Dyumatsena’s Restoration and Sāvitrī’s Disclosure of Yama’s Boons (आरण्यकपर्व, अध्याय २८२)
दिव्याम्बरधर: श्रीमान् सुमृष्टमणिकुण्डल: । विचित्रमाल्यमुकुटो वसन््त इव मूर्तिमान्,रावणने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे। उसके कानोंमें सुन्दर मणिमय कुण्डल झलक रहे थे। वह विचित्र माला और मुकुट पहने मूर्तिमान् वसन्तके समान शोभासम्पन्न जान पड़ता था
मार्कण्डेय उवाच