Adhyaya 6
Virata ParvaAdhyaya 636 Verses

Adhyaya 6

Adhyāya 6: Kaṅka (Yudhiṣṭhira) Seeks Refuge in Virāṭa’s Assembly

Upa-parva: Kanka-praveśa (Yudhiṣṭhira’s Entry into Virāṭa’s Court as ‘Kaṅka’)

Vaiśaṃpāyana describes Yudhiṣṭhira entering Virāṭa’s sabhā with controlled outward simplicity while retaining signs of innate sovereignty. Virāṭa observes him closely, consults the assembled ministers and learned men, and questions the newcomer’s identity—reasoning from social indicators (absence of attendants and royal insignia) and from embodied presence suggestive of consecrated kingship. Yudhiṣṭhira then speaks with deliberate restraint, presenting himself as a Brahmin named Kaṅka, formerly associated with Yudhiṣṭhira, and claiming proficiency in dice-play as his vocational skill. Virāṭa responds by offering protection, favor, and even expansive patronage, promising that Kaṅka may reside freely and without fear, and that the king will enforce order against any who trouble him. The chapter closes with Yudhiṣṭhira living honored at court, his true identity remaining undiscovered, emphasizing the episode’s themes of prudential speech, royal duty of refuge, and the ambiguity of external status markers.

Chapter Arc: अज्ञातवास की दहलीज़ पर पाण्डव शमी-वृक्ष की बँधी शाखा की ओर संकेत करते हैं—“यह हमारी माता है”—और अपने आयुधों की रक्षा के लिए उसी को आश्रय बनाते हैं। → राज्य से परिभ्रष्ट युधिष्ठिर संकट-निवारिणी दुर्गा की शरण लेते हैं; वे देवी को विष्णु-स्वरूप, ब्रह्म-स्वरूप, कंस-विद्राविणी और असुर-क्षयकारिणी कहकर स्तुति करते हैं, और प्रार्थना करते हैं कि व्याधि, मृत्यु और भय का नाश हो तथा अज्ञातवास में पहचान न खुले। → भक्तवत्सला देवी प्रकट होकर वर देती हैं—पाण्डवों के कार्य सिद्ध होंगे, विराटनगर में रहते हुए भी कुरुजन और नगरवासी उन्हें पहचान न सकेंगे; देवी रक्षा-कवच बाँधकर अंतर्धान हो जाती हैं। → देवी के प्रसाद से पाण्डवों का मन स्थिर होता है; शमी-वृक्ष उनके आयुधों का ‘मातृ-आश्रय’ बनता है और अज्ञातवास का मार्ग सुरक्षित प्रतीत होता है। → विराटनगर में प्रवेश के बाद कौन-सा संयोग उनकी पहचान को संकट में डालेगा—और किस रूप में वे अपने-अपने व्रत निभाएँगे?

Shlokas

Verse 1

अपर अपर हूँ... अपर-क पा - पाण्डवलोग शव बँधी हुई शाखाकी ओर अँगुलीसे संकेत करके कहते थे--“यह हमारी माता है।' वे अपने आयुधोंकी रक्षा करनेके कारण शमीको ही अपनी माता मानते थे और उसीकी ओर उनका वास्तविक संकेत था। शव- बन्धनके व्याजसे वे अस्त्र-संरक्षणको ही पूर्वजोंद्वारा आचरित कुलधर्म घोषित करते थे। षष्ठो5 ध्याय: युधिष्ठिरद्वारा दुगदिवीकी स्तुति और देवीका प्रत्यक्ष प्रकट होकर उन्हें वर देना वैशम्पायन उवाच विराटनगरं रम्यं गच्छमानो युधिष्ठिर: । अस्तुवन्मनसा देवी दुर्गा त्रिभुवनेश्वरीम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! विराटके रमणीय नगरमें प्रवेश करते समय महाराज युधिष्ठिरने मन-ही-मन त्रिभुवनकी अधीश्वरी दुर्गदिवीका इस प्रकार स्‍तवन किया--

ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ဆိုသည်—«အရှင်မင်းကြီး၊ ယုဓိဋ္ဌိရမဟာရာဇာသည် သာယာလှပသော ဗီရာဋမြို့သို့ ဝင်ရောက်သွားစဉ်၊ စိတ်အတွင်း၌ သုံးလောကအရှင်မ ဒုရ္ဂါဒေဝီကို ဤသို့ ချီးမွမ်းတော်မူ၏»။

Verse 2

यशोदागर्भसम्भूतां नारायणवरप्रियाम्‌ । नन्दगोपकुले जातां मड़ल्यां कुलवर्धिनीम्‌,“जो यशोदाके गर्भसे प्रकट हुई है, जो भगवान्‌ नारायणको अत्यन्त प्रिय है, नन्दगोपके कुलमें जिसने अवतार लिया है, जो सबका मंगल करनेवाली तथा कुलको बढ़ानेवाली है, जो कंसको भयभीत करनेवाली और असुरोंका संहार करनेवाली है, कंसके द्वारा पत्थरकी शिलापर पटकी जानेपर जो आकाशमें उड़ गयी थी, जिसके अंग दिव्य गन्धमाला एवं आभूषणोंसे विभूषित हैं, जिसने दिव्य वस्त्र धारण कर रखा है, जो हाथोंमें ढाल और तलवार धारण करती है, वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी भगिनी उस दुगदिवीका मैं चिन्तन करता हूँ

«ယရှောဒါ၏ဝမ်းမှ ပေါ်ထွန်းလာ၍ မြတ်စွာသော နာရာယဏအား အလွန်ချစ်မြတ်နိုးခံရသူ၊ နန္ဒဂోပ၏ နွားကျောင်းသားမျိုးရိုး၌ အဝတားပြုသူ၊ မင်္ဂလာကို ဆောင်ကြဉ်း၍ မျိုးရိုး၏ စည်ပင်တိုးတက်မှုကို မြှင့်တင်ပေးသူ—ထိုမင်္ဂလာဒေဝီကို ငါ စိတ်၌ ဆင်ခြင်ပူဇော်၏»။

Verse 3

कंसविद्रावणकरीमसुराणां क्षयंकरीम्‌ | शिलातटबविनिक्षिप्तामाकाशं प्रति गामिनीम्‌,“जो यशोदाके गर्भसे प्रकट हुई है, जो भगवान्‌ नारायणको अत्यन्त प्रिय है, नन्दगोपके कुलमें जिसने अवतार लिया है, जो सबका मंगल करनेवाली तथा कुलको बढ़ानेवाली है, जो कंसको भयभीत करनेवाली और असुरोंका संहार करनेवाली है, कंसके द्वारा पत्थरकी शिलापर पटकी जानेपर जो आकाशमें उड़ गयी थी, जिसके अंग दिव्य गन्धमाला एवं आभूषणोंसे विभूषित हैं, जिसने दिव्य वस्त्र धारण कर रखा है, जो हाथोंमें ढाल और तलवार धारण करती है, वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी भगिनी उस दुगदिवीका मैं चिन्तन करता हूँ

