Dharma-pratyabhijñāna and Vara-pradāna (धर्मप्रत्यभिज्ञानम्—वरप्रदानम्)
मार्कण्डेयजी कहते हैं--तब महान व्रतका पालन करनेवाली सावित्रीने अपने सास- ससुरको प्रणाम करके कहा--'ये मेरे पतिदेव फल आदि लानेके लिये महान् वनमें जा रहे हैं। यदि सासजी और ससुरजी मुझे आज्ञा दें तो मैं भी इनके साथ जाना चाहती हूँ। आज मुझे इनका एक क्षणका भी विरह सहा नहीं जाता। आपके पुत्र आज गुरुजनोंके लिये तथा अन्निहोत्रके उद्देश्स्से फल, फ़ूल और समिधा आदि लानेके लिये वनमें जा रहे हैं, अतः उनको रोकना उचित नहीं है। हाँ, यदि किसी दूसरे कार्यके लिये वनमें जाते होते तो उन्हें रोका भी जा सकता था। एक वर्षसे कुछ ही कम हुआ, मैं आश्रमसे बाहर नहीं निकली। अतः आज फूलोंसे भरे हुए वनको देखनेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है | २३-- २६ || हुमत्सेन उवाच यतः प्रभृति सावित्री पित्रा दत्ता स््नुषा मम | नानयाभ्यर्थनायुक्तमुक्तपूर्व स्मराम्यहम्,द्युमत्सेन बोले--जबसे सावित्रीके पिताने इसे मेरी पुत्रवधू बनाकर दिया है, तबसे आजतक इसने पहले कभी मुझसे किसी बातके लिये प्रार्थना की हो, इसका मुझे स्मरण नहीं है
dyumatsena uvāca | yataḥ prabhṛti sāvitryā pitṛā dattā snuṣā mama | nānayābhyarthanāyuktam uktapūrvaṃ smarāmy aham ||
Dyumatsena said: Ever since Savitri was given to me by her father as my daughter-in-law, I do not recall that she has ever before spoken to me with a request. (Thus, her present plea carries special weight, revealing her restraint, humility, and the seriousness of her devotion to her husband’s duty.)
हुमत्सेन उवाच