर्वक प्रजाका पालन करो। यही राजाओंका धर्म है। यजस्व विविधैर्यज्जैरिन्द्र तर्पय चेन्दुना । पुत्र राज्ये प्रतिष्ठाप्प तत आश्रममाव्रज ।। “नाना प्रकारके यज्ञोंद्वारा भगवानका यजन करो और देवराज इन्द्रको सोमरससे तृप्त करो। फिर पुत्रको राज्यसिंहासनपर बिठाकर वानप्रस्थाश्रममें आ जाना। अष्टौ वरान्‌ प्रयच्छामि तव पुत्रस्य पार्थिव । ब्रह्मण्यतामजेयत्वं युद्धेषु च तथा रतिम्‌ ।। 'भूपाल! मैं तुम्हारे पुत्रके लिये आठ वर देता हँ--वह ब्राह्मणभक्त होगा, युद्धमें अजेय होगा, उसकी युद्धविषयक रुचि कभी कम न होगी/। प्रियातिथेयतां चैव दीनानामन्ववेक्षणम्‌ । तथा बल॑ च सुमहल्लोके कीर्ति च शाश्वतीम्‌ ।। अनुरागं प्रजानां च ददौ तस्मै स कौशिक: ।) “वह अतिथियोंका प्रेमी होगा, दीन-दुखियोंपर उसकी सदा कृपा-दृष्टि बनी रहेगी, उसका बल महान्‌ होगा, लोकमें उसकी अक्षय कीर्तिका विस्तार होगा और प्रजाजनोंपर उसका सदा स्नेह बना रहेगा।” इस प्रकार चण्डकौशिक मुनिने उसके लिये ये आठ वर दिये। एतच्छुत्वा मुनेर्वाक्यं शिरसा प्रणिपत्य च । मुने: पादौ महाप्राज्ञ: स नृप: स्वगृहं गत:,मुनिका यह वचन सुनकर उन परम बुद्धिमान राजा बृहद्रथने उनके दोनों चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम किया और अपने घरको लौट गये

“ହେ ରାଜନ୍, ଏହିଏ ତୁମ ପୁତ୍ର ହେବ। ବନକୁ ଯାଇ ତପସ୍ୟା କରି ଦୁଃଖିତ ହେଅନି; ଧର୍ମାନୁସାରେ ପ୍ରଜାଙ୍କୁ ପାଳନ କର—ଏହିଏ ରାଜାମାନଙ୍କର ଧର୍ମ। ବିଭିନ୍ନ ପ୍ରକାର ଯଜ୍ଞ କର ଏବଂ ସୋମରସରେ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କୁ ତୃପ୍ତ କର। ପରେ ପୁତ୍ରକୁ ରାଜ୍ୟସିଂହାସନରେ ପ୍ରତିଷ୍ଠା କରି ବାନପ୍ରସ୍ଥ ଆଶ୍ରମକୁ ଗମନ କର। ହେ ପାର୍ଥିବ! ମୁଁ ତୁମ ପୁତ୍ର ପାଇଁ ଆଠଟି ବର ଦେଉଛି—ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣଭକ୍ତ ହେବ; ଯୁଦ୍ଧରେ ଅଜେୟ ହେବ ଏବଂ ରଣଧର୍ମରେ ତାହାର ରୁଚି କ୍ଷୟ ହେବ ନାହିଁ; ଅତିଥିସତ୍କାରପ୍ରିୟ ହେବ; ଦୀନ-ଦୁଃଖୀଙ୍କୁ ସଦା ଦୃଷ୍ଟିରେ ରଖିବ; ତାହାର ବଳ ମହାନ ହେବ; ଲୋକରେ ତାହାର କୀର୍ତ୍ତି ଶାଶ୍ୱତ ହେବ; ଏବଂ ପ୍ରଜାଙ୍କ ପ୍ରତି ତାହାର ଅନୁରାଗ ଅଟୁଟ ରହିବ।” ମୁନିଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ସେଇ ମହାପ୍ରାଜ୍ଞ ରାଜା ଶିର ନମାଇ ମୁନିଙ୍କ ପାଦରେ ପ୍ରଣାମ କରି ନିଜ ଗୃହକୁ ଫେରିଗଲେ।

