Adhyaya 31
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 3115 Verses

Adhyaya 31

अम्बरीषगाथा—गुणत्रयविभागः तथा लोभनिग्रहः (Ambarīṣa’s Gāthā: The Guṇas and the Restraint of Greed)

Upa-parva: Āśvamedhika-upākhyāna: Ambarīṣa-gāthā on the Nine Inner Rivals (Guṇa-based Doṣas)

A brāhmaṇa speaker defines ‘three rivals’ in the world as nine when analyzed by guṇa taxonomy. The sāttvika triad is named as harṣa (elation), stambha (rigidity/obstinacy), and abhimāna (self-regard); the rājasa triad as śoka (grief), krodha (anger), and atisaṃrambha (impetuous agitation); and the tāmasa triad as svapna (sleep/dreaming), tandrī (sloth/drowsiness), and moha (delusion). The discourse then asserts that a steady, vigilant, self-controlled person can ‘cut down’ these inner adversaries. To anchor the teaching, traditionalists cite an older gāthā spoken by King Ambarīṣa while governing: amid social disorder and harm to the virtuous, he seized authority, restrained major faults, honored the good, and attained success. Yet he confesses one remaining enemy—lobha—by which beings fail to reach dispassion (vaitṛṣṇya) and rush uncomprehendingly toward ‘low grounds’ like a thirst-driven being. Greed is prescribed to be cut down decisively; it is shown to generate thirst, then worry, increasing rājasic qualities, binding the embodied self to repeated birth, action, and death. The chapter concludes that true ‘kingdom’ is mastery over greed: with dhṛti (steadfastness) one should restrain lobha and recognize inner conquest as the highest sovereignty.

Chapter Arc: ब्राह्मण वाचक देवी/श्रोता के सम्मुख ‘आध्यात्मिक स्वराज्य’ की गाथा खोलता है—राजा अम्बरीष द्वारा गाया गया वह गीत, जिसमें मनुष्य के भीतर के शत्रुओं को युद्धभूमि की तरह पहचाना जाता है। → तीन गुणों (सत्त्व-रज-तम) के नौ-रूप शत्रुओं का वर्गीकरण होता है—रजस के रूप में तृष्णा, क्रोध, अभिसंरम्भ; तमस के रूप में श्रम, तन्द्रा, मोह; और इनके बरक्स शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, धैर्यवान पुरुष का आदर्श रखा जाता है जो ‘बाणसंघ’ समान साधनों से दोषों को काटता चलता है। → अम्बरीष का आत्मस्वीकार: ‘बहुत-से दोष जीत लिये, पर एक श्रेष्ठ दोष अब भी अवध्य-सा बचा है’—और वह दोष ‘लोभ’ के रूप में प्रकट होता है, जो मनुष्य से अकार्य भी करवा देता है। → लोभ के स्वरूप को सम्यक् देखकर धृति (स्थिर बुद्धि) से उसका निग्रह करने का उपदेश—यही ‘राज्य’ है; बाह्य राज्य नहीं, आत्मा ही राजा है, और आत्मराज्य की स्थापना ही परम विजय है।

Shlokas

Verse 1

अफ-्-णक+ एकत्रिशो<5 ध्याय: राजा अम्बरीषकी गायी हुई आध्यात्मिक स्वराज्यविषयक गाथा ब्राह्मण उवाच त्रयो वै रिपवो लोके नवधा गुणत: स्मृता: । प्रहर्ष: प्रीतिरानन्दस्त्रयस्ते सात््चिका गुणा:,ब्राह्मणने कहा--देवि! इस संसारमें सत्त्व, रज और तम--ये तीन मेरे शत्रु हैं। ये वृत्तियोंके भेदसे नौ प्रकारके माने गये हैं। हर्ष, प्रीति और आनन्द--ये तीन सात््विक गुण हैं; तृष्णा, क्रोध और द्वेषभाव--से तीन राजस गुण हैं और थकावट, तन्द्रा तथा मोह--ये तीन तामस गुण हैं

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—“ଦେବି! ଏହି ଲୋକରେ ସତ୍ତ୍ୱ, ରଜ, ତମ—ଏ ତିନି ଶତ୍ରୁ; ବୃତ୍ତିଭେଦରୁ ଗୁଣତଃ ନବବିଧ ବୋଲି ସ୍ମୃତ। ହର୍ଷ, ପ୍ରୀତି ଓ ଆନନ୍ଦ—ଏ ତିନି ସାତ୍ତ୍ୱିକ ଗୁଣ।”

