Adhyaya 163
Adi ParvaAdhyaya 16329 Verses

Adhyaya 163

Saṃvaraṇa–Tapatī Vivāhaḥ (The Marriage of Saṃvaraṇa and Tapatī) — Mahābhārata, Ādi Parva 163

Upa-parva: Vaṁśānucarita / Kuru-vaṁśa-prasaṅga (Genealogical and dynastic episode: Saṃvaraṇa–Tapatī narrative)

Vasiṣṭha petitions Savitṛ (the solar deity) for Tapatī’s hand on behalf of King Saṃvaraṇa, presenting the king’s suitability in reputation and dharma-oriented understanding. Savitṛ assents, praises the match, and formally entrusts Tapatī to Vasiṣṭha, who brings her to Saṃvaraṇa. The king, moved by desire and joy upon seeing Tapatī, completes a period of austerity; through tapas and Vasiṣṭha’s spiritual authority he obtains her as wife. The marriage is performed according to proper rite on a mountain frequented by divine beings. Saṃvaraṇa then remains with Tapatī for twelve years in secluded enjoyment, during which the capital and realm suffer drought and deprivation. Observing the crisis, Vasiṣṭha retrieves the king and returns him to the city; rains resume and the realm recovers. Saṃvaraṇa later performs extended rites with Tapatī, and the narrative culminates in the birth of Kuru—providing an etiological link for the Kaurava identity and Arjuna’s epithet tied to that lineage.

Chapter Arc: एक ब्राह्मण-परिवार की रक्षा के लिए भीमसेन स्वयं भोजन-सामग्री लेकर बकासुर के पास जाने का निश्चय करता है—और मार्ग में ही यह स्पष्ट हो जाता है कि आज ‘कर’ नहीं, ‘कर्तव्य’ चुकाया जाएगा। → युधिष्ठिर की चिंता और सावधानी—कि नगरवासी न जानें, ब्राह्मण को यत्नपूर्वक आश्वस्त रखा जाए—के बीच भीम निर्भय होकर राक्षस के हिस्से का अन्न स्वयं खा लेता है और उसे पुकारकर चुनौती देता है। यह अपमान बकासुर के क्रोध को भड़काता है और वह युद्ध के लिए दौड़ पड़ता है। → भयंकर गर्जना करता नरभक्षी बकासुर भीम पर झपटता है; दोनों महाबली एक-दूसरे को घसीटते, खींचते, भिड़ते हैं। अंततः भीम घुटने से पीठ दबाकर राक्षस की कमर तोड़ देता है—टूटते शरीर से मुख से रक्त फूट पड़ता है और बकासुर का अंत निश्चित हो जाता है। → बकासुर का वध हो जाता है; ब्राह्मण-परिवार और एकचक्रा नगर भय-मुक्त होते हैं। पाण्डवों की गुप्त पहचान सुरक्षित रहते हुए भी उनका धर्म-रक्षण प्रकट हो उठता है। → नगर में फैले इस परिवर्तन का प्रभाव—और पाण्डवों के ‘अज्ञात’ रहते हुए भी उनके यश का फैलना—आगे की घटनाओं के लिए भूमि तैयार करता है।

Shlokas

Verse 1

अड-४#-रू- द्विषष्ट्याधिकशततमो< ध्याय: भीमसेनका भोजन-सामग्री लेकर बकासुरके पास जाना और स्वयं भोजन करना तथा युद्ध करके उसे मार गिराना युधिछिर उवाच उपपन्नमिदं मातस्त्वया यद्‌ बुद्धिपूर्वकम्‌ । आर्तस्य ब्राह्मणस्यैतदनुक्रोशादिदं कृतम्‌,युधिष्ठिर बोले--माँ! आपने समझ-बूझकर जो कुछ निश्चय किया है, वह सब उचित है। आपने संकटमें पड़े हुए ब्राह्मणपर दया करके ही ऐसा विचार किया है

Yudhiṣṭhira berkata: “Ibu, apa yang telah ibu putuskan dengan pertimbangan yang teliti itu sepenuhnya wajar. Hal ini dilakukan kerana belas kasihan terhadap seorang brāhmaṇa yang sedang ditimpa kesusahan.”

