
युधिष्ठिरप्रश्नः—विश्वामित्रस्य ब्राह्मणत्वकौतूहलम् | Yudhiṣṭhira’s Inquiry on Viśvāmitra’s Attainment of Brāhmaṇya
Upa-parva: Viśvāmitra–Brāhmaṇatva (Transformation and the Question of Brāhmaṇya)
This adhyāya is structured as Yudhiṣṭhira’s interrogative brief to Bhīṣma. He frames brāhmaṇya as ‘difficult to obtain’ and asks how the kṣatriya Viśvāmitra attained it without bodily change (dehāntara). To motivate the question, Yudhiṣṭhira enumerates a dossier of Viśvāmitra-associated deeds and linked traditions: the destructive potency of tapas against Vasiṣṭha’s lineage; the projection/creation of fierce beings under anger; the establishment and renown of the Kuśika line; Śunaḥśepa’s release from sacrificial animal-status and subsequent affiliation as a son; the cursing of many sons to become outcaste groups for failing to honor Devarāta; Triśaṅku’s extraordinary ascent oriented to the southern direction; the sanctification of the Kauśikī river; the interruption of austerity by Rambhā and her transformation; Vasiṣṭha’s attempted drowning and the river Vipāśā becoming famed; and a release from a curse through praise (stuti) addressed to a divine leader. The chapter ends by sharpening the doctrinal request: explain the ‘tattva’ (principle) behind such transformations, and reconcile this with the case of Mataṅga, who is said not to obtain brāhmaṇya despite aspiration. The adhyāya thus functions as a curated set of narrative indices preparing for Bhīṣma’s explanatory response on dharma, tapas, and status.
Chapter Arc: कौरव-सभा में एक विस्मय जागता है—क्षत्रिय विश्वामित्र के ऐसे-ऐसे तपोबल-जनित कर्म कैसे हुए कि देव, ऋषि और नदियाँ तक उनके नाम से पवित्र हो उठीं; और क्या सचमुच बिना देह-परिवर्तन के ब्राह्मणत्व प्राप्त हो सकता है? → वर्णन विश्वामित्र के अद्भुत पराक्रम और तपस्या की ओर बढ़ता है—वसिष्ठ के पुत्रशत का तपोबल से विनाश, कौशिकी जैसी देवर्षि-सेवित नदी का पावन होना, विपाशा का कर्म-प्रसिद्ध होना; साथ ही एक चेतावनी भी उभरती है कि ये चरित्र असाधारण हैं, सामान्य जन को इनका अनुकरण नहीं करना चाहिए। → प्रश्न तीक्ष्ण हो उठता है—‘देहान्तरमनासाद्य कथं स ब्राह्मणोऽभवत्?’ विश्वामित्र के ब्राह्मणत्व-प्राप्ति का रहस्य और मतंग के प्रसंग का विरोधाभास (मतंग को ब्राह्मणत्व न मिलना, चाण्डाल-योनि में जन्म) एक ही बिंदु पर टकराते हैं: क्या ब्राह्मणत्व जन्म है या तप/धर्म का फल? → वक्ता संकेत देता है कि मतंग का ब्राह्मणत्व न पाना ‘स्थाने’ (उचित) था—अर्थात केवल तप नहीं, अपितु आचरण, संस्कार, और धर्म-निष्ठा की सूक्ष्म शर्तें निर्णायक हैं; विश्वामित्र के कर्मों की महत्ता स्वीकारते हुए भी उनके अनुकरण से सावधान किया जाता है। → मतंग के तप और उसके ‘यथातत्त्व’ कारणों का पूर्ण उद्घाटन अभी शेष है—किस नियम से किसी को ब्राह्मणत्व मिलता है और किसी को नहीं?
