Rājarṣi-samāgamaḥ — Yudhiṣṭhirasya Dharma-parīkṣā ca
Meeting the Royal Sage and a Dharmic Audit
ऊषुर्नातिचिरं कालं॑ रममाणा: कुरूद्वहा: | प्रतीक्षमाणा बीभत्सुं गन्धमादनसानुषु,“यदि मेरा प्रिय करना चाहते हो तो फिर ऐसा काम न करना।” भीमसेनको ऐसा उपदेश देकर उन्होंने पूर्वोक्त सौगन्धिक कमल ले लिये और वे देवोपम पाण्डव उसी सरोवरके तटपर इधर-उधर भ्रमण करने लगे। इसी समय शिलाओंको आयुधरूपमें ग्रहण किये, बहुत-से विशालकाय उद्यानरक्षक वहाँ प्रकट हो गये। भारत! उन्होंने धर्मराज युधिष्ठिर, महर्षि लोमश, नकुल-सहदेव तथा अन्यान्य श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको विनयपूर्वक नतमस्तक होकर प्रणाम किया। फिर धर्मराज युधिष्ठिरने उन्हें सान्त्वना दी। इससे वे निशाचर (राक्षस) प्रसन्न हो गये। तदनन्तर वे कुरुप्रवर पाण्डव धनाध्यक्ष कुबेरकी जानकारीमें कुछ कालतक वहाँ आनन्दपूर्वक टिके रहे और गन्धमादन पर्वतके शिखरोंपर अर्जुनके आगमनकी प्रतीक्षा करते रहे
vaiśampāyana uvāca | ūṣur nāticiraṃ kālaṃ ramamāṇāḥ kurūdvahāḥ | pratīkṣamāṇā bībhatsuṃ gandhamādana-sānūṣu ||
ヴァイシャンパーヤナは語った。クル族の最勝者たるパーンダヴァたちは、そこに長くは留まらなかった。彼の地を楽しみつつ、ガンダマーダナの山腹に身を置き、ビーバツ(アルジュナ)の到来を待った。この場面は、規律ある節制を示す。彼らは放浪と歓楽をひととき止めながらも、志は揺るがない—アルジュナとの再会、そしてダルマに縛られた旅の継続である。
वैशम्पायन उवाच