Adhyaya 6
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 633 Verses

Adhyaya 6

Marutta Seeks a Priest: Bṛhaspati’s Refusal and Nārada’s Guidance to Saṃvarta (Chapter 6)

Upa-parva: Bṛhaspati–Marutta–Saṃvarta Itihāsa (Embedded Exemplum)

Vyāsa introduces an ancient exemplum concerning King Marutta’s planned sacrifice. Marutta approaches Bṛhaspati, recalling an earlier understanding that Bṛhaspati would officiate, and requests him to conduct the rite with preparations already assembled. Bṛhaspati declines, stating he is engaged by the Devarāja and bound by a prior promise; he further asserts he will not officiate for a human after officiating for an immortal. Marutta, shamed and distressed, departs and meets the devarṣi Nārada, who observes his agitation and offers to remove his anger through counsel. Marutta reports Bṛhaspati’s rejection and expresses despair. Nārada informs him of Saṃvarta, another son of Aṅgiras, described as dharmic yet roaming in an unconventional, disorienting manner, frequently near Vārāṇasī. Nārada prescribes a method: place a corpse at the city gate to identify the ascetic who turns back upon seeing it; follow him without retreating despite humiliations, approach privately with folded hands, and disclose that Nārada directed the meeting. Marutta complies, goes to Vārāṇasī, places the corpse, identifies Saṃvarta by his reaction, follows him, and endures being smeared with dust, mud, phlegm, and spittle. Saṃvarta then withdraws and sits beneath a broad nyagrodha (banyan) in cool shade, marking the transition to the next phase of negotiation.

Chapter Arc: व्यास राजन् को एक प्राचीन, तेजस्वी इतिहास में ले जाते हैं—राजा मरुत्त और बृहस्पति का संवाद, जहाँ एक मनुष्य-यज्ञ की आकांक्षा स्वयं देवगुरु की मर्यादा से टकराती है। → मरुत्त मन-ही-मन महान यज्ञ का संकल्प करता है और वाग्मी होकर बृहस्पति से याजक बनने की याचना करता है; पर बृहस्पति स्पष्ट कह देते हैं कि वे अमरों के यज्ञ कराकर मनुष्यों का यज्ञ कैसे कराएँ—और आज से याजन से निवृत्त होने की घोषणा कर देते हैं। नारद मार्ग दिखाते हैं: यदि बृहस्पति न चाहें तो अंगिरा-पुत्र संवर्त को खोजो—वही प्रसन्न होकर यज्ञ कराएगा। → मरुत्त वाराणसी में महेश्वर-दर्शन की आकांक्षा से विचरते उन्मत्त-वेषधारी संवर्त तक पहुँचता है; संवर्त राजा को परखने/तोड़ने के लिए एकान्त में धूल, कीचड़, श्लेष्मा और छींटों से अपमानित करता है—पर मरुत्त हाथ जोड़कर, पीछे-पीछे चलकर भी विनय नहीं छोड़ता। → राजा की अडिग नम्रता देखकर संवर्त लौटता है, थका हुआ एक बहुशाखी न्यग्रोध की शीतल छाया में बैठता है—और संकेत देता है कि अब संवाद/शिक्षा का द्वार खुल सकता है। → संवर्त बैठ तो गया है, पर क्या वह मरुत्त का यज्ञ स्वीकार करेगा, और किन शर्तों पर—यह अगले प्रसंग पर टिका रहता है।

Shlokas

Verse 1

व्यासजी कहते हैं--राजन्‌! इस प्रसंगमें बुद्धिमान्‌ राजा मरुत्त और बृहस्पतिके इस पुरातन संवादविषयक इतिहासका उल्लेख किया जाता है

វ្យាសមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ព្រះរាជា! ក្នុងបរិបទនេះ គេរំលឹកឡើងនូវប្រវត្តិដ៏បុរាណមួយ—អំពីសន្ទនារវាងព្រះរាជាមរុត្តដ៏មានប្រាជ្ញា និងព្រះបૃហស្បតិ»។

Verse 2

देवराजस्य समयं कृतमाज्िरसेन ह | श्रुत्वा मरुत्तो नृपतिर्यज्ञमाहारयत्‌ परम्‌,राजा मरुत्तने जब यह सुना कि अंगिराके पुत्र बृहस्पतिजीने मनुष्यके यज्ञ न करानेकी प्रतिज्ञा कर ली है, तब उन्होंने एक महान्‌ यज्ञका आयोजन किया

វ្យាសមានព្រះបន្ទូលថា៖ ពេលព្រះរាជាមរុត្តបានឮថា ព្រះបૃហស្បតិ កូនប្រុសរបស់អង្គិរា បានធ្វើសច្ចាប្រណិធានមួយទាក់ទងនឹងព្រះរាជានៃទេវតា ហើយមិនព្រមប្រតិបត្តិយជ្ញសម្រាប់មនុស្សទៀត—ព្រះអង្គក៏សម្រេចចិត្តរៀបចំយជ្ញដ៏អធិកអធមមួយ។

