शमीवृक्षस्थायुधप्रकाशनम् / Revelation and Identification of the Weapons on the Śamī Tree
(मत्ता इव महानागा युक्तध्वजपताकिन: । नीतिमन्तो महेष्वासा सर्वास्त्रिकृतनि श्चया: ।। दुर्जया: सर्वसैन्यानां देवेरपि सवासवै: । पताकिनश्च मातड्ा: सध्वजाश्न महारथा: ।। विप्रकीर्णा: कृतोद्योगा वाजिनश्रित्र भूषिता: । तान् जेतुं समरे शूरान् दुर्बुद्धिरहमागत: ।।) ये कौरववीर मदसे उन्मत्त हुए महान् गजराजोंके समान जान पड़ते हैं। ये सबके सब ध्वजा-पताकाओंसे युक्त, नीतिनिपुण, महाधनुर्धर तथा सम्पूर्ण अस्त्रविद्याका सुनिश्चित ज्ञान रखते हैं। इनपर विजय पाना सम्पूर्ण सेनाओंके लिये ही नहीं, इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अत्यन्त कठिन है। इनके हाथियोंपर भी पताकाएँ फहरा रही हैं। बड़े-बड़े रथ ध्वजाओंसे सुशोभित हो रहे हैं। विचित्र आभूषणोंसे आभूषित घोड़े चारों ओर फैलकर विजयके लिये उद्योगशील प्रतीत होते हैं। ऐसे शूरवीर कौरवोंको युद्धमें जीतनेके लिये मैं दुर्बद्धि बालक कहाँ आ गया। दृष्टवैव हि कुरूनेतान् व्यूढानीकान् प्रहारिण: । हृषितानि च रोमाणि कश्मलं चागतं मम,सेनाकी व्यूहरचना करके प्रहारके लिये उद्यत खड़े हुए इन कौरवोंको देखकर ही मेरे रोंगटे खड़े हो गये हैं। मुझे मूर्च्छा-सी आ रही है
uttara uvāca |
matta iva mahānāgā yuktadhvajapatākinaḥ |
nītimanto maheṣvāsā sarvāstrikṛtaniścayāḥ ||
durjayāḥ sarvasainyānāṃ devair api savāsavaiḥ |
patākinaś ca mātaṅgāḥ sadhvajāś ca mahārathāḥ ||
viprakīrṇāḥ kṛtodyogā vājināś citrabhūṣitāḥ |
tān jetuṃ samare śūrān durbuddhir aham āgataḥ ||
dṛṣṭvaiva hi kurūn etān vyūḍhānīkān prahāriṇaḥ |
hṛṣitāni ca romāṇi kaśmalaṃ cāgataṃ mama ||
ウッタラは言った。「このカウラヴァの勇士たちは、酔いに狂った大象のように見える。皆が旗幟を掲げ、政道にも通じ、強弓の射手であり、あらゆる武器の知と用に確信を持っている。彼らを征することは、全軍にとってのみならず、インドラに率いられる神々にとってさえ至難である。彼らの戦象にも旗が翻り、巨大な戦車は旌旗に輝き、さまざまな飾りをまとった馬は四方に散って、勝利を渇望しているかのようだ。それなのに、この愚かな子どもの私が、かような勇士を戦場で打ち破ろうとしてここへ来たのか!まことに、攻撃のために陣を敷き、打ちかからんとするクル族を見ただけで、毛は逆立ち、眩暈のような—混乱と恐怖—が私を襲う。」
उत्तर उवाच