Adhyaya 9
Anushasana ParvaAdhyaya 928 Verses

Adhyaya 9

Adhyāya 9: Pratiśruta-Dāna (The Duty to Fulfill Promised Gifts)

Upa-parva: Dāna-Dharma Anuśāsana (Promise-keeping and the ethics of giving to Brāhmaṇas)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma about the destiny of those who, having promised gifts to Brāhmaṇas, fail to give out of delusion (1–2). Bhīṣma replies that the pledge-breaker’s hopes are destroyed, employing a sharp analogy to sterility (3), and asserts that merit accrued between one’s birth and death is impaired by such misconduct, including offerings made (4–5). He then introduces an illustrative tradition: an ancient dialogue between a jackal and a monkey (6–9). The monkey, seeing the jackal consuming corpses in a cremation ground, questions what severe prior act led to this degraded condition (9–10). The jackal explains that he once promised a Brāhmaṇa but did not deliver, and thus fell into a sinful birth, now feeding in a repugnant manner due to hunger (11–12). Bhīṣma reinforces that Brāhmaṇas repeatedly instruct him: what is promised must be given; one should not create ‘hope’ in Brāhmaṇas and then negate it (13–15). He describes the Brāhmaṇa’s ‘tejas’ as ignited by expectation: if angered, it can burn like fire; if pleased, it becomes protective and healing for the realm (16–18). The benefits of Brāhmaṇa satisfaction are enumerated—prosperity for family, livestock, allies, city, and countryside (19–20). The chapter closes with a directive: give what has been promised to attain an auspicious state; giving to Brāhmaṇas secures superior heavenly outcomes, sustains devas and ancestors, and recognizes the Brāhmaṇa as a living tīrtha who should not depart unhonored (21–24).

Chapter Arc: युधिष्ठिर पितामह भीष्म से धर्म का सूक्ष्म तत्त्व पूछते हैं—जो मनुष्य ब्राह्मण को दान देने की प्रतिज्ञा करके भी नहीं देता, उसका फल क्या होता है? → भीष्म प्रतिज्ञा-भंग को केवल असत्य नहीं, धर्म-क्षय बताते हैं और उदाहरण-रूप में वानर और शृगाल का संवाद/उपाख्यान रखते हैं, जहाँ ब्राह्मण को वचन देकर वस्तु न पहुँचाने का अपराध उजागर होता है। साथ ही ब्राह्मण-धन की अहरणीयता और ब्राह्मणों के प्रति निरन्तर क्षमा-भाव रखने की कठोर मर्यादा स्थापित होती है। → भीष्म का निर्णायक विधान: जो थोड़ा या बहुत दान ‘प्रतिश्रुत्य’ न दे, उसकी आशाएँ नष्ट होती हैं; ब्राह्मण-धन का हरण अक्षम्य है; और संतुष्ट ब्राह्मण का वाणी-आशीर्वाद राज्य को ‘अगद’ (रोग-रहित) सा बल देता है—यहीं दान-धर्म का तेज अपने चरम पर प्रकट होता है। → दान के फल का विस्तार: दाता के पुत्र-पौत्र, बन्धु, पशु, मन्त्री, नगर-जनपद शान्ति और पोषण पाते हैं; ब्राह्मण को दान से उत्तम स्वर्ग सुनिश्चित होता है; देवता और पितर भी तृप्त होते हैं। ब्राह्मण को ‘महान् तीर्थ’ कहकर उनकी पूजा-अवमानना से बचने का उपदेश देकर अध्याय स्थिर निष्कर्ष पर आता है।