Verse 3

संकल्प्य मनसा यज्ञ करन्धमसुतात्मज: । बृहस्पतिमुपागम्य वाग्मी वचनमत्रवीत्‌,बातचीत करनेमें कुशल करन्धमपौत्र मरुत्तने मन-ही-मन यज्ञका संकल्प करके बृहस्पतिजीके पास जाकर उनसे इस प्रकार कहा--

ដោយបានប្តេជ្ញាចិត្តក្នុងមនសិការ ថានឹងធ្វើយញ្ញា មរុត្ត—ចៅប្រុសរបស់ ករណ្ឌម និងកូនរបស់ អសូត—បានចូលទៅជិត ព្រះបૃហស្បតិ។ ជាអ្នកមានវាចាស្ទាត់ជំនាញ គាត់បានទូលព្រះអង្គដោយពាក្យសមគួរ។

Verse 4

भगवन्‌ यन्मया पूर्वमभिगम्य तपोधन । कृतो$भिसंधिर्यज्ञस्य भवतो वचनाद्‌ गुरो,“भगवन्‌! तपोधन! गुरुदेव! मैंने पहले एक बार आकर जो आपसे यज्ञके विषयमें सलाह ली थी और आपने जिसके लिये मुझे आज्ञा दी थी, उस यज्ञको अब मैं प्रारम्भ करना चाहता हूँ। आपके कथनानुसार मैंने सब सामग्री एकत्र कर ली है। साधु पुरुष! मैं आपका पुराना यजमान भी हूँ। इसलिये चलिये, मेरा यज्ञ करा दीजिये”

«ព្រះអង្គដ៏គួរគោរព! អ្នកបួសមានតបស្យាខ្ពស់! គ្រូដ៏អធិការ! មុននេះ ខ្ញុំបានមកសុំប្រឹក្សាព្រះអង្គអំពីយញ្ញា ហើយតាមព្រះបន្ទូលរបស់គ្រូ ខ្ញុំបានបង្កើតសេចក្តីប្តេជ្ញាសម្រាប់យញ្ញានោះ។ ឥឡូវនេះ ខ្ញុំចង់ចាប់ផ្តើមយញ្ញានោះហើយ។ តាមព្រះបន្ទូល ខ្ញុំបានប្រមូលសម្ភារៈទាំងអស់រួចរាល់។ ព្រះសង្ឃសុចរិត! ខ្ញុំជាយជមានរបស់ព្រះអង្គមកយូរ សូមព្រះអង្គមកធ្វើជាព្រះបូជាចារ្យ ដឹកនាំយញ្ញារបស់ខ្ញុំ»។

Verse 5

तमहं यष्टुमिच्छामि सम्भारा: सम्भृताश्च मे । याज्यो5स्मि भवत: साधो तत्‌ प्राप्तुहि विधत्स्व च,“भगवन्‌! तपोधन! गुरुदेव! मैंने पहले एक बार आकर जो आपसे यज्ञके विषयमें सलाह ली थी और आपने जिसके लिये मुझे आज्ञा दी थी, उस यज्ञको अब मैं प्रारम्भ करना चाहता हूँ। आपके कथनानुसार मैंने सब सामग्री एकत्र कर ली है। साधु पुरुष! मैं आपका पुराना यजमान भी हूँ। इसलिये चलिये, मेरा यज्ञ करा दीजिये”

«ខ្ញុំប្រាថ្នាធ្វើយញ្ញានោះ។ សម្ភារៈទាំងអស់ខ្ញុំបានប្រមូលរួចហើយ។ ឱអ្នកសុចរិត! ខ្ញុំគួរឲ្យព្រះអង្គជាអ្នកបូជាចារ្យដឹកនាំ; ដូច្នេះ សូមព្រះអង្គរៀបចំឲ្យខ្ញុំទទួលបានការប្រតិបត្តិពិធីដោយត្រឹមត្រូវ»។

Verse 6

ब॒हस्पतिर्वाच न कामये याजयितु त्वामहं पृथिवीपते । वृतो5स्मि देवराजेन प्रतिज्ञातं च तस्य मे,बृहस्पतिजीने कहा--राजन्‌! अब मैं तुम्हारा यज्ञ कराना नहीं चाहता। देवराज इन्द्रने मुझे अपना पुरोहित बना लिया है और मैंने भी उनके सामने यह प्रतिज्ञा कर ली है इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अश्वलमेधपर्वणि संवर्तमरुत्तीये षष्ठो5ध्याय: ।। ६ ।। इस प्रकार श्रीमह्ाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अश्वमेधपर्वमें संवर्त और मरुत्तका उपाख्यानविषयक छठा अध्याय पूरा हुआ