Verse 1
35१७" श्जु अीस-न्#सस - इस अध्यायमें वर्णित चरित्र असाधारण शक्तिसम्पन्न पुरुषोंके हैं। आजकलके साधारण मनुष्योंको इसके उस अंशका अनुकरण नहीं करना चाहिये जिसमें स्त्रीके लिये अपने शरीर-प्रदानकी बात कही गयी है। अतिथिको अन्न, जल, बैठनेके लिये आसन, रहनेके लिये स्थान, सोनेके लिये बिस्तर और वस्त्र आदि वस्तुएँ अपनी शक्तिके अनुसार समर्पित करनी चाहिये। मीठे वचनोंद्वारा उसका आदर-सत्कार भी करना चाहिये। इतना ही इस अध्यायका तात्पर्य है। तृतीयो<थध्याय: विश्वामित्रको ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति कैसे हुई--इस विषयमें युधिष्ठिरका प्रश्न युधिछिर उवाच ब्राह्माण्यं यदि दुष्प्राप्यं त्रिभिर्वर्ण्नराधिप । कथें प्राप्तं महाराज क्षत्रियेण महात्मना,युधिष्ठिरने पूछा--महाराज! नरेश्वर! यदि अन्य तीन वर्णोके लिये ब्राह्मणत्व प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है तो क्षत्रियकुलमें उत्पन्न महात्मा विश्वामित्रने कैसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया? धर्मात्मन्! नरश्रेष्ठ पितामह! इस बातको मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ, आप मुझे बताइये
युधिष्ठिर म्हणाला—राजाधिराज, नरेश्वर! जर उरलेल्या तीन वर्णांसाठी ब्राह्मणत्व प्राप्त करणे अत्यंत कठीण असेल, तर क्षत्रियकुळात जन्मलेले महात्मा विश्वामित्र ब्राह्मणत्वाला कसे पोहोचले? पितामह, हे मला यथार्थपणे ऐकायचे आहे; कृपा करून सांगा।
Verse 2
इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें सुदर्शनका उपाख्यानविषयक दूसरा अध्याय पूरा हुआ,विश्वामित्रेण धर्मात्मन् ब्राह्मणत्वं नरर्षभ | श्रोतुमिच्छामि तत्त्वेन तन्मे ब्रूहि पितामह युधिष्ठिरने पूछा--महाराज! नरेश्वर! यदि अन्य तीन वर्णोके लिये ब्राह्मणत्व प्राप्त करना अत्यन्त कठिन है तो क्षत्रियकुलमें उत्पन्न महात्मा विश्वामित्रने कैसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया? धर्मात्मन्! नरश्रेष्ठ पितामह! इस बातको मैं यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ, आप मुझे बताइये
युधिष्ठिर म्हणाला—धर्मात्मन् पितामह, नरश्रेष्ठ! महात्मा विश्वामित्रांनी ब्राह्मणत्व कसे प्राप्त केले, हे मला तत्त्वतः ऐकायचे आहे; कृपा करून मला सांगा।
Verse 3
तेन हामितवीर्येण वसिष्ठस्य महात्मन: । हतं॑ पुत्रशतं सद्यस्तपसापि पितामह,पितामह! अमित पराक्रमी विश्वामित्रने अपनी तपस्याके प्रभावसे महात्मा वसिष्ठके सौ पुत्रोंको तत्काल नष्ट कर दिया था इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि विश्वामित्रोपाख्याने तृतीयो5ध्याय:
पितामह! अमित पराक्रमी विश्वामित्रांनी आपल्या तपस्येच्या प्रभावाने महात्मा वसिष्ठांचे शंभर पुत्र तत्क्षणी नष्ट केले होते।
Verse 4
यातुधानाश्व बहवो राक्षसास्तिग्मतेजस: । मन्युना5<विष्टदेहेन सृष्टा: कालान्तकोपमा:,उन्होंने क्रोधके आवेशमें आकर बहुत-से प्रचण्ड तेजस्वी यातुधान एवं राक्षस रच डाले थे जो काल और यमराजके समान भयानक थे
क्रोधाने देह व्यापून त्यांनी अनेक प्रचंड तेजस्वी यातुधान व राक्षस निर्माण केले; ते काल व अंतकासारखे भयानक होते।
Verse 5
महान् कुशिकवंशकश्र ब्रह्मर्षिशतसंकुल: । स्थापितो नरलोके<स्मिन् विद्वद्ब्राह्मणसंस्तुत:
तो महान आहे—कुशिकवंशात जन्मलेला, शेकडो ब्रह्मर्षींनी वेढलेला। या मनुष्यलोकी प्रतिष्ठित होऊन तो विद्वान ब्राह्मणांनी स्तुत आहे।
Verse 6
इतना ही नहीं, इस मनुष्य-लोकमें उन्होंने उस महान् कुशिक-वंशको स्थापित किया जो अब सैकड़ों ब्रह्मर्षियोंसे व्याप्त और दिद्वान ब्राह्मणोंसे प्रशंसित है ।। ऋचीकस्यात्मजश्नैव शुन:शेपो महातपा: । विमोक्षितो महासत्रात् पशुतामप्युपागत:,ऋचीक (अजीगर्त) का महातपस्वी पुत्र शुनःशेप एक यज्ञमें यज्ञ-पशु बनाकर लाया गया था; किंतु विश्वामित्रजीने उस महायज्ञसे उसको छुटकारा दिला दिया
ऋचीकाचा महातपस्वी पुत्र शुनःशेप—ज्याला महासत्रातील महायज्ञात यज्ञपशू म्हणूनही आणले होते—त्या महान् विधीतून मुक्त करण्यात आला.
