Nāradasya Rājadharma-praśnāḥ
Nārada’s Examination of Royal Ethics
निश्चितानामनारम्भं मन्त्रस्यापरिरक्षणम् | मड़लाद्यप्रयोगं च प्रत्युत्थानं च सर्वतः,युधिछिर! तुम नास्तिकता, झूठ, क्रोध, प्रमाद, दीर्घसूत्रता, ज्ञानियोंका संग न करना, आलस्य, पाँचों इन्द्रियोंके विषयोंमें आसक्ति, प्रजाजनोंपर अकेले ही विचार करना, अर्थशास्त्रको न जाननेवाले मू्खोके साथ विचार-विमर्श, निश्चित कार्योंके आरम्भ करनेमें विलम्ब या टालमटोल, गुप्त मन्त्रणाको सुरक्षित न रखना, मांगलिक उत्सव आदि न करना तथा एक साथ ही सभी शत्रुओंपर चढ़ाई कर देना--इन राजसम्बन्धी चौदह दोषोंका त्याग तो करते हो न? क्योंकि जिनके राज्यकी जड़ जम गयी है, ऐसे राजा भी इन दोषोंके कारण नष्ट हो जाते हैं
niścitānām anārambhaṁ mantrasya aparirakṣaṇam | maṅgalādyaprayogaṁ ca pratyutthānaṁ ca sarvataḥ, yudhiṣṭhira |
នារទៈ បានមានពាក្យថា៖ «ឱ យុធិឋ្ឋិរៈ! តើអ្នកបានជៀសវាងកំហុសនៃរាជធម៌ទាំងនេះឬ—ការមិនចាប់ផ្តើមអ្វីដែលបានសម្រេចយ៉ាងមាំមួន; ការមិនរក្សាការពិគ្រោះសម្ងាត់ឲ្យមានសុវត្ថិភាព; ការធ្វេសប្រហែសពិធីមង្គល និងពិធីសាធារណៈដែលថែរក្សាកម្លាំងចិត្ត និងសេចក្តីស្របច្បាប់; និងការលោតឡើងប្រតិកម្មលើគ្រប់ទិសទាំងអស់ក្នុងពេលតែមួយ? សូម្បីតែស្តេចដែលអាណាចក្ររឹងមាំដូចឫសជ្រៅ ក៏អាចវិនាសដោយកំហុសទាំងនេះបាន ព្រោះវាធ្វើឲ្យចិត្តសម្រេចខ្សោយ បង្ហាញយុទ្ធសាស្ត្រ បំផ្លាញទំនុកចិត្តប្រជាជន និងបែកបាក់កម្លាំង»។
नारद उवाच