ព្រះបૃហស្បតិមានព្រះបន្ទូលថា៖ «ឱព្រះមហាក្សត្រអធិការលើផែនដី! ខ្ញុំមិនប្រាថ្នាធ្វើជាព្រះបូជាចារ្យដឹកនាំយញ្ញារបស់អ្នកទេ។ ព្រះឥន្ទ្រា ព្រះរាជានៃទេវតា បានជ្រើសខ្ញុំជាពុរោហិត ហើយខ្ញុំក៏បានប្តេជ្ញាពាក្យសច្ចៈចំពោះព្រះអង្គរួចហើយ»។

Verse 7

मरुत्त उवाच पित्र्यमस्मि तव क्षेत्र बहु मन्‍्ये च ते भृशम्‌ तवास्मि याज्यतां प्राप्तो भजमानं भजस्व माम्‌,मरुत्त बोले--विप्रवर! मैं आपके पिताके समयसे ही आपका यजमान हूँ तथा विशेष सम्मान करता हूँ। आपका शिष्य हूँ और आपकी सेवामें तत्पर रहता हूँ। अतः मुझे अपनाइये

មរុត្តបានទូលថា៖ «ឱព្រាហ្មណ៍ដ៏ប្រសើរ! តាំងពីសម័យឪពុករបស់ខ្ញុំមក ខ្ញុំជាយជមានរបស់លោក ហើយខ្ញុំគោរពលោកយ៉ាងខ្លាំង។ ខ្ញុំជាសិស្សរបស់លោក និងខិតខំសេវាកម្មជានិច្ច។ ដូច្នេះ សូមលោកទទួលយកខ្ញុំ និងអនុគ្រោះដល់ខ្ញុំ»។

Verse 8

बुहस्पतिर्वाच अमर्त्य याजयित्वाहं याजयिष्ये कथं नरम्‌ । मरुत्त गच्छ वा मा वा निवृत्तो<स्म्यद्य याजनात्‌,बृहस्पतिजीने कहा--मरुत्त! अमरोंका यज्ञ करानेके बाद मैं मरणधर्मा मनुष्योंका यज्ञ कैसे कराऊँगा? तुम जाओ या रहो। अब मैं मनुष्योंका यज्ञकार्य करानेसे निवृत्त हो गया हूँ

ព្រះបុហស្បតិ៍បានមានព្រះវាចា៖ «ខ្ញុំបានធ្វើពិធីយជ្ញៈជាបុរោហិតសម្រាប់ពួកអមរទេវរួចហើយ តើខ្ញុំនឹងធ្វើពិធីយជ្ញៈសម្រាប់មនុស្សស្លាប់បានដូចម្តេច? មរុត្ត អ្នកចង់ទៅក៏ទៅ ចង់នៅក៏នៅ—ថ្ងៃនេះខ្ញុំបានដកខ្លួនចេញពីការធ្វើជាបុរោហិតហើយ»។

Verse 9

न त्वां याजयितास्म्यद्य वृणु यं त्वमिहेच्छसि । उपाध्यायं महाबाहो यस्ते यज्ञ करिष्यति,महाबाहो! मैं तुम्हारा यज्ञ नहीं कराऊँगा। तुम दूसरे जिसको चाहो उसीको अपना पुरोहित बना लो। जो तुम्हारा यज्ञ करायेगा

មរុត្តបានមានព្រះវាចា៖ «ថ្ងៃនេះខ្ញុំមិនធ្វើពិធីយជ្ញៈរបស់អ្នកទេ។ មហាបាហូ! អ្នកចូរជ្រើសរើសអ្នកណាម្នាក់ដែលអ្នកពេញចិត្តនៅទីនេះ ឲ្យធ្វើជាគ្រូបុរោហិត—អ្នកដែលនឹងប្រតិបត្តិយជ្ញៈរបស់អ្នក»។

Verse 10

व्यास उवाच एवमुक्तस्तु नृपतिर्मरुत्तो व्रीडितो5भवत्‌ । प्रत्यागच्छन्‌ सुसंविग्नो ददर्श पथि नारदम्‌,व्यासजी कहते हैं--राजन्‌! बृहस्पतिजीसे ऐसा उत्तर पाकर महाराज मरुत्तको बड़ा संकोच हुआ। वे बहुत खिन्न होकर लौटे जा रहे थे, उसी समय मार्ममें उन्हें देवर्षि नारदजीका दर्शन हुआ

វ្យាសបានមានព្រះវាចា៖ ព្រះរាជាមរុត្តបានទទួលពាក្យឆ្លើយបែបនោះហើយ ក៏មានអារម្មណ៍អៀនខ្មាសយ៉ាងខ្លាំង។ ដោយទុក្ខសោក និងចិត្តរវល់រវាយ ព្រះអង្គបានត្រឡប់ក្រោយ; ខណៈកំពុងត្រឡប់តាមផ្លូវ ព្រះអង្គបានឃើញទេវឥសី នារទ។