Verse 32

यथासमयमाज्ञाय तदा स नृपसत्तम: | द्वाभ्यामेक॑ फलं प्रादात्‌ पत्नीभ्यां भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ) उन उत्तम नरेशने उचित कालका विचार करके दोनों पत्नियोंके लिये वह एक फल दे दिया

ଯଥାସମୟ ବିଚାରି, ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ସେଇ ନୃପଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦୁଇ ପତ୍ନୀଙ୍କୁ ସେଇ ଏକମାତ୍ର ଫଳ ଦାନ କଲେ।

Verse 33

ते तदाम्र द्विधा कृत्वा भक्षयामासतु: शुभे । भावित्वादपि चार्थस्य सत्यवाक्यतया मुने:,उन दोनों शुभस्वरूपा रानियोंने उस आमके दो टुकड़े करके एक-एक टुकड़ा खा लिया। होनेवाली बात होकर ही रहती है, इसलिये तथा मुनिकी सत्यवादिताके प्रभावसे वह फल खानेके कारण दोनों रानियोंको गर्भ रह गये। उन्हें गर्भवती हुई देखकर राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई

ତାପରେ ସେଇ ଦୁଇ ଶୁଭଲକ୍ଷଣା ରାଣୀ ସେଇ ଆମ୍ବକୁ ଦୁଇ ଭାଗ କରି ପ୍ରତ୍ୟେକେ ଏକ ଭାଗ ଭକ୍ଷଣ କଲେ। ଯାହା ଭାବିତ, ତାହା ହୋଇ ରହେ; ମୁନିଙ୍କ ସତ୍ୟବାକ୍ୟର ପ୍ରଭାବରେ ସେଇ ଫଳ ଖାଇବାମାତ୍ରେ ଉଭୟ ରାଣୀ ଗର୍ଭବତୀ ହେଲେ। ସେମାନଙ୍କୁ ଗର୍ଭବତୀ ଦେଖି ରାଜା ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ।

Verse 34

तयो: समभवद्‌ गर्भ: फलप्राशनसम्भव: । ते च दृष्टवा स नृपति: परां मुदमवाप ह,उन दोनों शुभस्वरूपा रानियोंने उस आमके दो टुकड़े करके एक-एक टुकड़ा खा लिया। होनेवाली बात होकर ही रहती है, इसलिये तथा मुनिकी सत्यवादिताके प्रभावसे वह फल खानेके कारण दोनों रानियोंको गर्भ रह गये। उन्हें गर्भवती हुई देखकर राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई

ସେଇ ଦୁଇ ଶୁଭରୂପା ରାଣୀ ଆମ୍ବ ଫଳଟିକୁ ଦୁଇ ଖଣ୍ଡ କରି ପ୍ରତ୍ୟେକେ ଏକେକ ଖଣ୍ଡ ଖାଇଲେ। ଯାହା ହେବାକୁ ଥାଏ, ତାହା ହୋଇ ରହେ; ମୁନିଙ୍କ ସତ୍ୟବାକ୍ୟର ପ୍ରଭାବରୁ ସେଇ ଫଳଭକ୍ଷଣ ଦ୍ୱାରା ଉଭୟ ରାଣୀ ଗର୍ଭବତୀ ହେଲେ। ସେମାନଙ୍କୁ ଗର୍ଭବତୀ ଦେଖି ରାଜା ପରମ ଆନନ୍ଦ ପାଇଲେ।

Verse 35

अथ काले महाप्राज्ञ यथासमयमागते । प्रजायेतामुभे राजज्छरीरशकले तदा,महाप्राज्ञ युधिष्ठिर! प्रसवकाल पूर्ण होनेपर उन दोनों रानियोंने यथासमय अपने गर्भसे शरीरका एक-एक टुकड़ा पैदा किया

ମହାପ୍ରାଜ୍ଞ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ଯଥାସମୟେ ପ୍ରସବକାଳ ଆସି ପହଞ୍ଚିଲାପରେ ସେଇ ଦୁଇ ରାଣୀ ପ୍ରସବ କଲେ; ହେ ରାଜନ, ସେତେବେଳେ ପ୍ରତ୍ୟେକେ ଗର୍ଭରୁ ଶରୀରର ଏକେକ ଖଣ୍ଡ ମାତ୍ର ଜନ୍ମ ଦେଲେ।

