Tīrtha-yātrā: Phalaśruti and Sacred Geography from Lohitya to Prayāga
Pulastya’s Instruction
स्ववंशमुद्धरेद् राजन् स्नात्वा वै वंशमूलके । कायशोधनमासाद्य तीर्थ भरतसत्तम,राजन! इस प्रकार वर देकर परशुरामजीके पितर प्रसन्नतापूर्वक उनसे अनुमति ले वहीं अन्तर्धान हो गये। इस प्रकार भृगुनन्दन महात्मा परशुरामके वे कुण्ड बड़े पुण्यमय माने गये हैं। राजन्! जो उत्तम व्रत एवं ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए परशुरामजीके उन कुण्डोंके जलमें स्नान करके उनकी पूजा करता है, उसे प्रचुर सुवर्णराशिकी प्राप्ति होती है। कुरुश्रेष्ठ! तदनन्तर तीर्थसेवी मनुष्य वंशमूलकतीर्थमें जाय। राजन्! वंशमूलकमें स्नान करके मनुष्य अपने कुलका उद्धार कर देता है। भरतश्रेष्ठ!] कायशोधनतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे शरीरकी शुद्धि होती है, इसमें संशय नहीं। शरीर शुद्ध होनेपर मनुष्य परम उत्तम कल्याणमय लोकोंमें जाता है
svavaṁśam uddhared rājan snātvā vai vaṁśamūlake | kāyaśodhanam āsādya tīrtha bharatasattama ||
രാജാവേ, ‘വംശമൂലക’യിൽ സ്നാനം ചെയ്താൽ മനുഷ്യൻ തന്റെ വംശത്തെ ഉയർത്തി രക്ഷിക്കുന്നു. ഭരതശ്രേഷ്ഠാ, തുടർന്ന് ‘കായശോധന’ എന്ന തീർത്ഥത്തിലെത്തണം.
घुलस्त्य उवाच