त्याग-दीक्षा का सोपान: राजधर्म, कुलधर्म और आत्मधर्म के संघर्ष में ‘प्रेम’ को शुद्ध कर ‘शरणागति’ तक पहुँचाना। अयोध्या काण्ड में भक्त-हृदय का अहं (अधिकार/अपमान/राज्य) गलता है और सेवाभाव (दास्य) व भ्रातृ-प्रेम (सख्य) मिलकर वैराग्य-युक्त करुणा में परिणत होते हैं—यही मुक्ति-सीढ़ी की मध्य-चढ़ाई है।
यह प्रकरण ‘त्याग-दीक्षा’ की मध्य-सीढ़ी है जहाँ **राजधर्म–कुलधर्म–आत्मधर्म** का संघर्ष ‘प्रेम’ को परिष्कृत करता है। **आलिंगन** यहाँ केवल भावुकता नहीं—अहं-गलन का संस्कार है: भरत का अधिकार-भाव दास्य में बदलता, राम का संयम करुणा को मर्यादा देता। ‘**हरष-सोक-सुख-दुख बिसरे**’ संकेत करता है कि सगुण-सान्निध्य में द्वैत-भाव क्षीण होते हैं; यह शान्त-रस की झलक है। ‘**पाहि नाथ**’ पुकार शरणागति का बीज—व्यक्ति दोष-खोज छोड़कर ईश्वराधीनता में टिकता है। निषाद/केवट की सहजता सामाजिक पद-भेद को काटकर बताती है कि भक्ति का अधिकार प्रेम-सेवा से है, जन्म/राज्य से नहीं। समग्र प्रतीक-धुरी: **राज्य बनाम वन** नहीं, बल्कि **अधिकार बनाम समर्पण**—और समर्पण ही करुणा को मुक्ति-पथ की साधना बनाता है।
Verse 490 (चौपाई)
सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन।। पाहि नाथ कहि पाहि गोसाई। भूतल परे लकुट की नाई।। बचन सपेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियँ जाने।। बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा।। मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई।। रहे राखि सेवा पर भारू। चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू।। कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनाम करत रघुनाथा।। उठे रामु सुनि पेम अधीरा। कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा।।
Verse 491 (दोहा/सोरठा)
बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान। भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान।।240।।
Verse 492 (चौपाई)
मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी।। परम पेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अहमिति बिसराई।। कहहु सुपेम प्रगट को करई। केहि छाया कबि मति अनुसरई।। कबिहि अरथ आखर बलु साँचा। अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा।। अगम सनेह भरत रघुबर को। जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को।। सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती। बाज सुराग कि गाँडर ताँती।। मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की। सुरगन सभय धकधकी धरकी।। समुझाए सुरगुरु जड़ जागे। बरषि प्रसून प्रसंसन लागे।।
Verse 493 (दोहा/सोरठा)
मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम। भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम।।241।।
Verse 494 (चौपाई)
भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई।। पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे। अभिमत आसिष पाइ अनंदे।। सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा।। पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए।। सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं। मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं।। सब बिधि सानुकूल लखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता।। कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा।। तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि। जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि।।
Verse 495 (दोहा/सोरठा)
नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग। सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग।।242।।
Verse 496 (चौपाई)
सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू। सिय समीप राखे रिपुदवनू।। चले सबेग रामु तेहि काला। धीर धरम धुर दीनदयाला।। गुरहि देखि सानुज अनुरागे। दंड प्रनाम करन प्रभु लागे।। मुनिबर धाइ लिए उर लाई। प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई।। प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू।। रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा।। रघुपति भगति सुमंगल मूला। नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला।। एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं। बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं।।
Verse 497 (दोहा/सोरठा)
जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ। सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ।।243।।
Verse 498 (चौपाई)
आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना।। जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी। तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी।। सानुज मिलि पल महु सब काहू। कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू।। यह बड़ि बातँ राम कै नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं।। मिलि केवटिहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा।। देखीं राम दुखित महतारीं। जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं।। प्रथम राम भेंटी कैकेई। सरल सुभायँ भगति मति भेई।। पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी। काल करम बिधि सिर धरि खोरी।।
Verse 499 (दोहा/सोरठा)
भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु।। अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु।।244।।
Verse 500 (चौपाई)
गुरतिय पद बंदे दुहु भाई। सहित बिप्रतिय जे सँग आई।। गंग गौरि सम सब सनमानीं।।देहिं असीस मुदित मृदु बानी।। गहि पद लगे सुमित्रा अंका। जनु भेटीं संपति अति रंका।। पुनि जननि चरननि दोउ भ्राता। परे पेम ब्याकुल सब गाता।। अति अनुराग अंब उर लाए। नयन सनेह सलिल अन्हवाए।। तेहि अवसर कर हरष बिषादू। किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू।। मिलि जननहि सानुज रघुराऊ। गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ।। पुरजन पाइ मुनीस नियोगू। जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू।।
Verse 501 (दोहा/सोरठा)
महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ।। पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ।।245।।
Verse 502 (चौपाई)
सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस लही मन मागी।। गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता।। बंदि बंदि पग सिय सबही के। आसिरबचन लहे प्रिय जी के।। सासु सकल जब सीयँ निहारीं। मूदे नयन सहमि सुकुमारीं।। परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं। काह कीन्ह करतार कुचालीं।। तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा।। जनकसुता तब उर धरि धीरा। नील नलिन लोयन भरि नीरा।। मिली सकल सासुन्ह सिय जाई। तेहि अवसर करुना महि छाई।।
Verse 503 (दोहा/सोरठा)
लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग।। हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग।।246।।
Verse 504 (चौपाई)
बिकल सनेहँ सीय सब रानीं। बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं।। कहि जग गति मायिक मुनिनाथा। कहे कछुक परमारथ गाथा।। नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा।। मरन हेतु निज नेहु बिचारी। भे अति बिकल धीर धुर धारी।। कुलिस कठोर सुनत कटु बानी। बिलपत लखन सीय सब रानी।। सोक बिकल अति सकल समाजू। मानहुँ राजु अकाजेउ आजू।। मुनिबर बहुरि राम समुझाए। सहित समाज सुसरित नहाए।। ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा।।
Verse 505 (दोहा/सोरठा)
भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह।। श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह।।247।।
Verse 506 (चौपाई)
करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी। भे पुनीत पातक तम तरनी।। जासु नाम पावक अघ तूला। सुमिरत सकल सुमंगल मूला।। सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस।। सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते। बोले गुर सन राम पिरीते।। नाथ लोग सब निपट दुखारी। कंद मूल फल अंबु अहारी।। सानुज भरतु सचिव सब माता। देखि मोहि पल जिमि जुग जाता।। सब समेत पुर धारिअ पाऊ। आपु इहाँ अमरावति राऊ।। बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई। उचित होइ तस करिअ गोसाँई।।
Verse 507 (दोहा/सोरठा)
धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम। लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम।।248।।
Verse 508 (चौपाई)
राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू।। सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुँ मारुत अनुकुला।। पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं। जो बिलोकि अंघ ओघ नसाहीं।। मंगलमूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हरषि दंडवत करि करि।। राम सैल बन देखन जाहीं। जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं।। झरना झरिहिं सुधासम बारी। त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी।। बिटप बेलि तृन अगनित जाती। फल प्रसून पल्लव बहु भाँती।। सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं। जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं।।
Verse 509 (दोहा/सोरठा)
सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग। बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग।।249।।
Read Ramcharitmanas in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.