Verse 36

एकाक्षिबाहुचरणे अर्धोदरमुखस्फिचे । दृष्टवा शरीरशकले प्रवेपतुरुभे भूशम्‌,प्रत्येक टुकड़ेमें एक आँख, एक हाथ, एक पैर, आधा पेट, आधा मुँह और कटिके नीचेका आधा भाग था। एक शरीरके उन टुकड़ोंको देखकर वे दोनों भयके मारे थर-थर काँपने लगीं

ପ୍ରତ୍ୟେକ ଖଣ୍ଡରେ ଗୋଟିଏ ଆଖି, ଗୋଟିଏ ହାତ, ଗୋଟିଏ ପାଦ, ଅର୍ଧ ଉଦର, ଅର୍ଧ ମୁଖ ଏବଂ କଟିତଳର ଅର୍ଧ ଭାଗ ଥିଲା। ସେଇ ଶରୀରଖଣ୍ଡଗୁଡ଼ିକୁ ଦେଖି ସେମାନେ ଦୁହେଁ ଭୟରେ ଭୟଙ୍କର ଭାବେ କମ୍ପିତ ହେଲେ।

Verse 37

उद्विग्ने सह सम्मन्त्रय ते भगिन्यौ तदाबले । सजीवे प्राणिशकले तत्यजाते सुदु:ःखिते,उनका हृदय उद्दिग्न हो उठा; अबला ही तो थीं। उन दोनों बहिनोंने अत्यन्त दुःखी होकर परस्पर सलाह करके उन दोनों टुकड़ोंको, जिनमें जीव तथा प्राण विद्यमान थे, त्याग दिया

ସେମାନଙ୍କ ହୃଦୟ ଉଦ୍ବିଗ୍ନ ହୋଇଉଠିଲା; ସେମାନେ ତ ଅବଳା ନାରୀ। ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁଃଖରେ ସେଇ ଦୁଇ ଭଉଣୀ ପରସ୍ପର ପରାମର୍ଶ କରି, ଯେଉଁ ଦୁଇ ଖଣ୍ଡରେ ଜୀବ ଓ ପ୍ରାଣ ଅବଶିଷ୍ଟ ଥିଲା, ସେଗୁଡ଼ିକୁ ତ୍ୟାଗ କଲେ।

Verse 38

तयोर्धात्र्यौ सुसंवीते कृत्वा ते गर्भसम्प्लवे । निर्गम्यान्त:पुरद्वारात्‌ समुत्सृज्याभिजग्मतु:,उन दोनोंकी धायें गर्भके उन टुकड़ोंको कपड़ेसे ढककर अन्तःपुरके दरवाजेसे बाहर निकलीं और चौराहेपर फेंककर चली गयीं

ତାପରେ ସେମାନଙ୍କ ଦୁଇ ଧାତ୍ରୀ ଗର୍ଭର ସେଇ ଖଣ୍ଡଗୁଡ଼ିକୁ ବସ୍ତ୍ରରେ ଭଲଭାବେ ଢାକିଦେଲେ। ଅନ୍ତଃପୁର ଦ୍ୱାର ଦେଇ ବାହାରି ଆସି, ସେଗୁଡ଼ିକୁ ଚଉମୁହାଣୀରେ ଫେଙ୍କି ଚାଲିଗଲେ।

Verse 39

ते चतुष्पथनिक्षिप्ते जरा नामाथ राक्षसी । जग्राह मनुजव्याप्र मांसशोणितभोजना,पुरुषसिंह! चौराहेपर फेंके हुए उन टुकड़ोंको रक्त और मांस खानेवाली जरा नामकी एक राक्षसीने उठा लिया

ଚତୁଷ୍ପଥରେ ଫେଙ୍କାଯାଇଥିବା ସେଇ ଖଣ୍ଡଗୁଡ଼ିକୁ ମାଂସ ଓ ରକ୍ତଭୋଜିନୀ ‘ଜରା’ ନାମକ ଏକ ରାକ୍ଷସୀ ଉଠାଇନେଲା, ହେ ମନୁଜବ୍ୟାଘ୍ର।