Verse 2

तृष्णा क्रोधो5भिसंरम्भो राजसास्ते गुणा: स्मृता: । श्रमस्तन्द्रा च मोहश्न त्रयस्ते तामसा गुणा:,ब्राह्मणने कहा--देवि! इस संसारमें सत्त्व, रज और तम--ये तीन मेरे शत्रु हैं। ये वृत्तियोंके भेदसे नौ प्रकारके माने गये हैं। हर्ष, प्रीति और आनन्द--ये तीन सात््विक गुण हैं; तृष्णा, क्रोध और द्वेषभाव--से तीन राजस गुण हैं और थकावट, तन्द्रा तथा मोह--ये तीन तामस गुण हैं

ବ୍ରାହ୍ମଣ କହିଲେ—“ତୃଷ୍ଣା, କ୍ରୋଧ ଓ ଉଗ୍ରାବେଶ—ଏ ତିନି ରାଜସ ଗୁଣ ବୋଲି ସ୍ମୃତ। ଶ୍ରମ, ତନ୍ଦ୍ରା ଓ ମୋହ—ଏ ତିନି ତାମସ ଗୁଣ।”

Verse 3

एतान्‌ निकृत्य धृतिमान्‌ बाणसंघैरतन्द्रित: । जेतुं परानुत्सहते प्रशान्तात्मा जितेन्द्रिय:,शान्तचित्त, जितेन्द्रिय, आलस्यहीन और धैर्यवान्‌ पुरुष शम-दम आदि बाण-समूहोंके द्वारा इन पूर्वोक्त गुणोंका उच्छेद करके दूसरोंको जीतनेका उत्साह करते हैं

ଶାନ୍ତଚିତ୍ତ, ଜିତେନ୍ଦ୍ରିୟ, ଅଳସ୍ୟହୀନ ଓ ଧୈର୍ଯ୍ୟବାନ ପୁରୁଷ ଶମ-ଦମ ଆଦି ‘ବାଣସଂଘ’ ଦ୍ୱାରା ଏହି ଗୁଣଦୋଷମାନଙ୍କୁ ଛେଦ କରି, ତାପରେ ହିଁ ପରକୁ ଜିତିବାକୁ ଉତ୍ସାହ କରେ।

Verse 4

अत्र गाथा: कीर्तयन्ति पुराकल्पविदो जना: । अम्बरीषेण या गीता राज्ञा पूर्व प्रशाम्यता,इस विषयमें पूर्वकालकी बातोंके जानकार लोग एक गाथा सुनाया करते हैं। पहले कभी शान्तिपरायण महाराज अम्बरीषने इस गाथाका गान किया था

ଏଠାରେ ପୁରାତନ କଥାବୃତ୍ତାନ୍ତ ଜାଣିଥିବା ଲୋକେ ଗୋଟିଏ ଗାଥା କୀର୍ତ୍ତନ କରନ୍ତି। କୁହାଯାଏ, ପୂର୍ବେ ଶାନ୍ତି ଓ ସଂଯମରେ ନିଷ୍ଠ ମହାରାଜ ଅମ୍ବରୀଷ ଏହି ଗାଥା ଗାଇଥିଲେ।

Verse 5

समुदीर्णेषु दोषेषु बाध्यमानेषु साधुषु । जग्राह तरसा राज्यमम्बरीषो महायशा:,कहते हैं--जब दोषोंका बल बढ़ा और अच्छे गुण दबने लगे, उस समय महायशस्वी महाराज अम्बरीषने बलपूर्वक राज्यकी बागडोर अपने हाथमें ली

ଦୋଷମାନେ ଉଦ୍ଧତ ହୋଇ ଉଠିଲେ ଓ ସାଧୁଜନ ଦମିତ ହେବାକୁ ଲାଗିଲେ, ସେତେବେଳେ ମହାଯଶସ୍ବୀ ଅମ୍ବରୀଷ ତ୍ୱରାରେ ରାଜ୍ୟଭାର ନିଜ ହାତକୁ ନେଲେ।

Verse 6

स निगृह्यात्मनो दोषान्‌ साधून्‌ समभिपूज्य च । जगाम महतीं सिद्धि गाथाश्षेमा जगाद ह,उन्होंने अपने दोषोंको दबाया और उत्तम गुणोंका आदर किया। इससे उन्हें बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त हुई और उन्होंने यह गाथा गायी--

ସେ ନିଜ ମନର ଦୋଷମାନଙ୍କୁ ଦମନ କରି, ସାଧୁଜନଙ୍କୁ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ସମ୍ମାନ କଲେ। ତାହାରେ ସେ ମହାସିଦ୍ଧି ପ୍ରାପ୍ତ କଲେ; ଏବଂ ପରେ କ୍ଷେମକର ଏହି ଗାଥା ଉଚ୍ଚାରଣ କଲେ।