Verse 7
हरिश्रन्द्रक्रतौ देवांस्तोषयित्वा55त्मतेजसा । पुत्रतामनुसम्प्राप्तो विश्वामित्रस्य धीमत:,हरिश्वन्द्रके उस यज्ञमें अपने तेजसे देवताओंको संतुष्ट करके विश्वामित्रने शुन:शेपको छुड़ाया था; इसलिये वह बुद्धिमान विश्वामित्रके पुत्रभावको प्राप्त हो गया
हरिश्चंद्राच्या यज्ञात आपल्या तेजाने देवांना संतुष्ट करून शुनःशेपाने बुद्धिमान विश्वामित्राचे पुत्रत्व प्राप्त केले.
Verse 8
नाभिवादयते ज्येष्ठं देवरातं नराधिप । पुत्रा: पज्चाशदेवापि शप्ता: श्वपचतां गता:,नरेश्वर! शुनः:शेप देवताओंके देनेसे देवरात नामसे प्रसिद्ध हो विश्वामित्रका ज्येष्ठ पुत्र हुआ। उसके छोटे भाई--विश्वामित्रके अन्य पचास पुत्र उसे बड़ा मानकर प्रणाम नहीं करते थे; इसलिये विश्वामित्रके शापसे वे सब-के-सब चाण्डाल हो गये
नराधिप! त्यांनी ज्येष्ठ देवराताला वंदन केले नाही; म्हणून ते पन्नासही पुत्र शापित होऊन श्वपच (चांडाळ) अवस्थेला गेले.
Verse 9
त्रिशड्कुर्बन्धुभिमक्त ऐक्ष्वाक: प्रीतिपूर्वकम् । अवाक्शिरा दिवं नीतो दक्षिणामाश्रितो दिशम्,जिस इक्ष्वाकुवंशी त्रिशंकुको भाई-बन्धुओंने त्याग दिया था और जब वह स्वर्गसे भ्रष्ट होकर दक्षिण दिशामें नीचे सिर किये लटक रहा था, तब विश्वामित्रजीने ही उसे प्रेमपूर्वक स्वर्गलोकमें पहुँचाया था
इक्ष्वाकुवंशी त्रिशंकूला त्याच्या बंधूंनी टाकून दिले होते; आणि तो स्वर्गातून भ्रष्ट होऊन दक्षिण दिशेकडे, खाली डोके करून लटकत असताना, विश्वामित्राने प्रेमपूर्वक त्याला पुन्हा स्वर्गलोकी पोहोचविले.
Verse 10
विश्वामित्रस्यथ विपुला नदी देवर्षिसेविता । कौशिकी च शिवा पुण्या ब्रद्मर्षिसुरसेविता,देवर्षियों, ब्रह्मर्षियों और देवताओंसे सेवित, पवित्र, मंगलकारिणी एवं विशाल कौशिकी नदी विश्वामित्रके ही प्रभावसे प्रकट हुई है
युधिष्ठिर म्हणाला—देवर्षींनी सेविलेली ती विशाल नदी विश्वामित्राचीच आहे. ती कौशिकी—मंगलमयी व पवित्र—ब्रह्मर्षी आणि देवांनी पूजिलेली. असे म्हणतात की विश्वामित्रांच्या तपोबलाच्या प्रभावानेच ती प्रकट झाली.
Verse 11
तपोविधघ्नकरी चैव पञ्चचूडा सुसम्मता । रम्भा नामाप्सरा: शापाद् यस्य शैलत्वमागता,पाँच चोटीवाली लोकप्रिय रम्भा नामक अप्सरा विश्वामित्रजीकी तपस्यामें विघ्न डालने गयी थी, जो उनके शापसे पत्थर हो गयी
युधिष्ठिर म्हणाला—‘पञ्चचूडा’ म्हणून प्रसिद्ध रंभा नावाची अप्सरा विश्वामित्रांच्या तपस्येत विघ्न घालायला गेली; पण त्यांच्या शापाने ती दगड झाली.
