
युद्धसंग्रहः (Kurukṣetra Campaign in Summary)
Upa-parva: Kurukṣetra-yuddha-smṛti (Vāsudeva’s recollection of the war; embedded retrospective episode)
This adhyāya is structured as a dialogic recollection. Vasudeva requests a factual account from Kṛṣṇa (Puṇḍarīkākṣa), who responds by stating that the deeds are too numerous for exhaustive enumeration and therefore offers a prioritized synopsis. He outlines the sequence of commanders and major phases: Bhīṣma as Kaurava commander and Śikhaṇḍin as a key Pandava front figure under Arjuna’s protection; the ten-day engagement ending with Bhīṣma’s fall and subsequent waiting for Uttarāyaṇa. Droṇa then assumes command, protected by senior fighters, while Dhṛṣṭadyumna leads the Pandavas under Bhīma’s guard; a five-day severe phase ends with Droṇa’s defeat. Karṇa becomes commander; after intense engagements, he is killed in a decisive encounter with Arjuna. The Kauravas then rally around Śalya, who is slain by Yudhiṣṭhira; Sahadeva kills Śakuni. Duryodhana retreats and is pursued; he is located at the Dvaipāyana lake and ultimately felled by Bhīma in a public contest. The chapter further notes the night-time massacre of the sleeping Pandava camp by Aśvatthāman (Droṇa’s son) in retaliation, leaving only a small remnant including the Pāṇḍavas with Kṛṣṇa and Sātyaki; Aśvatthāman escapes with Kṛpa and Bhoja, and Yuyutsu survives. The narration concludes with the framing voice (Vaiśaṃpāyana) observing that the Vṛṣṇis experienced mixed distress and exhilaration while hearing this account.
Chapter Arc: जनमेजय जिज्ञासा करता है—उत्तंक को वरदान देकर महायशस्वी श्रीकृष्ण ने आगे क्या किया? → वैशम्पायन बताते हैं कि गोविन्द सात्यकि के साथ शीघ्रगामी अश्वों पर आरूढ़ होकर द्वारका की ओर प्रस्थान करते हैं, मार्ग में सरोवर, नदियाँ, वन और पर्वत लाँघते हुए—मानो दीर्घ प्रवास के बाद घर की ओर लौटता हुआ विजयी नायक। → रम्या द्वारवती में प्रवेश: पताकाओं और घण्टिकाओं से गुंजित नगर, और यादवों का देवताओं की भाँति स्वागत—श्रीकृष्ण का माता-पिता से मिलन, आलिंगन, कुशल-प्रश्न और सान्त्वना के मधुर वचन। → वृष्णि-भोज-अन्धक जन समुदाय के बीच सम्मान पाकर श्रीकृष्ण अपने सुन्दर भवन में प्रवेश करते हैं; सात्यकि भी अपने गृह को लौटता है। → द्वारका-प्रवेश के बाद गृहस्थ-जीवन और यादव-समाज में आगे क्या संवाद/घटनाएँ घटेंगी—यह जिज्ञासा बनी रहती है।
Verse 1
जनमेजयने पूछा--द्विजश्रेष्ठ!] महायशस्वी महाबाहु भगवान् श्रीकृष्णने उत्तंकको वरदान देनेके पश्चात् क्या किया?,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णका द्वारकाप्रवेशविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ५९ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ ३ “लोक मिलाकर कुल २४३ श्लोक हैं) #5-2८5 >> धन #* षष्टितमो< ध्याय: वसुदेवजीके पूछनेपर श्रीकृष्णका उन्हें महाभारत-युद्धका वृत्तान्त संक्षेपसे सुनाना वसुदेव उवाच श्रुतवानस्मि वार्ष्णेय संग्रामं परमाद्भुतम् । नराणां वदतां तत्र कथं वा तेषु नित्यश:
ଜନମେଜୟ କହିଲେ—“ଦ୍ୱିଜଶ୍ରେଷ୍ଠ! ମହାଯଶସ୍ବୀ ମହାବାହୁ ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଉତ୍ତଙ୍କକୁ ବର ଦେଇ ପରେ କ’ଣ କଲେ?”
