
मायासभायां दुर्योधनस्य अवमान-प्रसङ्गः (Duryodhana’s Humiliation in the Hall of Māyā)
Upa-parva: Māyā-sabhā (The Hall of Māyā) — Duryodhana’s Discomfiture Episode
Vaiśaṃpāyana narrates Duryodhana’s tour of the extraordinary assembly hall alongside Śakuni. Duryodhana encounters engineered illusions: a crystal floor he mistakes for water prompts him to lift his garments; elsewhere he mistakes a crystal-water pond for solid ground and falls in, after which attendants laugh and provide fresh garments by royal order. Seeing the incident, Bhīma, Arjuna, and the twins also laugh; Duryodhana suppresses his reaction to preserve outward dignity. Additional misreadings follow—he strikes an apparently open doorway with his forehead and then withdraws, believing it closed. Granted leave by the Pāṇḍavas, he departs for Hāstinapura with an ungladdened mind after witnessing Yudhiṣṭhira’s unparalleled prosperity and the rājasūya’s grandeur. On the way, his internal monologue intensifies: he compares the rite to Indra’s, notes rivals subdued, recalls Śiśupāla’s fall, and describes himself as burning with envy, even contemplating self-destruction. He frames the Pāṇḍavas’ rise as fate’s triumph over his earlier efforts and asks Śakuni to report his distress and resentment to Dhṛtarāṣṭra—marking humiliation as a psychological turning point with political consequences.
Chapter Arc: सभामण्डल में भीष्म वाणी उठती है—वे चेदिराजकुल में जन्मे शिशुपाल के अद्भुत, भयावह जन्म-लक्षणों का वृत्तान्त सुनाते हैं: त्र्यक्ष, चतुर्भुज शिशु, जिसकी आकृति देख माता-पिता और बन्धु काँप उठते हैं। → राजा, रानी, पुरोहित और मन्त्रियों सहित चिन्ता में डूबते हैं; तभी आकाशवाणी/अशरीरी वाणी प्रकट होकर भविष्यवाणी करती है—यह बालक तभी मरेगा जब कोई उसे गोद में लेकर उसके विकार-चिह्नों का ‘मृत्यु-सूचक’ दर्शन करेगा। पुत्रस्नेह और भय के बीच जननी प्रश्न करती है, और उत्तर और भी कठोर बनता जाता है। → अशरीरी वाणी का निर्णायक कथन—जिसके द्वारा गोद में लिये जाने पर (भयावह) संकेत प्रकट होंगे, वही इसका मृत्यु-कारण बनेगा; इस भविष्यवाणी को टालने/परखने हेतु चेदिराज शिशु को क्रमशः असंख्य राजाओं की गोद में रखवाते हैं, ताकि वह ‘वह’ व्यक्ति पहचाना जा सके। → हजारों नरेशों की गोद में चढ़ने पर भी मृत्यु-सूचक लक्षण प्रकट नहीं होते; तत्काल संकट टलता है, पर भविष्यवाणी का काँटा राज्य और कुल के हृदय में धँसा रह जाता है—शिशुपाल का अंत किसी अज्ञात, नियत हाथ से बँधा है। → जिसके अंक में बैठते ही लक्षण प्रकट होंगे—वह कौन है, और कब यह नियति अपना संकेत देगी?
