Śaineya’s Breakthrough and Reunion with Arjuna (शैनेयस्य समागमः)
द्रोणगम्भीरपातालं कृतवर्ममहाह्दम् । जलसंधमटहाग्राहं कर्णचन्द्रोदयोद्धतम्,संजय! मेरी सेना भयंकर समुद्रके समान जान पड़ती है। योद्धा ही इसके अक्षय जल हैं, वाहन ही इसकी तरंगमालाएँ हैं, क्षेपणीय, खड्ग, गदा, शक्ति, बाण और प्रास आदि अस्त्र-शस्त्र इसमें मछलियोंके समान भरे हुए हैं। ध्वजा और आभूषणोंके समुदाय इसके भीतर रत्नोंके समान संचित हैं। दौड़ते हुए वाहन ही वायुके वेग हैं, जिनसे यह सैन्यसमुद्र कम्पित एवं क्षुब्ध-सा जान पड़ता है। द्रोणाचार्य ही इसकी पातालतक फैली हुई गहराई है। कृतवर्मा इसमें महान् हृदके समान है, जलसंध विशाल ग्राह है और कर्णरूपी चन्द्रमाके उदयसे यह सदा उद्धेलित होता रहता है
sañjaya uvāca | droṇagambhīrapātālaṃ kṛtavarmamahāhradam | jalasaṃdham-aṭahāgrāhaṃ karṇacandrodayoddhatam ||
ದ್ರೋಣಾಚಾರ್ಯನು ಅದರ ಪಾತಾಳವರೆಗೆ ಹರಡಿರುವ ಗಂಭೀರ ಆಳದಂತೆ; ಕೃತವರ್ಮನು ಅದರೊಳಗಿನ ಮಹಾಹ್ರದದಂತೆ; ಜಲಸಂಧನು (ಜಯದ್ರಥನು) ಅದರಲ್ಲಿನ ಮಹಾಗ್ರಾಹದಂತೆ; ಮತ್ತು ಕರ್ಣನೆಂಬ ಚಂದ್ರನ ಉದಯದಿಂದ ಅದು ಸದಾ ಉಕ್ಕಿ ಅಶಾಂತವಾಗಿರುತ್ತದೆ.
संजय उवाच