Adhyaya 69
Adi ParvaAdhyaya 6933 Verses

Adhyaya 69

Śakuntalā’s Satya-Discourse and the Recognition of Bharata (शकुन्तला–सत्योपदेशः; भरतप्रतिग्रहः)

Upa-parva: Śakuntalopākhyāna (Duḥṣanta–Śakuntalā Episode)

Chapter 69 presents Śakuntalā’s structured ethical critique of Duḥṣanta’s refusal to acknowledge their son. She opens with a perception-based rebuke—seeing others’ minor faults while ignoring one’s own—then develops illustrative analogies (mirror imagery; the swine and the swan separating impurity from essence) to distinguish the foolish from the discerning in moral speech. The discourse shifts to rājadharma and filial duty: abandoning one’s son undermines prosperity, reputation, and posthumous welfare, while truth is elevated above ritual magnitude (truth outweighing vast sacrificial merit). Śakuntalā warns that falsehood severs association and asserts her son’s capacity to rule even without Duḥṣanta. The narrative then introduces Vaiśaṃpāyana’s frame: a bodiless celestial voice validates Śakuntalā’s claim, instructs acceptance, and assigns the name Bharata (linked to “bearing/supporting”). Duḥṣanta explains his earlier hesitation as concern for public doubt, then formally embraces the child and honors Śakuntalā. The chapter concludes with Bharata’s consecration and a genealogical-ideological bridge: Bharata’s fame becomes an eponym for the Bhārata lineage and the epic’s civilizational identity.

Chapter Arc: Janamejaya, eager to know how the lion among men obtained Shakuntala, asks Vaishampayana for the full account—thus the tale turns from genealogy to a living scene of pursuit and fate. → Vaishampayana describes King Dushyanta setting out with a vast retinue—warriors in varied arms and attire, conches and kettledrums resounding—entering the forest for the royal hunt. The chase scatters herds, dries throats with dust and thirst, and turns the woodland into a tumult where beasts and men collide. → In the thick of the hunt, Dushyanta’s prowess blazes: he cuts down charging threats with sword and spear, whirls the mace with practiced mastery, and the forest itself seems overrun by elephants and storm-like volleys—until the king stands as the axis of the chaos, feared by beasts and admired by onlookers who liken him to Indra. → The chapter settles with the image of Dushyanta’s irresistible might and royal momentum established—his hunt has become the narrative engine that will carry him toward the encounter destined to change his lineage. → The king’s onward movement into the forest points toward the imminent meeting with Shakuntala, left just beyond the chapter’s threshold.

Shlokas

Verse 1

अपन बक। है २ >> $. दूरवर्ती शत्रुपर गदा फेंकना 'प्रक्षे' कहलाता है। २. समीपवर्ती शत्रुपर गदाकी कोटिसे प्रहार करना “विक्षेप” कहा गया है। ३. जब शत्रु बहुत हों तो सब ओर गदाको घुमाते हुए शत्रुओंपर उसका प्रहार करना “परिक्षेप” है। ४. गदाके अग्रभागसे मारना “अभिक्षेप” कहलाता है। एकोनसप्ततितमो<ध्याय: दुष्पन्तका शिकारके लिये वनमें जाना और विविध हिंसक वन-जन्तुओंका वध करना जनमेजय उवाच सम्भवं भरतस्याहं चरितं च महामते: । शकुन्तलाय श्रोत्पत्तिं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः,जनमेजय बोले--ब्रह्मन! मैं परम बुद्धिमान्‌ भरतकी उत्पत्ति और चरित्रको तथा शकुन्तलाकी उत्पत्तिके प्रसंगको भी यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ

ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—ഹേ മഹാമതേ! ഭരതന്റെ ജനനവും ചരിതവും, കൂടാതെ ശകുന്തളയുടെ ഉത്ഭവപ്രസംഗവും യഥാർത്ഥമായി കേൾക്കാൻ ഞാൻ ആഗ്രഹിക്കുന്നു।

Verse 2

दुष्यन्तेन च वीरेण यथा प्राप्ता शकुन्तला | त॑ वै पुरुषसिंहस्य भगवन्‌ विस्तरं त्वहम्‌

ഹേ ഭഗവൻ! പുരുഷസിംഹനായ ആ വീരൻ ദുഷ്യന്തൻ എങ്ങനെ ശകുന്തളയെ പ്രാപിച്ചുവോ, അത് വിശദമായി അരുളിച്ചെയ്യുക।

Verse 3

वैशम्पायन उवाच स कदाचिन्महाबाहु: प्रभूतनलवाहन:,वैशम्पायनजीने कहा--एक समयकी बात है, महाबाहु राजा दुष्यन्त बहुत-से सैनिक और सवारियोंको साथ लिये सैकड़ों हाथी-घोड़ोंसे घिरकर परम सुन्दर चतुरंगिणी सेनाके साथ एक गहन वनकी ओर चले

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—ഒരിക്കൽ മഹാബാഹുവും ശ്രീമാനുമായ രാജാവ് ദുഷ്യന്തൻ, ധാരാളം സൈന്യവും വാഹനങ്ങളും സഹിതം, നൂറുകണക്കിന് ആനകളും കുതിരകളും ചുറ്റിനിന്ന്, മനോഹരമായ ചതുരംഗസേനയോടെ ഒരു ഘനവനത്തിലേക്ക് പുറപ്പെട്ടു।