Verse 1
भीकम (2 अमान त्रिचत्वारिशो 5 ध्याय: भीष्मजीके द्वारा शिशुपालके जन्मके वृत्तान्तका वर्णन भीष्म उवाच चेदिराजकुले जातस्त्र्यक्ष एष चतुर्भुज: । रासभारावसदृशं ररास च ननाद च,भीष्मजी बोले--भीमसेन! सुनो, चेदिराज दमघोषके कुलमें जब यह शिशुपाल उत्पन्न हुआ, उस समय इसके तीन आँखें और चार भुजाएँ थीं। इसने रोनेकी जगह गदहेके रेंकनेकी भाँति शब्द किया और जोर-जोरसे गर्जना भी की
ភីષ្មៈបានមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ ភីមសេន! ចូរស្តាប់។ ក្នុងវង្សរាជចេទី ក្នុងគ្រួសាររបស់ព្រះបាទដមឃោសៈ ពេលសិឝុបាលានេះកើតមក គាត់មានភ្នែកបី និងដៃបួន។ មិនមែនយំដូចទារកធម្មតាទេ គាត់បន្លឺសំឡេងដូចសត្វលា ហើយក៏គ្រហឹមខ្លាំងៗផងដែរ»។
Verse 2
* 53 है ०५ >> 5555 वैकृतं तस्य तौ दृष्टवा त्यागायाकुरुतां मतिम्,इससे इसके माता-पिता अन्य भाई-बन्धुओंसहित भयसे थर्रा उठे। इसकी वह विकराल आकृति देख उन्होंने इसे त्याग देनेका निश्चय किया
ឃើញទារកនោះមានរូបរាងប្លែក និងគួរឱ្យភ័យខ្លាច បិតាមាតារបស់គាត់—ជាមួយបងប្អូន និងញាតិមិត្តទាំងឡាយ—បានញ័រខ្លួនដោយភ័យ។ ប្រឈមមុខនឹងទម្រង់ដ៏សាហាវនោះ ពួកគេបានសម្រេចចិត្តបោះបង់គាត់ចោល។
Verse 3
ततः सभार्य नृपतिं सामात्यं सपुरोहितम् । चिन्तासम्मूढहृदयं वागुवाचाशरीरिणी,पत्नी, पुरोहित तथा मन्त्रियोंसहित चेदिराजका हृदय चिन्तासे मोहित हो रहा था। उस समय आकाशवाणी हुई--
បន្ទាប់មក ព្រះមហាក្សត្រចេទី—ជាមួយព្រះមហេសី មន្ត្រីទាំងឡាយ និងព្រះបុរោហិត—ឈរនៅទីនោះ ដោយចិត្តត្រូវការព្រួយបារម្ភបំភាន់។ នៅពេលនោះ សំឡេងមួយគ្មានរូបកាយបាននិយាយចេញមក។ ពេលវេលានេះជាចំណុចបត់ផ្លូវនៃធម៌៖ នៅពេលការវិនិច្ឆ័យរបស់មនុស្សត្រូវភ័យ និងសង្ស័យគ្របដណ្តប់ ការត្រាស់ដឹងខ្ពស់បានចូលមកត្រៀមនាំទៅរកអ្វីដែលត្រឹមត្រូវ។
Verse 4
एष ते नृपते पुत्र: श्रीमान् जातो बलाधिक: । तस्मादस्मान्न भेतव्यमव्यग्र: पाहि वै शिशुम्,“राजन! तुम्हारा यह पुत्र श्रीसम्पन्न और महाबली है, अतः तुम्हें इससे डरना नहीं चाहिये। तुम शान्तचित्त होकर इस शिशुका पालन करो
ភីṣ្មៈមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ព្រះមហាក្សត្រ! ព្រះរាជបុត្ររបស់ព្រះអង្គនេះ បានប្រសូត្រឡើងដោយសិរីសម្បត្តិ និងកម្លាំងលើសលប់។ ដូច្នេះ ព្រះអង្គមិនគួរភ័យខ្លាចដោយហេតុយើងទេ; សូមកុំឲ្យចិត្តរវល់ ហើយចិញ្ចឹមថែរក្សាកុមារនេះដោយស្ងប់ស្ងាត់»។
Verse 5
नच वै तस्य मृत्युर्वे न काल: प्रत्युपस्थित: । मृत्यु्न्तास्य शस्त्रेण स चोत्पन्नो नराधिप,“नरेश्वर! अभी इसकी मृत्यु नहीं आयी है और न काल ही उपस्थित हुआ है। जो इसकी मृत्युका कारण है तथा जो शस्त्रद्वारा इसका वध करेगा, वह अन्यत्र उत्पन्न हो चुका है!
