गन्धमादन-हिमवत्प्रयाणे युधिष्ठिर-भीमसंवादः
Yudhiṣṭhira–Bhīma Dialogue on the Gandhamādana–Himavat Ascent
सूता: पौरोगवाश्रैव यं च मन्येत नो भवान् | न हाहं हातुमिच्छामि भवन्तमिह कहिचित्,फिर सहदेवके, मेरे तथा द्रौपदीके लिये तो कहना ही क्या है? भारत! ये ब्राह्मणलोग चाहें तो यहाँसे लौट सकते हैं। समस्त सेवक, सारथि, रसोइये तथा हममेंसे और जिस- जिसको आप लौटाना उचित समझें-वे सभी जा सकते हैं। राक्षसोंसे भरे हुए इस पर्वतपर तथा ऊँचे-नीचे दुर्गम प्रदेशोंमें मैं आपको कदापि अकेला छोड़ना नहीं चाहता। नरश्रेष्ठ! यह परम सौभाग्यवती पतिव्रता राजकुमारी कृष्णा भी आपको छोड़कर लौटनेको कभी तैयार न होंगी। इसी प्रकार यह सहदेव भी आपमें सदा अनुराग रखनेवाला है, आपको छोड़कर कभी नहीं लौटेगा। मैं इसके मनकी बात जानता हूँ। महाराज! सव्यसाची अर्जुनको देखनेकी इच्छासे हम सभी लालायित हो रहे हैं; अत: सब साथ ही चलेंगे। राजन! अनेक कन्दराओंसे युक्त इस पर्वतपर यदि रथोंके द्वारा यात्रा सम्भव न हो तो हम पैदल ही चलेंगे। आप इसके लिये उदास न हों। जहाँ-जहाँ द्रौपदी नहीं चल सकेगी वहाँ-वहाँ मैं स्वयं इसे कंधेपर चढ़ाकर ले जाऊँगा
sūtāḥ paurugavāś caiva yaṃ ca manyeta no bhavān | na cāhaṃ hātum icchāmi bhavantam iha karhi cit ||
സാരഥിമാരും പരിചാരകരും നിങ്ങൾ യോഗ്യമെന്ന് കരുതുന്ന മറ്റുള്ളവരും—നിങ്ങൾ തീരുമാനിച്ചാൽ മടങ്ങട്ടെ; എന്നാൽ ഞാൻ നിങ്ങളെ ഇവിടെ ഒരിക്കലും ഉപേക്ഷിക്കാൻ ആഗ്രഹിക്കുന്നില്ല.
भीम उवाच
Bhīma articulates a dharmic ethic of steadfast protection and loyalty: even if others withdraw, he will not abandon the one he is responsible to safeguard, especially in dangerous terrain.
In the forest setting of the Vana Parva, Bhīma addresses a respected leader (honorifically ‘bhavān’), saying that servants and charioteers may return if deemed appropriate, but he himself will not leave the addressee alone in perilous surroundings.