Shlokas

Verse 1

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६ श्लोक मिलाकर कुल ३०३ श्लोक हैं) भीस्न्म+ज (2) आसजमसना नवमो<्ध्याय: ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके न देने तथा उसके धनका अपहरण करनेसे दोषकी प्राप्तिके विषयमें सियार और वानरके संवादका उल्लेख एवं ब्राह्मणोंको दान देनेकी महिमा युधिछिर उवाच ब्राह्मणानां तु ये लोका: प्रतिश्रुत्य पितामह । न प्रयच्छन्ति मोहात्‌ ते के भवन्ति महाद्युते,युधिष्ठिरने पूछा--धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी पितामह! जो लोग ब्राह्मणोंको कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर मोहवश नहीं देते जो दुरात्मा दानका संकल्प करके भी दान नहीं देते वे क्या होते हैं? यह धर्मका विषय मुझे यथार्थरूपसे बताइये

युधिष्ठिर म्हणाला—हे पितामह! जे लोक ब्राह्मणांना दान देण्याची प्रतिज्ञा करूनही मोहामुळे देत नाहीत, त्यांचे पुढे काय होते? हे महातेजस्वी! अशा लोकांचा परिणाम काय—हे धर्मतत्त्व मला यथार्थपणे सांगा.

Verse 2

एतनमे तत्त्वतो ब्रूहि धर्म धर्मभूतां वर । प्रतिश्रुत्य दुरात्मानो न प्रयच्छन्ति ये नरा:,युधिष्ठिरने पूछा--धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी पितामह! जो लोग ब्राह्मणोंको कुछ देनेकी प्रतिज्ञा करके फिर मोहवश नहीं देते जो दुरात्मा दानका संकल्प करके भी दान नहीं देते वे क्या होते हैं? यह धर्मका विषय मुझे यथार्थरूपसे बताइये

हे धर्मधारकांतील श्रेष्ठ! हे तत्त्व मला यथार्थपणे सांगा—जे दुरात्मे लोक प्रतिज्ञा करूनही दान देत नाहीत, त्यांचे काय होते?

Verse 3

भीष्म उवाच यो न दद्यात्‌ प्रतिश्रुत्य स्वल्पं वा यदि वा बहु आशास्तस्य हता: सर्वा: क्लीबस्येव प्रजाफलम्‌,भीष्मजीने कहा--युथधिष्ठिर! जो थोड़ा या अधिक देनेकी प्रतिज्ञा करके उसे नहीं देता है, उसकी सभी आशाएँ वैसे ही नष्ट हो जाती हैं जैसे नपुंसककी संतानरूपी फलविषयक आशा

भीष्म म्हणाले—हे युधिष्ठिर! जो थोडे असो वा अधिक, दान देण्याची प्रतिज्ञा करूनही देत नाही, त्याच्या सर्व आशा नष्ट होतात—जशा नपुंसकाच्या संतानरूपी फलाच्या आशा नष्ट होतात.

Verse 4

यां रात्रि जायते जीवो यां रात्रि च विनश्यति । एतस्मिन्नन्तरे यद्‌ यत्‌ सुकृतं तस्य भारत,भरतनन्दन! जीव जिस रातको जन्म लेता है और जिस रातको उसकी मौत होती है-- इन दोनों रात्रियोंके बीचमें जीवनभर वह जो-जो पुण्यकर्म करता है, भरतश्रेष्ठ! उसने आजीवन जो कुछ होम, दान तथा तप किया होता है, उसका वह सब कुछ उस प्रतिज्ञा- भंगके पापसे नष्ट हो जाता है

भीष्म म्हणाले—हे भरतनंदना! ज्या रात्री जीव जन्मतो आणि ज्या रात्री तो नष्ट होतो, त्या दोन रात्रिंच्या मधल्या काळात आयुष्यात तो जे-जे पुण्य करतो—यज्ञ, दान व तपाने जे काही मिळवतो—ते सर्व प्रतिज्ञाभंगाच्या पापाने नष्ट होते.