Verse 11

देवर्षिणा समागम्य नारदेन स पार्थिव: । विधिवत्‌ प्राउ्जलिस्तस्थावथैनं नारदो<ब्रवीत्‌,देवर्षि नारदके साथ समागम होनेपर राजा मरुत्त यथाविधि हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तब नारदजीने उनसे कहा--

វ្យាសបានមានព្រះវាចា៖ ពេលបានជួបទេវឥសី នារទ ព្រះរាជាមរុត្តបានឈរដោយប្រកបដោយកិច្ចគោរព តាមពិធី ដោយប្រណម្យដៃ។ បន្ទាប់មក នារទបានមានព្រះវាចាទៅកាន់ព្រះអង្គ—

Verse 12

राजर्ष नातिहृष्टोड्सि कच्चित्‌ क्षेमं तवानघ । क्व गतो5सि कुतश्वैदमप्रीतिस्थानमागतम्‌,*राजर्षे! तुम अधिक प्रसन्न नहीं दिखायी देते हो। निष्पाप नरेश! तुम्हारे यहाँ कुशल तो है न? कहाँ गये थे और किस कारण तुम्हें यह खेदका अवसर प्राप्त हुआ है?

«រាជឥសីអើយ អ្នកមិនសូវរីករាយទេ។ ព្រះរាជាដែលគ្មានបាបអើយ នៅទីក្រុងរបស់អ្នកសុខសាន្តល្អទេឬ? អ្នកទៅណាមក ហើយដោយហេតុអ្វីបានជាអ្នកជួបឱកាសនៃទុក្ខសោក និងការមិនពេញចិត្តនេះ?»

Verse 13

श्रोतव्यं चेन्मया राजन ब्रूहि मे पार्थिवर्षभ । व्यपनेष्यामि ते मन्युं सर्वयत्नैर्नराधिप,“राजन! नृपश्रेष्ठ! यदि मेरे सुनने योग्य हो तो बताओ। नरेश्वर! मैं पूर्ण यत्न करके तुम्हारा दुःख दूर करूँगा”

វ្យាសៈបានមានពាក្យថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ—គោឧសភក្នុងចំណោមអ្នកគ្រប់គ្រង! បើរឿងនោះសមគួរឲ្យខ្ញុំស្តាប់ ចូរប្រាប់ខ្ញុំមក។ ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃមនុស្សទាំងឡាយ! ខ្ញុំនឹងខិតខំដោយអស់ពីកម្លាំង ដើម្បីបំបាត់ទុក្ខព្រួយ និងការរអាក់រអួលក្នុងចិត្តរបស់ព្រះអង្គ»។

Verse 14

एवमुक्तो मरुत्त: स नारदेन महर्षिणा । विप्रलम्भमुपाध्यायात्‌ सर्वमेव न्यवेदयत्‌,महर्षि नारदके ऐसा कहनेपर राजा मरुत्तने उपाध्याय (पुरोहित)-से बिछोह होनेका सारा समाचार उन्हें कह सुनाया

វ្យាសៈបានមានពាក្យថា៖ ដោយត្រូវមហាឥសី នារ៉ទៈ មានព្រះវាចាដូច្នោះហើយ ព្រះមហាក្សត្រ មរុត្តៈ បានរាយការណ៍ទាំងស្រុងអំពីរឿងរ៉ាវនៃការបែកចេញពីគ្រូបូជាចារ្យ (បុរោហិត) របស់ព្រះអង្គ។

Verse 15

मरुत्त उवाच गतोअस्म्यड्विरसः पुत्र देवाचार्य बृहस्पतिम्‌ । यज्ञार्थमृत्विजं द्रष्टूं सच मां नाभ्यनन्दत,मरुत्तने कहा--नारदजी! मैं अंगिराके पुत्र देवगुरु बृहस्पतिके पास गया था। मेरी यात्राका उद्देश्य यह था कि उन्हें अपना यज्ञ करानेके लिये ऋत्विजके रूपमें देखूँ: किंतु उन्होंने मेरी प्रार्थना स्वीकार नहीं की

មរុត្តៈបានមានពាក្យថា៖ «ឱ នារ៉ទៈ! ខ្ញុំបានទៅរក ព្រហស្បតិ៍—គ្រូទេវតា កូនរបស់ អង្គិរៈ—ដោយមានបំណងសូមឲ្យលោកធ្វើជាឥត្វិជ (បូជាចារ្យប្រតិបត្តិ) សម្រាប់យញ្ញរបស់ខ្ញុំ។ ប៉ុន្តែលោកមិនពេញចិត្តខ្ញុំទេ—លោកមិនទទួលសំណើរបស់ខ្ញុំឡើយ»។