Verse 2

ध्रुवमेष्यति भीमो5यं निहत्य पुरुषादकम्‌ | सर्वथा ब्राह्मणस्यार्थे यदनुक्रोशवत्यसि,निश्चय ही भीमसेन उस राक्षसको मारकर लौट आयेंगे; क्योंकि आप सर्वथा ब्राह्मणकी रक्षाके लिये ही उसपर इतनी दयालु हुई हैं

Yudhiṣṭhira berkata: “Sesungguhnya Bhīma ini akan kembali setelah membunuh rākṣasa pemakan manusia itu. Kerana belas kasihan ibu sepenuhnya tertuju kepada kebajikan serta perlindungan brāhmaṇa itu.”

Verse 3

यथा व्विदं न विन्देयुर्नरा नगरवासिन: । तथायं ब्राह्मणो वाच्य: परिग्राह्श्च यत्नत:,आपको यत्नपूर्वक ब्राह्मणपर अनुग्रह तो करना ही चाहिये; किंतु ब्राह्मगणसे यह कह देना चाहिये कि वे इस प्रकार मौन रहें कि नगरनिवासियोंको यह बात मालूम न होने पाये

Yudhiṣṭhira berkata: “Aturlah supaya penduduk kota tidak mengetahui hal ini. Namun brāhmaṇa ini mesti ditegur dengan cermat, dan hendaklah dia diterima serta disokong dengan perhatian yang bersungguh-sungguh.” Tuntutan etika di sini ialah kebijaksanaan yang berhati-hati berserta kewajipan: memelihara ketenteraman sosial dan keamanan awam, sambil tetap memberikan penghormatan dan bantuan yang wajar kepada brāhmaṇa.

Verse 4

वैशम्पायन उवाच (युधिष्ठिरेण सम्मन्त्रय ब्राह्मुणार्थमरिंदम । कुन्ती प्रविश्य तान्‌ सर्वान्‌ सान्त्ववयामास भारत ।।) ततो रात्र्यां व्यतीतायामन्नमादाय पाण्डव: । भीमसेनो ययौ तत्र यत्रासौ पुरुषादक:ः,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ब्राह्मण (की रक्षा)-के निमित्त युधिष्ठिरसे इस प्रकार सलाह करके कुन्तीदेवीने भीतर जाकर समस्त ब्राह्मण-परिवारको सान्त्वना दी। तदनन्तर रात बीतनेपर पाण्डुनन्दन भीमसेन भोजनसामग्री लेकर उस स्थानपर गये, जहाँ वह नरभक्षी राक्षस रहता था। बक राक्षसके वनमें पहुँचकर महाबली पाण्डुकुमार भीमसेन उसके लिये लाये हुए अन्नको स्वयं खाते हुए राक्षसका नाम ले-लेकर उसे पुकारने लगे

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Bhārata (Janamejaya), setelah berunding dengan Yudhiṣṭhira demi melindungi para brāhmaṇa, Kuntī masuk ke dalam dan menenangkan seluruh keluarga brāhmaṇa itu. Kemudian, setelah malam berlalu, Bhīmasena, sang Pāṇḍava, membawa bekalan makanan lalu pergi ke tempat makhluk pemakan manusia itu tinggal.” Petikan ini menonjolkan tindak balas yang selaras dengan dharma ketika krisis: musyawarah, belas kasihan terhadap yang lemah, dan tindakan berani untuk menyingkirkan ancaman daripada masyarakat.

Verse 5

आसाद्य तु वनं तस्य रक्षस: पाण्डवो बली । आजुहाव ततो नाम्ना तदन्नमुपपादयन्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! ब्राह्मण (की रक्षा)-के निमित्त युधिष्ठिरसे इस प्रकार सलाह करके कुन्तीदेवीने भीतर जाकर समस्त ब्राह्मण-परिवारको सान्त्वना दी। तदनन्तर रात बीतनेपर पाण्डुनन्दन भीमसेन भोजनसामग्री लेकर उस स्थानपर गये, जहाँ वह नरभक्षी राक्षस रहता था। बक राक्षसके वनमें पहुँचकर महाबली पाण्डुकुमार भीमसेन उसके लिये लाये हुए अन्नको स्वयं खाते हुए राक्षसका नाम ले-लेकर उसे पुकारने लगे

Vaiśampāyana berkata: Setelah tiba di rimba milik rākṣasa itu, Pāṇḍava yang perkasa (Bhīma) mula memanggilnya dengan lantang menurut namanya, sambil menyusun hidangan—bahkan memakan bekalan itu sendiri—agar raksasa pemakan manusia itu keluar. Peristiwa ini menonjolkan kesanggupan menanggung bahaya demi melindungi yang lemah, menjadikan kekuatan diri sebagai perisai bagi orang lain.