Verse 4

वनं जगाम गहनं हयनागशतैर्वृत: । बलेन चतुरज्जेण वृत: परमवल्गुना,वैशम्पायनजीने कहा--एक समयकी बात है, महाबाहु राजा दुष्यन्त बहुत-से सैनिक और सवारियोंको साथ लिये सैकड़ों हाथी-घोड़ोंसे घिरकर परम सुन्दर चतुरंगिणी सेनाके साथ एक गहन वनकी ओर चले

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—ഒരു കാലത്ത് മഹാബാഹുവായ രാജാവ് ദുഷ്യന്തൻ അതിസുന്ദരമായ ചതുരംഗസേനയോടുകൂടി, നൂറുകണക്കിന് കുതിരകളും ആനകളും ചുറ്റിനിന്ന്, ഘനമായ വനത്തിലേക്കു പുറപ്പെട്ടു।

Verse 5

खड्गशक्तिधरैवीरिर्गदामुसलपाणिभि: । प्रासतोमरहस्तैश्व ययौ योधशतैर्वृत:,जब राजाने यात्रा की, उस समय खड्ग, शक्ति, गदा, मुसल, प्रास और तोमर हाथमें लिये सैकड़ों योद्धा उन्हें घेरे हुए थे

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—രാജാവ് യാത്ര പുറപ്പെട്ടപ്പോൾ, ഖഡ്ഗവും ശക്തിയും ധരിച്ച വീരന്മാർ, ഗദയും മുസലവും കൈവശമുള്ളവർ, പ്രാസവും തോമരവും പിടിച്ചവർ—ഇങ്ങനെ നൂറുകണക്കിന് യോദ്ധാക്കൾ അദ്ദേഹത്തെ ചുറ്റി മുന്നേറി।

Verse 6

सिंहनादैश्व योधानां शड्खदुन्दुभिनि:स्वनै: । रथनेमिस्वनैश्वैव सनागवरबूंहितैः,महाराज दुष्यन्तके यात्रा करते समय योद्धाओंके सिंहनाद, शंख और नगाड़ोंकी आवाज, रथके पहियोंकी घरघराहट, बड़े-बड़े गजराजोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, नाना प्रकारके आयुध तथा भाँति-भाँतिके वेष धारण करनेवाले योद्धाओंद्वारा की हुई गर्जना और ताल ठोंकनेकी आवाजोंसे चारों ओर भारी कोलाहल मच गया था। महलके श्रेष्ठ शिखरपर बैठी हुई स्त्रियाँ उत्तम राजोचित शोभासे सम्पन्न शूरवीर दुष्यन्तको देख रही थीं। वे अपने यशको बढ़ानेवाले, इन्द्रके समान पराक्रमी और शत्रुओंका नाश करनेवाले थे। शत्रुरूपी मतवाले हाथीको रोकनेके लिये उनमें सिंहके समान शक्ति थी

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—ആ രാജാവ് പുറപ്പെട്ടപ്പോൾ യോദ്ധാക്കളുടെ സിംഹനാദം, ശംഖ-ദുന്ദുഭികളുടെ നിനാദം, രഥചക്രങ്ങളുടെ ഗർജ്ജനം, മഹാഗജങ്ങളുടെ തൂത്കാരം—എല്ലാം ചേർന്ന് എല്ലാടവും മഹാകോലാഹലം ഉയർന്നു।

Verse 7

नानायुधधरैश्वापि नानावेषधरैस्तथा । ह्षितस्वनमिश्रैश्न क्षेगेडितास्फोटितस्वनै:,महाराज दुष्यन्तके यात्रा करते समय योद्धाओंके सिंहनाद, शंख और नगाड़ोंकी आवाज, रथके पहियोंकी घरघराहट, बड़े-बड़े गजराजोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, नाना प्रकारके आयुध तथा भाँति-भाँतिके वेष धारण करनेवाले योद्धाओंद्वारा की हुई गर्जना और ताल ठोंकनेकी आवाजोंसे चारों ओर भारी कोलाहल मच गया था। महलके श्रेष्ठ शिखरपर बैठी हुई स्त्रियाँ उत्तम राजोचित शोभासे सम्पन्न शूरवीर दुष्यन्तको देख रही थीं। वे अपने यशको बढ़ानेवाले, इन्द्रके समान पराक्रमी और शत्रुओंका नाश करनेवाले थे। शत्रुरूपी मतवाले हाथीको रोकनेके लिये उनमें सिंहके समान शक्ति थी

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—നാനാവിധ ആയുധധാരികളും നാനാവേഷധാരികളും ഉയർത്തിയ ഹർഷമിശ്രിത ഘോഷങ്ങൾ, കളിയോടെയുള്ള വിളികൾ, കൈയടിയും ഭുജസ്ഫോടനശബ്ദങ്ങളും ചേർന്ന് എല്ലാടവും മഹാകോലാഹലം ഉണ്ടാക്കി।

Verse 8

आसीत्‌ किलकिलाशब्दस्तस्मिन्‌ गच्छति पार्थिवे । प्रासादवरशृज्गभस्था: परया नृपशो भया,महाराज दुष्यन्तके यात्रा करते समय योद्धाओंके सिंहनाद, शंख और नगाड़ोंकी आवाज, रथके पहियोंकी घरघराहट, बड़े-बड़े गजराजोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, नाना प्रकारके आयुध तथा भाँति-भाँतिके वेष धारण करनेवाले योद्धाओंद्वारा की हुई गर्जना और ताल ठोंकनेकी आवाजोंसे चारों ओर भारी कोलाहल मच गया था। महलके श्रेष्ठ शिखरपर बैठी हुई स्त्रियाँ उत्तम राजोचित शोभासे सम्पन्न शूरवीर दुष्यन्तको देख रही थीं। वे अपने यशको बढ़ानेवाले, इन्द्रके समान पराक्रमी और शत्रुओंका नाश करनेवाले थे। शत्रुरूपी मतवाले हाथीको रोकनेके लिये उनमें सिंहके समान शक्ति थी