«(ငါ ဆင်ခြင်ပူဇော်သည်) ကံဆကို ကြောက်လန့်စေ၍ အသူရတို့ကို ပျက်စီးစေသူ၊ ကျောက်ပြားပေါ်သို့ ပစ်ချခံရသော်လည်း ကောင်းကင်သို့ ထိုးတက်သွားသူ—ထိုဒေဝီကို»။

Verse 4

वासुदेवस्य भगिनीं दिव्यमाल्यविभूषिताम्‌ । दिव्याम्बरधरां देवीं खड़्गखेटकधारिणीम्‌,“जो यशोदाके गर्भसे प्रकट हुई है, जो भगवान्‌ नारायणको अत्यन्त प्रिय है, नन्दगोपके कुलमें जिसने अवतार लिया है, जो सबका मंगल करनेवाली तथा कुलको बढ़ानेवाली है, जो कंसको भयभीत करनेवाली और असुरोंका संहार करनेवाली है, कंसके द्वारा पत्थरकी शिलापर पटकी जानेपर जो आकाशमें उड़ गयी थी, जिसके अंग दिव्य गन्धमाला एवं आभूषणोंसे विभूषित हैं, जिसने दिव्य वस्त्र धारण कर रखा है, जो हाथोंमें ढाल और तलवार धारण करती है, वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णकी भगिनी उस दुगदिवीका मैं चिन्तन करता हूँ

«ဝါစုဒေဝ၏ညီမ၊ ကောင်းကင်ဘုံပန်းကုံးတို့ဖြင့် တန်ဆာဆင်ထားသူ၊ ဒိဗ္ဗဝတ်စုံကို ဝတ်ဆင်သူ၊ ဓားနှင့် ဒိုင်းကို ကိုင်ဆောင်သော ဒေဝီကို ငါ ဆင်ခြင်ပူဇော်၏»။

Verse 5

इस प्रकार श्रीमह्या भारत विराटपर्वके अन्तर्गत पाण्डवप्रवेशपर्वमें नगरप्रवेशके लिये अस्त्रस्थापनविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ,भारावतरणे पुण्ये ये स्मरन्ति सदाशिवाम्‌ | तान्‌ वै तारयसे पापात्‌ पड़के गामिव दुर्बलाम्‌ 'पृथ्वीका भार उतारनेवाली पुण्यमयी देवि! तुम सदा सबका कल्याण करनेवाली हो। जो लोग तुम्हारा स्मरण करते हैं, निश्चय ही तुम उन्हें पाप और उसके फलस्वरूप होनेवाले दुःखसे उबार लेती हो; ठीक उसी तरह, जैसे कोई पुरुष कीचड़में फँसी हुई दुर्बल गायका उद्धार कर देता है"

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်– «အို သန့်ရှင်းသော ဒေဝီ၊ မြေကြီး၏ဝန်ကို လျော့ပါးစေသော မင်္ဂလာပေးသူ၊ အမြဲကောင်းကျိုးပေးသူ! သင်ကို သတိရသူတို့ကို သင်သည် အပြစ်နှင့် ထိုအပြစ်ကြောင့် ဖြစ်လာသော ဒုက္ခမှ မလွဲမသွေ ကယ်တင်ပေး၏—ရွံ့ထဲတွင် ကပ်နေသော အားနည်းသည့် နွားကို လူတစ်ယောက်က ဆွဲထုတ်ကယ်တင်သကဲ့သို့။»

Verse 6

स्तोतुं प्रचक्रमे भूयो विविधै: स्तोत्रसम्भवै: । आमन्त्र्य दर्शनाकाड्क्षी राजा देवीं सहानुज:,तत्पश्चात्‌ भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरने देवीके दर्शनकी अभिलाषा रखकर नाना प्रकारके स्तुतिपरक नामोंद्वारा उन्हें सम्बोधित करके पुनः उनकी स्तुति प्रारम्भ की --इच्छानुसार उत्तम वर देनेवाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। सच्चिदानन्दमयी कृष्णे! तुम कुमारी और ब्रह्मचारिणी हो। तुम्हारी अंगकान्ति प्रभातकालीन सूर्यके सदृश लाल है । तुम्हारा मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति आह्वाद प्रदान करनेवाला है मेरी कृपासे तुम्हें सुख और आरोग्य सुलभ होगा। लोकमें जो मनुष्य मेरा कीर्तन और स्तवन करेंगे, वे पापरहित होंगे और मैं संतुष्ट होकर उन्हें राज्य, बड़ी आयु, नीरोग शरीर और पुत्र प्रदान करूँगी। राजन! जैसे तुमने मेरा स्मरण किया है, इसी प्रकार जो लोग परदेशमें रहते समय, नगरमें, युद्धमें, शत्रुओंद्वारा संकट प्राप्त होनेपर, घने जंगलोंमें, दुर्गम मार्गमें, समुद्रमें तथा गहन पर्वतपर भी मेरा स्मरण करेंगे, उनके लिये इस संसारमें कुछ भी दुर्लभ न होगा। पाण्डवो! जो इस उत्तम स्तोत्रको भक्तिभावसे सुनेगा या पढ़ेगा, उसके सम्पूर्ण कार्य सिद्ध हो जायँगे। मेरे कृपाप्रसादसे विराटनगरमें रहते समय तुम सब लोगोंको कौरवगण अथवा उस नगरके निवासी मनुष्य नहीं पहचान सकेंगे। शत्रुओंका दमन करनेवाले राजा युधिष्ठिरसे ऐसा कहकर वरदायिनी देवी दुर्गा पाण्डवोंकी रक्षाका भार ले वहीं अन्तर्धान हो गयी ।। इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि पाण्डवप्रवेशपर्वणि दुर्गास्तवे षष्ठो5ध्याय:

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်– ထို့နောက် ဒေဝီ၏ တိုက်ရိုက်ဒർശနကို လိုလားတောင့်တ၍ ညီတော်များနှင့်အတူ ရှိသော ဘုရင် ယုဓိဋ္ဌိရသည်၊ သီချင်းသံတော်များမှ ဆင်းသက်လာသော အမည်နာမနှင့် ဂုဏ်ပုဒ်အမျိုးမျိုးဖြင့် ဒေဝီကို ခေါ်ဆိုကာ ထပ်မံ ချီးမွမ်းစတင်하였다။ ဤအခန်းကဏ္ဍသည် ဓမ္မတရားနှင့်ညီသော နှိမ့်ချမှုကို ထင်ဟပ်စေသည်—ဖုံးကွယ်နေရခြင်းနှင့် အန္တရာယ်ထဲသို့ ဝင်မီ၊ တရားသမာဓိရှိသော ဘုရင်သည် အင်အားဖြင့်မဟုတ်ဘဲ ရိုသေသည့် အာဟွာနနှင့် ဘက္တိဖြင့်သာ ကာကွယ်မှုကို တောင်းခံ၏။

