Dhaumya’s Counsel on Incognito Conduct in a Royal Household (राजवसतौ आचरण-निति)
शूरोअस्मीति न दृप्तः स्याद् बुद्धिमानिति वा पुनः । प्रियमेवाचरन् राज्ञ: प्रियो भवति भोगवान्,“मैं शूरवीर हूँ अथवा बड़ा बुद्धिमान् हूँ", ऐसा घमंड न करे। जो सदा राजाको प्रिय लगनेवाले कार्य ही करता है, वही उसका प्रेमपात्र तथा ऐश्वर्यभोगसे सम्पन्न होता है
ຢ່າໄດ້ຫຍິ່ງຍະໂສວ່າ «ຂ້ອຍເປັນວິລະຊົນ» ຫຼື «ຂ້ອຍເປັນຄົນສະຫຼາດ». ຜູ້ໃດປະພຶດແຕ່ການງານທີ່ເຮັດໃຫ້ກະສັດພໍໃຈຢູ່ເສມອ ຜູ້ນັ້ນແຫຼະຈຶ່ງເປັນຜູ້ທີ່ກະສັດຮັກ ແລະໄດ້ເສວຍສຸກໃນອໍານາດວາສນາ.
धौग्य उवाच