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—ആ രാജാവ് മുന്നേറുമ്പോൾ ‘കിലകിലാ’ എന്ന ആർത്തധ്വനി ഉയർന്നു. ഉത്തമ പ്രാസാദങ്ങളുടെ ശിഖരങ്ങളിൽ നിന്ന സ്ത്രീകൾ രാജോചിതമായ ശോഭയിൽ പരമമായി വിസ്മിതരായി ആ രാജയാത്രയെ നോക്കി നിന്നു।

Verse 9

ददृशुस्तं स्त्रियस्तत्र शूरमात्मयशस्करम्‌ | शक्रोपमममित्रघ्नं परवारणवारणम्‌,महाराज दुष्यन्तके यात्रा करते समय योद्धाओंके सिंहनाद, शंख और नगाड़ोंकी आवाज, रथके पहियोंकी घरघराहट, बड़े-बड़े गजराजोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, नाना प्रकारके आयुध तथा भाँति-भाँतिके वेष धारण करनेवाले योद्धाओंद्वारा की हुई गर्जना और ताल ठोंकनेकी आवाजोंसे चारों ओर भारी कोलाहल मच गया था। महलके श्रेष्ठ शिखरपर बैठी हुई स्त्रियाँ उत्तम राजोचित शोभासे सम्पन्न शूरवीर दुष्यन्तको देख रही थीं। वे अपने यशको बढ़ानेवाले, इन्द्रके समान पराक्रमी और शत्रुओंका नाश करनेवाले थे। शत्रुरूपी मतवाले हाथीको रोकनेके लिये उनमें सिंहके समान शक्ति थी

അവിടെ സ്ത്രീകൾ ആ വീരനെ കണ്ടു—സ്വയശസ്സിനെ വർധിപ്പിക്കുന്നവൻ, ഇന്ദ്രസമാന പരാക്രമശാലി, ശത്രുഹന്താവ്, ശത്രുപക്ഷത്തിലെ മത്തഗജങ്ങളെ തടയുന്നവൻ; സിംഹബലത്തോടെ ഉന്മത്ത ഹസ്തികളെ നിയന്ത്രിക്കുന്ന നരാധിപനെപ്പോലെ।

Verse 10

पश्यन्तः स्त्रीगणास्तत्र वज्रपाणिं सम मेनिरे । अयं स पुरुषव्यात्रो रणे वसुपराक्रम:

അവിടെ നോക്കിനിൽക്കുമ്പോൾ സ്ത്രീകളുടെ സംഘം അദ്ദേഹത്തെ വജ്രപാണി (ഇന്ദ്രൻ) സമാനനെന്ന് കരുതി—“ഇവനാണ് ആ പുരുഷവ്യാഘ്രൻ; യുദ്ധത്തിൽ ഇവന്റെ പരാക്രമം വസുക്കളെപ്പോലെ ദുര്ധർഷം.”

Verse 11

इति वाचो ब्रुवन्त्यस्ता: स्त्रिय: प्रेमणा नराधिपम्‌,ऐसी बातें करती हुई वे स्त्रियाँ बड़े प्रेमसे महाराज दुष्यन्तकी स्तुति करतीं और उनके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा करती थीं। यत्र-तत्र खड़े हुए श्रेष्ठ ब्राह्मण सब ओर उनकी स्तुति- प्रशंसा करते थे

ഇങ്ങനെ വാക്കുകൾ ഉച്ചരിച്ചുകൊണ്ട് ആ സ്ത്രീകൾ സ്നേഹത്തോടെ നരാധിപനെ സ്തുതിച്ചു; അവന്റെ ശിരസ്സിന്മേൽ പുഷ്പവൃഷ്ടിയും ചൊരിഞ്ഞു।

Verse 12

तुष्ठवुः पुष्पवृष्टी क्ष ससृजुस्तस्य मूर्थनि । तत्र तत्र च विप्रेन्द्रै: स्‍्तूयमान: समन्‍्ततः,ऐसी बातें करती हुई वे स्त्रियाँ बड़े प्रेमसे महाराज दुष्यन्तकी स्तुति करतीं और उनके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा करती थीं। यत्र-तत्र खड़े हुए श्रेष्ठ ब्राह्मण सब ओर उनकी स्तुति- प्रशंसा करते थे

അവർ അവനെ സ്തുതിച്ചു; അവന്റെ ശിരസ്സിന്മേൽ പുഷ്പവൃഷ്ടി ചൊരിഞ്ഞു. കൂടാതെ പല സ്ഥലങ്ങളിലും നിന്നിരുന്ന വിപ്രേന്ദ്രന്മാർ ചുറ്റുമെങ്ങും നിന്നു അവനെ പുകഴ്ത്തിക്കൊണ്ടിരുന്നു।