Verse 7

नमोस्तु वरदे कृष्णे कुमारि ब्रह्मचारिणि । बालार्कसदृशाकारे पूर्णचन्द्रनिभानने,तत्पश्चात्‌ भाइयोंसहित राजा युधिष्ठिरने देवीके दर्शनकी अभिलाषा रखकर नाना प्रकारके स्तुतिपरक नामोंद्वारा उन्हें सम्बोधित करके पुनः उनकी स्तुति प्रारम्भ की --इच्छानुसार उत्तम वर देनेवाली देवि! तुम्हें नमस्कार है। सच्चिदानन्दमयी कृष्णे! तुम कुमारी और ब्रह्मचारिणी हो। तुम्हारी अंगकान्ति प्रभातकालीन सूर्यके सदृश लाल है । तुम्हारा मुख पूर्णिमाके चन्द्रमाकी भाँति आह्वाद प्रदान करनेवाला है

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်– «အို ကရိရှ္ဏာ၊ ဆုတောင်းသမျှ ပေးသနားသော ဆုတော်ပေးရှင်၊ အို အပျိုတော်၊ အို ဗြဟ္မစရိယာကို ထိန်းသိမ်းသူ—သင့်အား နမസ്കာရပါ၏။ သင့်ရုပ်သဏ္ဌာန်သည် နေထွက်စ အနီရောင် နုနယ်သည့် နေရောင်ကဲ့သို့ တောက်ပ၍၊ သင့်မျက်နှာသည် လပြည့်လကဲ့သို့ သက်သာချမ်းမြေ့စေ၏။» ထို့ကြောင့် ဒေဝီ၏ ဒർശနနှင့် ကရုဏာကို လိုလား၍ ယုဓိဋ္ဌိရဘုရင်သည် ညီတော်များနှင့်အတူ ရိုသေသည့် အမည်များစွာဖြင့် ထပ်မံ ချီးမွမ်းစတင်하였다—အခက်အခဲအတွင်း၌ပင် နှိမ့်ချမှုနှင့် တရားသမာဓိရှိသော စိတ်ရင်းကို အခြေခံသည့် ဘက္တိဖြစ်၏။

Verse 8

चतुर्भुजे चतुर्वक्त्रे पीनश्रोणिपयोधरे । मयूरपिच्छवलये केयूराजड़रदधारिणि । भासि देवि यथा पद्मा नारायणपरिग्रह:

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်– «အို ဒေဝီ၊ လက်လေးဖက်၊ မျက်နှာလေးဖက်ရှိ၍ တင်ပါးနှင့် ရင်သားပြည့်ဝသူ၊ မယုရပင်ပျံအမွှေးဖြင့် ဝိုင်းကာ အလှဆင်ထားပြီး လက်မောင်းကွင်းများ ဝတ်ဆင်ကာ ဆံပင်ကို ဂျဉ်းကပ်ထားသူ—နာရာယဏ၏ အပိုင်အဆိုင်အဖြစ် ချီတက်ခံရသကဲ့သို့ သင်သည် ကြာပန်းကဲ့သို့ တောက်ပလှ၏။»

Verse 9

स्वरूपं ब्रह्मचर्य च विशदं गगनेश्वरी । कृष्णच्छविसमा कृष्णा संकर्षणसमानना

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်– «သူမ၏ ရုပ်သဏ္ဌာန်နှင့် သန့်ရှင်းသော ဗြဟ္မစရိယာအကျင့်သည် ဖြူစင်တောက်ပ၍၊ ကောင်းကင်၏ အရှင်ကဲ့သို့ ထွန်းလင်းနေ၏။ ကရိရှ္ဏာကဲ့သို့ အမဲရောင်အလှရှိသော ထို ကရိရှ္ဏာသည်၊ သင်္ကရ္ရှဏနှင့် ဆင်တူသော မျက်နှာရှိ၏။»

Verse 10

“तुम चार भुजाओंसे सुशोभित विष्णुरूपा और चार मुखोंसे अलंकृत ब्रह्मस्वरूपा हो। तुम्हारे नितम्ब और उरोज पीन हैं। तुमने मोरपंखका कंगन धारण किया है तथा केयूर और अंगद पहन रखे हैं। देवि! भगवान्‌ नारायणकी धर्मपत्नी लक्ष्मीजीके समान तुम्हारी शोभा हो रही है। आकाशगमें विचरनेवाली देवि! तुम्हारा स्वरूप और ब्रह्मचर्य परम उज्ज्वल है। श्यामसुन्दर श्रीकृष्णकी छबिके समान तुम्हारी श्याम कान्ति है, इसीलिये तुम कृष्णा कहलाती हो। तुम्हारा मुख संकर्षणके समान है ।। बिभ्रती विपुलौ बाहू शक्रध्वजसमुच्छूयौ । पात्री च पड़कजी घण्टी स्त्रीविशुद्धा च या भुवि,“तुम (वर और अभय मुद्रा धारण करनेवाली) ऊपर उठी हुई दो विशाल भुजाओंको इन्द्रकी ध्वजाके समान धारण करती हो। तुम्हारे तीसरे हाथमें पात्र, चौथेमें कमल और पाँचवेंमें घण्टा सुशोभित है। छठे हाथमें पाश, सातवेंमें धनुष तथा आठवेंमें महान्‌ चक्र शोभा पाता है। ये ही तुम्हारे नाना प्रकारके आयुध हैं। इस पृथ्वीपर स्त्रीका जो विशुद्ध स्वरूप है, वह तुम्हीं हो। कुण्डलमण्डित कर्णयुगल तुम्हारे मुखमण्डलकी शोभा बढ़ाते हैं। देवि! तुम चन्द्रमासे होड़ लेनेवाले मुखसे सुशोभित होती हो। तुम्हारे मस्तकपर विचित्र मुकुट है। बँधे हुए केशोंकी वेणी साँपकी आकृतिके समान कुछ और ही शोभा दे रही है। यहाँ कमरमें बँधी हुई सुन्दर करधनीके द्वारा तुम्हारी ऐसी शोभा हो रही है, मानो नागसे लपेटा हुआ मन्दराचल हो

ဝိုင်သမ္ပာယနက ပြောသည်– «သူမသည် အင်ဒြ၏ အလံတော်ကဲ့သို့ မြင့်မားစွာ ထောင်တက်နေသော လက်မောင်းကြီး နှစ်ဖက်ကို ဆောင်ထား၏။ လက်တစ်ဖက်တွင် ပാത്ര (အိုး/ခွက်) ကို ကိုင်၍၊ လက်တစ်ဖက်တွင် ကြာပန်းကို ကိုင်၍၊ လက်တစ်ဖက်တွင် ခေါင်းလောင်းကို ကိုင်ထား၏။ မြေပြင်ပေါ်၌ မိန်းမ၏ သန့်ရှင်းစင်ကြယ်မှုကို ကိုယ်စားပြုသော အရုပ်သဘောသည် သူမပင် ဖြစ်၏»။