Verse 5

यच्च तस्य हुतं किंचिद्‌ दत्तं वा भरतर्षभ । तपस्तप्तमथो वापि सर्व तस्योपहन्यते,भरतनन्दन! जीव जिस रातको जन्म लेता है और जिस रातको उसकी मौत होती है-- इन दोनों रात्रियोंके बीचमें जीवनभर वह जो-जो पुण्यकर्म करता है, भरतश्रेष्ठ! उसने आजीवन जो कुछ होम, दान तथा तप किया होता है, उसका वह सब कुछ उस प्रतिज्ञा- भंगके पापसे नष्ट हो जाता है

भीष्म म्हणाले— हे भरतश्रेष्ठ! त्याने यज्ञात जे काही हवन केले, जे काही दान दिले आणि जे काही तप आचरले— ते सर्व नष्ट होते. प्रतिज्ञाभंगाचे पाप जन्म-मृत्यूच्या मधल्या काळात साठवलेले सर्व पुण्य हरपवते आणि आयुष्यभरच्या उपासना, दान व संयमाचे फळ शून्य करते.

Verse 6

अथैतद्‌ वचन प्राहुर्धर्मशास्त्रविदो जना: । निशम्य भरतश्रेष्ठ बुद्ध्या परमयुक्तया,भरतश्रेष्ठ! धर्मशास्त्रके ज्ञाता मनुष्य अपनी परम योगयुक्त बुद्धिसे विचार करके यह उपर्युक्त बात कहते हैं

भीष्म म्हणाले— हे भरतश्रेष्ठ! हे ऐकून धर्मशास्त्र जाणणारे लोक परम संयमयुक्त, सुयोग्य बुद्धीने विचार करून असेच म्हणतात.

Verse 7

अपि चोदाहरन्तीमं धर्मशास्त्रविदो जना: । अश्वानां श्यामकर्णानां सहस्रेण स मुच्यते,धर्मशास्त्रोंके विद्वान यह भी कहते हैं कि प्रतिज्ञा-भंगका पाप करनेवाला पुरुष एक हजार श्यामकर्ण घोड़ोंका दान करनेसे उस पापसे मुक्त होता है

भीष्म म्हणाले— तसेच धर्मशास्त्राचे विद्वान हे उदाहरणही देतात: जो पुरुष प्रतिज्ञाभंगाच्या पापात पडला असेल, तो श्यामकर्ण घोड्यांचे एक हजार दान केल्याने त्या दोषातून मुक्त होतो.

Verse 8

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी प्रशंशाविषयक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ,अन्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ | शृगालस्य च संवादं वानरस्य च भारत भारत! इस विषयमें विज्ञ पुरुष सियार और वानरके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं

भीष्म म्हणाले— हे भारत! याच संदर्भात विद्वान लोक एका प्राचीन इतिहासाचे उदाहरण देतात— कोल्हा आणि वानर यांचा संवाद. या विषयाचे स्पष्टीकरण करण्यासाठी ते ती जुनी कथा त्यांच्या संभाषणरूपाने सांगतात.

Verse 9

तौ सखायोौ पुरा ह्ास्तां मानुषत्वे परंतप । अन्यां योनिं समापन्नौ शार्गालीं वानरीं तथा,शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! मनुष्य-जन्ममें जो दोनों पहले एक-दूसरेके मित्र थे, वे ही दूसरे जन्ममें सियार और वानरकी योनिमें प्राप्त हो गये इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि शृगालवानरसंवादे नवमो<ध्याय:

भीष्म म्हणाले— हे शत्रुसंतापक! ते दोघे पूर्वी मनुष्यजन्मात परस्पर मित्र होते; पुढे दुसऱ्या जन्मात प्रवेश करून कोल्हा आणि वानर अशा योनिंना प्राप्त झाले.

