Kuberasaras-darśana (Bhīma beholds Kubera’s guarded lotus-lake) / कुबेरसरः-दर्शनम्
विसिष्मिये तदा भीमो जहृषे च पुन: पुनः । तमर्कमिव तेजोभि: सौवर्णमिव पर्वतम्,वे वानरवीर अपनी विशाल पूँछको हिलाते हुए सम्पूर्ण दिशाओंको घेरकर खड़े थे। भाईके उस विराट् रूपको देखकर कौरवनन्दन भीमको बड़ा आश्चर्य हुआ। उनके शरीरमें बार-बार हर्षसे रोमांच होने लगा। हनुमानजी तेजमें सूर्यके समान दिखायी देते थे। उनका शरीर सुवर्णमय मेरुपर्वतके समान था और उनकी प्रभासे सारा आकाशमण्डल प्रज्वलित- सा जान पड़ता था। उनकी ओर देखकर भीमसेनने दोनों आँखें बंद कर लीं। तब हनुमानजी उनसे मुसकराते हुए-से बोले---
vaiśampāyana uvāca |
visiṣmiye tadā bhīmo jahṛṣe ca punaḥ punaḥ |
tam arkam iva tejobhiḥ sauvarṇam iva parvatam ||
ヴァイシャンパーヤナは語った。そのときビーマは驚嘆し、幾度となく歓喜に身を震わせた。ハヌマーンは光輝において太陽のごとく、姿において黄金の山のごとく見えた――兄の広大なる神威の前に、ビーマの胸は畏敬と昂揚で満ちあふれたのである。
वैशम्पायन उवाच