Verse 16

प्रत्याख्यातश्न तेनाहं जीवितुं नाद्य कामये । परित्यक्तश्न गुरुणा दूषितश्चास्मि नारद,नारदजी! मेरे गुरुने मुझपर मरणधर्मा मनुष्य होनेका दोष लगाकर मुझे त्याग दिया। उनके द्वारा इस प्रकार अस्वीकार किये जानेके कारण अब मैं जीवित रहना नहीं चाहता

មរុត្តៈបានមានពាក្យថា៖ «ដោយត្រូវលោកបដិសេធ ខ្ញុំមិនប្រាថ្នាចង់រស់នៅថ្ងៃនេះទៀតឡើយ។ ត្រូវគ្រូបោះបង់ ហើយត្រូវស្តីបន្ទោសដូចជាមានកំហុស ឱ នារ៉ទៈ ខ្ញុំក្លាយជាមនុស្សអាម៉ាស់។ ពេលគ្រូរបស់ខ្លួនបដិសេធយ៉ាងនេះ—ដាក់បន្ទុកថា ‘ជាមនុស្សស្លាប់បាន’—ជីវិតសម្រាប់ខ្ញុំក៏បាត់ន័យទៅ»។

Verse 17

व्यास उवाच एवमुक्तस्तु राज्ञा स नारद: प्रत्युवाच ह । आविक्षितं महाराज वाचा संजीवयन्निव,व्यासजी कहते हैं--महाराज! राजा मरुत्तके ऐसा कहनेपर देवर्षि नारदने अपनी अमृतमयी वाणीके द्वारा अविक्षितकुमारको जीवन प्रदान करते हुए-से कहा

វ្យាសៈបានមានពាក្យថា៖ ពេលព្រះមហាក្សត្របានមានពាក្យដូច្នោះ នារ៉ទៈឥសីក៏ឆ្លើយតប។ ឱ មហាក្សត្រ! ដោយអំណាចនៃព្រះវាចាដូចទឹកអម្រឹតរបស់លោក វាហាក់ដូចជាលោកបានផ្តល់ជីវិតឡើងវិញដល់ព្រះអង្គម្ចាស់ អាវិក្សិតៈ—ដាស់ឲ្យរស់ឡើងដោយពាក្យដែលនាំមកនូវភាពច្បាស់លាស់ កម្លាំងចិត្ត និងគោលបំណងថ្មី។

Verse 18

नारद उवाच राजन्नज्धिरस: पुत्र: संवर्तो नाम धार्मिक: । चड्क्रमीति दिश: सर्वा दिग्वासा मोहयन्‌ प्रजा:,नारदजी बोले--राजन्‌! अंगिराके दूसरे पुत्र संवर्त बड़े धार्मिक हैं। वे दिगम्बर होकर प्रजाको मोहमें डालते हुए अर्थात्‌ सबसे छिपे रहकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते रहते हैं। यदि बृहस्पति तुम्हें अपना यजमान बनाना नहीं चाहते तो तुम संवर्तके ही पास चले जाओ संवर्त बड़े तेजस्वी हैं, वे प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारा यज्ञ करा देंगे

នារ៉ដៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! អង្គិរាសមានបុត្រទីពីរម្នាក់ឈ្មោះ សំវរតៈ ជាអ្នកប្រកាន់ធម៌យ៉ាងមាំមួន។ គាត់រស់នៅដោយគ្មានសម្លៀកបំពាក់ ហើយលាក់ខ្លួនពីភ្នែកមនុស្សទូទៅ ធ្វើឲ្យប្រជាជនភាន់ច្រឡំ ខណៈដែលគាត់ដើរល្បាតទៅគ្រប់ទិសទាំងអស់ជានិច្ច។ ប្រសិនបើ ព្រហស្បតិ មិនចង់ទទួលព្រះអង្គជាយជមានសម្រាប់ពិធីយញ្ញទេ នោះសូមព្រះអង្គទៅរក សំវរតៈវិញ; គាត់មានតេជៈរុងរឿងខ្លាំង ហើយពេលគាត់ពេញចិត្ត គាត់នឹងធ្វើពិធីយញ្ញឲ្យព្រះអង្គដោយសប្បាយចិត្ត»។

Verse 19

तं॑ गच्छ यदि याज्यं त्वां न वाउ्छति बृहस्पति: । प्रसन्नस्त्वां महातेजा: संवर्तो याजयिष्यति,नारदजी बोले--राजन्‌! अंगिराके दूसरे पुत्र संवर्त बड़े धार्मिक हैं। वे दिगम्बर होकर प्रजाको मोहमें डालते हुए अर्थात्‌ सबसे छिपे रहकर सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करते रहते हैं। यदि बृहस्पति तुम्हें अपना यजमान बनाना नहीं चाहते तो तुम संवर्तके ही पास चले जाओ संवर्त बड़े तेजस्वी हैं, वे प्रसन्नतापूर्वक तुम्हारा यज्ञ करा देंगे