Verse 12
तथैवास्य भयाद् बद्ध्वा वसिष्ठ: सलिले पुरा । आत्मानं मज्जयन् श्रीमान् विपाश: पुनरुत्थित:,पूर्वकालमें विश्वामित्रके ही भयसे अपने शरीरको रस्सीसे बाँधकर श्रीमान् वसिष्ठजी अपने-आपको एक नदीके जलमें डुबो रहे थे; परंतु उस नदीके द्वारा पाशरहित (बन्धनमुक्त) हो पुन: ऊपर उठ आये। महात्मा वसिष्ठके उस महान् कर्मसे विख्यात हो वह पवित्र नदी उसी दिनसे “विपाशा” कहलाने लगी
युधिष्ठिर म्हणाला—तसेच पूर्वी त्याच्या भयामुळे श्रीमान् वसिष्ठांनी आपल्या देहाला दोरीने बांधून पाण्यात बुडून मरायचा प्रयत्न केला; पण त्या नदीने त्यांना पाशमुक्त करून पुन्हा वर आणले.
Verse 13
तदाप्रभृति पुण्या हि विपाशाभून्महानदी । विख्याता कर्मणा तेन वसिष्ठस्य महात्मन:,पूर्वकालमें विश्वामित्रके ही भयसे अपने शरीरको रस्सीसे बाँधकर श्रीमान् वसिष्ठजी अपने-आपको एक नदीके जलमें डुबो रहे थे; परंतु उस नदीके द्वारा पाशरहित (बन्धनमुक्त) हो पुन: ऊपर उठ आये। महात्मा वसिष्ठके उस महान् कर्मसे विख्यात हो वह पवित्र नदी उसी दिनसे “विपाशा” कहलाने लगी
त्या वेळेपासून ती महानदी पवित्र मानली जाऊन ‘विपाशा’ या नावाने विख्यात झाली. महात्मा वसिष्ठांच्या त्या अद्भुत कर्मामुळेच तिला ही कीर्ती मिळाली—विश्वामित्रांच्या भयाने दोरी बांधून ते त्यात बुडाले, पण नदीने बंधन तोडून त्यांना पुन्हा वर आणले.
Verse 14
वाम्भिश्न भगवान् येन देवसेनाग्रग: प्रभु: । स्तुतः प्रीतमना श्चासीच्छापाच्चैनममुज्चत,वाणीद्वारा स्तुति करनेपर उन विश्वामित्रपर सामर्थ्य शाली भगवान् इन्द्र प्रसन्न हो गये थे और उनको शापमुक्त कर दिया था
युधिष्ठिर म्हणाला—वाणीने केलेल्या स्तुतीने देवसेनांचा अग्रणी समर्थ प्रभु इंद्र प्रसन्न झाला आणि त्याने त्याला शापातून मुक्त केले.
Verse 15
ध्रुवस्यौत्तानपादस्य ब्रद्मर्षीणां तथैव च । मध्यं ज्वलति यो नित्यमुदीचीमाश्रितो दिशम्,जो विश्वामित्र उत्तानपादके पुत्र ध्रुव तथा ब्रह्मर्षियों (सप्तर्षियों)-के बीचमें उत्तर दिशाके आकाशका आश्रय ले तारारूपसे सदा प्रकाशित होते रहते हैं, वे क्षत्रिय ही रहे हैं। कुरुनन्दन! उनके ये तथा और भी बहुत-से अदभुत कर्म हैं, उन्हें याद करके मेरे हृदयमें यह जाननेका कौतूहल उत्पन्न हुआ है कि वे ब्राह्मण कैसे हो गये?
युधिष्ठिर म्हणाला—उत्तानपादाचा पुत्र ध्रुव, जो उत्तर दिशेच्या आकाशात ब्रह्मर्षी (सप्तर्षी) यांच्या मध्ये तारारूपाने नित्य प्रकाशमान आहे, तो तर क्षत्रियच होता. कुरुनंदना! त्याची ही व इतरही अनेक अद्भुत कर्मे आठवून माझ्या हृदयात कुतूहल उत्पन्न झाले आहे—तो ब्राह्मण कसा झाला?