Verse 2
वैशम्पायन उवाच उत्तड़काय वरं दत्त्वा प्रायात् सात्यकिना सह । द्वारकामेव गोविन्द: शीघ्रवेगैर्महाहयै:,वैशम्पायनजीने कहा--उत्तंकको वर देकर भगवान् श्रीकृष्ण महान् वेगशाली शीघ्रगामी घोड़ोंद्वारा सात्यकि (और सुभद्रा)-के साथ पुनः द्वाराकी ओर ही चल दिये
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଉତ୍ତଙ୍କକୁ ବର ଦେଇ ଗୋବିନ୍ଦ ସାତ୍ୟକି ସହିତ ମହାବେଗୀ ଶୀଘ୍ରଗାମୀ ଅଶ୍ୱମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଦ୍ୱାରକାକୁ ଯାତ୍ରା କଲେ।
Verse 3
सरांसि सरितश्चैव वनानि च गिरीस्तथा । अतिक्रम्याससादाथ रम्यां द्वारवतीं पुरीम्,मार्गमें अनेकानेक सरोवरों, सरिताओं, वनों और पर्वतोंको लाँधकर वे परम रमणीय द्वारका नगरीमें जा पहुँचे। महाराज! उस समय वहाँ रैवतक पर्वतपर कोई बड़ा भारी उत्सव मनाया जा रहा था। सात्यकिको साथ लिये कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण भी उस समय उस महोत्सवमें पधारे
ମାର୍ଗରେ ଅନେକ ସରୋବର, ନଦୀ, ବନ ଓ ପର୍ବତ ଅତିକ୍ରମ କରି ସେମାନେ ଶେଷରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ରମଣୀୟ ଦ୍ୱାରବତୀ ପୁରୀକୁ ପହଞ୍ଚିଲେ।
Verse 4
वर्तमाने महाराज महे रैवतकस्य च । उपायात् पुण्डरीकाक्षो युयुधानानुगस्तदा,मार्गमें अनेकानेक सरोवरों, सरिताओं, वनों और पर्वतोंको लाँधकर वे परम रमणीय द्वारका नगरीमें जा पहुँचे। महाराज! उस समय वहाँ रैवतक पर्वतपर कोई बड़ा भारी उत्सव मनाया जा रहा था। सात्यकिको साथ लिये कमलनयन भगवान् श्रीकृष्ण भी उस समय उस महोत्सवमें पधारे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାରାଜ! ରୈବତକ ପର୍ବତରେ ସେଇ ମହୋତ୍ସବ ଚାଲିଥିବାବେଳେ, ଯୁୟୁଧାନ (ସାତ୍ୟକି) ସହିତ ପୁଣ୍ଡରୀକାକ୍ଷ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ସେଠାକୁ ଆସି ପହଞ୍ଚିଲେ।
Verse 5
अलंकृतस्तु स गिरिरनाननारूपैर्विचित्रितै: । बभौ रत्नमयै: कोशै: संवृतः पुरुषर्षभ,पुरुषप्रवर! वह पर्वत नाना प्रकारके विचित्र रत्नमय ढेरोंद्वारा सजाया गया था, उस समय उसकी अद्भुत शोभा हो रही थी
ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ! ସେଇ ପର୍ବତ ନାନାପ୍ରକାର ବିଚିତ୍ର ରୂପରେ ଅଲଙ୍କୃତ ଥିଲା; ରତ୍ନମୟ ନିଧିର ଢେରମାନେ ଚାରିଦିଗରେ ଘେରି ରହିଥିବାରୁ ସେ ଅଦ୍ଭୁତ ଶୋଭାରେ ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଉଥିଲା।
Verse 6
काजउ्चनस्रग्भिरग्रयाभि: सुमनोभिस्तथैव च । वासोभिश्व महाशैल: कल्पवृक्षैस्तथैव च,सोनेकी सुन्दर मालाओं, भाँति-भाँतिके पुष्पों, वस्त्रों और कल्पवृक्षोंसे घिरे हुए उस महान् शैलकी अपूर्व शोभा हो रही थी