Verse 10

ततः परासून्‌ खादन्तं शृगालं वानरोउब्रवीत्‌ । श्मशानमध्ये सम्प्रेक्ष्य पूर्वजातिमनुस्मरन्‌,तदनन्तर एक दिन सियारको मरघटमें मुर्दे खाता देख वानरने पूर्व-जन्मका स्मरण करके पूछा--“भैया! तुमने पहले जन्ममें कौन-सा भयंकर पाप किया था, जिससे तुम मरघटमें घृणित एवं दुर्गन्धयुक्त मुर्दे खा रहे हो?”

तेव्हा प्रेतं खात असलेल्या कोल्ह्याला पाहून वानर बोलला. स्मशानाच्या मध्यभागी त्याला पाहून आणि आपला पूर्वजन्म स्मरून तो विचारू लागला— “भाऊ, तू पूर्वजन्मी कोणते घोर पाप केलेस, म्हणून आज तू स्मशानात घाणेरडी व दुर्गंधीयुक्त प्रेते खातोस?”

Verse 11

कि त्वया पापकं पूर्व कृतं कर्म सुदारुणम्‌ । यस्त्वं श्मशाने मृतकान्‌ पूतिकानत्सि कुत्सितान्‌,तदनन्तर एक दिन सियारको मरघटमें मुर्दे खाता देख वानरने पूर्व-जन्मका स्मरण करके पूछा--“भैया! तुमने पहले जन्ममें कौन-सा भयंकर पाप किया था, जिससे तुम मरघटमें घृणित एवं दुर्गन्धयुक्त मुर्दे खा रहे हो?”

तू पूर्वी कोणते अत्यंत दारुण पापकर्म केलेस, ज्यामुळे तू स्मशानात कुजलेली, घृणास्पद प्रेते खातोस?

Verse 12

एवमुक्त: प्रत्युवाच शृगालो वानरं तदा । ब्राह्मणस्य प्रतिश्रुत्य न मया तदुपाहृतम्‌,वानरके इस प्रकार पूछनेपर सियारने उसे उत्तर दिया--'भाई वानर! मैंने ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके वह वस्तु उसे नहीं दी थी। इसीके कारण मैं इस पापयोनिमें आ पड़ा हूँ और उसी पापसे भूखा होनेपर मुझे इस तरहका घृणित भोजन करना पड़ता है!

असे म्हटल्यावर कोल्ह्याने तेव्हा वानराला उत्तर दिले— “मी एका ब्राह्मणाला देण्याचे वचन दिले होते; पण ती वस्तू मी त्याला दिली नाही.”

Verse 13

तत्कृते पापकीं योनिमापन्नो5स्मि प्लवड्भम । तस्मादेवंविध॑ भक्ष्यं भक्षयामि बुभुक्षित:,वानरके इस प्रकार पूछनेपर सियारने उसे उत्तर दिया--'भाई वानर! मैंने ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा करके वह वस्तु उसे नहीं दी थी। इसीके कारण मैं इस पापयोनिमें आ पड़ा हूँ और उसी पापसे भूखा होनेपर मुझे इस तरहका घृणित भोजन करना पड़ता है!

“त्याच पापामुळे, हे वानरा, मी पापयोनित पडलो आहे. म्हणून भूक लागली की मला असेच नीच व घृणास्पद अन्न खावे लागते.”

Verse 14

भीष्म उवाच शृगालो वानरं प्राह पुनरेव नरोत्तम । कि त्वया पातकं कर्म कृतं येनासि वानर:,भीष्मजी कहते हैं--नरश्रेष्ठत इसके बाद सियारने वानरसे पुनः पूछा--“तुमने कौन- सा पाप किया था? जिससे वानर हो गये?”

भीष्म म्हणाले— हे नरश्रेष्ठ! त्यानंतर कोल्ह्याने वानराला पुन्हा विचारले— “तू कोणते पातक कर्म केलेस, ज्यामुळे तू वानर झालास?”