ភីṣ្មៈមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ព្រះមហាក្សត្រ! មរណភាពរបស់គាត់មិនទាន់មកដល់ទេ ហើយកាលកំណត់ក៏មិនទាន់ចូលមកដែរ។ អ្នកដែលនឹងក្លាយជាមូលហេតុនៃមរណភាពរបស់គាត់—អ្នកដែលនឹងសម្លាប់គាត់ដោយអាវុធ—បានកើតនៅទីផ្សេងរួចហើយ»។
Verse 6
संश्रुत्योदाह्तं वाक््यं भूतमन्तर्हितं ततः । पुत्रस्नेहाभिसंतप्ता जननी वाक्यमब्रवीत्,तदनन्तर यह आकाशवाणी सुनकर उस अन्तहित भूतको लक्ष्य करके पुत्रस्नेहसे संतप्त हुई इसकी माता बोली--
ពេលនាងបានឮពាក្យដែលបានប្រកាសហើយ នាងបានបែរទៅនិយាយទៅកាន់អង្គសត្វអស្ចារ្យដែលមើលមិនឃើញនោះ ដែលបានលាក់ខ្លួនទៅ។ ម្តាយដែលរងទុក្ខដោយសេចក្តីស្រឡាញ់ចំពោះកូន បាននិយាយ—ពាក្យនាងកើតពីទុក្ខសោក ការចងចិត្ត និងកាតព្វកិច្ចដ៏បន្ទាន់ក្នុងការពារកូន។
Verse 7
येनेदमीरितं वाक््यं ममैतं तनयं प्रति । प्राउजलिस्तं नमस्यामि ब्रवीतु स पुनर्वच:,“मेरे इस पुत्रके विषयमें जिन्होंने यह बात कही है, उन्हें मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करती हूँ। चाहे वे कोई देवता हों अथवा और कोई प्राणी? वे फिर मेरे प्रश्नका उत्तर दें। मैं यह यथार्थरूपसे सुनना चाहती हूँ कि मेरे इस पुत्रकी मृत्युमें कौन निमित्त बनेगा?”
«អ្នកណាដែលបាននិយាយពាក្យនេះអំពីកូនប្រុសរបស់ខ្ញុំ—ខ្ញុំសូមគោរពបូជាដោយដៃប្រណម្យ។ ទោះជាព្រះទេវតា ឬសត្វមានជីវិតណាមួយក៏ដោយ សូមនិយាយម្តងទៀត ហើយឆ្លើយសំណួរខ្ញុំ។ ខ្ញុំចង់ស្តាប់សេចក្តីពិតថា អ្នកណានឹងក្លាយជាមូលហេតុនៃមរណភាពកូនប្រុសខ្ញុំ?»
Verse 8
याथातथ्येन भगवान् देवो वा यदि वेतर: । श्रोतुमिच्छामि पुत्रस्य को<स्य मृत्युर्भविष्यति,“मेरे इस पुत्रके विषयमें जिन्होंने यह बात कही है, उन्हें मैं हाथ जोड़कर प्रणाम करती हूँ। चाहे वे कोई देवता हों अथवा और कोई प्राणी? वे फिर मेरे प्रश्नका उत्तर दें। मैं यह यथार्थरूपसे सुनना चाहती हूँ कि मेरे इस पुत्रकी मृत्युमें कौन निमित्त बनेगा?”
«ដោយសេចក្តីពិតប្រាកដ—មិនថាអ្នកដែលនិយាយនោះជាព្រះទេវតាដ៏គួរគោរព ឬជាសត្វមានជីវិតផ្សេងទៀត—ខ្ញុំចង់ស្តាប់ឲ្យច្បាស់ថា អ្នកណានឹងក្លាយជាមូលហេតុនៃមរណភាពកូនប្រុសនេះ?»