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଶ୍ରେଷ୍ଠ ସୁବର୍ଣ୍ଣମାଳା, ସୁଗନ୍ଧିତ ପୁଷ୍ପ, ଉତ୍ତମ ବସ୍ତ୍ର ଓ କଳ୍ପବୃକ୍ଷଦ୍ୱାରା ଚତୁର୍ଦ୍ଦିଗରେ ଘେରାଯାଇଥିବା ସେ ମହାପର୍ବତ ଅପୂର୍ବ ଶୋଭାରେ ଦୀପ୍ତିମାନ ହେଲା।
Verse 7
दीपवृक्षैश्ष सौवर्णरभीक्ष्णममुपशोभित: । गुहानिर्सरदेशेषु दिवाभूतो बभूव ह,वृक्षेके आकारमें सजाये हुए सोनेके दीप उस स्थानकी शोभाको और भी उद्दीप्त कर रहे थे। वहाँकी गुफाओं और झरनोंके स्थानोंमें दिनके समान प्रकाश हो रहा था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଦୀପବୃକ୍ଷମାନଙ୍କ ଉପରେ ସଜାଯାଇଥିବା ସୁବର୍ଣ୍ଣ ଦୀପଗୁଡ଼ିକ ସେ ସ୍ଥାନକୁ ନିରନ୍ତର ଶୋଭିତ କରୁଥିଲେ। ଗୁହାମାନଙ୍କ ଅଞ୍ଚଳରେ ଓ ଝରଣା-ନିର୍ଗମ ସ୍ଥାନଗୁଡ଼ିକରେ ସେଠାରେ ଦିନ ପରି ଆଲୋକ ହୋଇଯାଇଥିଲା।
Verse 8
पताकाभिरवविंचित्राभि: सघण्टाभि: समन्ततः । पुम्भि: स्त्रीभिश्व संघुष्ट: प्रणित इव चाभवत्,चारों ओर विचित्र पताकाएँ फहरा रही थीं, उनमें बँधी हुई घण्टियाँ बज रही थीं और स्त्रियों तथा पुरुषोंके सुमधुर शब्द वहाँ व्याप्त हो रहे थे। इससे वह पर्वत संगीतमय-सा प्रतीत हो रहा था
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଚତୁର୍ଦ୍ଦିଗରେ ବିଚିତ୍ର ପତାକାମାନେ ଫଡ଼ଫଡ଼ାଉଥିଲେ; ସେମାନଙ୍କ ସହ ବାନ୍ଧା ଘଣ୍ଟିମାନେ ଝଙ୍କାର କରୁଥିଲେ। ନାରୀ-ପୁରୁଷଙ୍କ ମଧୁର ଶବ୍ଦରେ ସେ ସ୍ଥାନ ଗୁଞ୍ଜିଉଠିଲା; ଯେପରି ପର୍ବତଟି ନିଜେ ସଙ୍ଗୀତମୟ ହୋଇଯାଇଛି।
Verse 9
अतीव प्रेक्षणीयो 5 भून्मेरु्मुनिगणैरिव । मत्तानां हृष्टरूपाणां स्त्रीणां पुंसां च भारत
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ସେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦର୍ଶନୀୟ ହେଲା—ମୁନିଗଣମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପରିବେଷ୍ଟିତ ମେରୁ ପର୍ବତ ପରି—ଆନନ୍ଦରେ ମତ୍ତ ନାରୀ-ପୁରୁଷମାନେ ହର୍ଷୋଦ୍ଦୀପ୍ତ ମୁଖଭାବ ଧାରଣ କରିଥିଲେ।
Verse 10
प्रमत्तमत्तसम्मत्तक्ष्वेडितोत्क्रुष्टसंकुल:
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ପ୍ରମତ୍ତ ଓ ମତ୍ତ ଲୋକମାନଙ୍କ କୋଳାହଳରେ ସେ ସ୍ଥାନ ଭରିଯାଇଥିଲା; ଗର୍ବଭରା ହୁଙ୍କାର, ଉଚ୍ଚ ଚିତ୍କାର ଓ ଉନ୍ମତ୍ତ ଘୋଷର ଗୁଞ୍ଜନ ଏକାକାର ହୋଇଥିଲା।
Verse 11
विपणापणवान् रम्यो भक्ष्यभोज्यविहारवान्,उस महान् पर्वतपर होनेवाला वह महोत्सव परम मंगलमय प्रतीत होता था। वहाँ दूकानें और बाजार लगी थीं। भक्ष्य-भोज्य पदार्थ यथेष्ट रूपसे प्राप्त होते थे। सब ओर घूमने-फिरनेकी सुविधा थी। वस्त्रों और मालाओंके ढेर लगे थे। वीणा, वेणु और मृदंग बज रहे थे। इन सबके कारण वहाँकी रमणीयता बहुत बढ़ गयी थी। वहाँ दीनों, अन्धों और अनाथोंके लिये