Verse 13

निर्ययौ परमप्रीत्या वनं मृगजिघांसया । त॑ं देवराजप्रतिमं मत्तवारणधूर्गतम्‌,इस प्रकार महाराज वनमें हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ नगरसे बाहर निकले। वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे। मतवाले हाथीकी पीठपर बैठकर यात्रा करनेवाले उन महाराज दुष्यन्तके पीछे-पीछे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी वर्णोके लोग गये और सब आशीर्वाद एवं विजयसूचक वचनोंद्वारा उनके अभ्युदयकी कामना करते हुए उनकी ओर देखते रहे

പിന്നീട് അവൻ പരമാനന്ദത്തോടെ മൃഗയയ്ക്കായി വനത്തിലേക്ക് പുറപ്പെട്ടു—ദേവരാജ ഇന്ദ്രനെപ്പോലെ മഹിമയോടെ—മത്തഗജത്തിന്റെ മേൽ ആരൂഢനായി മുന്നേറി।

Verse 14

द्विजक्षत्रियविट्शूद्रा निर्यान्तमनुजग्मिरे । ददृशुर्वर्धभानास्ते आशीर्भिश्च॒ जयेन च,इस प्रकार महाराज वनमें हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ नगरसे बाहर निकले। वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे। मतवाले हाथीकी पीठपर बैठकर यात्रा करनेवाले उन महाराज दुष्यन्तके पीछे-पीछे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी वर्णोके लोग गये और सब आशीर्वाद एवं विजयसूचक वचनोंद्वारा उनके अभ्युदयकी कामना करते हुए उनकी ओर देखते रहे

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—രാജാവ് നഗരത്തിൽ നിന്നു പുറപ്പെട്ടപ്പോൾ ബ്രാഹ്മണർ, ക്ഷത്രിയർ, വൈശ്യർ, ശൂദ്രർ എന്നിങ്ങനെ നാലു വർണ്ണക്കാരും അവന്റെ പിന്നാലെ നടന്നു. അവർ മംഗളാശീർവാദങ്ങളും ‘ജയ’ഘോഷങ്ങളും ഉയർത്തി, അവന്റെ ക്ഷേമവും വിജയവും ആശംസിച്ച് അവനെ നോക്കി നിന്നു।

Verse 15

सुदूरमनुजग्मुस्तं पौरजानपदास्तथा । न्यवर्तन्त ततः पश्चादनुज्ञाता नृपेण ह,नगर और जनपदके लोग बहुत दूरतक उनके पीछे-पीछे गये। फिर महाराजकी आज्ञा होनेपर लौट आये

നഗരവാസികളും ജനപദവാസികളും അവനെ വളരെ ദൂരം വരെ പിന്തുടർന്നു. പിന്നീടു രാജാവിന്റെ അനുവാദം ലഭിച്ചതോടെ അവർ മടങ്ങിപ്പോയി।

Verse 16

सुपर्णप्रतिमेनाथ रथेन वसुधाधिप: । महीमापूरयामास घोषेण त्रिदिवं तथा,उनका रथ गरुडके समान वेगशाली था। उसके द्वारा यात्रा करनेवाले नरेशने घरघराहटकी आवाजसे पृथ्वी और आकाशको गुँँजा दिया। जाते-जाते बुद्धिमान्‌ दुष्यन्तने एक नन्दनवनके समान मनोहर वन देखा, जो बेल, आक, खैर, कैथ और धव (बाकली) आदि वृक्षोंसे भरपूर था

അപ്പോൾ വസുധാധിപൻ ഗരുഡസദൃശമായ വേഗമുള്ള രഥത്തിൽ കയറി മുന്നേറി. ആ രഥത്തിന്റെ ഗർജ്ജനത്തോടെ ഭൂമി മുഴങ്ങിപ്പോയി; ആ ശബ്ദം സ്വർഗ്ഗത്തേക്കും പ്രതിധ്വനിച്ചതുപോലെ തോന്നി।

Verse 17

स गच्छन्‌ ददृशे धीमान्‌ नन्दनप्रतिमं वनम्‌ । बिल्वार्कखदिराकीर्ण कपित्थधवसंकुलम्‌,उनका रथ गरुडके समान वेगशाली था। उसके द्वारा यात्रा करनेवाले नरेशने घरघराहटकी आवाजसे पृथ्वी और आकाशको गुँँजा दिया। जाते-जाते बुद्धिमान्‌ दुष्यन्तने एक नन्दनवनके समान मनोहर वन देखा, जो बेल, आक, खैर, कैथ और धव (बाकली) आदि वृक्षोंसे भरपूर था

അങ്ങനെ പോകുമ്പോൾ ധീമാനായ രാജാവ് നന്ദനവനത്തിനെപ്പോലെ മനോഹരമായ ഒരു വനത്തെ കണ്ടു. അത് ബിൽവ, അർക്ക, ഖദിര വൃക്ഷങ്ങളാൽ നിറഞ്ഞതും കപിത്തവും ധവവും കൊണ്ട് സാന്ദ്രമായതുമായിരുന്നു।

Verse 18

विषमं पर्वतस्रस्तैरश्मभिश्व समावृतम्‌ । निर्जलं निर्मनुष्यं च बहुयोजनमायतम्‌,पर्वतकी चोटीसे गिरे हुए बहुत-से शिला-खण्ड वहाँ इधर-उधर पड़े थे। ऊँची-नीची भूमिके कारण वह वन बड़ा दुर्गग जान पड़ता था। अनेक योजनतक फैले हुए उस वनमें कहीं जल या मनुष्यका पता नहीं चलता था