នារ៉ដៈបាននិយាយថា៖ «បើ ព្រហស្បតិ មិនចង់ទទួលព្រះអង្គជាយជមានសម្រាប់ពិធីបូជាទេ នោះសូមព្រះអង្គទៅរក សំវរតៈ។ បុរសមានតេជៈដ៏មហិមា​នោះ បើបានពេញចិត្ត នឹងធ្វើពិធីយញ្ញឲ្យព្រះអង្គដោយរីករាយ»។

Verse 20

मरुत्त उवाच संजीवितो&5हं भवता वाक्येनानेन नारद | पश्येयं क्‍्व नु संवर्त शंस मे वदतां वर,मरुत्त बोले--वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजी! आपने यह बात बताकर मुझे जिला दिया। अब यह बताइये कि मैं संवर्त मुनिका दर्शन कहाँ कर सकूँगा? मुझे उनके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये? मैं कैसा व्यवहार करूँ, जिससे वे मेरा परित्याग न करें। यदि उन्होंने भी मेरी प्रार्थना ठुकरा दी तब मैं जीवित नहीं रह सकूँगा

មរុត្តៈបាននិយាយថា៖ «ឱ នារ៉ដៈ អ្នកប្រសើរបំផុតក្នុងចំណោមអ្នកនិយាយ! ដោយពាក្យទាំងនេះរបស់លោក ខ្ញុំដូចជាត្រូវបានសង្គ្រោះជីវិតឡើងវិញ។ សូមប្រាប់ខ្ញុំ—ខ្ញុំនឹងអាចឃើញ សំវរតៈ នៅទីណា? សូមណែនាំខ្ញុំថា ខ្ញុំគួរចូលទៅជិតគាត់យ៉ាងដូចម្តេច ដើម្បីកុំឲ្យត្រូវគាត់បោះបង់។ បើសូម្បីតែគាត់បដិសេធសំណូមពរខ្ញុំ ខ្ញុំមិនអាចរស់បន្តបានទេ»។

Verse 21

कथं च तस्मै वर्तेयं कथं मां न परित्यजेत्‌ । प्रत्याख्यातश्न तेनापि नाहं जीवितुमुत्सहे,मरुत्त बोले--वक्ताओंमें श्रेष्ठ नारदजी! आपने यह बात बताकर मुझे जिला दिया। अब यह बताइये कि मैं संवर्त मुनिका दर्शन कहाँ कर सकूँगा? मुझे उनके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिये? मैं कैसा व्यवहार करूँ, जिससे वे मेरा परित्याग न करें। यदि उन्होंने भी मेरी प्रार्थना ठुकरा दी तब मैं जीवित नहीं रह सकूँगा

មរុត្តៈបាននិយាយថា៖ «ខ្ញុំគួរប្រព្រឹត្តចំពោះគាត់យ៉ាងដូចម្តេច ដើម្បីឲ្យគាត់មិនបោះបង់ខ្ញុំ? បើសូម្បីតែត្រូវគាត់បដិសេធ ខ្ញុំក៏មិនអាចមានចិត្តរស់បន្តបានឡើយ»។

Verse 22

नारद उवाच उन्मत्तवेषं बिभ्रत्‌ स चड़क्रमीति यथासुखम्‌ | वाराणस्यां महाराज दर्शनेप्सुर्महेश्वरम्‌,नारदजीने कहा--महाराज! वे इस समय वाराणसीमें महेश्वर विश्वनाथके दर्शनकी इच्छासे पागलका-सा वेष धारण किये अपनी मौजसे घूम रहे हैं

នារ៉ដៈបាននិយាយថា៖ «ឱ មហាក្សត្រ! ឥឡូវនេះគាត់កំពុងដើរលេងតាមចិត្តនៅក្នុង វារាណសី ដោយពាក់រូបរាងដូចមនុស្សឆ្កួត ព្រោះគាត់ប្រាថ្នាចង់បានទស្សនៈនៃ មហេស្វរៈ—វិශ්វនាថ»។

Verse 23

तस्या द्वारं समासाद्य न्यसेथा: कुणपं क्वचित्‌ | त॑ दृष्टवा यो निवर्तेत संवर्त: स महीपते,तुम उस पुरीके प्रवेश-द्वारपर पहुँचकर वहाँ कहींसे एक मुर्दा लाकर रख देना। पृथ्वीनाथ! जो उस मुर्देको देखकर सहसा पीछेकी ओर लौट पड़े, उसे ही संवर्त समझना और वे शक्तिशाली मुनि जहाँ कहीं जायँ उनके पीछे-पीछे चले जाना। जब वे किसी एकान्त स्थानमें पहुचें, तब हाथ जोड़कर शरणापत्र हो जाना