Verse 40

कर्तुकामा सुखवहे शकले सा तु राक्षसी । संयोजयामास तदा विधानबलचोदिता,विधाताके विधानसे प्रेरित होकर उस राक्षसीने उन दोनों टुकड़ोंको सुविधापूर्वक ले जानेयोग्य बनानेकी इच्छासे उस समय जोड़ दिया

ବିଧାତାଙ୍କ ବିଧାନବଳରେ ପ୍ରେରିତ ହୋଇ, ବହନ କରିବାକୁ ସୁବିଧା ହେବ—ଏହି ଇଚ୍ଛାରେ ସେଇ ରାକ୍ଷସୀ ସେତେବେଳେ ସେ ଦୁଇ ଖଣ୍ଡକୁ ଯୋଡ଼ିଦେଲା।

Verse 41

ते समानीतमात्रे तु शकले पुरुषर्षभ । एकमूर्तिधरो वीर: कुमार: समपद्यत,नरश्रेष्ठ उन टुकड़ोंका परस्पर संयोग होते ही एक शरीरधारी वीर कुमार बन गया

ହେ ପୁରୁଷର୍ଷଭ! ସେଇ ଖଣ୍ଡଦୁଇଟି ଏକତ୍ର ହେବାମାତ୍ରେ ଏକ ଦେହଧାରୀ ଏକ ବୀର କୁମାର ଜନ୍ମ ନେଲା।

Verse 42

ततः सा राक्षसी राजन्‌ विस्मयोत्फुल्ललोचना । न शशाक समुद्वोढुं वज़सारमयं शिशुम्‌,राजन! यह देखकर राक्षसीके नेत्र आश्वर्यसे खिल उठे। उसे वह शिशु वज्रके सारतत्त्वका बना जान पड़ा। राक्षसी उसे उठाकर ले जानेमें असमर्थ हो गयी

ତାପରେ, ହେ ରାଜନ୍! ବିସ୍ମୟରେ ପ୍ରସ୍ଫୁଟିତ ନୟନବତୀ ସେଇ ରାକ୍ଷସୀ ସେ ଶିଶୁକୁ ଉଠାଇ ନେଇପାରିଲା ନାହିଁ; ଶିଶୁଟି ତାକୁ ବଜ୍ରସାରମୟ ପରି ଲାଗିଲା।

Verse 43

बालस्ताम्रतल मुष्टिं कृत्वा चास्ये निधाय स: । प्राक्रोशदतिसंरब्ध: सतोय इव तोयद:,उस बालकने अपने लाल हथेलीवाले हाथोंकी मुट्ठी बाँधकर मुँहमें डाल ली और अत्यन्त क़ुद्ध होकर जलसे भरे मेघकी भाँति गम्भीर स्वरसे रोना शुरू कर दिया

ସେଇ ବାଳକ ତାମ୍ରବର୍ଣ୍ଣ ହସ୍ତତଳର ମୁଷ୍ଟି ବାନ୍ଧି ମୁହଁରେ ଦେଲା, ଏବଂ ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧିତ ହୋଇ ଜଳଭରା ମେଘ ପରି ଗମ୍ଭୀର ସ୍ୱରରେ ଆର୍ତ୍ତନାଦ କରି କାନ୍ଦିବାକୁ ଲାଗିଲା।

Verse 44

तेन शब्देन सम्भ्रान्त: सहसान्तःपुरे जनः । निर्जगाम नरव्याप्र राज्ञा सह परंतप,परंतप नरव्याप्र! बालकके उस रोने-चिल्लानेके शब्दसे रनिवासकी सब स्त्रियाँ घबरा उठीं तथा राजाके साथ सहसा बाहर निकलीं

ସେଇ ଶିଶୁର କାନ୍ଦ-ଚିତ୍କାରର ଶବ୍ଦରେ ଅନ୍ତଃପୁରର ଲୋକମାନେ—ବିଶେଷକରି ରାଜଗୃହର ନାରୀମାନେ—ଭ୍ରମିତ ହୋଇ ଉଠିଲେ; ହେ ନରବ୍ୟାଘ୍ର, ହେ ପରନ୍ତପ! ସେମାନେ ରାଜାଙ୍କ ସହ ସହସା ବାହାରିଲେ।