निरन्तर सुरा-मैरेयमिश्रित भक्ष्य-भोज्य पदार्थ दिये जाते थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ସେଇ ମହାପର୍ବତ ଉପରେ ହୋଇଥିବା ମହୋତ୍ସବଟି ପରମ ମଙ୍ଗଳମୟ ବୋଲି ପ୍ରତୀତ ହେଉଥିଲା। ସେଠାରେ ଦୋକାନ ଓ ବଜାର ବସିଥିଲା; ଇଚ୍ଛାମତେ ପ୍ରଚୁର ଭକ୍ଷ୍ୟ-ଭୋଜ୍ୟ ଓ ପାନୀୟ ମିଳୁଥିଲା, ଏବଂ ସବୁ ଦିଗରେ ଘୁରିବା-ଫିରିବାର ସୁବିଧା ଥିଲା। ବସ୍ତ୍ର ଓ ମାଳାର ଢେର ଲାଗିଥିଲା; ବୀଣା, ବେଣୁ ଓ ମୃଦଙ୍ଗର ନାଦ ଦିଗଦିଗନ୍ତରେ ଗୁଞ୍ଜୁଥିଲା। ଏସବୁ ଦ୍ୱାରା ସେଠାର ରମଣୀୟତା ଅଧିକ ବଢ଼ିଗଲା। ତଦୁପରି ଦୀନ, ଅନ୍ଧ ଓ ଅନାଥମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସୁରା-ମୈରେୟ ମିଶ୍ରିତ ଭକ୍ଷ୍ୟ-ଭୋଜ୍ୟ ନିରନ୍ତର ବଣ୍ଟନ ହେଉଥିଲା।
Verse 12
वस्त्रमाल्योत्करयुतो वीणावेणुमृदड्भगवान् । सुरामैरेयमिश्रेण भक्ष्यभोज्येन चैव ह,उस महान् पर्वतपर होनेवाला वह महोत्सव परम मंगलमय प्रतीत होता था। वहाँ दूकानें और बाजार लगी थीं। भक्ष्य-भोज्य पदार्थ यथेष्ट रूपसे प्राप्त होते थे। सब ओर घूमने-फिरनेकी सुविधा थी। वस्त्रों और मालाओंके ढेर लगे थे। वीणा, वेणु और मृदंग बज रहे थे। इन सबके कारण वहाँकी रमणीयता बहुत बढ़ गयी थी। वहाँ दीनों, अन्धों और अनाथोंके लिये निरन्तर सुरा-मैरेयमिश्रित भक्ष्य-भोज्य पदार्थ दिये जाते थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ବସ୍ତ୍ର ଓ ମାଳାର ଢେରରେ ପରିପୂର୍ଣ୍ଣ, ବୀଣା-ବେଣୁ-ମୃଦଙ୍ଗର ନାଦରେ ମୁଖର, ଏବଂ ସୁରା-ମୈରେୟ ସହିତ ଭକ୍ଷ୍ୟ-ଭୋଜ୍ୟରେ ସମୃଦ୍ଧ ସେଇ ମହା ଉତ୍ସବ-ସମାଗମ ପରମ ମଙ୍ଗଳମୟ ବୋଲି ପ୍ରତୀତ ହେଉଥିଲା। ସେଠାରେ ବଜାର ଓ ଦୋକାନ ବସିଥିଲା; ଇଚ୍ଛାମତେ ସବୁକିଛି ପ୍ରଚୁର ମିଳୁଥିଲା, ଏବଂ ସବୁ ଦିଗରେ ଆସା-ଯାଆ ସହଜ ଥିଲା। ତଥାପି ଦୀନ, ଅନ୍ଧ ଓ ଅନାଥମାନଙ୍କ ପାଇଁ ସୁରା-ମୈରେୟ ମିଶ୍ରିତ ଭକ୍ଷ୍ୟ-ଭୋଜ୍ୟ ନିରନ୍ତର ବଣ୍ଟନ ହେଉଥିଲା।
Verse 13
दीनान्धकृपणादिभ्यो दीयमानेन चानिशम् | बभौ परमकल्याणो महस्तस्य महागिरे:,उस महान् पर्वतपर होनेवाला वह महोत्सव परम मंगलमय प्रतीत होता था। वहाँ दूकानें और बाजार लगी थीं। भक्ष्य-भोज्य पदार्थ यथेष्ट रूपसे प्राप्त होते थे। सब ओर घूमने-फिरनेकी सुविधा थी। वस्त्रों और मालाओंके ढेर लगे थे। वीणा, वेणु और मृदंग बज रहे थे। इन सबके कारण वहाँकी रमणीयता बहुत बढ़ गयी थी। वहाँ दीनों, अन्धों और अनाथोंके लिये निरन्तर सुरा-मैरेयमिश्रित भक्ष्य-भोज्य पदार्थ दिये जाते थे
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଦୀନ, ଅନ୍ଧ, ଦରିଦ୍ର ଆଦିମାନଙ୍କୁ ଅବିରତ ଦାନ ଓ ଅନ୍ନ-ପାନ ଦିଆଯାଉଥିବାରୁ, ସେଇ ମହାପର୍ବତର ମହୋତ୍ସବ ପରମ କଲ୍ୟାଣମୟ ଭାବେ ଶୋଭିତ ହେଉଥିଲା।
Verse 14
पुण्यावसथवान् वीर पुण्यकृद्धिर्निषेवित: । विहारो वृष्णिवीराणां महे रैवतकस्य ह