ആ പ്രദേശം കഠിനവും അസമവുമായിരുന്നു; പർവ്വതങ്ങളിൽ നിന്നു വീണ പാറക്കഷണങ്ങൾ എല്ലാടവും പരന്നുകിടന്നു. അവിടെ ജലം ഇല്ല, മനുഷ്യരുടെ അടയാളവും ഇല്ല; ആ വനാന്തരം പല യോജന വരെ വ്യാപിച്ചിരുന്നു।

Verse 19

मृगसिंहैर्व॒तं घोरैरन्यैश्वापि वनेचरै: । तद्‌ वन॑ मनुजव्याघ्र: सभृत्ययलवाहन:,वह सब ओर मृग और सिंह आदि भयंकर जन्तुओं तथा अन्य वनवासी जीवोंसे भरा हुआ था। नरश्रेष्ठ राजा दुष्यन्तने सेवक, सैनिक और सवारियोंके साथ नाना प्रकारके हिंसक पशुओंका शिकार करते हुए उस वनको रौंद डाला। वहाँ बाणोंके लक्ष्यमें आये हुए बहुत-से व्याप्रोंको महाराज दुष्यन्तने मार गिराया और कितनोंको सायकोंसे बींध डाला। शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ नरेशने कितने ही दूरवर्ती हिंसक पशुओंको बाणोंद्वारा घायल किया। जो निकट आ गये, उन्हें तलवारसे काट डाला और कितने ही एण जातिके पशुओंको शक्ति नामक शस्त्रद्वारा मौतके घाट उतार दिया

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—ആ വനമൊട്ടാകെ മാൻ, സിംഹം മുതലായ ഭയങ്കര മൃഗങ്ങളാലും മറ്റു വനചരങ്ങളാലും നിറഞ്ഞിരുന്നു. അപ്പോൾ മനുഷ്യരിൽ വ്യാഘ്രനായ രാജാവ് ദുഷ്യന്തൻ സേവകരും സൈന്യവും വാഹനങ്ങളുമായി അതിൽ പ്രവേശിച്ചു; ക്രൂരമൃഗങ്ങളെ വേട്ടയാടി വനത്തിലൂടെ മുന്നേറി. അവിടെ അമ്പുകളുടെ പരിധിയിൽ വന്ന അനേകം വ്യാഘ്രങ്ങളെ അദ്ദേഹം വീഴ്ത്തി.

Verse 20

लोडयामास दुष्यन्त: सूदयन्‌ विविधान्‌ मृगान्‌ । बाणगोचरसपम्प्राप्तांस्तत्र व्याप्रगणान्‌ बहूनू,वह सब ओर मृग और सिंह आदि भयंकर जन्तुओं तथा अन्य वनवासी जीवोंसे भरा हुआ था। नरश्रेष्ठ राजा दुष्यन्तने सेवक, सैनिक और सवारियोंके साथ नाना प्रकारके हिंसक पशुओंका शिकार करते हुए उस वनको रौंद डाला। वहाँ बाणोंके लक्ष्यमें आये हुए बहुत-से व्याप्रोंको महाराज दुष्यन्तने मार गिराया और कितनोंको सायकोंसे बींध डाला। शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ नरेशने कितने ही दूरवर्ती हिंसक पशुओंको बाणोंद्वारा घायल किया। जो निकट आ गये, उन्हें तलवारसे काट डाला और कितने ही एण जातिके पशुओंको शक्ति नामक शस्त्रद्वारा मौतके घाट उतार दिया

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—രാജാവ് ദുഷ്യന്തൻ പലവിധ മൃഗങ്ങളെ കൊന്നുകൊണ്ട് വനത്തിൽ ചുറ്റിനടന്നു. അവിടെ അമ്പുകളുടെ പരിധിയിൽ വന്ന അനേകം വ്യാഘ്രസംഘങ്ങളെ അദ്ദേഹം വീഴ്ത്തി.

Verse 21

पातयामास दुष्यन्तो निर्बिभेद च सायकै: । दूरस्थान्‌ सायकै: कांश्चिदभिनत्‌ स नराधिप:,वह सब ओर मृग और सिंह आदि भयंकर जन्तुओं तथा अन्य वनवासी जीवोंसे भरा हुआ था। नरश्रेष्ठ राजा दुष्यन्तने सेवक, सैनिक और सवारियोंके साथ नाना प्रकारके हिंसक पशुओंका शिकार करते हुए उस वनको रौंद डाला। वहाँ बाणोंके लक्ष्यमें आये हुए बहुत-से व्याप्रोंको महाराज दुष्यन्तने मार गिराया और कितनोंको सायकोंसे बींध डाला। शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ नरेशने कितने ही दूरवर्ती हिंसक पशुओंको बाणोंद्वारा घायल किया। जो निकट आ गये, उन्हें तलवारसे काट डाला और कितने ही एण जातिके पशुओंको शक्ति नामक शस्त्रद्वारा मौतके घाट उतार दिया

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—ദുഷ്യന്തൻ പലരെയും വീഴ്ത്തി അമ്പുകളാൽ കുത്തിത്തുറന്നു. ദൂരെയിരുന്നവരെയും ആ നരാധിപൻ തന്റെ ശരംകൊണ്ട് പരിക്കേൽപ്പിച്ചു.