Verse 45

ते चाबले परिम्लाने पय:पूर्णपयो धरे । निराशे पुत्रलाभाय सहसैवाभ्यगच्छताम्‌,दूधसे भरे हुए स्तनोंवाली वे दोनों अबला रानियाँ भी, जो पुत्रप्राप्तिकी आशा छोड़ चुकी थीं, मलिन मुख हो सहसा बाहर निकल आयीं

ଦୁଧରେ ପୂର୍ଣ୍ଣ ସ୍ତନଧାରିଣୀ ସେଇ ଦୁଇ ଅବଳା ରାଣୀମାନେ ମଧ୍ୟ—ପୁତ୍ରଲାଭର ଆଶା ଛାଡ଼ିଦେଇଥିଲେ ଯଦିଓ—ମ୍ଲାନ ମୁଖରେ ସହସା ବାହାରି ଆସିଲେ।

Verse 46

अथ दृष्टवा तथाभूते राजानं चेष्टसंततिम्‌ तं च बाल॑ सुबलिनं चिन्तयामास राक्षसी,उन दोनों रानियोंको उस प्रकार उदास, राजाको संतान पानेके लिये उत्सुक तथा उस बालकको अत्यन्त बलवान्‌ देखकर राक्षसीने सोचा, “मैं इस राजाके राज्यमें रहती हूँ। यह पुत्रकी इच्छा रखता है; अतः इस धर्मात्मा तथा महात्मा नरेशके बालक पुत्रकी हत्या करना मेरे लिये उचित नहीं है”

ସେଇ ଦୁଇ ରାଣୀଙ୍କୁ ଏପରି ଉଦାସ, ରାଜାଙ୍କୁ ସନ୍ତାନଲାଭ ପାଇଁ ଉତ୍ସୁକ, ଏବଂ ସେଇ ବାଳକକୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ବଳବାନ ଦେଖି ରାକ୍ଷସୀ ମନେ ମନେ ଚିନ୍ତା କଲା—“ମୁଁ ଏହି ରାଜାଙ୍କ ରାଜ୍ୟରେ ବସୁଛି; ସେ ପୁତ୍ରକାମ; ତେଣୁ ଏହି ଧର୍ମାତ୍ମା, ମହାତ୍ମା ନରେଶଙ୍କ ବାଳ ପୁତ୍ରକୁ ହତ୍ୟା କରିବା ମୋ ପାଇଁ ଉଚିତ ନୁହେଁ।”

Verse 47

नाहामि विषये राज्ञो वसन्ती पुत्रगृद्धिन: । बालं पुत्रमिमं हन्तुं धार्मिकस्य महात्मन:,उन दोनों रानियोंको उस प्रकार उदास, राजाको संतान पानेके लिये उत्सुक तथा उस बालकको अत्यन्त बलवान्‌ देखकर राक्षसीने सोचा, “मैं इस राजाके राज्यमें रहती हूँ। यह पुत्रकी इच्छा रखता है; अतः इस धर्मात्मा तथा महात्मा नरेशके बालक पुत्रकी हत्या करना मेरे लिये उचित नहीं है”

“ମୁଁ ଏହି ରାଜାଙ୍କ ରାଜ୍ୟରେ ବସୁଛି, ଏବଂ ସେ ପୁତ୍ରଲାଲସାରେ ଆକୁଳ; ତେଣୁ ଏହି ଧର୍ମାତ୍ମା, ମହାତ୍ମା ନରେଶଙ୍କ ଏହି ବାଳ ପୁତ୍ରକୁ ହତ୍ୟା କରିବା ମୋ ପାଇଁ ଉଚିତ ନୁହେଁ।”

Verse 48

सा तं बालमुपादाय मेघलेखेव भास्करम्‌ । कृत्वा च मानुषं रूपमुवाच वसुधाधिपम्‌,ऐसा विचारकर उस राक्षसीने मानवीका रूप धारण किया और जैसे मेघमाला सूर्यको धारण करे, उसी प्रकार वह उस बालकको गोदमें उठाकर भूपालसे बोली

ଏପରି ଚିନ୍ତା କରି ରାକ୍ଷସୀ ମାନବୀ ରୂପ ଧାରଣ କଲା; ଏବଂ ଯେପରି ମେଘମାଳା ସୂର୍ଯ୍ୟକୁ ଆବୃତ କରେ, ସେପରି ସେଇ ବାଳକକୁ କୋଳେ ଉଠାଇ ଭୂଧରାଧିପ ରାଜାଙ୍କୁ କହିଲା।