Verse 9
अन्तर्भूतं ततो भूतमुवाचेद॑ं पुनर्वच: । यस्योत्सड़े गृहीतस्य भुजावभ्यधिकावुभौ,निमज्जिष्यति यं दृष्टवा सो<स्य मृत्युर्भविष्यति । तब पुनः उसी अदृश्य भूतने यह उत्तर दिया--'जिसके द्वारा गोदमें लिये जानेपर पाँच सिरवाले दो सर्पोकी भाँति इसकी पाँचों अँगुलियोंसे युक्त दो अधिक भुजाएँ पृथ्वीपर गिर जायँगी और जिसे देखकर इस बालकका ललाटवर्ती तीसरा नेत्र भी ललाटमें लीन हो जायगा, वही इसकी मृत्युमें निमित्त बनेगा”
បន្ទាប់មក អាត្មាអស្ចារ្យដែលមើលមិនឃើញ ហើយឥឡូវស្ថិតនៅខាងក្នុង បាននិយាយឡើងម្ដងទៀតថា៖ «ពេលកុមារនេះត្រូវគេយកទៅដាក់លើភ្លៅរបស់នរណាម្នាក់ ដៃបន្ថែមទាំងពីររបស់គេ—មួយៗមានម្រាមប្រាំ ដូចពស់ក្បាលប្រាំ—នឹងលិចចុះ ហើយបាត់ទៅ។ ហើយអ្នកដែលឃើញហេតុនោះកើតឡើង នឹងក្លាយជាមូលហេតុនៃមរណភាពរបស់គេ»។
Verse 10
पतिष्यत: क्षितितले पञ्चशीर्षाविवोरगौ । तृतीयमेतद् बालस्य ललाटस्थं तु लोचनम्
ភីષ្មៈបាននិយាយថា៖ «នៅពេលវាហាក់ដូចជានឹងធ្លាក់ចុះលើដី នោះបានលេចឡើង—ដូចពស់ក្បាលប្រាំពីរគម្រប—(ភ្នែកពីរ) ហើយនេះហើយជាភ្នែកទីបីរបស់កុមារ ស្ថិតលើថ្ងាស»។
Verse 11
त्र्यक्ष॑ चतुर्भुजं श्रुव्वा तथा च समुदाह्ृतम्
ភីષ្មៈបាននិយាយថា៖ «បានឮគេប្រកាសថា គេមានភ្នែកបី និងដៃបួន ហើយបានប្រកាសឡើងយ៉ាងច្បាស់ដូច្នោះ…»។
Verse 12
पृथिव्यां पार्थिवा: सर्वे अभ्यागच्छन् दिदृक्षव: । चार बाँह और तीन आँखवाले बालकके जन्मका समाचार सुनकर भूमण्डलके सभी नरेश उसे देखनेके लिये आये ।। ११ $ ।। तान् पूजयित्वा सम्प्राप्तान् यथाह स महीपति:
ភីષ្មៈបាននិយាយថា៖ «ពេលបានឮដំណឹងថា កុមារម្នាក់កើតមកមានដៃបួន និងភ្នែកបី ព្រះមហាក្សត្រទាំងអស់លើផែនដី—ចង់ឃើញអព្ភូតហេតុនោះដោយខ្លួនឯង—បានមកពីទិសទាំងឡាយ។ បន្ទាប់មក ព្រះមហាក្សត្រនោះបានទទួលស្វាគមន៍ព្រះមហាក្សត្រដែលមកដល់ទាំងនោះដោយកិត្តិយសសមគួរ តាមលំដាប់ឋានៈ និងគុណសម្បត្តិ»។
Verse 13
एवं राजसहस््राणां पृथक्त्वेन यथाक्रमम्
ភីષ្មៈបាននិយាយថា៖ «ដូច្នេះហើយ ព្រះមហាក្សត្ររាប់ពាន់ត្រូវបានរៀបចំទទួលជាលំដាប់—បំបែកចេញដោយឡែកៗ តាមលំដាប់លំដោយ—ដោយរាប់គ្នាម្នាក់ៗ មិនឲ្យច្របូកច្របល់»។