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ହେ ବୀର, ସେଠା ଥିଲା ପୁଣ୍ୟ ଆବାସ; ପୁଣ୍ୟକର୍ମ କରୁଥିବା ଲୋକମାନେ ଯାହାକୁ ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ସେବନ କରୁଥିଲେ। ସେଇ ଥିଲା ବୃଷ୍ଣିବୀରମାନଙ୍କର ବିହାରସ୍ଥଳ—ମହାନ ରୈବତକର ପ୍ରସିଦ୍ଧ ରମଣୀୟ ଭୂମି।
Verse 15
तदा च कृष्णसांनिध्यमासाद्य भरतर्षभ,(स्तुवन्त्यन्तर्हिता देवा गन्धर्वाश्व सहर्षिभि: । भरतश्रेष्ठ] उस समय देवता, गन्धर्व और ऋषि अदृश्यरूपसे श्रीकृष्णके निकट आकर उनकी स्तुति करने लगे
ତେବେ, ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ସାନ୍ନିଧ୍ୟକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହେବା ସହିତ ଦେବତାମାନେ—ଅଦୃଶ୍ୟ ରହି—ଗନ୍ଧର୍ବ ଓ ଋଷିମାନଙ୍କ ସହ ମିଶି ତାଙ୍କର ସ୍ତୁତି କରିବାକୁ ଲାଗିଲେ।
Verse 16
ततः सम्पूज्यमान: स विवेश भवनं शुभम्
ତାପରେ ଯଥାବିଧି ସମ୍ମାନିତ ଓ ଆଦରରେ ସତ୍କୃତ ହୋଇ ସେ ଶୁଭ ଭବନରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ।
Verse 17
विवेश च प्रह्ृष्टात्मा चिरकालप्रवासत:
ଦୀର୍ଘକାଳ ପ୍ରବାସ ପରେ ହର୍ଷିତ ହୃଦୟରେ ସେ ପ୍ରବେଶ କଲେ।
Verse 18
भगवान् श्रीकृष्ण अपने पिता-माता आदिको महाभारतका वृत्तान्त सुना रहे हैं उपायान्तं तु वार्ष्णेयं भोजवृष्ण्यन्धकास्तथा
ବାର୍ଷ୍ଣେୟ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ନିକଟକୁ ଆସୁଥିବାବେଳେ ଭୋଜ, ବୃଷ୍ଣି ଓ ଅନ୍ଧକମାନେ ମଧ୍ୟ ଆଗକୁ ଆସିଲେ।
Verse 19
स तानभ्यर्च्य मेधावी पृष्टवा च कुशलं तदा । अभ्यवादयत प्रीत:ः पितरं मातरं तदा,मेधावी श्रीकृष्णने उन सबका आदर करके उनका कुशल-समाचार पूछा और प्रसन्नतापूर्वक अपने माता-पिताके चरणोंमें प्रणाम किया
ତେବେ ସେ ମେଧାବୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ କରି କୁଶଳ ପଚାରିଲେ ଏବଂ ପ୍ରୀତ ହୃଦୟରେ ପିତା ଓ ମାତାଙ୍କୁ ପ୍ରଣାମ କଲେ।
Verse 20
ताभ्यां स सम्परिष्वक्त: सान्त्वितश्न महाभुज: । उपोपदिष्टै: सर्वेस्तैर्वष्णिभि: परिवारित:
ସେ ଦୁଇଜଣ (ମାତା-ପିତା) ତାଙ୍କୁ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଲେ; ସେ ମହାବାହୁ ସମସ୍ତ ବୃଷ୍ଣିମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପରିବେଷ୍ଟିତ ଓ ତାଙ୍କ ଉପଦେଶରେ ସମର୍ଥିତ ହୋଇ ଧୈର୍ୟବାନ ହେଲେ।
Verse 21
उन दोनोंने उन महाबाहु श्रीकृष्णको अपनी छातीसे लगा लिया और मीठे वचनोंद्वारा उन्हें सान्त्वना दी। इसके बाद सभी वृष्णिवंशी उनको घेरकर आस-पास बैठ गये,स विश्रान्तो महातेजा: कृतपादावनेजन: । कथयामास तत्सरव॑ पृष्ट: पित्रा महाहवम् महातेजस्वी श्रीकृष्ण जब हाथ-पैर धोकर विश्राम कर चुके, तब पिताके पूछनेपर उन्होंने उस महायुद्धकी सारी घटना कह सुनायी
