जेपुश्न शतरुद्रीयं देवा: कृत्वाउ्जलिं तदा । संस्तूयमानस्त्रिदशै: प्रससाद महेश्वर:,उस समय देवतालोग हाथ जोड़कर शतरुद्रियका जप करने लगे। देवताओं के द्वारा अपनी स्तुति की जानेपर महेश्वर प्रसन्न हो गये
jepuḥ śatarudrīyaṃ devāḥ kṛtvāñjaliṃ tadā | saṃstūyamānas tridāśaiḥ prasasāda maheśvaraḥ ||
ସେତେବେଳେ ଦେବମାନେ ହାତ ଯୋଡ଼ି ଶତରୁଦ୍ରୀୟ ଜପ କଲେ। ତ୍ରିଦଶମାନଙ୍କ ସ୍ତୁତିରେ ମହେଶ୍ୱର ପ୍ରସନ୍ନ ହେଲେ।
वायुदेव उवाच