Verse 15

वानर उवाच सदा चाहं फलाहारो ब्राह्मणानां प्लवड्भम: । तस्मान्न ब्राह्मणस्वं तु हर्तव्यं विदुषा सदा । सम॑ विवादो मोक्तव्यो दातव्यं स प्रतिश्रुतम्‌,वानरने कहा--मैं सदा ब्राह्मणोंका फल चुराकर खाया करता था; इसी पापसे वानर हुआ। अतः विज्ञ पुरुषको कभी ब्राह्मणका धन नहीं चुराना चाहिये। उनके साथ कभी झगड़ा नहीं करना चाहिये और उनके लिये जो वस्तु देनेकी प्रतिज्ञा की गयी हो, वह अवश्य दे देनी चाहिये

वानर म्हणाला—मी नेहमी ब्राह्मणांची फळे चोरून खायचो; त्या पापामुळेच मी वानर झालो. म्हणून ज्ञानी पुरुषाने कधीही ब्राह्मणांचे धन चोरू नये. ब्राह्मणांशी कधी वाद घालू नये; आणि त्यांना देण्याचे जे वचन दिले असेल ते नक्की द्यावे.

Verse 16

भीष्म उवाच इत्येतद्‌ ब्रुवतो राजन्‌ ब्राह्मणस्य मया श्रुतम्‌ । कथां कथयत: पुण्यां धर्मज्ञस्य पुरातनीम्‌,भीष्मजी कहते हैं--राजन्‌! यह कथा मैंने एक धर्मज्ञ ब्राह्मणके मुखसे सुनी है; जो प्राचीनकालकी पवित्र कथाएँ सुनाता था

भीष्म म्हणाले—राजन्, हे मी धर्मज्ञ ब्राह्मणाच्या मुखातून ऐकले आहे; तो प्राचीन काळातील पवित्र कथा सांगत होता.

Verse 17

श्रुतश्चापि मया भूय: कृष्णस्यापि विशाम्पते | कथां कथयत: पूर्व ब्राह्मणं प्रति पाण्डव,प्रजानाथ! पाण्डुनन्दन! फिर मैंने यही बात भगवान्‌ श्रीकृष्णके मुखसे भी सुनी थी; जब कि वे पहले किसी ब्राह्मणसे ऐसी ही कथा कह रहे थे

हे प्रजानाथ, हे पांडव, हे पांडुनंदन! हीच गोष्ट मी पुन्हा श्रीकृष्णांच्या मुखातूनही ऐकली होती; पूर्वी ते एका ब्राह्मणाला अशीच कथा सांगत होते.

Verse 18

न हर्तव्यं विप्रधन क्षन्तव्यं तेषु नित्यश: । बालाश्व नावमन्तव्या दरिद्रा: कृपणा अपि,ब्राह्मणका धन कभी नहीं चुराना चाहिये। वे अपराध करें तो भी सदा उनके प्रति क्षमाभाव ही रखना चाहिये। वे बालक, दरिद्र अथवा दीन हों तो भी उनका अनादर नहीं करना चाहिये

ब्राह्मणांचे धन कधीही चोरू नये. ते अपराधी ठरले तरीही त्यांच्या प्रति नेहमी क्षमाभाव ठेवावा. ते बालक असोत, दरिद्री असोत किंवा दीन असोत—तरीही त्यांचा अवमान करू नये.

Verse 19

एवमेव च मां नित्यं ब्राह्मणा: संदिशन्ति वै । प्रतिश्रुत्य भवेद्‌ देयं नाशा कार्या द्विजोत्तमे,ब्राह्मगलोग भी मुझे सदा यही उपदेश दिया करते थे कि प्रतिज्ञा कर लेनेपर वह वस्तु ब्राह्यणको दे ही देनी चाहिये। किसी श्रेष्ठ ब्राह्ोणणी आशा भंग नहीं करनी चाहिये

ब्राह्मण मला नेहमी हाच उपदेश देत—एकदा वचन दिल्यावर ती वस्तू ब्राह्मणाला नक्की द्यावी. श्रेष्ठ ब्राह्मणाची आशा कधीही भंग करू नये.

