Jatāyu’s Resistance, Sītā’s Traces, Kabandha’s Release, and the Path to Sugrīva (Āraṇyaka-parva 263)
विकृतिं नैति न क्रोधं तदा तुष्टो5भवन्मुनि: । आह चैन दुराधर्षो वरदो5स्मीति भारत,भारत! ऐसा उन्होंने कई बार किया, तो भी जब राजा दुर्योधनके मनमें विकार या क्रोध नहीं उत्पन्न हुआ, तब वे दुर्धर्ष मुनि उसपर बहुत प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले---मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ!
ಅವನ ಮನಸ್ಸಿಗೆ ವಿಕಾರವೂ ಇಲ್ಲ, ಕ್ರೋಧವೂ ಇಲ್ಲ; ಆಗ ಮುನಿ ತೃಪ್ತನಾದನು. ಹೇ ಭಾರತನೇ! ಆ ದುರಾಧರ್ಷ ಮುನಿ ಅವನಿಗೆ—“ನಾನು ವರದಾತ” ಎಂದು ಹೇಳಿದನು.
वैशम्पायन उवाच