Verse 49

राक्षस्युवाच बृहद्रथ सुतस्ते5यं मया दत्त: प्रगृह्मताम्‌ । तव पत्नीद्वये जातो द्विजातिवरशासनात्‌ । धात्रीजनपरित्यक्तो मयायं परिरक्षित:,राक्षसीने कहा--बृहद्रथ! यह तुम्हारा पुत्र है, जिसे मैंने तुम्हें दिया है। तुम इसे ग्रहण करो। ब्रह्मर्षिके वरदान एवं आशीर्वादसे तुम्हारी पत्नियोंके गर्भसे इसका जन्म हुआ है। धायोंने इसे घरके बाहर लाकर डाल दिया था; किंतु मैंने इसकी रक्षा की है

ରାକ୍ଷସୀ କହିଲା—ହେ ବୃହଦ୍ରଥ! ଏହି ତୋର ପୁତ୍ର; ମୁଁ ଏହାକୁ ତୋତେ ଦେଉଛି—ଗ୍ରହଣ କର। ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଦ୍ୱିଜଙ୍କ ବିଧାନ ଓ ଆଶୀର୍ବାଦରେ ତୋର ଦୁଇ ରାଣୀଙ୍କ ଗର୍ଭରୁ ଏହାର ଜନ୍ମ ହୋଇଛି। ଧାତ୍ରୀମାନେ ଏହାକୁ ଘର ବାହାରେ ଫେଙ୍ଗି ତ୍ୟାଗ କରିଥିଲେ; କିନ୍ତୁ ମୁଁ ଏହାକୁ ରକ୍ଷା କରିଛି।

Verse 50

श्रीकृष्ण उवाच ततस्ते भरतश्रेष्ठ काशिराजसुते शुभे । त॑ं बालमभिपलद्याशु प्रस्रवैरभ्यषिड्चताम्‌,श्रीकृष्ण कहते हैं--भरतकुलभूषण! तब काशिराजकी उन दोनों शुभलक्षणा कन्याओंने उस बालकको तुरंत गोदमें लेकर उसे स्तनोंके दूधसे सींच दिया

ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତାପରେ କାଶୀରାଜଙ୍କ ସେଇ ଦୁଇ ଶୁଭଲକ୍ଷଣା କନ୍ୟା ଶିଶୁଟିକୁ ତୁରନ୍ତ କୋଳେ ନେଇ, ସ୍ତନ୍ୟର ଧାରାରେ ତାକୁ ସ୍ନାନ କରାଇଲେ ପରି ସିଞ୍ଚିଲେ।

Verse 51

ततः स राजा संहृष्ट: सर्व तदुपलभ्य च । अपृच्छद्धेमगर्भाभां राक्षसीं तामराक्षसीम्‌,यह सब देख-सुनकर राजाके हर्षकी सीमा न रही। उन्होंने सुवर्णकी-सी कान्तिवाली उस राक्षसीसे, जो स्वरूप-से राक्षसी नहीं जान पड़ती थी, इस प्रकार पूछा

ଏସବୁ ଦେଖି-ଶୁଣି ରାଜା ଆନନ୍ଦରେ ପ୍ରଫୁଲ୍ଲିତ ହେଲେ। ସମସ୍ତ ଘଟଣା ଉପଲବ୍ଧି କରି ସୁବର୍ଣ୍ଣସଦୃଶ କାନ୍ତିବତୀ ସେଇ ରାକ୍ଷସୀକୁ—ଯେ ରୂପରେ ରାକ୍ଷସୀ ପରି ଲାଗୁନଥିଲା—ଏଭଳି ପଚାରିଲେ।

Verse 52

राजोवाच का त्वं कमलगर्भाभे मम पुत्रप्रदायिनी । कामया ब्रूहि कल्याणि देवता प्रतिभासि मे,राजाने कहा--कमलके भीतरी भागके समान मनोहर कान्तिवाली कल्याणी! मुझे पुत्र प्रदान करनेवाली तुम कौन हो? बताओ। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि तुम इच्छानुसार विचरनेवाली कोई देवी हो