Verse 6

ततः स राक्षस: क्रुद्धो भीमस्य वचनात्‌ तदा | आजगाम सुसंक्रुद्धो यत्र भीमो व्यवस्थित:,भीमके इस प्रकार पुकारनेसे वह राक्षस कुपित हो उठा और अत्यन्त क्रोधमें भरकर जहाँ भीमसेन बैठकर भोजन कर रहे थे, वहाँ आया

Kemudian rākṣasa itu, diprovokasi oleh kata-kata Bhīma, menyala marah. Dengan amarah yang membara, dia datang ke tempat Bhīma berada—duduk dan sedang makan—siap untuk berhadapan.

Verse 7

महाकायो महावेगो दारयन्निव मेदिनीम्‌ | लोहिताक्ष: करालश्न लोहितश्मश्रुमूर्थज:,उसका शरीर बहुत बड़ा था। वह इतने महान्‌ वेगसे चलता था, मानो पृथ्वीको विदीर्ण कर देगा। उसकी आँखें रोषसे लाल हो रही थीं। आकृति बड़ी विकराल जान पड़ती थी। उसके दाढ़ी, मूँछ और सिरके बाल लाल रंगके थे

Vaiśampāyana berkata: Tubuhnya amat besar dan dia bergerak dengan kelajuan dahsyat, seolah-olah hendak membelah bumi. Matanya merah menyala kerana amarah; rupanya menggerunkan. Janggut, misai, dan rambut di kepalanya semuanya kemerahan—tanda sifat liar dan ganas yang menakutkan sesiapa yang memandang.

Verse 8

आकर्णाद्‌ भिन्नवक्त्रश्न शड्कुर्णो बिभीषण: । त्रिशिखां भ्रुकुटिं कृत्वा संदश्य दशनच्छदम्‌,मुँहका फैलाव कानोंके समीपतक था, कान भी शंकुके समान लंबे और नुकीले थे। बड़ा भयानक था वह राक्षस। उसने भौंहें ऐसी टेढ़ी कर रखी थीं कि वहाँ तीन रेखाएँ उभड़ आयी थीं और वह दाँतोंसे ओठ चबा रहा था

Vaiśampāyana berkata: Mulutnya seakan terbelah lebar hingga ke dekat telinga; telinganya panjang, runcing, seperti kon. Sang rākṣasa tampak amat mengerikan. Dia mengerutkan kening dengan garang hingga timbul tiga garis, dan menggigit bibirnya sendiri dengan gigi—tanda niat ganas dan gelora batin yang berkecamuk.

Verse 9

भुज्जानमन्नं तं दृष्टवा भीमसेनं स राक्षस: । विवृत्य नयने क्रुद्ध इंदं वचनमत्रवीत्‌,भीमसेनको वह अन्न खाते देख राक्षसका क्रोध बहुत बढ़ गया और उसने आँखें तरेरकर कहा--

Vaiśampāyana berkata: Melihat Bhīmasena sedang makan, kemarahan rākṣasa itu semakin memuncak. Dengan mata terbeliak kerana marah, dia mengucapkan kata-kata ini.

Verse 10

को<यमन्नमिदं भुद्धतक्ते मदर्थमुपकल्पितम्‌ । पश्यतो मम दुर्बुद्धिर्यियासुर्यमसादनम्‌,“यमलोकमें जानेकी इच्छा रखनेवाला यह कौन दुर्बुद्धि मनुष्य है, जो मेरी आँखोंके सामने मेरे ही लिये तैयार करके लाये हुए इस अन्नको स्वयं खा रहा है?”

Vaiśampāyana berkata: “Siapakah lelaki bodoh ini, yang mendambakan untuk pergi ke alam Yama, sehingga—di hadapan mataku sendiri—dia memakan makanan yang telah disediakan untukku?”

Verse 11

भीमसेनस्तत: श्रुत्वा प्रहसन्निव भारत । राक्षसं तमनादृत्य भुड्क्त एव पराड्मुख:,भारत! उसकी बात सुनकर भीमसेन मानो जोर-जोरसे हँसने लगे और उस राक्षसकी अवहेलना करते हुए मुँह फेरकर खाते ही रह गये

Vaiśampāyana berkata: Mendengar kata-kata itu, Bhīmasena seakan-akan meledak ketawa. Tanpa menghiraukan rākṣasa itu, dia memalingkan wajah dan terus makan—tanda penghinaan yang tidak berganjak.

