Tīrtha-yātrā: Phalaśruti and Sacred Geography from Lohitya to Prayāga
Pulastya’s Instruction
कोटितीर्थमुपस्पृश्य हयमेधफलं लभेत् । अश्रिनोस्तीर्थमासाद्य रूपवानभिजायते,महाराज! वहाँसे पृथिवीतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे सहस्र गोदानका फल प्राप्त होता है। राजन! वहाँसे तीर्थसेवी मनुष्य शालूकिनीमें जाकर दशाश्वमेधतीर्थमें स्नान करनेसे उसी फलका भागी होता है। सर्पदेवीमें जाकर उत्तम नागतीर्थका सेवन करनेसे मनुष्य अग्निष्टोमका फल पाता और नागलोकमें जाता है। धर्मज्ञ! वहाँसे तरन्तुक नामक द्वारपालके पास जाय। वहाँ एक रात निवास करनेसे सहसख्र गोदानका फल होता है। वहाँसे नियमपूर्वक नियमित भोजन करते हुए पंचनदतीर्थमें जाय और वहाँ कोटितीर्थमें स्नान करे। इससे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। अश्विनीतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य रूपवान् होता है
koṭitīrtham upaspṛśya hayamedhaphalaṁ labhet | aśvinostīrtham āsādya rūpavān abhijāyate, mahārāja |
കോടിതീർത്ഥത്തിൽ സ്നാനം ചെയ്താൽ അശ്വമേധയാഗഫലം ലഭിക്കും. അശ്വിനീ തീർത്ഥം പ്രാപിച്ച് സ്നാനം ചെയ്താൽ മനുഷ്യൻ രൂപവാനാകുന്നു.
घुलस्त्य उवाच