នារ​ទៈ បាននិយាយថា៖ «ចូរទៅដល់ទ្វារចូលទីក្រុងនោះ ហើយនៅទីណាមួយនៅទីនោះ ចូរយកសពមួយមកដាក់។ ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃផែនដី! អ្នកណាដែលឃើញសពនោះហើយភ្លាមៗត្រឡប់ក្រោយ—ចូរដឹងថា នោះហើយជាសំវរតៈ។ បន្ទាប់មក ចូរតាមដានមហាមុនីដ៏មានអានុភាពនោះ ទៅគ្រប់ទីកន្លែងដែលគាត់ទៅ។ ពេលគាត់ទៅដល់កន្លែងស្ងាត់ឯកោ ចូរចូលទៅដោយបត់ដៃ ហើយសុំជ្រកកោន»។

Verse 24

त॑ पृष्ठतो5नुगच्छेथा यत्र गच्छेत्‌ स वीर्यवान्‌ । तनेकान्ते समासाद्य प्राउजलि: शरणं व्रजे:,तुम उस पुरीके प्रवेश-द्वारपर पहुँचकर वहाँ कहींसे एक मुर्दा लाकर रख देना। पृथ्वीनाथ! जो उस मुर्देको देखकर सहसा पीछेकी ओर लौट पड़े, उसे ही संवर्त समझना और वे शक्तिशाली मुनि जहाँ कहीं जायँ उनके पीछे-पीछे चले जाना। जब वे किसी एकान्त स्थानमें पहुचें, तब हाथ जोड़कर शरणापत्र हो जाना

នារ​ទៈ បាននិយាយថា៖ «ចូរតាមគាត់ពីក្រោយ ទៅគ្រប់ទីកន្លែងដែលបុរសដ៏មានវីរភាពនោះទៅ។ ពេលអ្នកទៅដល់គាត់នៅកន្លែងឯកោ ចូរចូលទៅដោយបត់ដៃ ហើយសុំជ្រកកោន»។

Verse 25

पृच्छेत्‌ त्वां यदि केनाहं तवाख्यात इति सम ह । ब्रूयास्त्वं नारदेनेति संवर्त कथितोडसि मे,यदि तुमसे पूछें कि किसने तुम्हें मेरा पता बताया है तो कह देना--'संवर्तजी! नारदजीने मुझे आपका पता बताया है”

នារ​ទៈ បាននិយាយថា៖ «បើគេសួរអ្នកថា ‘អ្នកណាបានប្រាប់អ្នកអំពីខ្ញុំ?’ នោះចូរឆ្លើយថា ‘ដោយនារ​ទៈ’។ ដូច្នេះហើយ ឱ សំវរតៈ អ្នកត្រូវបានបញ្ជាក់ចំពោះខ្ញុំថាជាអ្នកដែលត្រូវចូលទៅជួប»។

Verse 26

स चेत्‌ त्वामनुयुञ्जीत ममानुगमनेप्सया । शंसेथा वहल्लिमारूढं मामपि त्वमशड्कया,यदि वे तुमसे मेरे पास आनेके लिये मेरा पता पूछें तो तुम निर्भीक होकर कह देना कि “नारदजी आगमें समा गये”

នារ​ទៈ បាននិយាយថា៖ «បើគាត់សួរអ្នក ដោយចង់តាមខ្ញុំ ហើយសួរអំពីទីកន្លែងដែលខ្ញុំស្ថិតនៅ នោះចូរប្រាប់ដោយមិនភ័យ និងមិនស្ទាក់ស្ទើរ​ថា ‘នារ​ទៈ បានចូលទៅក្នុងភ្លើងហើយ’»។

Verse 27

व्यास उवाच स तथेति प्रतिश्रुत्य पूजयित्वा च नारदम्‌ | अभ्यनुज्ञाय राजर्षिययौ वाराणसीं पुरीम्‌,व्यासजी कहते हैं--राजन! यह सुनकर राजर्षि मरुत्तने “बहुत अच्छा" कहकर नारदजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की और उनसे जानेकी आज्ञा ले वे वाराणसीपुरीकी ओर चल दिये

វ្យាសៈ បាននិយាយថា៖ ព្រះរាជឥសី មរុត្តៈ បានស្តាប់ហើយយល់ព្រមថា «ដូច្នោះហើយ»។ គាត់បានគោរពបូជានារ​ទៈ ដោយសក្ការៈសមគួរ សុំអនុញ្ញាតលាចេញ ហើយចេញដំណើរទៅកាន់ទីក្រុង វារាណសី។

Verse 28

तत्र गत्वा यथोक्तं स पुर्या द्वारे महायशा: । कुणपं स्थापयामास नारदस्य वच: स्मरन्‌,वहाँ जाकर नारदजीके कथनका स्मरण करते हुए महायशस्वी नरेशने उनके बताये अनुसार काशीपुरीके द्वारपर एक मुर्दा लाकर रख दिया