Verse 12

रवं स भैरवं कृत्वा समुद्यम्य करावुभौ । अभ्यद्रवद्‌ भीमसेनं जिघांसु: पुरुषादक:,अब तो वह नरभक्षी राक्षस भीमसेनको मार डालनेकी इच्छासे भयंकर गर्जना करता हुआ दोनों हाथ ऊपर उठाकर उनकी ओर दौड़ा

Vaiśampāyana berkata: Rākṣasa pemakan manusia itu mengaum dengan dahsyat, mengangkat kedua-dua tangannya tinggi-tinggi, lalu menerpa Bhīmasena dengan niat membunuhnya.

Verse 13

तथापि परिभूयैन प्रेक्षमाणो वृकोदर: । राक्षसं भुझुक्त एवान्नं पाण्डव: परवीरहा,तो भी शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पाण्डुनन्दन भीमसेन उस राक्षसकी ओर देखते हुए उसका तिरस्कार करके उस अन्नको खाते ही रहे। तब उसने अत्यन्त अमर्षमें भरकर कुन्तीनन्दन भीमसेनके पीछे खड़े हो अपने दोनों हाथोंसे उनकी पीठपर प्रहार किया

Namun demikian, Vṛkodara (Bhīma) tetap memandang rākṣasa itu dan menghina dia, sambil terus makan. Pāṇḍava—pembunuh wira musuh—tidak berhenti; dengan ketenangannya dia menandakan keberanian dan enggan dipancing kepada tindakan terburu-buru.

Verse 14

अमर्षेण तु सम्पूर्ण: कुन्तीपुत्रं वृकोदरम्‌ जघान पृष्ठे पाणिभ्यामुभाभ्यां पृष्ठत: स्थित:,तो भी शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले पाण्डुनन्दन भीमसेन उस राक्षसकी ओर देखते हुए उसका तिरस्कार करके उस अन्नको खाते ही रहे। तब उसने अत्यन्त अमर्षमें भरकर कुन्तीनन्दन भीमसेनके पीछे खड़े हो अपने दोनों हाथोंसे उनकी पीठपर प्रहार किया

Vaiśampāyana berkata: Dipenuhi amarah, rākṣasa itu berdiri di belakang lalu memukul belakang Kuntī-putra Vṛkodara (Bhīma) dengan kedua-dua tangannya. Namun Bhīmasena—pemusnah wira musuh dan putera Pāṇḍu—memandang rākṣasa itu dengan hina dan terus makan makanan itu. Kemudian, semakin meluap murkanya, si iblis berdiri lagi di belakang Bhīma dan sekali lagi menghentam belakangnya dengan kedua-dua tangan.

Verse 15

तथा बलवता भीम: पाणिशभ्यां भूशमाहतः । नैवावलोकयामास राक्षसं भुड्क्त एव सः,इस प्रकार बलवान राक्षसके दोनों हाथोंसे भयानक चोट खाकर भी भीमसेनने उसकी ओर देखातक नहीं, वे भोजन करनेमें ही संलग्न रहे

Vaiśampāyana berkata: Walaupun Bhīma yang perkasa itu dipukul dengan kuat oleh rākṣasa dengan kedua-dua tangannya, dia tidak pun menoleh memandang makhluk itu; dia tetap tenggelam dalam makanannya.

Verse 16

ततः स भूय: संक्रुद्धो वृक्षमादाय राक्षस: । ताडयिष्यंस्तदा भीम॑ पुनरभ्यद्रवद्‌ बली,तब उस बलवान राक्षसने पुनः अत्यन्त कुपित हो एक वृक्ष उखाड़कर भीमसेनको मारनेके लिये फिर उनपर धावा किया

Vaiśampāyana berkata: Kemudian rākṣasa itu, sekali lagi menyala oleh amarah, mencabut sebatang pokok dan, berniat memukul Bhīma, menyerbu ke arahnya semula dengan ganas.

Verse 17

ततो भीम: शनैर्भुक्त्वा तदन्नं पुरुषर्षभ: । वार्युपस्पृश्य संहृष्टस्तस्थी युधि महाबल:,तदनन्तर नरश्रेष्ठ महाबली भीमसेनने धीरे-धीरे वह सब अन्न खाकर, आचमन करके मुँह-हाथ धो लिये, फिर वे अत्यन्त प्रसन्न हो युद्धके लिये डट गये

Kemudian Bhīma, banteng di antara manusia, perlahan-lahan menghabiskan makanan itu. Setelah menyucikan diri dengan meneguk air (ācaman), dia menjadi sangat gembira lalu berdiri teguh, dengan kekuatan besar, bersiap untuk bertempur.