ସେ ଦୁଇଜଣ ମହାବାହୁ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ବକ୍ଷେ ଆଲିଙ୍ଗନ କରି ମଧୁର ବଚନରେ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦେଲେ। ତାପରେ ସମସ୍ତ ବୃଷ୍ଣିବଂଶୀ ତାଙ୍କୁ ଘେରି ଚାରିପାଖେ ବସିଲେ। ମହାତେଜସ୍ବୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ହାତପା ଧୋଇ ବିଶ୍ରାମ କରିଥିବାବେଳେ, ପିତା ପଚାରିବାରୁ ସେ ମହାଯୁଦ୍ଧର ସମଗ୍ର ବୃତ୍ତାନ୍ତ ଯଥାବତ୍ କହିଶୁଣାଇଲେ।
Verse 59
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि कृष्णस्य द्वारकाप्रवेशे एकोनषष्टितमो5 ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଆଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବର ଅନୁଗୀତାପର୍ବରେ କୃଷ୍ଣଙ୍କ ଦ୍ୱାରକାପ୍ରବେଶ ବିଷୟକ ଊଣଷଠିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 96
गायतां पर्वतेन्द्रस्य दिवस्पृणिव नि:स्वन: । जैसे मुनिगणोंसे मेरुकी शोभा होती है, उसी प्रकार द्वारकावासियोंके समागमसे वह पर्वत अत्यन्त दर्शनीय हो गया था। भरतनन्दन! उस पर्वतराजके शिखरपर हर्षोन्मत्त होकर गाते हुए स्त्री-पुरुषोंका सुमधुर शब्द मानो स्वर्गलोकतक व्याप्त हो रहा था
ପର୍ବତେନ୍ଦ୍ରର ଶିଖରରୁ ଗାଉଥିବା ସ୍ତ୍ରୀ-ପୁରୁଷମାନଙ୍କର ସୁମଧୁର ଗୀତଧ୍ୱନି ମହା ପ୍ରତିଧ୍ୱନି ସହ ଯେନ ସ୍ୱର୍ଗଲୋକ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ବ୍ୟାପିଯାଉଥିଲା। ଯେପରି ମୁନିଗଣଙ୍କ ସମାଗମରେ ମେରୁ ଶୋଭିତ ହୁଏ, ସେପରି ଦ୍ୱାରକାବାସୀମାନଙ୍କ ମିଳନରେ ସେ ପର୍ବତ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦର୍ଶନୀୟ ହୋଇଯାଇଥିଲା। ଭରତନନ୍ଦନ! ସେ ଗିରିରାଜର ଶିଖରରୁ ହର୍ଷୋନ୍ମତ୍ତ ଜନଙ୍କର ସୁମଧୁର ଗାନ ଯେନ ଦେବଲୋକ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ବ୍ୟାପିଥିଲା।
Verse 103
तथा किलकिलाशब्दैर्भूधरो5भून्मनोहर: । कुछ लोग क्रीडा आदिमें आसक्त होकर दूसरे कार्योंकी ओर ध्यान नहीं देते थे, कितने ही हर्षसे मतवाले हो रहे थे, कुछ लोग कूदते-फाँदते, उच्च स्वरसे कोलाहल करते और किलकारियाँ भरते थे। इन सभी शब्दोंसे गूँजता हुआ पर्वत परम मनोहर जान पड़ता था
ଏପରି ‘କିଲକିଲା’ ଧ୍ୱନି ଓ ଆନନ୍ଦର କୋଲାହଳରେ ପ୍ରତିଧ୍ୱନିତ ହୋଇ ସେ ପର୍ବତ ଅତ୍ୟନ୍ତ ମନୋହର ଲାଗୁଥିଲା। କେହି କେହି କ୍ରୀଡାରେ ଆସକ୍ତ ହୋଇ ଅନ୍ୟ କାର୍ଯ୍ୟକୁ ଧ୍ୟାନ ଦେଉନଥିଲେ; ଅନେକେ ହର୍ଷମଦରେ ମତ୍ତ ହୋଇଯାଇଥିଲେ; କେହି ଲାଫି-ଝାପି ଉଚ୍ଚ ସ୍ୱରରେ ହୁଲ୍ଲୋଡ଼ କରୁଥିଲେ ଓ ଉଲ୍ଲାସଧ୍ୱନି ଭରୁଥିଲେ। ଏହି ସମସ୍ତ ଶବ୍ଦରେ ଗୁଞ୍ଜି ଉଠି ସେ ଗିରି ପରମ ରମଣୀୟ ହୋଇଥିଲା।
Verse 143