Verse 20

ब्राह्मणो हवाशया पूर्व कृतया पृथिवीपते । सुसमिद्धो यथा दीप्त: पावकस्तद्विध: स्मृत:

भीष्म म्हणाले—हे पृथ्वीपते! जो ब्राह्मण पवित्र अग्नीच्या आश्रयाने उपजीविका करतो आणि प्राचीन विहित आचारधर्मात स्थित असतो, तो सुसमिद्ध, दीप्त अग्नीप्रमाणे मानला जातो—तेजस्वी, सामर्थ्यवान आणि पावन।

Verse 21

पृथ्वीनाथ! ब्राह्मणको पहले आशा दे देनेपर वह समिधासे प्रज्वलित हुई अग्निके समान उद्दीप्त हो उठता है ।। य॑ निरीक्षेत संक्रुद्ध आशया पूर्वजातया । प्रदहेच्च हि तं राजन्‌ कक्षमक्षय्यभुग्‌ यथा,राजन! पहलेकी लगी हुई आशा भंग होनेसे अत्यन्त क्रोधमें भरा हुआ ब्राह्मण जिसकी ओर देख लेता है, उसे उसी प्रकार जलाकर भस्म कर डालता है, जैसे अग्नि सूखी लकड़ी अथवा तिनकोंके बोझको जला देती है

भीष्म म्हणाले—हे पृथ्वीनाथ! ब्राह्मणाला प्रथम आशा दिली तर तो समिधांनी प्रज्वलित झालेल्या अग्नीप्रमाणे अत्यंत उद्दीप्त होतो. आणि हे राजन्, तीच पूर्वीची आशा भंगली की क्रोधाने दग्ध झालेला ब्राह्मण ज्याच्याकडे नजर टाकतो, त्याला तसाच भस्म करतो—जसा अग्नी कोरड्या गवताचा वा काड्यांचा ढीग जाळून टाकतो।

Verse 22

स एव हि यदा तुष्टो वचसा प्रतिनन्दति । भवत्यगदसंकाशो विषये तस्य भारत,भारत! वही ब्राह्मण जब आशापूर्तिसे संतुष्ट होकर वाणीद्वारा राजाका अभिनन्दन करता है--उसे आशीर्वाद देता है, तब उसके राज्यके लिये वह चिकित्सकके तुल्य हो जाता है

भीष्म म्हणाले—हे भारत! तोच ब्राह्मण जेव्हा आशापूर्ती व यथोचित सन्मानाने संतुष्ट होऊन वाणीने राजाचे अभिनंदन करतो—आशीर्वाद देतो—तेव्हा तो त्या राज्यासाठी वैद्याप्रमाणे होतो।

Verse 23

पुत्रान्‌ पौत्रान्‌ पशुंश्वैव बान्धवान्‌ सचिवांस्तथा । पुरं जनपदं चैव शान्तिरिष्टेन पोषयेत्‌,तथा उस दाताके पुत्र-पौत्र, बन्धु-बान्धव, पशु, मन्त्री, नगर और जनपदके लिये वह शान्तिदायक बनकर उन्हें कल्याणका भागी बनाता और उन सबका पोषण करता है

भीष्म म्हणाले—इष्ट, म्हणजे विहित पुण्यकर्माच्या प्रभावाने मनुष्य शांतीचा स्रोत होतो; तो आपल्या पुत्र-पौत्र, बंधु-बांधव, पशुधन, मंत्री तसेच नगर व जनपद यांचेही पोषण करून त्यांना कल्याणाचा भागी करतो।

Verse 24

एतद्धि परम॑ तेजो ब्राह्मणस्येह दृश्यते । सहस्रकिरणस्येव सवितुर्धरणीतले,इस पृथ्वीपर ब्राह्मणका उत्कृष्ट तेज सहस्र किरणोंवाले सूर्यदेवके समान दृष्टिगोचर होता है