Verse 14
एतदेव तु संभश्रुत्य द्वारवत्यां महाबलौ,द्वारका्में यही समाचार सुनकर महाबली बलराम और श्रीकृष्ण दोनों यदुवंशी वीर अपनी बुआसे मिलनेके लिये उस समय चेदिराज्यकी राजधानीमें गये
ពេលបានឮដំណឹងនោះនៅទីក្រុងទ្វារវតី វីរបុរសយាទវៈដ៏មហាបលទាំងពីរ—ព្រះបលរាម និងព្រះស្រីក្រឹષ્ણ—បានចេញដំណើរភ្លាមៗទៅកាន់រាជធានីនៃប្រទេសចេទី ដើម្បីទៅជួបមីងខាងឪពុករបស់ពួកគេ។
Verse 15
ततश्रैदिपुरं प्राप्तौ संकर्षणजनार्दनौ | यादवौ यादवीं द्र॒ष्टं स््वसारं तौ पितुस्तदा,द्वारका्में यही समाचार सुनकर महाबली बलराम और श्रीकृष्ण दोनों यदुवंशी वीर अपनी बुआसे मिलनेके लिये उस समय चेदिराज्यकी राजधानीमें गये
ភីष្មបាននិយាយថា៖ បន្ទាប់ពីបានឮដំណឹងនោះ សង្កರ್ಷណ (ព្រះបលរាម) និង ជនារទន (ព្រះក្រឹષ્ણ) វីរបុរសយាទវៈដ៏មហាបល បានចេញដំណើរ ហើយទៅដល់ទីក្រុងនៃប្រទេសចេទី។ នៅពេលនោះ ពួកគេបានទៅដើម្បីជួបមីងខាងឪពុករបស់ពួកគេ—ស្ត្រីយាទវៈនោះ។
Verse 16
अभिवाद्य यथान्यायं यथाश्रेष्ठ नृपं च ताम् कुशलानामयं पृष्टवा निषण्णौ रामकेशवौ,वहाँ बलराम और श्रीकृष्णने बड़े-छोटेके क्रमसे सबको यथायोग्य प्रणाम किया एवं राजा दमघोष और अपनी बुआ श्रुतश्रवासे कुशल और आरोग्यविषयक प्रश्न किया। तत्पश्चात् दोनों भाई एक उत्तम आसनपर विराजमान हुए
ភីष្មបាននិយាយថា៖ ព្រះរាម (បលរាម) និង ព្រះកេសវ (ក្រឹષ્ણ) បានថ្វាយបង្គំតាមគ្រប់លំដាប់ថ្នាក់ ដោយគោរពតាមច្បាប់ព្រះរាជវាំង; បន្ទាប់មកបានសួរសុខទុក្ខ និងសុខភាពរបស់ព្រះមហាក្សត្រ និងស្ត្រីនោះ។ រួចហើយ បងប្អូនទាំងពីរបានអង្គុយលើអាសនៈដ៏ប្រសើរ។
Verse 17
साभ्यर्च्य तौ तदा वीरीौ प्रीत्या चाभ्यधिकं ततः । पुत्रं दामोदरोत्सज्रे देवी संन्यदधात् स््वयम्,महादेवी श्रुतश्रवाने बड़े प्रेमसे उन दोनों वीरोंका सत्कार किया और स्वयं ही अपने पुत्रको श्रीकृष्णकी गोदमें डाल दिया
ភីष្មបាននិយាយថា៖ ព្រះនាងដ៏ខ្ពង់ខ្ពស់បានទទួលស្វាគមន៍វីរបុរសទាំងពីរនោះដោយការគោរព និងដោយសេចក្តីស្រឡាញ់កាន់តែខ្លាំង។ បន្ទាប់មក ព្រះនាងបានដាក់ព្រះរាជបុត្ររបស់នាងដោយដៃខ្លួនឯង ទៅលើភ្លៅរបស់ ដាមោទរ (ព្រះក្រឹષ્ણ)។