स नगो वेश्मसंकीर्णो देवलोक इवाबभौ । वीरवर! उस पर्वतपर प्रण्यानुष्ठानके लिये बहुत-से गृह और आश्रम बने थे, जिनमें पुण्यात्मा पुरुष निवास करते थे। रैवतक पर्वतके उस महोत्सवमें वृष्णिवंशी वीरोंका विहार- स्थल बना हुआ था। वह गिरिप्रदेश बहुसंख्यक गृहोंसे व्याप्त होनेके कारण देवलोकके समान शोभा पाता था
ସେ ପର୍ବତ ଅନେକ ଗୃହରେ ସଂକୀର୍ଣ୍ଣ ହୋଇ ଦେବଲୋକ ପରି ଶୋଭା ପାଉଥିଲା। ବୀରବର! ସେଠାରେ ପୁଣ୍ୟାନୁଷ୍ଠାନ ପାଇଁ ବହୁ ଘର ଓ ଆଶ୍ରମ ନିର୍ମିତ ଥିଲା, ଯେଉଁଠାରେ ପୁଣ୍ୟାତ୍ମା ପୁରୁଷମାନେ ବସବାସ କରୁଥିଲେ। ରୈବତକ ପର୍ବତର ସେ ମହୋତ୍ସବରେ ତାହା ବୃଷ୍ଣିବଂଶୀ ବୀରମାନଙ୍କର ବିହାରସ୍ଥଳ ହୋଇଯାଇଥିଲା। ଅସଂଖ୍ୟ ନିବାସରେ ବ୍ୟାପ୍ତ ଥିବାରୁ ସେ ଗିରିପ୍ରଦେଶ ଦେବଲୋକ ସମାନ ଶୋଭା ପାଇଥିଲା।
Verse 156
देवगन्धर्वा ऊचु: साधक: सर्वरधर्माणामसुराणां विनाशक: । त्वं स्रष्टा सृज्यमाधारं कारणं धर्मवेदवित् ।। त्वया यत् क्रियते देव न जानीमो5त्र मायया । केवलं त्वाभिजानीम: शरणं परमेश्वरम् ।। ब्रह्मादीनां च गोविन्द सांनिध्यं शरणं नमः ।। देवता और गन्धर्व बोले--भगवन्! आप समस्त धर्मोके साधक और असुरोंके विनाशक हैं। आप ही स्रष्टा, आप ही सृज्य जगत् और आप ही उसके आधार हैं। आप ही सबके कारण तथा धर्म और वेदके ज्ञाता हैं। देव! आप अपनी मायासे जो कुछ करते हैं, हमलोग उसे नहीं जान पाते हैं। हम केवल आपको जानते हैं। आप ही सबके शरणदाता और परमेश्वर हैं। गोविन्द! आप ब्रह्मा आदिको भी सामीप्य और शरण प्रदान करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है ।। वैशम्पायन उवाच इति स्तुते&मानुषैश्न पूजिते देवकीसुते ।) शक्रसझप्रतीकाशो बभूव स हि शैलराट् । वैशम्पायनजी कहते हैं--इस प्रकार मानवेतर प्राणियों--देवताओं और गन्धर्वोद्वारा जब देवकीनन्दन श्रीकृष्णकी स्तुति और पूजा की जा रही थी, उस समय वह पर्वतराज रैवतक इन्द्रभवनके समान जान पड़ता था
ଦେବତା ଓ ଗନ୍ଧର୍ବମାନେ କହିଲେ— “ଭଗବନ୍! ଆପଣ ସମସ୍ତ ଧର୍ମର ସାଧକ ଏବଂ ଅସୁରମାନଙ୍କର ବିନାଶକ। ଆପଣ ହିଁ ସ୍ରଷ୍ଟା; ଆପଣ ହିଁ ସୃଷ୍ଟ ଜଗତ ଏବଂ ତାହାର ଆଧାର। ଆପଣ ସମସ୍ତଙ୍କର କାରଣ, ଧର୍ମ ଓ ବେଦର ଜ୍ଞାତା। ଦେବ! ଆପଣ ନିଜ ମାୟାରେ ଯାହା କରନ୍ତି, ତାହା ଆମେ ଏଠାରେ ବୁଝିପାରୁ ନାହିଁ; ଆମେ କେବଳ ଆପଣଙ୍କୁ ଜାଣୁ—ଆପଣ ହିଁ ପରମ ଶରଣ, ପରମେଶ୍ୱର। ଗୋବିନ୍ଦ! ଆପଣ ବ୍ରହ୍ମା ଆଦି ଦେବମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ନିଜ ସାନ୍ନିଧ୍ୟ ଓ ଶରଣ ଦାନ କରନ୍ତି। ଆପଣଙ୍କୁ ନମସ୍କାର।” ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ଏପରି ଭାବେ ଦେବତା ଓ ଗନ୍ଧର୍ବ ପରି ଅମାନୁଷ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଦେବକୀସୁତ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ସ୍ତୁତ ଓ ପୂଜିତ ହେଉଥିବାବେଳେ, ପର୍ବତରାଜ ରୈବତକ ଇନ୍ଦ୍ରଙ୍କ ଦିବ୍ୟ ଭବନ ସମାନ ଦୀପ୍ତିମାନ ଦେଖାଗଲା।”
