Droṇa-parva Adhyāya 95 — Sātyaki’s Breakthrough and the Routing of Allied Contingents
सान्तरायुधिनश्रैव द्विपास्तीक्ष्णविषोपमा: । बहुत-से हाथी चिग्घाड़ रहे थे, बहुतेरे धराशायी हो गये थे, दूसरे कितने ही हाथी सम्पूर्ण दिशाओंमें चक्कर काट रहे थे और बहुत-से गज अत्यन्त भयभीत हो भागते हुए अपने ही पक्षके योद्धाओंको कुचल रहे थे। तीक्ष्ण विषवाले सर्पोके समान भयंकर वे सभी हाथी गुप्तास्त्रधारी सैनिकोंसे युक्त थे || ४० ई ।। विदन्त्यसुरमायां ये सुघोरा घोरचक्षुष:,जो आसुरी मायाको जानते हैं, जिनकी आकृति अत्यन्त भयंकर है तथा जो भयानक नेत्रोंसे युक्त हैं एवं जो कौओंके समान काले, दुराचारी, स्त्रीलम्पट और कलहप्रिय होते हैं वे यवन, पारद, शक और बाह्नलीक भी वहाँ युद्धके लिये उपस्थित हुए
sāntarāyudhināś caiva dvipās tīkṣṇaviṣopamāḥ |
ສັນຊະຍະ ກ່າວວ່າ: ຍັງມີຊ້າງທີ່ຕິດອາວຸດ ແລະມີຄົນຂີ່ສວມເກາະ, ນ່າຢ້ານດັ່ງງູພິດຄົມ. ໃນສຽງອື້ອຶງຂອງສົງຄາມ, ຊ້າງຫຼາຍໂຮງຮ້ອງ; ຫຼາຍຕົວລົ້ມລົງກັບດິນ; ບາງຕົວຫມຸນວຽນໄປທົ່ວທິດ; ແລະຫຼາຍຕົວຖືກຄວາມຕົກໃຈຄອບງຳ ໜີກະເຈີດ ພ້ອມທັງຢຽບຢ່ຳພວກຂ້າງຕົນເອງ. ດັ່ງນັ້ນ ຄວາມວຸ້ນວາຍແລະຄວາມຢ້ານກົວໃນສົງຄາມ ໄດ້ປ່ຽນພະລັງໃຫ້ເປັນການທຳລາຍຢ່າງບໍ່ເລືອກໜ້າ.
संजय उवाच
The verse underscores how fear and confusion in war can make even powerful forces (like war-elephants) turn indiscriminately destructive, harming allies as well as enemies—an ethical warning about the uncontrollable fallout of violence.
Sañjaya describes the battlefield where armed elephants, terrifying like venomous serpents, trumpet, fall, whirl about, and in panic flee—sometimes trampling their own troops—intensifying the disorder of the fight.