Pulastya’s Tīrtha Enumeration: Sarasvatī, Naimiṣa, Gayā, and Associated Phalaśruti
Chapter 82
शाकतवृत्ति: फलैर्वापि कौमारं विन्दते परम् । कण्वाश्रमं ततो गच्छेच्छीजुष्टं लोकपूजितम्,जो शाकाहार या फलाहार करके वहाँ रहता है, वह परम उत्तम कुमारलोक (कार्तिकेयके लोक)-में जाता है। वहाँसे लोकपूजित कण्वके आश्रममें जाय, जो भगवती लक्ष्मीके द्वारा सेवित है
घुलस्त्य उवाच