Śārṅgaka-stuti to Agni during the Khāṇḍava Conflagration (शार्ङ्गक-स्तुतिः / अग्नि-स्तुतिः)
शरैश्व मे<र्थों बहुभिरक्षयै: क्षिप्रमस्यत: । न हि वोढुं रथ: शक्त: शरान् मम यथेप्सितान्,इसके सिवा शीघ्रतापूर्वक बाण चलाते रहनेके लिये मुझे इतने अधिक बाणोंकी आवश्यकता होगी, जो कभी समाप्त न हों तथा मेरी इच्छाके अनुरूप बाणोंको ढोनेके लिये शक्तिशाली रथ भी मेरे पास नहीं है
«ຍິ່ງໄປກວ່ານັ້ນ ເພື່ອຍິງລູກສອນຢ່າງວ່ອງໄວບໍ່ຂາດສາຍ ຂ້າພະເຈົ້າຈໍາເປັນຕ້ອງມີລູກສອນຈໍານວນຫຼາຍທີ່ບໍ່ຮອດສິ້ນ. ແລະຂ້າພະເຈົ້າກໍບໍ່ມີລົດຮົບທີ່ແຂງແຮງພໍ ເພື່ອຂົນລູກສອນຕາມທີ່ຂ້າພະເຈົ້າປາດຖະໜາ»។
अजुन उवाच