Verse 11

पाशं धनुर्महाचक्रं विविधान्यायुधानि च । कुण्डलाभ्यां सुपूर्णाभ्यां कर्णाभ्यां च विभूषिता,“तुम (वर और अभय मुद्रा धारण करनेवाली) ऊपर उठी हुई दो विशाल भुजाओंको इन्द्रकी ध्वजाके समान धारण करती हो। तुम्हारे तीसरे हाथमें पात्र, चौथेमें कमल और पाँचवेंमें घण्टा सुशोभित है। छठे हाथमें पाश, सातवेंमें धनुष तथा आठवेंमें महान्‌ चक्र शोभा पाता है। ये ही तुम्हारे नाना प्रकारके आयुध हैं। इस पृथ्वीपर स्त्रीका जो विशुद्ध स्वरूप है, वह तुम्हीं हो। कुण्डलमण्डित कर्णयुगल तुम्हारे मुखमण्डलकी शोभा बढ़ाते हैं। देवि! तुम चन्द्रमासे होड़ लेनेवाले मुखसे सुशोभित होती हो। तुम्हारे मस्तकपर विचित्र मुकुट है। बँधे हुए केशोंकी वेणी साँपकी आकृतिके समान कुछ और ही शोभा दे रही है। यहाँ कमरमें बँधी हुई सुन्दर करधनीके द्वारा तुम्हारी ऐसी शोभा हो रही है, मानो नागसे लपेटा हुआ मन्दराचल हो

ဝိုင်သမ္ပာယနက ပြောသည်– «သူမသည် ပာရှ (ကြိုးချည်), မြားလက်နက် (ဓနု) နှင့် မဟာစက္က (ကြီးမားသော စက်ဝိုင်းလက်နက်) တို့အပါအဝင် အမျိုးမျိုးသော လက်နက်များဖြင့် တန်ဆာဆင်ထား၏။ ထို့ပြင် ကွင်းတပ်ထားသော နားနှစ်ဖက်သည်လည်း သူမ၏ တင့်တယ်မှုကို ပိုမို ထွန်းလင်းစေ၏»။

Verse 12

चन्द्रविस्पर्द्धिना देवि मुखेन त्वं विराजसे । मुकुटेन विचित्रेण केशबन्धेन शोभिना,“तुम (वर और अभय मुद्रा धारण करनेवाली) ऊपर उठी हुई दो विशाल भुजाओंको इन्द्रकी ध्वजाके समान धारण करती हो। तुम्हारे तीसरे हाथमें पात्र, चौथेमें कमल और पाँचवेंमें घण्टा सुशोभित है। छठे हाथमें पाश, सातवेंमें धनुष तथा आठवेंमें महान्‌ चक्र शोभा पाता है। ये ही तुम्हारे नाना प्रकारके आयुध हैं। इस पृथ्वीपर स्त्रीका जो विशुद्ध स्वरूप है, वह तुम्हीं हो। कुण्डलमण्डित कर्णयुगल तुम्हारे मुखमण्डलकी शोभा बढ़ाते हैं। देवि! तुम चन्द्रमासे होड़ लेनेवाले मुखसे सुशोभित होती हो। तुम्हारे मस्तकपर विचित्र मुकुट है। बँधे हुए केशोंकी वेणी साँपकी आकृतिके समान कुछ और ही शोभा दे रही है। यहाँ कमरमें बँधी हुई सुन्दर करधनीके द्वारा तुम्हारी ऐसी शोभा हो रही है, मानो नागसे लपेटा हुआ मन्दराचल हो

ဝိုင်သမ္ပာယနက ပြောသည်– «ဒေဝီ၊ သင်၏ မျက်နှာသည် လမင်းနှင့် ယှဉ်ပြိုင်နိုင်အောင် ထွန်းလင်းတောက်ပ၏။ အံ့ဖွယ် မုကుట်တော်ဖြင့် တန်ဆာဆင်ထားပြီး၊ လှပစွာ ချည်နှောင်ထားသော ဆံပင်ကလည်း သင်၏ တင့်တယ်မှုကို ပိုမို မြှင့်တင်၏»။

Verse 13

भुजज्भाभोगवासेन श्रोणिसूत्रेण राजता । विभ्राजसे चाबद्धेन भोगेनेवेह मन्दर:,“तुम (वर और अभय मुद्रा धारण करनेवाली) ऊपर उठी हुई दो विशाल भुजाओंको इन्द्रकी ध्वजाके समान धारण करती हो। तुम्हारे तीसरे हाथमें पात्र, चौथेमें कमल और पाँचवेंमें घण्टा सुशोभित है। छठे हाथमें पाश, सातवेंमें धनुष तथा आठवेंमें महान्‌ चक्र शोभा पाता है। ये ही तुम्हारे नाना प्रकारके आयुध हैं। इस पृथ्वीपर स्त्रीका जो विशुद्ध स्वरूप है, वह तुम्हीं हो। कुण्डलमण्डित कर्णयुगल तुम्हारे मुखमण्डलकी शोभा बढ़ाते हैं। देवि! तुम चन्द्रमासे होड़ लेनेवाले मुखसे सुशोभित होती हो। तुम्हारे मस्तकपर विचित्र मुकुट है। बँधे हुए केशोंकी वेणी साँपकी आकृतिके समान कुछ और ही शोभा दे रही है। यहाँ कमरमें बँधी हुई सुन्दर करधनीके द्वारा तुम्हारी ऐसी शोभा हो रही है, मानो नागसे लपेटा हुआ मन्दराचल हो

ဝိုင်သမ္ပာယနက ပြောသည်– «မြွေကွင်းကဲ့သို့သော ခါးပတ်နှင့် တောက်ပသော ခါးကြိုးကြောင့် သင်သည် ထွန်းလင်းတောက်ပ၏—ဤနေရာရှိ မန္ဒရတောင်ကို မြွေက မချည်မနှောင်ဘဲ ဝိုင်းပတ်ထားသကဲ့သို့»။

Verse 14

ध्वजेन शिखिपिच्छानामुच्छ़ितेन विराजसे । कौमारं व्रतमास्थाय त्रिदिवं पावितं त्वया,“तुम्हारी मयूरपिच्छसे चिह्नित ध्वजा आकाशमें ऊँची फहरा रही है। उससे तुम्हारी शोभा और भी बढ़ गयी है। तुमने ब्रह्मचर्यव्रत धारण करके तीनों लोकोंको पवित्र कर दिया है

ဝိုင်သမ္ပာယနက ပြောသည်– «မယုရပင်ခတ်အမှတ်အသားပါသော သင်၏ အလံတော်သည် ကောင်းကင်၌ မြင့်မြင့် လွင့်ပျံနေ၍ သင်၏ တင့်တယ်မှုကို ပိုမို ထွန်းလင်းစေ၏။ သင်သည် ဘြဟ္မစရိယ ဝရတ (သန့်ရှင်းသော သီလ) ကို ထိန်းသိမ်းခြင်းဖြင့် သုံးလောကကို သန့်စင်ပေးခဲ့၏»။

