द्रोणपर्व — अध्याय ८७: सात्यकेरनुयात्रा
Sātyaki’s resolve and departure to reach Arjuna
उपास्यमानो बहुभि: कुरुपाण्डवसात्वतै: । सूत तस्य गृहे शब्दो नाद्य द्रौणे्यथा पुरा,सूत संजय! मेरे पुत्रोंके परम आश्रय जिस महाथनुर्थर द्रोणपुत्र अश्वत्थामाकी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सभी जातियोंके शिष्य उपासना (निकट रहकर सेवा) करते रहे हैं, जो वितण्डावाद, भाषण, पारस्परिक बातचीत, द्रुतस्वरमें बजाये हुए वाद्योंके शब्दों तथा भाँति- भाँतिके अभीष्ट गीतोंसे दिन-रात मन बहलाया करता था, जिसके पास बहुत-से कौरव, पाण्डव और सात्वतवंशी वीर बैठा करते थे, उस अश्वत्थामाके घरमें आज पहलेके समान हर्षसूचक शब्द नहीं हो रहा है
dhṛtarāṣṭra uvāca | upāsyamāno bahubhiḥ kuru-pāṇḍava-sātvataiḥ | sūta tasya gṛhe śabdo nādya drauṇey yathā purā | sūta sañjaya |
ທຣິຕຣາສະຕຣະ ກ່າວວ່າ: «ໂອ ສູຕະ ສັນຈະຍະ! ອັສວັດຖາມາ ບຸດຂອງ ດໂຣນະ ຜູ້ຖືກຫຼາຍຄົນບໍລິການ—ທັງພວກ ກຸຣຸ, ປານດະວະ, ແລະ ສາດວະຕະ—ເຮືອນຂອງເຂົາທີ່ເຄີຍກ້ອງກັບດ້ວຍສຽງຄຶກຄື້ນ ບັດນີ້ບໍ່ມີສຽງຍິນດີເຊັ່ນເກົ່າອີກແລ້ວ»។
धृतराष्ट उवाच