លុះព្រះរាជាអ្នកមានកិត្តិយសធំ បានទៅដល់ទីនោះ ហើយរំលឹកព្រះវាចារបស់ព្រះឥសី នារ៉ដៈ (Nārada) ក៏បានប្រតិបត្តិតាមដែលបានបង្គាប់ ដោយយកសពមួយមកដាក់នៅមាត់ទ្វារក្រុង។

Verse 29

यौगपलद्मेन विप्रश्न पुरीद्वारमथाविशत्‌ । ततः स कुणपं दृष्टवा सहसा संन्यवर्तत,इसी समय विप्रवर संवर्त भी पुरीके द्वारपर आये; किंतु उस मुर्देको देखकर वे सहसा पीछेकी ओर लौट पड़े

ដោយអំណាចយោគៈ ព្រះព្រាហ្មណ៍ដ៏ឧត្តមបានចូលទៅកាន់មាត់ទ្វារក្រុង។ តែពេលឃើញសពនៅទីនោះ ក៏ភ្ញាក់ផ្អើលថយក្រោយភ្លាម ហើយត្រឡប់ចេញវិញ។

Verse 30

सतं निवृत्तमालक्ष्य प्राउ्जलि: पृष्ठतो5न्वगात्‌ । आविक्षितो महीपाल: संवर्तमुपशिक्षितुम्‌,उन्हें लौटा देख राजा मरुत्त संवर्तसे शिक्षा लेनेके लिये हाथ जोड़े उनके पीछे-पीछे गये

ព្រះរាជា អាវិក្សិត (Āvikṣita) អធិរាជលើផែនដី ឃើញព្រះឥសីត្រឡប់ក្រោយ ក៏ប្រណម្យដៃ ហើយដើរតាមពីក្រោយ ដើម្បីសុំសិក្សាពី សំវរត (Saṁvarta)។

Verse 31

सचतंविजने दृष्टवा पांसुभि: कर्दमेन च । श्लेष्मणा चैव राजानं छीवनैश्व समाकिरत्‌,एकान्तमें पहुँचनेपर राजाको अपने पीछे-पीछे आते देख संवर्तने उनपर धूल फेंकी, कीचड़ उछाला तथा थूक और खखार डाल दिये

វ្យាសៈបាននិយាយថា៖ ពេល សំវរត (Saṁvarta) ឃើញព្រះរាជាតាមទៅដល់ទីស្ងាត់ឯកោ ក៏បោះធូលីលើព្រះអង្គ សាច់ក泥បាញ់ ហើយថែមទាំងបំពុលដោយស្លេស្ម ទឹកមាត់ និងកំហាកទៀត។

Verse 32

स तथा बाध्यमानो वै संवर्तेन महीपति: । अन्वगादेव तमृषिं प्राउजलि: सम्प्रसादयन्‌,इस प्रकार संवर्तके सतानेपर भी राजा मरुत्त हाथ जोड़ उन्हें प्रसन्न करनेके उद्देश्यसे उन महर्षिके पीछे-पीछे चले ही गये

ទោះបីត្រូវ សំវរត (Saṁvarta) រារាំង និងបៀតបៀនយ៉ាងនោះក្តី ព្រះមហាក្សត្រមិនបានត្រឡប់ក្រោយឡើយ។ ព្រះអង្គប្រណម្យដៃ ដើរតាមព្រះឥសីនោះបន្ត ដើម្បីធ្វើឲ្យព្រះឥសីពេញព្រះហឫទ័យ។

Verse 33

ततो निवर्त्य संवर्त: परिश्रान्त उपाविशत्‌ । शीतलच्छायमासाद्य न्यग्रोध॑ बहुशाखिनम्‌,तब संवर्त मुनि लौटकर शीतल छायासे युक्त तथा अनेक शाखाओंसे सुशोभित एक बरगदके नीचे थककर बैठ गये

បន្ទាប់មក សំវរតៈ បានត្រឡប់ក្រោយ ហើយអង្គុយចុះដោយអស់កម្លាំង។ គាត់ស្វែងរកម្លប់ត្រជាក់ក្រោមដើមជ្រៃធំមែកសាខាច្រើន ហើយសម្រាកនៅទីនោះ—ដូចរូបសង្ឃមុនីមួយ ដែលឈប់ស្ងប់ដើម្បីប្រមូលស្មារតី និងកម្លាំង មុននឹងបន្តបេសកកម្មរបស់ខ្លួន។

Frequently Asked Questions

The conflict is between Bṛhaspati’s prior contractual vow to the Devarāja and Marutta’s expectation of priestly service based on earlier approach and readiness—testing how dharma adjudicates competing claims without violating pledged truth.

Legitimate ends (a public rite) require legitimate means: counsel, patience, and respect for autonomous obligations are portrayed as superior to entitlement, while perseverance under humiliation is shown as a prerequisite for accessing difficult spiritual authority.

No explicit phalaśruti is stated in this segment; the meta-function is exemplum-based instruction—using an ancient narrative to frame how ritual action, vows, and advisory mediation should be understood within broader dharma reasoning.