Verse 18
न्यस्तमात्रस्य तस्याड्के भुजावभ्यधिकावुभौ । पेततुस्तच्च नयनं न््यमज्जत ललाटजम्,उनकी गोदमें रखते ही बालककी वे दोनों बाँहें गिर गयीं और ललाटवर्ती नेत्र भी वहीं विलीन हो गया
ភីष្មបាននិយាយថា៖ ពេលក្មេងនោះទើបតែត្រូវដាក់លើភ្លៅរបស់ព្រះអង្គ ប្រាណរបស់គេដូចជាដាច់ភ្លាមៗ—ដៃទាំងពីររបស់គេធ្លាក់ស្រក់អស់កម្លាំង ហើយភ្នែកដែលស្ថិតលើថ្ងាសក៏លិចចូល ហើយបាត់ទៅ។
Verse 19
तद् दृष्टवा व्यथिता त्रस्ता वरं कृष्णमयाचत । ददस्व मे वरं कृष्ण भयारताया महाभुज,यह देखकर बालककी माता भयभीत हो मन-ही-मन व्यथित हो गयी और श्रीकृष्णसे वर माँगती हुई बोली--“महाबाहु श्रीकृष्ण! मैं भयसे व्याकुल हो रही हूँ। मुझे इस पुत्रकी जीवनरक्षाके लिये कोई वर दो
ពេលនាងឃើញដូច្នោះ នាងរងទុក្ខចិត្ត ភ័យខ្លាច ហើយសូមពរពីព្រះក្រឹෂ្ណ។ នាងនិយាយថា៖ «ព្រះក្រឹෂ្ណ មហាបាហុ! ខ្ញុំកំពុងរងភ័យយ៉ាងខ្លាំង។ សូមប្រទានពរមួយ ដើម្បីការពារជីវិតកូនប្រុសនេះ»
Verse 20
त्वं ह्वार्तानां समाश्चासों भीतानामभयप्रद: । एवमुक्तस्तत: कृष्ण: सोडब्रवीद् यदुनन्दन:,'क्योंकि तुम संकटमें पड़े हुए प्राणियोंक सबसे बड़े सहारे और भयभीत मनुष्योंको अभय देनेवाले हो।” अपनी बुआके ऐसा कहनेपर यदुनन्दन श्रीकृष्णने कहा--
«ព្រោះព្រះអង្គជាជម្រកដ៏ធំបំផុតសម្រាប់អ្នកដែលជួបវិបត្តិ ហើយជាអ្នកប្រទានភាពមិនភ័យដល់អ្នកដែលភ័យខ្លាច»។ ពេលនាងនិយាយដូច្នោះ ក្រឹෂ្ណា—អ្នកជាទីរីករាយនៃយទុ—ក៏ឆ្លើយតប។
Verse 21
मा भेस्त्वं देवि धर्मज्ञे न मत्तोडस्ति भयं तव । ददामि कं वरं कि च करवाणि पितृष्वस:,*देवि! धर्मज्ञे! तुम डरो मत। तुम्हें मुझसे कोई भय नहीं है। बुआ! तुम्हीं कहो, मैं तुम्हें कौन-सा वर दूँ? तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध कर दूँ?
«កុំភ័យឡើយ នាងទេវី អ្នកដឹងធម៌! អ្នកមិនមានអ្វីត្រូវភ័យពីខ្ញុំទេ។ អ្នកមីងអើយ ចូរប្រាប់មក—ខ្ញុំគួរប្រទានពរអ្វីដល់អ្នក? ហើយខ្ញុំគួរសម្រេចកិច្ចការអ្វីឲ្យអ្នក?»
