Bhīmasena–Hanūmān Saṃvāda: The Tail Test and the Divine Path
बद्धश्रोत्रमनश्षक्षुर्जगामामितविक्रम: । वह देखनेमें ऐसा जान पड़ता था मानो पृथिवीके समस्त आभूषणोंसे विभूषित ऊँचे उठी हुई भुजा हो। गन्धमादनके शिखर सब ओरसे रमणीय थे। वहाँ कोयल पक्षियोंकी शब्दध्वनि हो रही थी और झुंड-के-झुंड भौरे मड़रा रहे थे। भीमसेन उन्हींमें आँखें गड़ाये मन-ही-मन अभिलषित कार्यका चिन्तन करते जाते थे। अमितपराक्रमी भीमके कान, नेत्र और मन उन्हीं शिखरोंमें अटके रहे अर्थात् उनके कान वहाँके विचित्र शब्दोंको सुननेमें लग गये; आँखें वहाँके अद्भुत दृश्योंको निहारने लगीं और मन वहाँकी अलौकिक विशेषताके विषयमें सोचने लगा और वे अपने गन्तव्य स्थानकी ओर अग्रसर होते चले गये ।। १६-१७ हे || आजिपघ्रन् स महातेजा: सर्वर्तुकुसुमोद्भधवम्,वे महातेजस्वी कुन्तीकुमार सभी ऋतुओंके फूलोंके उत्कट सुगन्धका आस्वादन करते हुए वनमें उद्दामगतिसे विचरनेवाले मदोन्मत्त गजराजकी भाँति चले जा रहे थे। नाना प्रकारके कुसुमोंसे सुवासित गन्धमादनकी परम पवित्र वायु उन्हें पंखा झल रही थी। जैसे पिताको पुत्रका स्पर्श शीतल एवं सुखद जान पड़ता है, वैसा ही सुख भीमसेनको उस पर्वतीय वायुके स्पर्शसे मिल रहा था। उनके पिता पवनदेव उनकी सारी थकावट हर लेते थे। उस समय हर्षातिरेकसे भीमके शरीरमें रोमांच हो रहा था
baddhaśrotramanaścakṣur jagāmāmitavikramaḥ |
ヴァイシャンパーヤナは語った。計り知れぬ武勇の英雄は、耳も心も眼もことごとく据えたまま進んだ――聞くもの、見るもの、思うものに没入して。かくしてビーマは目的地へと歩を運び、驚異の峰々とその妖しくも麗しい音と景に注意を奪われつつ、内なる決意はなお彼の成し遂げんとする務めを形づくっていた。
वैशम्पायन उवाच
The verse highlights disciplined attention: a purposeful person advances by fixing the senses and mind on the chosen aim, letting perception and reflection support resolve rather than distract it.
Vaiśampāyana narrates that Bhīma continues his journey with his hearing, sight, and mind fully absorbed—captivated by the remarkable surroundings while pressing onward toward his intended goal.