ରାଜା କହିଲେ—କମଳଗର୍ଭ ସଦୃଶ ମନୋହର କାନ୍ତିବତୀ କଲ୍ୟାଣୀ! ମୋତେ ପୁତ୍ର ଦେଇଥିବା ତୁମେ କିଏ? ଇଚ୍ଛାମତେ କୁହ। ମୋତେ ତ ତୁମେ ଇଚ୍ଛାନୁସାରେ ବିଚରଣ କରୁଥିବା କୌଣସି ଦେବୀ ପରି ପ୍ରତୀତ ହେଉଛ।

Verse 186

प्रियाभ्यामनुरूपाभ्यां करेणुभ्यामिव द्विप: । भरतकुलभूषण! महापराक्रमी राजा बृहद्रथने काशिराजकी दो जुड़वीं कन्याओंके साथ, जो अपनी रूप-सम्पत्तिसे अपूर्व शोभा पा रही थीं, विवाह किया और उन नरश्रेष्ठने एकान्तमें अपनी दोनों पत्नियोंके समीप यह प्रतिज्ञा की कि मैं तुम दोनोंके साथ कभी विषम व्यवहार नहीं करूँगा (अर्थात्‌ दोनोंके प्रति समानरूपसे मेरा प्रेमभाव बना रहेगा)। जैसे दो हथिनियोंके साथ गजराज सुशोभित होता है, उसी प्रकार वे महाराज बृहद्रथ अपने मनके अनुरूप दोनों प्रिय पत्नियोंके साथ शोभा पाने लगे

ହେ ଭରତକୁଳଭୂଷଣ! ମହାପରାକ୍ରମୀ ରାଜା ବୃହଦ୍ରଥ କାଶୀରାଜଙ୍କ ରୂପସମ୍ପନ୍ନ ଯୁଗ୍ମ କନ୍ୟାଦ୍ୱୟଙ୍କୁ ବିବାହ କଲେ। ପରେ ଏକାନ୍ତରେ ସେ ଉଭୟଙ୍କୁ ଏହି ପ୍ରତିଜ୍ଞା କଲେ—“ମୁଁ ତୁମ ଦୁହିଁଜଣଙ୍କ ସହ କେବେ ବି ଅସମ ବ୍ୟବହାର କରିବି ନାହିଁ; ତୁମ ଦୁହିଁଜଣଙ୍କ ପ୍ରତି ମୋର ସ୍ନେହ ସମାନ ରହିବ।” ଏବଂ ଯେପରି ଯୋଗ୍ୟ ଦୁଇ ହସ୍ତିନୀ ସହ ଗଜରାଜ ଅଧିକ ଶୋଭିତ ହୁଏ, ସେପରି ମନୋନୁକୂଳ ସେଇ ପ୍ରିୟ ପତ୍ନୀଦ୍ୱୟ ସହ ବୃହଦ୍ରଥ ଅଧିକ ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଲେ।

Verse 1936

गड्ायमुनयोर्म ध्ये मूर्तिमानिव सागर: । जब वे दोनों पत्नियोंके बीच विराजमान होते, उस समय ऐसा जान पड़ता, मानो गंगा और यमुनाके बीचमें मूर्तिमान्‌ समुद्र सुशोभित हो रहा है

ଯେତେବେଳେ ସେ ଦୁଇ ମହିଷୀଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଦୀପ୍ତିମାନ ଭାବେ ବିରାଜୁଥିଲେ, ସେତେବେଳେ ଗଙ୍ଗା ଓ ଯମୁନାର ମଧ୍ୟରେ ମୂର୍ତ୍ତିମାନ ସମୁଦ୍ର ଶୋଭା ପାଉଛି ବୋଲି ଲାଗୁଥିଲା।

Frequently Asked Questions

The tension lies in attributing responsibility and legitimacy: Jarā asserts she is only a ‘cause’ (hetumātra) while fate and royal fortune are decisive, yet the polity formalizes the result through rites and naming, converting an extraordinary event into recognized dynastic continuity.

The chapter conveys that political authority is stabilized through institutional acts—hospitality, counsel, public succession, and ritual consecration—while also acknowledging that perceived destiny and reputation (prophetic validation) strongly condition interstate behavior.

No explicit phalaśruti is stated in this chapter; its meta-function is etiological and strategic, explaining Jarāsandha’s status and thereby clarifying later political calculations within Sabhā-parva’s broader arc.