Verse 22
शक््यं वा यदि वाशक्यं करिष्यामि वचस्तव । एवमुक्ता तत:ः कृष्णमब्रवीद् यदुनन्दनम्,“सम्भव हो या असम्भव, तुम्हारे वचनका मैं अवश्य पालन करूँगा।” इस प्रकार आश्वासन मिलनेपर श्रुतश्रवा यदुनन्दन श्रीकृष्णसे बोली--
«មិនថាអាចធ្វើបាន ឬមិនអាចធ្វើបានក៏ដោយ ខ្ញុំនឹងអនុវត្តតាមពាក្យរបស់អ្នកជានិច្ច»។ ពេលបានទទួលការធានាដូច្នោះហើយ ស្រុតាស្រវា ក៏និយាយទៅកាន់ក្រឹෂ្ណា—អ្នកជាទីរីករាយនៃយទុ—ថា៖
Verse 23
शिशुपालस्यथापराधान् क्षमेथास्त्वं महाबल । मत्कृते यदुशार्दूल विद्धयेनं मे वरं प्रभो,“महाबली यदुकुलतिलक श्रीकृष्ण! तुम मेरे लिये शिशुपालके सब अपराध क्षमा कर देना। प्रभो! यही मेरा मनोवांछित वर समझो”
«ព្រះក្រឹෂ្ណ មហាបលា យទុសារទូល! សូមអភ័យទោសចំពោះកំហុសទាំងអស់របស់សិឝុបាល ដើម្បីខ្ញុំ។ ព្រះអម្ចាស់! សូមចាត់ទុកនេះជាពរដែលខ្ញុំប្រាថ្នាខ្លាំងបំផុត»
Verse 24
श्रीकृष्ण उवाच अपराधशतं क्षाम्यं मया हास्य पितृष्वस: । पुत्रस्य ते वधाहस्य मा त्वं शोके मन: कृथा:,श्रीकृष्णने कहा--बुआ! तुम्हारा पुत्र अपने दोषोंके कारण मेरे द्वारा यदि वधके योग्य होगा, तो भी मैं इसके सौ अपराध क्षमा करूँगा। तुम अपने मनमें शोक न करो
ព្រះក្រឹષ્ણមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱ ប្អូនស្រីរបស់ឪពុកខ្ញុំ! ទោះបីកូនប្រុសរបស់អ្នក ដោយសារកំហុសរបស់គេ ក្លាយជាអ្នកសមនឹងត្រូវសម្លាប់ដោយដៃខ្ញុំក៏ដោយ ខ្ញុំនឹងអត់ទោសឲ្យគេមួយរយកំហុស។ កុំឲ្យចិត្តអ្នកធ្លាក់ចូលក្នុងទុក្ខសោកឡើយ»។
Verse 25
भीष्म उवाच एवमेष नृप: पाप: शिशुपाल: सुमन्दधी: । त्वां समाह्नयते वीर गोविन्दवरदर्पित:,भीष्मजी कहते हैं--वीरवर भीमसेन! इस प्रकार यह मन्दबुद्धि पापी राजा शिशुपाल भगवान् श्रीकृष्णके दिये हुए वरदानसे उन्मत्त होकर तुम्हें युद्धेके लिये ललकार रहा है
ភីෂ្មមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ដូច្នេះហើយ—ស្ដេចបាបនោះ សិឝុបាល មនុស្សមានបញ្ញាខ្សោយណាស់ កំពុងប្រកួតប្រជែងលើកលែងអ្នក ឱ វីរបុរស។ ដោយស្រវឹងអំនួតពីព្រះពរដែលគោវិន្ទ (ក្រឹષ્ણ) ប្រទាន គេកំពុងហៅអ្នកចេញទៅសង្គ្រាម»។
Verse 43
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि शिशुपालवधपर्वणि शिशुपालवृत्तान्तकथने त्रिचत्वारिंशो ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत सभापवके अन्तर्गत शिशुपालवधपर्वमें शिशुपालवृत्तान्तवर्णनविषयक तैंतालीयवाँ अध्याय पूरा हुआ
ដូច្នេះ ក្នុង «មហាភារត» ដ៏បរិសុទ្ធ នៅក្នុង «សភាបវ៌» ក្នុងបរិវេណនៃ «បវ៌ស្ដីពីការសម្លាប់សិឝុបាល» ជំពូកទីសែសិបបី—ដែលពិពណ៌នាពីប្រវត្តិរឿងរ៉ាវរបស់សិឝុបាល—បានបញ្ចប់។
Verse 106
