सहस्राक्षादनवर: कुन्ति पुत्रस्तवेति वै । उत्तरे पारियात्रे च जगुर्भूतानि सर्वश:,धर्मपुत्रो महाबाहुर्विललाप सुविस्तरम् । अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण इधर-उधर बिखरे थे। भीमसेन और नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्रेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रोंसे शोकके आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे। अपने समस्त भ्राताओंको इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाह धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्तामें डूब गये और देरतक विलाप करते रहे-- “धनंजय! जब तुम्हारा जन्म हुआ था, उस समय देवताओंने भी कहा था कि “कुन्ती! तुम्हारा यह पुत्र सहस्रनेत्रधारी इन्द्रसे किसी बातमें कम न होगा।' उत्तर पारियात्र पर्वतपर सब प्राणियोंने तुम्हारे विषयमें यही कहा था कि “ये अर्जुन शीघ्र ही पाण्डवोंकी खोयी हुई राजलक्ष्मीको पुनः लौटा लायेंगे। युद्धमें कोई भी इनपर विजय पानेवाला न होगा और ये भी किसीको परास्त किये बिना न रहेंगे”
vaiśaṃpāyana uvāca |
sahasrākṣād anavaraḥ kuntī-putras taveti vai |
uttare pāriyātre ca jagur bhūtāni sarvaśaḥ ||
Vaiśaṃpāyana said: “Indeed, all beings everywhere proclaimed—both in the northern region of Pāriyātra and beyond—‘This son of Kuntī is in no way inferior to the thousand-eyed Indra.’”
वैशग्पायन उवाच