Verse 16
तस्यैतानि च कर्माणि तथान्यानि च कौरव । क्षत्रियस्येत्यतो जातमिदं कौतूहलं मम,जो विश्वामित्र उत्तानपादके पुत्र ध्रुव तथा ब्रह्मर्षियों (सप्तर्षियों)-के बीचमें उत्तर दिशाके आकाशका आश्रय ले तारारूपसे सदा प्रकाशित होते रहते हैं, वे क्षत्रिय ही रहे हैं। कुरुनन्दन! उनके ये तथा और भी बहुत-से अदभुत कर्म हैं, उन्हें याद करके मेरे हृदयमें यह जाननेका कौतूहल उत्पन्न हुआ है कि वे ब्राह्मण कैसे हो गये?
युधिष्ठिर म्हणाला—हे कौरवा! क्षत्रिय असताना त्याने केलेली ही व इतरही अनेक कर्मे आठवून माझ्या मनात मोठे कुतूहल निर्माण झाले आहे. विश्वामित्र आणि उत्तानपादाचा पुत्र ध्रुव—जे उत्तर दिशेच्या आकाशात ब्रह्मर्षी (सप्तर्षी) यांच्या मध्ये तारारूपाने नित्य प्रकाशमान आहेत—तेही निश्चयच क्षत्रिय होते. कुरुनंदना! त्यांच्या या व इतर अनेक अद्भुत कर्मांचे स्मरण करून माझे हृदय जाणून घ्यायला उत्सुक आहे—ते ब्राह्मण कसे झाले?
Verse 17
किमेतदिति तत्त्वेन प्रब्रूहि भरतर्षभ । देहान्तरमनासाद्य कथं स ब्राह्मणो&भवत्,भरतश्रेष्ठ) यह क्या बात है? इसे ठीक-ठीक बताइये। विश्वामित्रजी दूसरा शरीर धारण किये बिना ही कैसे ब्राह्मण हो गये?
युधिष्ठिर म्हणाला—भरतश्रेष्ठा! ही काय गोष्ट आहे? तिचे तत्त्व नीट सांगावे. दुसरे शरीर न धारण करता तो ब्राह्मण कसा झाला?
Verse 18
एतत् तत्त्वेन मे तात सर्वमाख्यातुमर्हसि । मतड़स्य यथातत्त्वं तथैवैतद् वदस्व मे,तात! यह सब आप यथार्थरूपसे बतानेकी कृपा करें। जैसे मतड़को तपस्या करनेसे भी ब्राह्मणत्व नहीं प्राप्त हुआ, वैसी ही बात विश्वामित्रके लिये क्यों नहीं हुई? यह मुझे बताइये
युधिष्ठिर म्हणाला—तात! हे सर्व तत्त्वतः मला सांगण्याची कृपा करा. जसा मतंगाला तपस्येनेही ब्राह्मणत्व मिळाले नाही, तशीच गोष्ट विश्वामित्राच्या बाबतीत का झाली नाही—हे मला यथार्थ सांगावे.
Verse 19
स्थाने मतड़ो ब्राह्म॒ण्यं नालभद् भरतर्षभ । चण्डालयोनौ जातो हि कथं ब्राह्मण्यमाप्तवान्,भरतश्रेष्ठ! मतड़को जो ब्राह्मणत्व नहीं प्राप्त हुआ, वह उचित ही था; क्योंकि उसका जन्म चाण्डालकी योनिमें हुआ था; परंतु विश्वामित्रने कैसे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया?
युधिष्ठिर म्हणाला—भरतश्रेष्ठा! मतंगाला ब्राह्मणत्व न मिळणे योग्यच होते; कारण त्याचा जन्म चांडाल-योनीत झाला होता. मग विश्वामित्राने ब्राह्मणत्व कसे प्राप्त केले?
Whether brāhmaṇya is an immutable status tied to birth or a realizable attainment through tapas, intention, and conduct—especially when a kṣatriya (Viśvāmitra) is portrayed as becoming a brāhmaṇa without bodily change.
The list functions as an evidentiary index: it aggregates diverse motifs (curse, praise, austerity, adoption, extraordinary ascent, river sanctification) to justify the question and delimit the explanatory scope Bhīṣma is asked to provide.
No explicit phalaśruti appears in this adhyāya; it operates as a problem-statement and narrative catalog, preparing for subsequent doctrinal clarification rather than concluding with promised merits.