Verse 7

भूयिष्ठं विजिता दोषा निहता: सर्वशत्रव: । एको दोषो वरिष्ठक्ष वध्य: स न हतो मया,“मैंने बहुत-से दोषोंपर विजय पायी और समस्त शत्रुओंका नाश कर डाला; किंतु एक सबसे बड़ा दोष रह गया है। यद्यपि वह नष्ट कर देने योग्य है तो भी अबतक मैं नाश न कर सका

“ମୁଁ ଅନେକ ଦୋଷକୁ ଜୟ କରିଛି ଏବଂ ସମସ୍ତ ଶତ୍ରୁଙ୍କୁ ନିହତ କରିଛି; ତଥାପି ଗୋଟିଏ ଦୋଷ—ସବୁଠାରୁ ବଡ଼—ଏଯାଁ ରହିଗଲା। ସେ ଦୋଷ ବଧଯୋଗ୍ୟ, କିନ୍ତୁ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମୁଁ ତାହାକୁ ନାଶ କରିପାରିନି।”

Verse 8

यत्प्रयुक्तो जन्तुरयं वैतृष्ण्यं नाधिगच्छति । तृष्णार्त इह निम्नानि धावमानो न बुध्यते,“उसीकी प्रेरणासे इस प्राणीको वैराग्य नहीं होता। तृष्णाके वशमें पड़ा हुआ मनुष्य संसारमें नीच कर्मोंकी ओर दौड़ता है, सचेत नहीं होता

“ସେହି ପ୍ରେରଣାରେ ଏହି ପ୍ରାଣୀ ବୈତୃଷ୍ଣ୍ୟ (ବୈରାଗ୍ୟ) ପାଉନାହିଁ। ତୃଷ୍ଣାରେ ଆର୍ତ୍ତ ହୋଇ ମଣିଷ ଏଠାରେ ନୀଚ କର୍ମମାନଙ୍କ ଦିଗକୁ ଧାଉଥାଏ, କିନ୍ତୁ ସଚେତନ ହୁଏନାହିଁ।”

Verse 9

अकार्यमपि येनेह प्रयुक्त: सेवते नर: । त॑ लोभमसिभिस्ती&णैर्निकृत्य सुखमेधते,“उससे प्रेरित होकर वह यहाँ नहीं करने-योग्य काम भी कर डालता है। उस दोषका नाम है लोभ। उसे ज्ञानरूपी तलवारसे काटकर मनुष्य सुखी होता है

ତାହାର ପ୍ରେରଣାରେ ମଣିଷ ଏହି ଲୋକରେ ଅକରଣୀୟ କାମ ମଧ୍ୟ କରିବସେ। ସେଇ ଦୋଷର ନାମ ଲୋଭ। ଜ୍ଞାନରୂପ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଖଡ୍ଗରେ ତାହାକୁ କାଟିଦେଲେ ମଣିଷ କଲ୍ୟାଣ ଓ ସୁଖ ପାଏ।

Verse 10

लोभाद्धि जायते तृष्णा ततत्रिन्ता प्रवर्तते । स लिप्यमानो लभते भूयिष्ठं राजसान्‌ गुणान्‌ । तदवाप्तौ तु लभते भूयिष्ठं तमसान्‌ गुणान्‌,“लोभसे तृष्णा और तृष्णासे चिन्ता पैदा होती है। लोभी मनुष्य पहले बहुत-से राजस गुणोंको पाता है और उनकी प्राप्ति हो जानेपर उसमें तामसिक गुण भी अधिक मात्रामें आ जाते हैं

ଲୋଭରୁ ତୃଷ୍ଣା ଜନ୍ମେ, ତୃଷ୍ଣାରୁ ଚିନ୍ତା ପ୍ରବୃତ୍ତ ହୁଏ। ଲୋଭରେ ଲିପ୍ତ ମଣିଷ ପ୍ରଥମେ ବହୁତ ରାଜସ ଗୁଣ ପାଏ; ତାହା ଲାଭ ହେଲେ ପରେ ତା’ରେ ତାମସ ଗୁଣ ଅଧିକ ମାତ୍ରାରେ ଆସିଯାଏ।

Verse 11

स तैर्गुणैः संहतदेहबन्धन: पुन: पुनर्जायति कर्म चेहते । जन्मक्षये भिन्नविकीर्णदेहो मृत्युं पुनर्गच्छति जन्मनैव,“उन गुणोंके द्वारा देह-बन्धनमें जकड़कर वह बारंबार जन्म लेता और तरह-तरहके कर्म करता रहता है। फिर जीवनका अन्त समय आनेपर उसके देहके तत्त्व विलग-विलग होकर बिखर जाते हैं और वह मृत्युको प्राप्त हो जाता है। इसके बाद फिर जन्म-मृत्युके बन्धनमें पड़ता है