Verse 163
गोविन्द: सात्यकिश्वैव जगाम भवनं स्वकम् | तदनन्तर सबसे सम्मानित हो भगवान् श्रीकृष्णने अपने सुन्दर भवनमें प्रवेश किया और सात्यकि भी अपने घरमें गये
ସମସ୍ତଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସମ୍ମାନିତ ଗୋବିନ୍ଦ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ) ନିଜ ସୁନ୍ଦର ଭବନରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ; ସାତ୍ୟକି ମଧ୍ୟ ନିଜ ଘରକୁ ଗଲେ।
Verse 173
कृत्वा नसुकरं कर्म दानवेष्विव वासव: । जैसे इन्द्र दानवोंपर महान् पराक्रम प्रकट करके आये हों, उसी प्रकार दुष्कर कर्म करके दीर्घकालके प्रवाससे प्रसन्नचित्त होकर लौटे हुए भगवान् श्रीकृष्णने अपने भवनमें प्रवेश किया
ଯେପରି ବାସବ (ଇନ୍ଦ୍ର) ଦାନବମାନଙ୍କ ଉପରେ ମହାପରାକ୍ରମ ପ୍ରକାଶ କରି ଫେରିଆସନ୍ତି, ସେପରି ଦୁଷ୍କର କାର୍ଯ୍ୟ ସାଧନ କରି, ଦୀର୍ଘକାଳ ପ୍ରବାସ ପରେ ପ୍ରସନ୍ନଚିତ୍ତ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ନିଜ ଭବନକୁ ଫେରି ପ୍ରବେଶ କଲେ।
Verse 186
अभ्यगच्छन् महात्मानं देवा इव शतक्रतुम् । जैसे देवता देवराज इन्द्रकी अगवानी करते हैं, उसी प्रकार भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके यादवोंने अपने निकट आते हुए महात्मा श्रीकृष्णका आगे बढ़कर स्वागत किया
ଯେପରି ଦେବମାନେ ଶତକ୍ରତୁ (ଇନ୍ଦ୍ର)ଙ୍କୁ ଅଗ୍ରସର ହୋଇ ସ୍ୱାଗତ କରନ୍ତି, ସେପରି ଭୋଜ, ବୃଷ୍ଣି ଓ ଅନ୍ଧକ ବଂଶର ଯାଦବମାନେ ନିକଟକୁ ଆସୁଥିବା ମହାତ୍ମା ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଆଗକୁ ବଢ଼ି ସ୍ୱାଗତ କଲେ।
The chapter balances completeness against responsibility: it asserts that total enumeration is impractical and instead models ethically curated narration—highlighting decisive actions while acknowledging the scale of loss and the weight of consequence.
Collective trauma is processed through disciplined recollection: the epic presents memory as a civic instrument that supports restoration, clarifies causal chains of action, and discourages misrepresentation of duty and outcome.
Rather than a formal phalaśruti, the chapter provides meta-commentary through framing: Vaiśaṃpāyana notes the Vṛṣṇis’ mixed emotional response, indicating that hearing and transmitting itihāsa carries psychological and moral impact within the broader pursuit of order and meaning.