Verse 15

तेन त्वं स्तूयसे देवि त्रिदशै: पूज्यसेडपि च । त्रैलोक्यरक्षणार्थाय महिषासुरनाशिनि । प्रसन्ना मे सुरश्रेष्ठे दयां कुर॒ु शिवा भव,“देवि! इसीलिये सम्पूर्ण देवता तुम्हारी स्तुति और पूजा भी करते हैं। तीनों लोकोंकी रक्षाके लिये महिषासुरका नाश करनेवाली देवेश्वरी! मुझपर प्रसन्न होकर दया करो। मेरे लिये कल्याणमयी हो जाओ

ထို့ကြောင့် အို မဟာဒေဝီ၊ ဒေဝတားတို့သည်ပင် သင့်ကို ချီးမွမ်းကာ ပူဇော်ကြ၏။ လောကသုံးပါးကို ကာကွယ်ရန် မဟိṣာသုရကို သတ်ဖြတ်သော မဟာဒေဝီ—ဒေဝတားတို့အနက် အမြတ်ဆုံးသော အရှင်မ၊ ကျွန်ုပ်အပေါ် သနားကြင်နာ၍ ကျေးဇူးပြုပါ။ ကျွန်ုပ်အတွက် မင်္ဂလာဖြစ်စေပါ။

Verse 16

जया त्वं विजया चैव संग्रामे च जयप्रदा । ममापि विजयं देहि वरदा त्वं च साम्प्रतम्‌,“तुम जया और विजया हो। तुम्हीं संग्राममें विजय देनेवाली हो, अतः मुझे भी विजय दो। इस समय तुम मेरे लिये वरदायिनी हो जाओ

သင်သည် ဇယာလည်းဖြစ်၊ ဝိဇယာလည်းဖြစ်၏—စစ်မြေပြင်၌ အောင်မြင်မှုကို ပေးသနားသူလည်း သင်ပင်။ ကျွန်ုပ်အားလည်း အောင်မြင်မှုကို ပေးပါ။ ယခုချိန်တွင် ကျွန်ုပ်အတွက် ဆုတောင်းပြည့်စုံစေသော ဆုတော်ပေးရှင် ဖြစ်ပါစေ။

Verse 17

विन्ध्ये चैव नगश्रेष्ठे तव स्थान हि शाश्व॒तम्‌ | कालि कालि महाकालि खड्गखट्वाड्रधारिणि,'पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्याचलपर तुम्हारा सनातन निवासस्थान है। काली! काली!! महाकाली! !! तुम खड़्ग और खट्वांग धारण करनेवाली हो

ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်—“တောင်တန်းတို့အနက် အမြတ်ဆုံးသော ဝိန္ဓျတောင်ပေါ်၌ သင့်၏ နေရာတည်သည် အစဉ်အမြဲတည်၏။ အို ကာလီ၊ အို ကာလီ၊ အို မဟာကာလီ—ဓားနှင့် ခဋ္ဝာင်္ဂ (khaṭvāṅga) ကို ကိုင်ဆောင်သူ—”

Verse 18

कृतानुयात्रा भूतैस्त्वं वरदा कामचारिणि । भारावतारे ये च त्वां संस्मरिष्यन्ति मानवा:,'जो प्राणी तुम्हारा अनुसरण करते हैं, उन्हें तुम मनोवाज्छित वर देती हो। इच्छानुसार विचरनेवाली देवि! जो मनुष्य अपने ऊपर आये हुए संकटका भार उतारनेके लिये तुम्हारा स्मरण करते हैं तथा जो मानव प्रतिदिन प्रातःकाल तुम्हें प्रणाम करते हैं, उनके लिये इस पृथ्वीपर पुत्र अथवा धन-धान्य आदि कुछ भी दुर्लभ नहीं हैं

ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်—“အလိုတော်အတိုင်း လွတ်လပ်စွာ လှုပ်ရှားနိုင်သော ဒေဝီမ၊ သင့်ကို သတ္တဝါတို့ လိုက်လံဆည်းကပ်ကြပြီး သင်သည် သင့်ကို ရှာဖွေသူတို့အား ဆုတော်များ ပေးသနား၏။ ထို့ပြင် မိမိအပေါ် ကျရောက်လာသော ဒုက္ခဝေဒနာ၏ အလေးချိန်ကို ချရန် သင့်ကို သတိရမည်သော လူတို့အတွက်—ဤမြေပြင်ပေါ်၌ သားသမီးဖြစ်စေ၊ ဥစ္စာဓနဖြစ်စေ၊ စပါးသီးနှံအပေါများဖြစ်စေ—မရနိုင်သောအရာ မရှိတော့။”

Verse 19

प्रणमन्ति च ये त्वां हि प्रभाते तु नरा भुवि । न तेषां दुर्लभ किंचित्‌ पुत्रतो धनतो5पि वा,'जो प्राणी तुम्हारा अनुसरण करते हैं, उन्हें तुम मनोवाज्छित वर देती हो। इच्छानुसार विचरनेवाली देवि! जो मनुष्य अपने ऊपर आये हुए संकटका भार उतारनेके लिये तुम्हारा स्मरण करते हैं तथा जो मानव प्रतिदिन प्रातःकाल तुम्हें प्रणाम करते हैं, उनके लिये इस पृथ्वीपर पुत्र अथवा धन-धान्य आदि कुछ भी दुर्लभ नहीं हैं

ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်—“မြေပြင်ပေါ်ရှိ လူတို့အနက် မနက်အရုဏ်တက်ချိန်တွင် သင့်ကို ဦးညွှတ်ပူဇော်သူတို့အတွက်—အမှန်တကယ် မရနိုင်သောအရာ မရှိ။ သားသမီးဖြစ်စေ၊ ဥစ္စာဓနဖြစ်စေ—မည်သည့်အရာမျှ မခက်ခဲ။”

Verse 20

दुर्गात्‌ तारयसे दुर्गे तत्‌ त्वं दुर्गा स्मृता जनै: । कान्तारेष्ववसन्नानां मग्नानां च महार्णवे

ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်– «အို ဒုရ္ဂါ၊ သင်သည် သတ္တဝါတို့ကို အန္တရာယ်မှ ကယ်တင်ပေးသောကြောင့် လူတို့က သင့်ကို ‘ဒုရ္ဂါ’ ဟူသော နာမဖြင့် မှတ်မိကြသည်။ လမ်းမဲ့တောကန္တာရ၌ ဒုက္ခကျရောက်သူတို့ကိုလည်းကောင်း၊ မဟာသမုဒ္ဒရာကြီး၌ နစ်မြုပ်နေသူတို့ကိုလည်းကောင်း သင်သည် ကယ်တင်သူဖြစ်သည်»။

