धृतराष्ट्र–दुर्योधन संवादः
Vāraṇāvata-vivāsana-nīti: Dhṛtarāṣṭra and Duryodhana’s Policy Dialogue
शारद्वतीं ततो भार्या कृपी द्रोणो5न्वविन्दत । अन्निहोत्रे च धर्मे च दमे च सततं रताम्,वे वेदों और वेदांगोंके विद्वान् तो थे ही, तपस्याद्वारा अपनी सम्पूर्ण पापराशिको दग्ध कर चुके थे। उनका महान् यश सब ओर फैल चुका था। एक समय पितरोंने उनके मनमें पुत्र उत्पन्न करनेकी प्रेरणा दी; अतः द्रोणाचार्यने पुत्रके लोभसे शरद्वानकी पुत्री कृपीको धर्मपत्नीके रूपमें ग्रहण किया। कृपी सदा अन्निहोत्र, धर्मानुष्ठान तथा इन्द्रियसंयममें उनका साथ देती थी
śāradvatīṁ tato bhāryā kṛpī droṇo ’nvavindata | agnihotre ca dharme ca dame ca satataṁ ratām ||
അതിനുശേഷം ദ്രോണൻ ശാരദ്വതന്റെ പുത്രി കൃപിയെ ഭാര്യയായി സ്വീകരിച്ചു. അവൾ എപ്പോഴും അഗ്നിഹോത്രത്തിൽ, ധർമ്മാചരണത്തിൽ, ഇന്ദ്രിയസംയമത്തിൽ നിരന്തരം രതയായിരുന്നു.
वैशम्पायन उवाच