Tīrtha-yātrā: Phalaśruti and Sacred Geography from Lohitya to Prayāga
Pulastya’s Instruction
क्षत: किल करे राज॑स्तस्य शाकरसो5स्रवत् । स वै शाकरसं दृष्टवा हर्षाविष्ट:प्रनृत्तवान्,नरेश्वर! इसके बाद सप्तसारस्वत नामक तीर्थकी यात्रा करे, जहाँ लोकविख्यात महर्षि मंकणकको सिद्धि प्राप्त हुई थी। राजन! हमारे सुननेमें आया है कि पहले कभी महर्षि मंकणकके हाथमें कुशका अग्रभाग गड़ गया, जिससे उनके हाथमें घाव हो गया। महाराज! उस समय उस हाथसे शाकका रस चूने लगा। शाकका रस चूता देख महर्षि हर्षावेशसे मतवाले हो नृत्य करने लगे
kṣataḥ kila kare rājas tasya śākaraso 'sravat | sa vai śākarasaṃ dṛṣṭvā harṣāviṣṭaḥ pranaṛttavān, nareśvara |
ഹേ രാജാവേ, അവന്റെ കൈയിൽ മുറിവുണ്ടായി അതിൽ നിന്ന് ശാകരസം ഒഴുകിയതായി പറയുന്നു. ആ ശാകരസം ഒഴുകുന്നത് കണ്ടപ്പോൾ, ഹർഷാവേശം പിടിച്ച് അവൻ നൃത്തം തുടങ്ങി, ഹേ നരേശ്വരാ.
घुलस्त्य उवाच