Verse 18

क्षिप्तं क्रुद्धेन त॑ वृक्ष॑ प्रतिजग्राह वीर्यवान्‌ । सव्येन पाणिना भीम: प्रहसन्निव भारत,जनमेजय! कुपित राक्षसके द्वारा चलाये हुए उस वृक्षको पराक्रमी भीमसेनने बायें हाथसे हँसते हुए-से पकड़ लिया

Vaiśampāyana berkata: Bhīma yang gagah perkasa menyambut pokok yang dilemparkan dalam kemarahan oleh rākṣasa itu. Wahai Janamejaya, keturunan Bharata—dengan tangan kirinya dia menangkapnya seolah-olah sedang ketawa.

Verse 19

ततः स पुनरुद्यम्य वृक्षान्‌ बहुविधान्‌ बली । प्राहिणोद्‌ भीमसेनाय तस्मै भीमश्न पाण्डव:,तब उस बलवान्‌ निशाचरने पुनः बहुत-से वृक्षोंको उखाड़ा और भीमसेनपर चला दिया। पाण्डुनन्दन भीमने भी उसपर अनेक वृक्षोंद्वारा प्रहार किया

Kemudian makhluk pengembara malam yang gagah itu sekali lagi mencabut pelbagai jenis pokok lalu melemparkannya ke arah Bhīmasena. Namun Bhīma, putera Pāṇḍu yang masyhur sebagai pemakan musuh, membalasnya pula dengan menghentam menggunakan banyak pokok.

Verse 20

तद्‌ वृक्षयुद्धम भवन्महीरुहविनाशनम्‌ । घोररूपं महाराज नरराक्षसराजयो:,महाराज! नरराज तथा राक्षसराजका वह भयंकर वृक्षयुद्ध उस वनके समस्त वृक्षोंके विनाशका कारण बन गया

Vaiśampāyana berkata: Pertempuran dengan pohon-pohon itu menjadi punca kebinasaan pepohon rimba yang besar-besar. Wahai Raja, itulah pertembungan yang menggerunkan antara raja manusia dan raja rākṣasa—begitu dahsyat hingga memusnahkan belantara itu sendiri.

Verse 21

नाम विश्राव्य तु बकः समभिद्रुत्य पाण्डवम्‌ । भुजाभ्यां परिजग्राह भीमसेनं महाबलम्‌,तदनन्तर बकासुरने अपना नाम सुनाकर महाबली पाण्डुनन्दन भीमसेनकी ओर दौड़कर दोनों बाँहोंसे उन्हें पकड़ लिया

Vaiśampāyana berkata: Setelah terlebih dahulu menyebut namanya, Baka meluru terus kepada Pāṇḍava dan dengan kedua-dua lengannya memeluk serta menggenggam Bhīmasena yang maha perkasa.

Verse 22

भीमसेनो<डपि तद्‌ रक्ष: परिरभ्य महाभुज: । विस्फुरन्तं महाबाहुं विचकर्ष बलादू बली,महाबाहु बलवान्‌ भीमसेनने भी उस विशाल भुजाओंवाले राक्षसको दोनों भुजाओंसे कसकर छातीसे लगा लिया और बलपूर्वक उसे इधर-उधर खींचने लगे। उस समय बकासुर उनके बाहुपाशसे छूटनेके लिये छटपटा रहा था

Vaiśampāyana berkata: Bhīmasena yang berlengan gagah turut memeluk rākṣasa itu rapat ke dadanya dengan kedua-dua lengan, lalu dengan kekuatan semata-mata menyeret makhluk berlengan besar yang meronta-ronta itu ke sana sini.

Verse 23

स कृष्यमाणो भीमेन कर्षमाणश्न पाण्डवम्‌ | समयुज्यत तीव्रेण क्लमेन पुरुषादक:,भीमसेन उस राक्षसको खींचते थे तथा राक्षस भीमसेनको खींच रहा था। इस खींचा- खींचीमें वह नरभक्षी राक्षस बहुत थक गया

Vaiśampāyana berkata: Ketika Bhīma menyeretnya dan rākṣasa pemakan manusia itu pula menarik Pāṇḍava, mereka bergelut dalam tarik-menarik yang sengit. Dalam pertarungan yang tegang itu, rākṣasa kanibal itu menjadi amat letih.