Verse 21

दस्युभिर्वा निरुद्धानां त्वं गति: परमा नृणाम्‌ | जलप्रतरणे चैव कान्तारेष्वटवीषु च

ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်– «ဓားပြတို့က ဝိုင်းပိတ်ထားသော လူတို့အတွက် သင်သည် အမြင့်ဆုံး အားကိုးရာဖြစ်သည်။ ထို့အတူ ရေကို ဖြတ်ကူးရာတွင်လည်းကောင်း၊ ကန္တာရဆန်သော တောရိုင်းနှင့် တောလမ်းကြောင်းများတွင်လည်းကောင်း သင်သည် သူတို့၏ သေချာသော အားကိုးရာဖြစ်သည်»။

Verse 22

ये स्मरन्ति महादेवि न च सीदन्ति ते नरा: । त्वं कीर्ति: श्रीर्धति: सिद्धिद्नोर्विद्या संततिर्मति:

ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်– «အို မဟာဒေဝီ၊ သင့်ကို သတိရသော လူတို့သည် စိတ်ပျက်အားလျော့၍ မနစ်မြုပ်ကြ။ သင်သည် သူတို့၏ ဂုဏ်သတင်းနှင့် သာယာချမ်းသာ၊ တည်ကြည်သော သတ္တိနှင့် အောင်မြင်မှုဖြစ်သည်။ သင်သည် ဗဟုသုတနှင့် ပညာ၊ မျိုးရိုးဆက်နွယ်မှုနှင့် ဆက်စပ်တည်တံ့မှု၊ ထို့ပြင် မှန်ကန်စွာ ဆုံးဖြတ်နိုင်သော ဉာဏ်ပညာဖြစ်သည်»။

Verse 23

संध्या रात्रि: प्रभा निद्रा ज्योत्स्ना कान्ति: क्षमा दया । नृणां च बन्धन मोहूं पुत्रनाशं धनक्षयम्‌

ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်– «ဆည်းဆာ၊ ည၊ အရုဏ်အလင်း၊ အိပ်စက်ခြင်း၊ လမင်းရောင်၊ တောက်ပမှု၊ သည်းခံခြင်း၊ ကရုဏာ—ထို့ပြင် လူတို့၏ အခြေအနေများဖြစ်သော ချည်နှောင်ခြင်းနှင့် မောဟ၊ သားသမီးဆုံးရှုံးခြင်း၊ ဥစ္စာပျက်စီးခြင်းတို့လည်း ပါဝင်သည်»။

Verse 24

व्याधिं मृत्युं भयं चैव पूजिता नाशयिष्यसि । सो5हं राज्यात्‌ परिभ्रष्ट: शरणं त्वां प्रपन्नचान्‌

ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်– «သင့်ကို သင့်လျော်စွာ ပူဇော်ကန်တော့လျှင် သင်သည် ရောဂါ၊ သေခြင်းနှင့် ကြောက်ရွံ့မှုတို့ကို ဖျောက်ဖျက်မည်။ ငါသည်—နိုင်ငံတော်မှ လွတ်ကျသွားသူ—သင့်ထံသို့ အားကိုးရာအဖြစ် လာရောက်၍ သင့်အကာအကွယ်အောက်၌ ကိုယ်ကို အပ်နှံပါ၏»။

Verse 25

“दुर्गे! तुम दुःसह दुःखसे उद्धार करती हो, इसीलिये लोगोंके द्वारा दुर्गा कही जाती हो। जो दुर्गम वनमें कष्ट पा रहे हों, महासागरमें डूब रहे हों अथवा लुटेरोंके वशमें पड़ गये हों, उन सब मनुष्योंके लिये तुम्हीं परम गति हो--तुम्हीं उन्हें संकटसे मुक्त कर सकती हो। महादेवि! पानीमें तैरते समय, दुर्गम मार्गमें चलते समय और जंगलोंमें भटक जानेपर जो तुम्हारा स्मरण करते हैं, वे मनुष्य क्लेश नहीं पाते। तुम्हीं कीर्ति, श्री, धृति, सिद्धि, लज्जा, विद्या, संतति, मति, संध्या, रात्रि, प्रभा, निद्रा, ज्योत्स्ना, कान्ति, क्षमा और दया हो। तुम पूजित होनेपर मनुष्योंके बन्धन, मोह, पुत्रनाश और धननाशका संकट, व्याधि, मृत्यु और सम्पूर्ण भय नष्ट कर देती हो। मैं भी राज्यसे भ्रष्ट हूँ, इसलिये तुम्हारी शरणमें आया हूँ ।। प्रणतश्न यथा मूर्ध्ना तव देवि सुरेश्वरि । त्राहि मां पद्मपत्राक्षि सत्ये सत्या भवस्व न:

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်– «အို ဒုရ္ဂါမယ်တော်! သည်းမခံနိုင်သော ဒုက္ခမှ သတ္တဝါတို့ကို ကယ်တင်ပေးသောကြောင့် လူတို့က မယ်တော်ကို ‘ဒုရ္ဂါ’ ဟု ခေါ်ကြသည်။ လမ်းမဖြတ်နိုင်သော တောအုပ်တွင် ပင်ပန်းနာကျင်နေသူ၊ မဟာသမုဒ္ဒရာ၌ နစ်မြုပ်နေသူ၊ သို့မဟုတ် လုယက်သူတို့၏ အာဏာအောက်သို့ ကျရောက်သူတို့အတွက် မယ်တော်တစ်ပါးတည်းသာ အမြင့်ဆုံး အားကိုးရာဖြစ်သည်—ဘေးအန္တရာယ်မှ လွတ်မြောက်စေနိုင်သူလည်း မယ်တော်တစ်ပါးတည်းသာ ဖြစ်သည်။ အို မဟာဒေဝီ! ရေထဲတွင် ရုန်းကန်နေစဉ်၊ အန္တရာယ်ပြည့်လမ်းကြမ်းကို လျှောက်နေစဉ်၊ တောထဲတွင် လမ်းပျောက်လှည့်လည်နေစဉ် မယ်တော်ကို သတိရသူတို့သည် ဆင်းရဲကျပ်တည်းမှု မတွေ့ရ။ မယ်တော်သည် ကီर्ति၊ သီရိ၊ သတ္တိတည်ကြည်မှု၊ အောင်မြင်မှု၊ ရှက်ကြောက်မှု၊ ပညာ၊ သားသမီး၊ ဉာဏ်ပညာ၊ ဆည်းဆာ၊ ည၊ အလင်းရောင်၊ အိပ်စက်ခြင်း၊ လရောင်၊ အလှတရား၊ ခွင့်လွှတ်ခြင်းနှင့် ကရုဏာ ဖြစ်သည်။ မယ်တော်ကို ပူဇော်လျှင် လူတို့၏ ချည်နှောင်မှုနှင့် မောဟ၊ သားဆုံးရှုံးခြင်းနှင့် ဥစ္စာဆုံးရှုံးခြင်း၏ ဘေး၊ ရောဂါ၊ သေခြင်းနှင့် ကြောက်ရွံ့မှု အလုံးစုံကို ဖျက်ဆီးပေးသည်။ ကျွန်ုပ်လည်း နိုင်ငံတော်မှ လွတ်ကျသွားသောကြောင့် မယ်တော်၏ အရိပ်အာဝါသို့ လာရောက်ခိုလှုံသည်။ ခေါင်းကို ငုံ့၍ ပူဇော်ပါ၏—အို ဒေဝီ၊ ဒေဝတို့၏ အရှင်မ၊ ကြာရွက်မျက်စိရှိသူ—ကျွန်ုပ်ကို ကယ်တင်ပါ။ အို သစ္စာတရား၊ ကျွန်ုပ်တို့အတွက် သစ္စာဖြစ်ပါစေ»။