भीष्म म्हणाले—या लोकात ब्राह्मणाचे परम तेज स्पष्ट दिसते—धरणीतलावर सहस्र किरणांच्या सविता (सूर्या) प्रमाणे।

Verse 25

तस्माद्‌ दातव्यमेवेह प्रतिश्रुत्य युधिष्ठिर । यदीच्छेच्छो भनां जातिं प्राप्तुं भरतसत्तम,भरतश्रेष्ठ युधिष्ठि!! इसलिये जो उत्तम योनिमें जन्म लेना चाहता हो, उसे ब्राह्मणको देनेकी प्रतिज्ञा की हुई वस्तु अवश्य दे डालनी चाहिये

म्हणून, हे युधिष्ठिर, या लोकात जे दान देण्याचे वचन दिले आहे ते निश्चयाने द्यावे. हे भरतश्रेष्ठ, जो उत्तम योनीत जन्म मिळावा अशी इच्छा करतो, त्याने विशेषतः ब्राह्मणाला वचन दिलेली वस्तू कधीही रोखू नये—अवश्य द्यावी.

Verse 26

ब्राह्मणस्य हि दत्तेन ध्रुवं स्वर्गो हानुत्तम: । शक्य: प्राप्तुंविशेषेण दानं हि महती क्रिया,ब्राह्मणको दान देनेसे निश्चय ही परम उत्तम स्वर्गलोकको विशेष रूपसे प्राप्त किया जा सकता है; क्योंकि दान महान्‌ पुण्यकर्म है

ब्राह्मणाला दान दिल्याने निश्चयच परम उत्तम स्वर्ग प्राप्त होतो. दानामुळे विशेष रीतीने स्वर्गसिद्धी होते; कारण दान हे महान् पुण्यकर्म आहे.

Verse 27

इतो दत्तेन जीवन्ति देवता: पितरस्तथा । तस्माद्‌ दानानि देयानि ब्राह्मणेभ्यो विजानता,इस लोकमें ब्राह्मणको दान देनेसे देवता और पितर तृप्त होते हैं; इसलिये विद्वान्‌ पुरुष ब्राह्मणको अवश्य दान दे

या लोकात जे दान दिले जाते, त्याने देवता आणि पितरही तृप्त होऊन पोसले जातात. म्हणून हे जाणणाऱ्या विवेकी पुरुषाने ब्राह्मणांना निश्चयाने दान द्यावे.

Verse 28

महद्धि भरतश्रेष्ठ ब्राह्मणस्तीर्थमुच्यते । वेलायां न तु कस्यांचिद्‌ गच्छेद्‌ विप्रो हपूजित:,भरतश्रेष्ठ! ब्राह्मण महान्‌ तीर्थ कहे जाते हैं; अतः वे किसी भी समय घरपर आ जायाँ तो बिना सत्कार किये उन्हें नहीं जाने देना चाहिये

हे भरतश्रेष्ठ, ब्राह्मणाला महान तीर्थ असे म्हटले जाते. म्हणून कोणत्याही वेळी ब्राह्मणाला सत्कार न करता जाऊ देऊ नये; तो आला की यथोचित मान देऊनच निरोप द्यावा.

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether a spoken pledge to give—especially to a Brāhmaṇa—can be ethically abandoned due to later reluctance or delusion; the chapter treats abandonment as a serious breach whose consequences outweigh the convenience of non-payment.

Speech that generates expectation becomes obligation: one should promise only what one can deliver, and once promised, one must give; fulfilling pledges preserves merit, social trust, and the protective goodwill associated with honoring worthy recipients.

Yes: the text links pledge-breaking to destruction of hopes, impairment of accumulated merit and offerings, degraded rebirth (illustrated by the jackal), and contrasts it with the expansive prosperity and auspicious destiny associated with satisfying Brāhmaṇas through fulfilled giving.