Verse 22

अभ्याशमागतांश्वान्यान्‌ खड्गेन निरकृन्तत । कांश्चिदेणान्‌ समाजघ्ने शक्‍्त्या शक्तिमतां वर:,वह सब ओर मृग और सिंह आदि भयंकर जन्तुओं तथा अन्य वनवासी जीवोंसे भरा हुआ था। नरश्रेष्ठ राजा दुष्यन्तने सेवक, सैनिक और सवारियोंके साथ नाना प्रकारके हिंसक पशुओंका शिकार करते हुए उस वनको रौंद डाला। वहाँ बाणोंके लक्ष्यमें आये हुए बहुत-से व्याप्रोंको महाराज दुष्यन्तने मार गिराया और कितनोंको सायकोंसे बींध डाला। शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ नरेशने कितने ही दूरवर्ती हिंसक पशुओंको बाणोंद्वारा घायल किया। जो निकट आ गये, उन्हें तलवारसे काट डाला और कितने ही एण जातिके पशुओंको शक्ति नामक शस्त्रद्वारा मौतके घाट उतार दिया

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—അടുത്തെത്തിയ നായകളെയും മറ്റു മൃഗങ്ങളെയും അദ്ദേഹം ഖഡ്ഗംകൊണ്ട് വെട്ടിമാറ്റി. ശക്തിമാന്മാരിൽ ശ്രേഷ്ഠനായ രാജാവ് ചില ഏണ (മാൻ)കളെ ശക്തി (കുന്തം)കൊണ്ട് വീഴ്ത്തി.

Verse 23

श्रोतुमिच्छामि तत्त्वज्ञ सर्व मतिमतां वर । भगवन! वीरवर दुष्यन्तने शकुन्तलाको कैसे प्राप्त किया? मैं पुरुषसिंह दुष्यन्तके उस चरित्रको विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। तत्त्वज्ञ मुने! आप बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं। अतः ये सब बातें बताइये,गदामण्डलतत्त्वज्ञक्ष॒चारामितविक्रम: । तोमरैरसिभिश्वापि गदामुसलकम्पनै: असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अदभुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े

ജനമേജയൻ പറഞ്ഞു—ഹേ തത്ത്വജ്ഞാ, ബുദ്ധിമാന്മാരിൽ ശ്രേഷ്ഠാ! എല്ലാം കേൾക്കാൻ ഞാൻ ആഗ്രഹിക്കുന്നു. ഭഗവൻ, വീരശ്രേഷ്ഠനായ ദുഷ്യന്തൻ ശകുന്തലയെ എങ്ങനെ പ്രാപിച്ചു? മനുഷ്യസിംഹനായ ദുഷ്യന്തന്റെ ചരിതം ഞാൻ വിശദമായി കേൾക്കാൻ ആഗ്രഹിക്കുന്നു; അതിനാൽ ഇതെല്ലാം പറയുക. (തുടർന്ന്) അതിരില്ലാത്ത പരാക്രമമുള്ള രാജാവ് ഗദ ചുഴറ്റുന്ന കലയിൽ നിപുണനായിരുന്നു. തോമരം, ഖഡ്ഗം, ഗദ, മുസലം എന്നിവയുടെ പ്രഹാരങ്ങളാൽ സ്വേച്ഛയായി സഞ്ചരിച്ചിരുന്ന കാട്ടാനകളെ വധിച്ചുകൊണ്ട് അദ്ദേഹം ആ വനത്തിൽ വിഹരിച്ചു. അത്ഭുതവീര്യമുള്ള നരേശനും യുദ്ധപ്രിയ സൈന്യവും ആ വിശാല വനത്തിന്റെ ഓരോ കോണും തിരഞ്ഞു. സിംഹങ്ങളും വ്യാഘ്രങ്ങളും വനത്തെ വിട്ട് ഓടി. നേതാക്കൾ കൊല്ലപ്പെട്ട കൂട്ടങ്ങൾ കലങ്ങിപ്പോയി പാഞ്ഞു; ചില കൂട്ടങ്ങൾ ആർ‍ത്തനാദം ചെയ്തു. ദാഹംകൊണ്ട് പീഡിതരായി അവർ വരണ്ട നദിത്തട്ടുകളിലേക്കു ചെന്നു; വെള്ളം കിട്ടാതെ നിരാശപ്പെട്ടു. ഉന്മത്തമായ ഓട്ടത്തിന്റെ ക്ഷീണത്തിൽ അവർ മൂർച്ച്ഛിച്ച് നിലത്ത് വീണു. വിശപ്പ്, ദാഹം, ക്ഷീണം എന്നിവകൊണ്ട് തകർന്ന അനേകം മൃഗങ്ങൾ ഭൂമിയിൽ ചിതറിക്കിടന്നു.

Verse 24

चचार स विनिष्नन्‌ वै स्वैरचारान्‌ वनद्विपान्‌ । राज्ञा चाद्भुतवीर्येण योधेश्व समरप्रियै:,असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अदभुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—അവൻ അവിടെ സ്വൈരമായി സഞ്ചരിച്ചിരുന്ന വനഗജങ്ങളെ അടിച്ചു വീഴ്ത്തിക്കൊണ്ട് എല്ലാടവും ചുറ്റി നടന്നു. അത്ഭുതവീര്യമുള്ള ആ രാജാവ് യുദ്ധപ്രിയ യോദ്ധാക്കളോടുകൂടെ ആ മഹാവനത്തെ നാലുദിക്കിലും അരിച്ചുപെറുക്കി തിരഞ്ഞു; രാജശക്തിയുടെ ആ അതിരുകടന്ന പ്രയോഗം വനത്തെ ജീവികൾക്കു ഭയഭൂമിയാക്കി.