Verse 26

“कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाली देवि! देवेश्वरि! मैं तुम्हारे चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करता हूँ। मेरी रक्षा करो। सत्ये! हमारे लिये वस्तुतः सत्यस्वरूपा बनो-- अपनी महिमाको सत्य कर दिखाओ ।। शरणं भव मे दुर्गे शरण्ये भक्तवत्सले । एवं स्तुता हि सा देवी दर्शयामास पाण्डवम्‌

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်– «ကြာပွင့်ရွက်ကဲ့သို့ ကျယ်ဝန်းသော မျက်စိရှိသော ဒေဝီမယ်တော်၊ ဒေဝတို့၏ အရှင်မ! မယ်တော်၏ ခြေတော်ရင်း၌ ခေါင်းတင်၍ ဦးညွှတ်ပူဇော်ပါ၏။ ကျွန်ုပ်ကို ကာကွယ်ပါ။ အို သစ္စာတရား! ကျွန်ုပ်တို့အတွက် အမှန်တကယ် သစ္စာ၏ အရုပ်အဆင်းဖြစ်ပါစေ—မယ်တော်၏ မဟိမကို အမှန်တကယ် ထင်ရှားစေပါ။ ကျွန်ုပ်၏ ခိုလှုံရာဖြစ်ပါစေ၊ အို ဒုရ္ဂါ—ခိုလှုံရာဖြစ်ထိုက်သူ၊ भक्तတို့ကို ချစ်မြတ်နိုးသူ»။ ထိုသို့ ချီးမွမ်းခံရသဖြင့် ဒေဝီသည် ပाण्डဝကို ထင်ရှားပြသ하였다။

Verse 27

देव्युवाच शृणु राजन्‌ महाबाहो मदीयं वचन प्रभो,देवी बोली--महाबाहु राजा युधिष्ठिर! मेरी बात सुनो। समर्थ राजन! शीघ्र ही तुम्हें संग्राममें विजय प्राप्त होगी। मेरे प्रसादसे कौरवसेनाको जीतकर उसका संहार करके तुम निष्कण्टक राज्य करोगे और पुन: इस पृथ्वीका सुख भोगोगे। राजन! तुम्हें भाइयोंसहित पूर्ण प्रसन्नता प्राप्त होगी

ဒေဝီက ပြောသည်– «နားထောင်လော့၊ အို မင်းကြီး၊ မဟာဗာဟု အရှင်! ငါ၏စကားကို နားထောင်ပါ။ မကြာခင် သင်သည် စစ်မြေပြင်၌ အောင်ပွဲရလိမ့်မည်။ ငါ၏ကရုဏာတော်ကြောင့် ကౌရဝ စစ်တပ်ကို အနိုင်ယူ၍ ဖျက်ဆီးပြီးနောက် ရန်သူအတားအဆီးမရှိသော ‘ဆူးကင်း’ နိုင်ငံကို အုပ်ချုပ်ကာ ဤမြေကြီး၏ ချမ်းသာပျော်ရွှင်မှုကို ထပ်မံ ခံစားရလိမ့်မည်။ အို မင်းကြီး၊ ညီအစ်ကိုတို့နှင့်အတူ ပြည့်စုံသော ပျော်ရွှင်ချမ်းမြေ့မှုကို ရလိမ့်မည်»။

Verse 28

भविष्यत्यचिरादेव संग्रामे विजयस्तव । मम प्रसादान्निर्जित्य हत्वा कौरववाहिनीम्‌,देवी बोली--महाबाहु राजा युधिष्ठिर! मेरी बात सुनो। समर्थ राजन! शीघ्र ही तुम्हें संग्राममें विजय प्राप्त होगी। मेरे प्रसादसे कौरवसेनाको जीतकर उसका संहार करके तुम निष्कण्टक राज्य करोगे और पुन: इस पृथ्वीका सुख भोगोगे। राजन! तुम्हें भाइयोंसहित पूर्ण प्रसन्नता प्राप्त होगी

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်– «မကြာခင် စစ်မြေပြင်၌ အောင်ပွဲသည် သင်၏အဖြစ် ဖြစ်လိမ့်မည်။ ငါ၏ကရုဏာတော်ကြောင့် ကൗရဝ စစ်တပ်ကို အနိုင်ယူ၍ ဖျက်ဆီးပြီးနောက် ရန်သူနှင့် အတားအဆီးကင်းသော ‘ဆူးကင်း’ နိုင်ငံကို အုပ်ချုပ်ကာ ဤမြေကြီး၏ ချမ်းသာပျော်ရွှင်မှုကို ထပ်မံ ခံစားရလိမ့်မည်။ အို မင်းကြီး၊ ညီအစ်ကိုတို့နှင့်အတူ ပြည့်စုံသော ပျော်ရွှင်မှုကို ရလိမ့်မည်»။

Verse 29

राज्यं निष्कपटकं कृत्वा भोक्ष्यसे मेदिनीं पुनः । भ्रातृभि:सहितो राजन प्रीति प्राप्स्पसि पुष्कलाम्‌,देवी बोली--महाबाहु राजा युधिष्ठिर! मेरी बात सुनो। समर्थ राजन! शीघ्र ही तुम्हें संग्राममें विजय प्राप्त होगी। मेरे प्रसादसे कौरवसेनाको जीतकर उसका संहार करके तुम निष्कण्टक राज्य करोगे और पुन: इस पृथ्वीका सुख भोगोगे। राजन! तुम्हें भाइयोंसहित पूर्ण प्रसन्नता प्राप्त होगी

ဝိုင်ရှမ္ပါယနက ပြောသည်– «လှည့်စားမှုနှင့် သစ္စာဖောက်မှုကင်းသော နိုင်ငံတော်ကို ပြန်လည်တည်ဆောက်ပြီးနောက် သင်သည် ဤမြေကြီးကို ထပ်မံ ခံစားရလိမ့်မည်။ အို မင်းကြီး၊ ညီအစ်ကိုတို့နှင့် စည်းလုံးညီညွတ်လျက် သင်သည် ပေါများသော ပျော်ရွှင်မှုနှင့် စိတ်ချမ်းသာမှုကို ရလိမ့်မည်»။