ସେଇ ଗୁଣମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଦେହ-ବନ୍ଧନରେ ଦୃଢ଼ ଭାବେ ବନ୍ଧା ହୋଇ ସେ ପୁନଃପୁନଃ ଜନ୍ମ ନେଉଛି ଏବଂ ଏଠାରେ କର୍ମରେ ଲାଗି ରହୁଛି। ଜନ୍ମର ଅବଧି ଶେଷ ହେଲେ ଦେହର ତତ୍ତ୍ୱମାନେ ଭିନ୍ନ ଭିନ୍ନ ହୋଇ ଛିଣ୍ଡି ଛିଣ୍ଡି ଛିଟିଯାନ୍ତି, ସେ ମୃତ୍ୟୁକୁ ପାଏ; ଏବଂ ସେଇ ଧାରାରେ ପୁଣି ଜନ୍ମ–ମୃତ୍ୟୁର ଚକ୍ରରେ ପଡ଼େ।

Verse 12

तस्मादेत॑ सम्यगवेक्ष्य लोभ॑ निगृहा धृत्या55त्मनि राज्यमिच्छेत्‌ । एतदू राज्यं नान्यदस्तीह राज्य- मात्मैव राजा विदितो यथावत्‌,“इसलिये इस लोभके स्वरूपको अच्छी तरह समझकर इसे धैर्यपूर्वक दबाने और आत्मराज्यपर अधिकार पानेकी इच्छा करनी चाहिये। यही वास्तविक स्वराज्य है। यहाँ दूसरा कोई राज्य नहीं है। आत्माका यथार्थ ज्ञान हो जानेपर वही राजा है”

ଏହିପରି ଲୋଭର ସ୍ୱରୂପକୁ ସମ୍ୟକ୍ ଭାବେ ଦେଖିବିଚାରି, ଧୈର୍ୟରେ ତାହାକୁ ନିଗ୍ରହ କରି, ଆତ୍ମାଭିତରେ ରାଜ୍ୟ—ଆତ୍ମସ୍ୱରାଜ୍ୟ—ଲାଭ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରିବା ଉଚିତ। ଏହିଟି ହିଁ ସତ୍ୟ ରାଜ୍ୟ; ଏଠାରେ ଅନ୍ୟ କୌଣସି ରାଜ୍ୟ ନାହିଁ। ଆତ୍ମାକୁ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ଜାଣିଲେ ଆତ୍ମା ନିଜେ ରାଜା ବୋଲି ପ୍ରତୀତ ହୁଏ।

Verse 13

इति राज्ञाम्बरीषेण गाथा गीता यशस्विना । अधिराज्यं पुरस्कृत्य लोभमेकं॑ निकृन्तता,इस प्रकार यशस्वी अम्बरीषने आत्मराज्यको आगे रखकर एकमात्र प्रबल शत्रु लोभका उच्छेद करते हुए उपर्युक्त गाथाका गान किया था

ଏହିପରି ଯଶସ୍ୱୀ ରାଜା ଅମ୍ବରୀଷ ଆତ୍ମରାଜ୍ୟକୁ ଅଗ୍ରେ ରଖି, ଏକମାତ୍ର ପ୍ରବଳ ଶତ୍ରୁ—ଲୋଭ—କୁ ଛେଦ କରିବା ଉଦ୍ଦେଶ୍ୟରେ ଏହି ଗାଥା ଗାଇଥିଲେ।

Verse 30

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें ब्राह्मणगीताविषयक तीसवाँ अध्याय प्रा हुआ

ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଅଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଅନୁଗୀତା ପର୍ବରେ ବ୍ରାହ୍ମଣଗୀତା-ବିଷୟକ ତ୍ରିଂଶ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।

Verse 31

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि ब्राह्मणगीतासु एकत्रिंशो5ध्याय:

ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଅଶ୍ୱମେଧିକ ପର୍ବରେ ଅନୁଗୀତା ପର୍ବରେ ବ୍ରାହ୍ମଣଗୀତାସୁ ଏକତ୍ରିଂଶ ଅଧ୍ୟାୟଃ।

Frequently Asked Questions

How a ruler—or any agent—can exercise authority without being governed by inner rivals, especially greed, which distorts judgment and converts governance into acquisitive compulsion.

Identify the guṇa-conditioned faults, restrain them with steadiness and vigilance, and treat the conquest of lobha as the decisive condition for stable conduct, public protection, and inner freedom.

Yes. It frames ‘this kingdom and no other’ as mastery over lobha: inner victory is presented as the highest sovereignty, because it prevents the causal chain leading to agitation, bondage, and repetitive suffering.