Verse 24

तयोरवेंगेन महता पृथिवी समकम्पत । पादपांश्न महाकायांश्वूर्णयामासतुस्तदा,उन दोनोंके महान्‌ वेगसे धरती जोरसे काँपने लगी। उन दोनोंने उस समय बड़े-बड़े वृक्षोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले

Vaiśampāyana berkata: Didorong oleh momentum yang amat besar daripada kedua-duanya, bumi bergegar dengan kuat. Pada saat itu juga, mereka memecahkan pokok-pokok besar hingga berkecai menjadi serpihan.

Verse 25

हीयमान तु तद्‌ रक्ष: समीक्ष्य पुरुषादकम्‌ । निष्पिष्य भूमौ जानुभ्यां समाजघ्ने वृकोदर:,उस नरभक्षी राक्षसको कमजोर पड़ते देख भीमसेन उसे पृथ्वीपर पटककर रगड़ने और दोनों घुटनोंसे मारने लगे

Vaiśaṃpāyana berkata: Melihat rākṣasa pemakan manusia itu semakin lemah, Vṛkodara (Bhīma) menghempaskannya ke bumi, menghimpit dan menggeseknya ke tanah, lalu menghentamnya berulang kali dengan kedua-dua lutut.

Verse 26

ततो<स्य जानुना पृष्ठठगवपीड्य बलादिव । बाहुना परिजग्राह दक्षिणेन शिरोधराम्‌,तदनन्तर उन्होंने अपने एक घुटनेसे बल-पूर्वक राक्षसकी पीठ दबाकर दाहिने हाथसे उसकी गर्दन पकड़ ली और बायें हाथसे कमरका लँगोट पकड़कर उस राक्षसको दुहरा मोड़ दिया। उस समय वह बड़ी भयानक आवाज में चीत्कार कर रहा था

Vaiśaṃpāyana berkata: Kemudian, dengan lututnya menekan belakang rākṣasa itu seolah-olah dengan kekuatan semata-mata, dia menggenggam leher makhluk itu dengan lengan kanannya.

Verse 27

सव्येन च कटीदेशे गृह वाससि पाण्डव: । तद्‌ रक्षो द्विगुणं चक्रे रुवन्तं भैरवं रवम्‌,तदनन्तर उन्होंने अपने एक घुटनेसे बल-पूर्वक राक्षसकी पीठ दबाकर दाहिने हाथसे उसकी गर्दन पकड़ ली और बायें हाथसे कमरका लँगोट पकड़कर उस राक्षसको दुहरा मोड़ दिया। उस समय वह बड़ी भयानक आवाज में चीत्कार कर रहा था

Vaiśaṃpāyana berkata: Dengan tangan kirinya, putera Pāṇḍu itu mencengkam kain di pinggang rākṣasa, sambil menekan belakangnya dengan lutut dan memegang lehernya dengan tangan kanan. Dengan kekuatan yang mengatasi, dia membengkokkan rākṣasa itu hingga melipat dua, sedang makhluk itu menjerit dengan raungan yang menggerunkan.

Verse 28

ततो<स्य रुधिरं वकत्रात्‌ प्रादुरासीद्‌ विशाम्पते | भज्यमानस्य भीमेन तस्य घोरस्य रक्षस:,राजन! भीमसेनके द्वारा उस घोर राक्षसकी जब कमर तोड़ी जा रही थी, उस समय उसके मुखसे (बहुत-सा) खून गिरा

Vaiśaṃpāyana berkata: Kemudian, wahai tuan rakyat, darah memancut dari mulutnya ketika rākṣasa yang mengerikan itu dihimpit dan dihancurkan oleh Bhīma.

Verse 162

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि बकवधपर्वणि बकभीमसेनयुद्धे द्विषष्ट्यधिकशततमो<ध्याय:

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, di dalam Ādi Parva, pada bahagian Bakavadha-parva tentang pembunuhan Baka, dalam kisah pertempuran antara Baka dan Bhīmasena, berakhirlah bab yang ke-seratus enam puluh dua.

Frequently Asked Questions

The implicit dharma-tension is between personal absorption in pleasure and the king’s administrative duty: Saṃvaraṇa’s prolonged withdrawal correlates with societal distress, prompting corrective intervention.

Legitimate prosperity is depicted as dependent on disciplined authority: alliances should be sanctioned through proper counsel and rite, and rulership requires sustained presence and responsibility toward the realm.

No explicit phalaśruti formula appears here; the meta-function is genealogical and etiological—explaining Kuru’s origin and reinforcing the narrative logic that order (including rainfall) follows restored righteous governance.