Verse 30

मत्प्रसादाच्च ते सौख्यमारोग्यं च भविष्यति । ये च संकीर्तयिष्यन्ति लोके विगतकल्मषा:

ငါ၏ကျေးဇူးတော်ကြောင့် သင်တို့ထံသို့ ပျော်ရွှင်ချမ်းသာခြင်းနှင့် ကျန်းမာသန်စွမ်းခြင်းတို့ ရောက်လာမည်။ ထို့ပြင် လောက၌ ဤကို ရွတ်ဆိုချီးမွမ်းကာ သီဆိုကြမည့်သူတို့သည် အပြစ်နှင့် အညစ်အကြေးတို့မှ ကင်းစင်သွားမည်။

Verse 31

तेषां तुष्टा प्रदास्यामि राज्यमायुर्वपु: सुतम्‌ । प्रवासे नगरे चापि संग्रामे शत्रुसंकटे

ဝိုင်သမ္ပာယနက ပြောသည်– “သူတို့ကို ကျေနပ်သဖြင့် ငါသည် အာဏာပိုင်ရာဇသိက္ခာ၊ အသက်ရှည်ခြင်း၊ ကိုယ်ခန္ဓာကောင်းမွန်ခြင်းနှင့် သားမြေးတို့ကို ပေးမည်—ပြည်ပရဝါသ၌ရှိစဉ်လည်းကောင်း၊ မြို့၌နေထိုင်စဉ်လည်းကောင်း၊ စစ်မြေပြင်၌ ရန်သူအန္တရာယ်ကြား၌ပင်လည်းကောင်း”။

Verse 32

अटब्यां दुर्गकान्तारे सागरे गहने गिरौ । ये स्मरिष्यन्ति मां राजन्‌ यथाहं भवता स्मृता

ဝိုင်သမ္ပာယနက ပြောသည်– “အို မင်းကြီး၊ တောအတွင်း၌ဖြစ်စေ၊ အန္တရာယ်ပြင်းထန်သော တောရိုင်းကန္တာရ၌ဖြစ်စေ၊ ပင်လယ်ပေါ်၌ဖြစ်စေ၊ လမ်းမဲ့နက်နဲသော နေရာ၌ဖြစ်စေ၊ တောင်ပေါ်၌ဖြစ်စေ—သင်က ငါ့ကို သတိရသကဲ့သို့ပင် ငါ့ကို သတိရမည့်သူတိုင်းအတွက် ငါသည် ထင်ရှားစွာ ရှိနေမည်”။

Verse 33

न तेषां दुर्लभ किंचिदस्मिललोके भविष्यति । इदं स्तोत्रवरं भकत्या शृणुयाद्‌ वा पठेत वा

ဝိုင်သမ္ပာယနက ပြောသည်– “ထိုသို့ပြုသူတို့အတွက် ဤလောက၌ မရနိုင်သည့်အရာ မရှိတော့မည်။ ဤအထူးကောင်းမြတ်သော စတုတ္ထရ (သီချင်းချီးမွမ်း) ကို ဘက္တိဖြင့် နားထောင်သော်လည်းကောင်း၊ ရွတ်ဖတ်သော်လည်းကောင်း ပြုသင့်သည်”။

Verse 34

तस्य सर्वाणि कार्याणि सिद्धि यास्यन्ति पाण्डवा: । मत्प्रसादाच्च व: सर्वान्‌ विराटनगरे स्थितान्‌

ဝိုင်သမ္ပာယနက ပြောသည်– “အို ပाण्डဝတို့၊ သူ၏ လုပ်ငန်းဆောင်တာ အားလုံးသည် မလွဲမသွေ အောင်မြင်စီးပွားမည်။ ထို့ပြင် ငါ၏ကျေးဇူးတော်ကြောင့် ဗိရာဋမြို့၌ နေထိုင်နေသော သင်တို့အားလုံးကို ကာကွယ်စောင့်ရှောက်၍ တိုးတက်စေမည်”။

Verse 35

न प्रज्ञास्यन्ति कुरवो नरा वा तन्निवासिन: । इत्युक्त्वा वरदा देवी युधिष्ठिरमरिंदमम्‌ । रक्षां कृत्वा च पाण्डूनां तत्रैवान्तरधीयत

ဝိုင်ရှမ္ပာယနက ပြောသည်– «ကူရုတို့လည်း မဟုတ်၊ ထိုနေရာ၌ နေထိုင်သူ လူတို့လည်း မဟုတ်၊ သင်တို့ကို မသိမမြင်နိုင်ကြလိမ့်မည်» ဟု။ ထိုသို့ဆိုပြီးနောက် ကောင်းချီးပေးတတ်သော ဒေဝီသည် ရန်သူနှိမ်နင်းသူ ယုဓိဋ္ဌိရကို မိန့်ကြားကာ၊ ပာဏ္ဍဝတို့အပေါ် ကာကွယ်စောင့်ရှောက်မှုကို ချမှတ်ပေးပြီး ထိုနေရာ၌ပင် ပျောက်ကွယ်သွားလေသည်။

Verse 263

उपगम्य तु राजानमिदं वचनमत्रवीत्‌ । “शरणागतोंकी रक्षा करनेवाली भक्तवत्सले दुर्गे! मुझे शरण दो।” इस प्रकार स्तुति करनेपर देवी दुर्गाने पाण्डुनन्दन युधिष्छिरको प्रत्यक्ष दर्शन दिया तथा राजाके पास आकर यह बात कही

ဘုရင်ထံသို့ ချဉ်းကပ်ကာ သူက ဤစကားကို ပြောလေသည်– «ကိုးကွယ်သူတို့ကို ချစ်မြတ်နိုး၍ ခိုလှုံလာသူတို့ကို ကာကွယ်ပေးသော ဒုရ္ဂါမယ်တော်၊ ကျွန်ုပ်အား ခိုလှုံရာ ပေးတော်မူပါ» ဟု။ ထိုသို့ ချီးမွမ်းသဖြင့် ဒုရ္ဂါဒေဝီသည် ပာဏ္ဍု၏သား ယုဓိဋ္ဌိရရှေ့၌ ထင်ရှားစွာ ပေါ်ထွန်းလာပြီး၊ ထို့နောက် ဘုရင်အနီးသို့ လာကာ မိမိ၏ သတင်းစကားကို ပြောကြားလေသည်။

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns ethical concealment: Yudhiṣṭhira must secure safety through partial disclosure (a crafted identity) while avoiding harmful falsehood, navigating how much truth can be spoken without endangering others or violating obligations.

The chapter teaches that dharma is often enacted through measured speech and role-appropriate conduct: protection of life and social order can require restraint, while rulers must uphold hospitality and justice even amid uncertainty.

No explicit phalaśruti appears here; the closing narrative function is meta-commentarial by implication, emphasizing that disciplined concealment and righteous patronage can operate effectively without public recognition.