Verse 25

लोड्यमानं महारण्यं तत्यजु: सम मृगाधिपा: । तत्र विद्रुतयूथानि हतयूथपतीनि च,असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अदभुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—ആ മഹാവനം ഇങ്ങനെ ചവിട്ടിമെതിച്ച് വേട്ടയാടിക്കൊണ്ടിരിക്കുമ്പോൾ മൃഗാധിപന്മാർ—സിംഹങ്ങളും കടുവകളും—അത് ഉപേക്ഷിച്ച് ഓടി. അവിടെ പല കൂട്ടങ്ങളും തങ്ങളുടെ കൂട്ടനേതാക്കൾ കൊല്ലപ്പെട്ടതിനാൽ ഭീതിയിൽ പാഞ്ഞു; ചില ചിതറിയ കൂട്ടങ്ങൾ വ്യാകുലമായി കരുണാർത്തനാദം മുഴക്കി രക്ഷപ്പെട്ടു.

Verse 26

मृगयूथान्यथौत्सुक्याच्छब्दं चक्रुस्ततस्तत: । शुष्काश्चापि नदीर्गत्वा जलनैराश्यकर्शिता:,असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अदभुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—അപ്പോൾ മൃഗക്കൂട്ടങ്ങൾ വ്യാകുലമായി ഇടം ഇടമായി വീണ്ടും വീണ്ടും നിലവിളിച്ചു. ചിലർ ജലത്തിനുള്ള നിരാശയിൽ വറ്റിയ നദിത്തട്ടുകളിലേക്കും ചെന്നു; എന്നാൽ അവിടെയും വെള്ളം കിട്ടാതിരുന്നതിനാൽ അവർ നിരാശയിൽ കൂടുതൽ ക്ഷീണിച്ചു.

Verse 27

व्यायामक्लान्तह्ृदया: पतन्ति सम विचेतस: । क्षुत्पिपासापरीताश्र श्रान्ताश्न॒ पतिता भुवि,असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अदभुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—അതിരില്ലാത്ത ഓട്ടപ്പാച്ചിലിന്റെ ക്ഷീണത്തിൽ ഹൃദയം തളർന്ന് ബോധം അസ്ഥിരമായ ജീവികൾ വീണുകിടന്നു. വിശപ്പും ദാഹവും ചുറ്റിപ്പിടിച്ച്, അത്യന്തം ക്ഷീണിച്ച് അവർ ഭൂമിയിൽ പതിച്ചു.

Verse 28

केचित्‌ तत्र नरव्याप्रैरभक्ष्यन्त बुभुक्षितै: । केचिदग्निमथोत्पाद्य संसाध्य च वनेचरा:,वहाँ कितने ही व्याप्र-स्वभावके नृशंस जंगली मनुष्य भूखे होनेके कारण कुछ मृगोंको कच्चे ही चबा गये। कितने ही वनमें विचरनेवाले व्याध वहाँ आग जलाकर मांस पकानेकी अपनी रीतिके अनुसार मांसको कूट-कूटकर राँधने और खाने लगे। उस वनमें कितने ही बलवान्‌ और मतवाले हाथी अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे क्षत-विक्षत होकर सूँड़को समेटे हुए भयके मारे वेगपूर्वक भाग रहे थे। उस समय उनके घावोंसे बहुत-सा रक्त बह रहा था और वे मल-मूत्र करते जाते थे

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—അവിടെ ചിലർ വിശപ്പാൽ പ്രേരിതരായി വ്യാഘ്രസ്വഭാവം കൈക്കൊണ്ട്, അഭക്ഷ്യവും ഭക്ഷിക്കാൻ തുടങ്ങി. മറ്റുചില വനവാസികൾ അഗ്നി കൊളുത്തി, തങ്ങളുടെ പതിവുപോലെ ആഹാരം ഒരുക്കി, പാചകം ചെയ്ത് ഭക്ഷിച്ചു.

Verse 29

भक्षयन्ति सम मांसानि प्रकुट्य विधिवत्‌ तदा । तत्र केचिद्‌ गजा मत्ता बलिन: शस्त्रविक्षता:,वहाँ कितने ही व्याप्र-स्वभावके नृशंस जंगली मनुष्य भूखे होनेके कारण कुछ मृगोंको कच्चे ही चबा गये। कितने ही वनमें विचरनेवाले व्याध वहाँ आग जलाकर मांस पकानेकी अपनी रीतिके अनुसार मांसको कूट-कूटकर राँधने और खाने लगे। उस वनमें कितने ही बलवान्‌ और मतवाले हाथी अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे क्षत-विक्षत होकर सूँड़को समेटे हुए भयके मारे वेगपूर्वक भाग रहे थे। उस समय उनके घावोंसे बहुत-सा रक्त बह रहा था और वे मल-मूत्र करते जाते थे

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—അപ്പോൾ ആ വനാന്തരത്തിൽ ചിലർ തങ്ങളുടെ കഠിനമായ രീതിപ്രകാരം മാംസം ഒരുക്കി ഭക്ഷിച്ചു. അവിടെ ചില ബലവാന്മാരായ, മദോന്മത്ത ഗജങ്ങൾ ആയുധാഘാതങ്ങളാൽ ക്ഷതവിക്ഷതരായി, തുമ്പി ചുരുക്കി ഭയത്തോടെ വേഗത്തിൽ ഓടിപ്പോയി.