निमज्जिष्यति यं दृष्टवा सो<स्य मृत्युर्भविष्यति । तब पुनः उसी अदृश्य भूतने यह उत्तर दिया--'जिसके द्वारा गोदमें लिये जानेपर पाँच सिरवाले दो सर्पोकी भाँति इसकी पाँचों अँगुलियोंसे युक्त दो अधिक भुजाएँ पृथ्वीपर गिर जायँगी और जिसे देखकर इस बालकका ललाटवर्ती तीसरा नेत्र भी ललाटमें लीन हो जायगा, वही इसकी मृत्युमें निमित्त बनेगा”
ភីෂ្មមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ពេលឃើញអ្នកដែលបានកំណត់ឲ្យលិចចូលក្នុងវិនាស គេនោះនឹងក្លាយជាមូលហេតុនៃមរណភាពរបស់កុមារនេះ»។ បន្ទាប់មក សត្វអាថ៌កំបាំងមិនអាចមើលឃើញនោះបានឆ្លើយបន្ថែមថា៖ «អ្នកណាដែល—ពេលយកកុមារនេះដាក់លើភ្លៅ—ដៃបន្ថែមពីររបស់វា ដែលមានម្រាមប្រាំៗ ដូចពស់ក្បាលប្រាំពីរគូ នឹងធ្លាក់ចុះលើផែនដី ហើយពេលឃើញអ្នកនោះ ភ្នែកទីបីលើថ្ងាសរបស់កុមារនេះក៏នឹងរលាយចូលទៅក្នុងថ្ងាសវិញ—អ្នកនោះតែម្នាក់ឯង នឹងក្លាយជាហេតុនាំទៅកាន់មរណភាពរបស់វា»។
Verse 126
एकैकस्य नृपस्याड्के पुत्रमारोपयत् तदा । चेदिराजने अपने घर पधारे हुए उन सभी नरेशोंका यथायोग्य सत्कार करके अपने पुत्रको हर एककी गोदमें रखा
ភីෂ្មមានព្រះបន្ទូលថា៖ បន្ទាប់ពីទទួលស្វាគមន៍ និងគោរពបូជាស្ដេចទាំងអស់ដែលមកដល់ តាមសមរម្យនៃឋានៈរបស់ពួកគេហើយ ស្ដេចចេឌីបានយកកូនប្រុសរបស់ខ្លួន ដាក់លើភ្លៅរបស់ស្ដេចម្នាក់ៗ ជាបន្តបន្ទាប់។
Verse 133
शिशुरड्कसमारूढो न तत् प्राप निदर्शनम् इस प्रकार वह शिशु क्रमश: सहस्रों राजाओंकी गोदमें अलग-अलग रखा गया, परन्तु मृत्युसूचक लक्षण कहीं भी प्राप्त नहीं हुआ
ភីṣ្មៈបានមានព្រះវាចា៖ ទោះបីទារកនោះត្រូវបានដាក់លើភ្លៅរបស់ស្តេចជាច្រើនរាប់ពាន់ ដោយបន្តបន្ទាប់គ្នា ក៏មិនបានឃើញសញ្ញាណណាមួយនៃស្នាមមរណៈដែលបានទាយទុកឡើយ។ ហេតុការណ៍នេះបង្ហាញពីដែនកំណត់នៃការសង្ស័យ និងការអានអូមែន ហើយរំលេចកាតព្វកិច្ចធម៌ក្នុងការទប់ស្កាត់ការវិនិច្ឆ័យដែលកើតពីភ័យ នៅពេលគ្មានភស្តុតាង។
The pressure point is how a ruler should respond to public embarrassment: whether to absorb it with restraint and restore composure, or to convert wounded honor into retaliatory intent that can compromise ethical governance.
Unregulated envy and honor-injury distort perception and judgment; when emotion becomes policy, it can reframe others’ legitimate success as intolerable injustice, accelerating unethical decision-making.
No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s meta-function is narrative causality—explaining the psychological origin of later strategic hostility and situating it within the epic’s broader inquiry into how inner states precipitate public conflict.