Duryodhana’s Śaraṇāgati and the Pāṇḍavas’ Resolve
Gandharva Encounter
न नाथमधिगच्छन्ति वध्यमाना महारणे । उस महासमरमें असुरोंकी मार खाकर वे सब देवता भागते हुए कहीं कोई रक्षक नहीं पा रहे थे। किन्हींके सिर फट गये थे तो किन्हींके सब अंगोंमें गहरे घाव हो गये थे ।। ६७ ई || अथ तद् दिद्रुतं सैन्यं दृष्टवा देव: पुरंदर:,तदनन्तर बलासुरविनाशक देवराज इन्द्रने अपनी उस सेनाको दानवोंसे पीड़ित होकर भागती देख उसे आश्वासन देते हुए कहा--'शूरवीरो! भय त्याग दो, इससे तुम्हारा मंगल होगा। हथियार उठाओ और पराक्रममें मन लगाओ। तुम्हें किसी प्रकार व्यथित नहीं होना चाहिये। इन भयंकर दिखायी देनेवाले दुराचारी दानवोंको जीतो। तुम्हारा कल्याण हो। तुम सब लोग मेरे साथ इन महाकाय दैत्योंपर टूट पड़ो।' इन्द्रकी यह बात सुनकर देवताओंको बड़ी सान्त्वना मिली
na nātham adhigacchanti vadhyamānā mahāraṇe |
महायुद्धात मार खात असताना त्यांना कोणताही रक्षक सापडत नव्हता। ते पळणारे सैन्य पाहून देवपुरंदर इंद्र म्हणाला—“शूरांनो, भय सोडा; तेच तुमच्या हिताचे आहे। शस्त्रे उचला आणि पराक्रमात मन लावा। कशानेही व्यथित होऊ नका। दिसायला भयंकर असले तरी हे दुराचारी दानव आहेत—यांना जिंका। तुमचे कल्याण होवो। माझ्यासह या महाकाय दैत्यांवर तुटून पडा।” इंद्राचे शब्द ऐकून देवांना मोठा धीर आला।
मार्कण्डेय उवाच
Even when overwhelmed and seemingly without refuge, one should not surrender to fear. Right leadership restores morale by directing the mind toward courage, disciplined action, and the ethical resolve to oppose destructive forces.
The devas are being routed by asuras in a fierce battle and flee, wounded and unable to find protection. Indra (Purandara) sees their retreat, reassures them, urges them to abandon fear, take up weapons, and attack the gigantic daityas together; his words console and steady the gods.