Verse 30

संकोच्याग्रकरान्‌ भीता: प्रद्रवन्ति सम वेगिता: । शकृन्मूत्रं सृजन्तश्च क्षरन्तः शोणितं बहु,वहाँ कितने ही व्याप्र-स्वभावके नृशंस जंगली मनुष्य भूखे होनेके कारण कुछ मृगोंको कच्चे ही चबा गये। कितने ही वनमें विचरनेवाले व्याध वहाँ आग जलाकर मांस पकानेकी अपनी रीतिके अनुसार मांसको कूट-कूटकर राँधने और खाने लगे। उस वनमें कितने ही बलवान्‌ और मतवाले हाथी अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे क्षत-विक्षत होकर सूँड़को समेटे हुए भयके मारे वेगपूर्वक भाग रहे थे। उस समय उनके घावोंसे बहुत-सा रक्त बह रहा था और वे मल-मूत्र करते जाते थे

അവർ ഭയത്തോടെ മുൻഭാഗം (തുമ്പി) ചുരുക്കി ഒരേ വേഗത്തിൽ ഓടിപ്പോയി. ഓടിക്കൊണ്ടിരിക്കെ മലമൂത്രം വിസർജ്ജിക്കുകയും മുറിവുകളിൽ നിന്ന് ധാരാളം രക്തം ഒഴുകുകയും ചെയ്തു.

Verse 31

वन्या गजवरास्तत्र ममृदुर्मनुजान्‌ बहून्‌ । तद्‌ वनं बलमेघेन शरधारेण संवृतम्‌ | व्यरोचत मृगाकीर्ण राज्ञा हतमृगाधिपम्‌,बड़े-बड़े जंगली हाथियोंने भी वहाँ भागते समय बहुत-से मनुष्योंको कुचल डाला। वहाँ बाणरूपी जलकी धारा बरसानेवाले सैन्यरूपी बादलोंने उस वनरूपी व्योमको सब ओरसे घेर लिया था। महाराज दुष्यन्तने जहाँके सिंहोंको मार डाला था, वह हिंसक पशुओंसे भरा हुआ वन बड़ी शोभा पा रहा था

അവിടെ മഹാബലമുള്ള കാട്ടുഗജങ്ങൾ ഓടിപ്പോകുമ്പോൾ പല മനുഷ്യരെയും ചവിട്ടിമെതിച്ചു. ആ വനമാകട്ടെ ആകാശംപോലെ—ചുറ്റുമെല്ലാം സേനാരൂപ മേഘങ്ങൾ അമ്പുവർഷധാരകൾ ചൊരിഞ്ഞുകൊണ്ട് അതിനെ മൂടി. മൃഗങ്ങൾ നിറഞ്ഞ ആ വനം കൂടുതൽ ദീപ്തമായി; കാരണം രാജാവ് അതിലെ മൃഗാധിപനെ (സിംഹത്തെ) വധിച്ചിരുന്നു.

Verse 69

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने एकोनसप्ततितमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

ഇങ്ങനെ ശ്രീമഹാഭാരതത്തിലെ ആദിപർവാന്തർഗതമായ സംഭവപർവത്തിൽ ശകുന്തലോപാഖ്യാനവിഷയക അറുപത്തൊമ്പതാം അധ്യായം സമാപ്തമായി.

Verse 103

यस्य बाहुबलं प्राप्प न भवन्त्यसुहृदूगणा: । वहाँ देखती हुई स्त्रियोंने उन्हें वज्रपाणि इन्द्रके समान समझा और आपसमें वे इस प्रकार बातें करने लगीं--“सखियो! देखो तो सही, ये ही वे पुरुषसिंह महाराज दुष्यन्त हैं, जो संग्रामभूमिमें वसुओंके समान पराक्रम दिखाते हैं, जिनके बाहुबलमें पड़कर शत्रुओंका अस्तित्व मिट जाता है”

വൈശമ്പായനൻ പറഞ്ഞു—അവനെ അവിടെ കണ്ട സ്ത്രീകൾ അവനെ വജ്രപാണിയായ ഇന്ദ്രനോട് ഉപമിച്ചു; പിന്നെ പരസ്പരം ഇങ്ങനെ പറഞ്ഞു—“സഖിമാരേ, നോക്കൂ! ഇവനാണ് ആ നരസിംഹൻ രാജാ ദുഷ്യന്തൻ; യുദ്ധഭൂമിയിൽ വസുക്കളെപ്പോലെ പരാക്രമം പ്രകടിപ്പിക്കുന്നവൻ. അവന്റെ ബാഹുബലത്തിന്റെ പരിധിയിൽ വീണാൽ ശത്രുക്കൾക്ക് നിലനിൽപ്പില്ല.”

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns whether a ruler may deny a privately established relationship and child due to public doubt; the text evaluates this as a conflict between reputation-management and the non-negotiable duty of satya and पुत्रधर्म.

Truth is treated as the highest dharma and a stabilizing public good: discernment in speech, self-scrutiny, and fidelity to one’s obligations are presented as superior to mere external prestige or ritual magnitude.

A formal phalaśruti is not stated; instead, the chapter offers meta-validation through narrative authority (celestial testimony) and genealogical consequence: Bharata’s recognition becomes the legitimizing hinge for the Bhārata lineage and the epic’s historical self-identification.